दूसरों की जय से पहले...(व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | May 24, 2021

हमारे एक मित्र महाशय हैं। वे आए दिन दूर की हाँकते हैं। उनकी मानो तो वे चुटकियों में भारत को विश्व का सरताज बना सकते हैं। अमेरिका जैसे विकसित देशों की प्रगति को व्यर्थ मानते हैं। उनकी मानो तो वे रातों रात दुनिया की रूपरेखा बदल सकते हैं। हम दोनों एक ही पाठशाला में पढ़ते थे। उसमें और मुझ में छह साल का अंतर था। किंतु उसने कभी इस अंतर को मित्रता के बीच आने नहीं दिया। जब वह पंद्रह साल का था तब वह दसवीं कक्षा पढ़ रहा था। उसी वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उसने भाषण देते हुए एक कहानी का जिक्र किया। कहानी का सार यही था कि बदलने की प्रबल इच्छा चिंगारी की भांति हमारे भीतर सुलगती रहनी चाहिए। उसने सभी से अपने-अपने गाँवों की रूपरेखा बदलने की शपथ दिलायी। भाषण इतना प्रेरक और जोरदार था कि तालियों की गड़गड़ाहट से प्रांगण गूँज उठा। उसी दिन कई गपोड़ियों ने उसका नाम हक्कड़ सिंह रख दिया।

जब वह पैंतीस वर्ष का हुआ तो उसे लगा कि गली की दशा बदलना भी आसान नहीं है। तरह-तरह के लोग और तरह-तरह की सोच के बीच तालमेल करना टेढ़ी खीर है। भला इन्हें कौन बदल सकता है? बदलाव, परिवर्तन आदि पर्यायवाची शब्द शब्दकोश में ही अच्छे लगते हैं। वास्तविक जीवन में इसका पालन नभ-पाताल नापने के बराबर है। उसे लगा कि गली से पहले अपने परिजनों में परिवर्तन लाना जरूरी है।

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अब वह पैंतालीस वर्ष का हो चला है। वह परिजनों को बदलने चला था। परिजनों ने उसकी एक न सुनी। उसे तरह-तरह के उलाहने दिए। उसे भला-बुरा कहा। एक दिन जब उसके घर के पास एक बैठक चल रही थी तो उसमें एक पंद्रह वर्षीय बालक मेरे मित्र की भांति समाज में परिवर्तन लाने के बारे में जोर-शोर से भाषण दे रहा था। मित्र को अपना बचपन याद आ गया। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा– लो एक और मुझ जैसा दिवाना आ गया है! चला है समाज बदलने! उसे कोई समझाए कि समाज बदलना पापड़ बेलने जितना आसान काम नहीं है। यहाँ हम इतने वर्षों से बदलने के चक्कर में बूढ़े हो चले हैं। आजकल आदमी जीता ही कितना है? साठ साल की जिंदगी भी जी ले तो वह धन्य मनावे। इतने साल से हम कुछ नहीं कर पाये, भला यह खाक़ कर पाएगा?

यही सब वह कर रहा था कि मंच पर लगे लाउडस्पीकर पर एक गाना चल पड़ा- हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें, दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें। यह गाना सुनने भर की देरी थी कि उसके आँखों में आँसू आ गए। उसने मुझसे केवल इतना ही कहा– शायद मैं दूसरों को तर्जनी अंगुली दिखाने से पहले खुद को दिखाता तो आज मैं कुछ और होता!

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त'

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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