By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त | Nov 03, 2020
बचपन से ही आसमान की ओर देखने, छूने, उड़ने की बड़ी इच्छा थी। चूँकि इच्छाओं को पालने के लिए रुपए-पैसे खर्च नहीं करने पड़ते, इसलिए सभी इसके पीछे लगे रहते हैं। लगे भी क्यों न! घर से लेकर मोहल्ले तक और स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक यही सिखाया गया कि आसमान सफलताओं को छूने के लिए होता है। लेकिन सच यह है कि यह आसमान जितना हमारा है उतना ही प्याज का भी है। यही वजह है कि आए दिन इसकी कीमत आसमान को छूती रहती हैं। एक निम्न-मध्य वर्गीय कामकाजी इंसान की कमाई को चैलेंज करती हैं। चैलेंज भी बड़ा नायाब होता है। मानो कहता हो- दम हो तो एक प्याज खरीद कर दिखा तो मान जाऊँ कि तेरी औकात क्या है। इंसानों के संग रहते-रहते प्याज ने गिरगिट की तरह रंग बदलना सीख लिया है। उसकी जितनी परतें हैं, उतने ही रंग और नखरे हैं। कभी-कभी तो लगता है जितने ट्विस्ट प्यार में नहीं होते उतने तो प्याज में होते हैं।
द्वापर युग में श्रीकृष्ण और कलयुग में प्याज की लीलाएँ अपरंपार है। दोनों के संदेश निराले और प्रेरणादायी हैं। श्रीकृष्ण के संदेशों का सार भगवद्गीता है तो प्याज का अश्रुगाथा है। श्रीकृष्ण जहाँ कहते हैं कि हे मानव! तू केवल कर्म करता जा, फल की चिंता छोड़ दे। ठीक उसी तरह प्याज कहता है, हे मानव! तू केवल मेरी चिंता कर, अपनी चिंता छोड़ दे। विषम परिस्थितियों में कायर बनना, एक प्याज का छिलका तक प्राप्त न करना तेरी जिंदगी की लानत को दर्शाता है। ऐसा करने वाले को स्वर्ग तो क्या नरक में भी जगह नहीं मिल सकती। सच तो यह है कि मरने वाले, जीने वाले और आगे आने वाले के लिए मेरा दर्शन मात्र ही सबसे बड़ा पुण्य है। जिस तरह खेल-कूद के लिए बाल्यावस्था, राम नाम जपने के लिए वृद्धावस्था होती है ठीक उसी तरह प्याज की खरीद-फरोख्त के लिए युवावस्था को समर्पित करना चाहिए। अब वह दिन दूर नहीं जब न्यायालयों, गली-चौराहों, पंचायतों में लोग गीता की जगह प्याज की कसमें खाते हुए मिलेंगे कि मैं जो कहूँगा सच कहूँगा, सच के सिवा कुछ नहीं कहूँगा। प्याज के इस उत्थान को देखने के बाद पूरा विश्वास हो गया है कि आसमान प्याज का ही नहीं, प्याज का ही है। हम सब तो जमीन पर रेंगने वाले लाचार प्राणी मात्र हैं।
-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त