सही मार्गों की बस्ती (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Feb 26, 2020

आदरणीय, लोकप्रिय और युगबदलू विकासजी की अनेक राष्ट्रीय योजनाओं के अंतर्गत पूरे देश में नभ, जल व थल मार्गों का निर्माण जारी है, लेकिन कुछ ऐसे मार्ग भी हैं जिनके बारे आज तक संजीदगी से विचार नहीं हो सका। हमारे यहां ज़िंदगी की शुरुआत से ही समाज सेवकों, गुरुओं, नेताओं व मंत्रियों के माध्यम से किसी न किसी महापुरुष के पद चिन्हों या मार्ग पर चलने का ज़बर्दस्त नैतिक आह्वान किया जाता है। हर किसी को अपने मार्ग पर चलने के लिए मजबूर कर देने वाले, अवसरानुसार अपने भाषणों में भारत वासियों को राम, गांधी, बाबा अंबेडकर, महात्मा बुद्ध व अन्यों के नाम पर चलने की संजीदा सलाह देते हैं। 

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इस नई विकसित जगह के पड़ोस में मिनी मार्किट बनने की संभावना भी उग सकती है। घूमने, बतियाने और गोल गप्पे खाने के लिए एक नई जगह हो जाएगी, पुरानी भीड़ वाली जगहों पर वैसे भी कोरनोवायरस के कारण कोई जाना नहीं चाहता। पैसे निकालने के लिए भविष्य में यहां किसी बैंक का एटीएम लग सकता है फिलहाल यह जगह नैतिक एटीएम की तरह सेवा उपलब्ध करवा सकती है, सातों दिन चौबीस घंटे जब चाहे यहां चलकर जितना चाहे पुण्य कमा लो। मान लो रात को ठीक से नींद नहीं आई तो सुबह ब्रह्ममुहर्त के अलार्म के साथ उठकर महात्मा बुद्ध मार्ग पर पंद्रह मिनट चल लो, फिर साथ ही बने गुरु या महागुरु मार्ग को भी निबटा लो। लंबी व गहरी सांस लेते हुए महसूस करो कि मैं सही मार्ग पर आगे बढ़ रहा हूँ, मेरे जीवन में सफलता और समृद्धि का प्रवेश हो रहा है। इन सदमार्गों के अंत में संबन्धित बाबा, गुरु या महागुरु के पदचिन्ह बनाए जाने चाहिए जो बेहद नर्म व मुलायम रबड़ के हों  ताकि इन पर पाँव रखते ही लगे कि हमारे पाँवों का महापुरुष के पाँव में समावेश हो गया है । एक सामाजिक राजनीतिक संस्था इस स्थल को संचालित व नियंत्रित कर सकती है। एक साथ कई मार्ग व पदचिन्हों पर चलने के लिए एक के साथ आधा मुफ्त जैसी आफ़र दी जा सकती है। हर क्षेत्र में सही मार्गों की बस्ती जैसी सुविधा उपलब्ध होने बारे सोचा जाए तो निर्माण गतिविधियों को भी नई गति मिलेगी।   

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आम आदमी समय की कमी के कारण अपनी ज़िंदगी का रास्ता भी भूला रहता है इसलिए एक ही जगह अनेक पदचिन्हों व सदमार्गों की उपलब्धता उसे मनपसंद महापुरुष के रास्ते पर चलाकर अनेक राष्ट्रीय समस्याओं का हल भी उपलब्ध करा सकती है। जिस मोहल्ले में अराजकता, धार्मिक और राजनीतिक निरंकुशता, अमानवीयता, अविश्वसनीयता, अनैतिकता व कुप्रशासन जैसे नागरिक देश प्रेम के भजन गाते हुए महापुरुषों द्वारा बताए सदमार्गों पर चलने का प्रवचन करते हों वहां ज़िन्दगी खूब चहक सकती है। 

- संतोष उत्सुक

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