By एकता | Nov 04, 2026
स्कूलों में बच्चों के साथ बुलिंग के मामले लगातार चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। यूनिसेफ (UNICEF) के आंकड़ों के मुताबिक, स्कूल जाने वाले हर पांच में से एक बच्चा किसी न किसी रूप में बुलिंग का शिकार होता है। वहीं, डिजिटल दुनिया में यह स्थिति और भी भयानक है, जहां हर तीन में से एक बच्चा ऑनलाइन या साइबर बुलिंग झेलने पर मजबूर है।
व्यवहार में अचानक बदलाव: अगर बच्चा अचानक बहुत शांत, गुमसुम या चिड़चिड़ा रहने लगे, तो यह किसी गंभीर परेशानी की ओर इशारा करता है। पहले खुलकर बोलने वाले बच्चे का कॉन्फिडेंस अचानक गिर जाना, अत्यधिक सीक्रेटिव हो जाना या बात-बात पर हिंसक और अग्रेसिव होना बुलिंग के लक्षण हो सकते हैं।
बार-बार शारीरिक समस्याएं: बिना किसी स्पष्ट बीमारी के पेट दर्द, सिरदर्द, उल्टी या जी मिचलाना अक्सर मानसिक तनाव का शारीरिक रूप होता है। बच्चे स्कूल जाने से बचने के लिए भी ऐसे दर्द महसूस कर सकते हैं।
खान-पान और नींद की आदतों में बदलाव: अचानक भूख का खत्म हो जाना या जरूरत से ज्यादा खाना, रात को सोने में तकलीफ होना, बार-बार डरावने सपने आना या दिन भर बिस्तर पर पड़े रहना मानसिक प्रताड़ना की ओर इशारा करता है।
स्कूल और दोस्तों से दूरी: सुबह स्कूल जाने के वक्त बीमार होने के बहाने बनाना, स्कूल जाने से पूरी तरह मना करना, पढ़ाई में अचानक पिछड़ने लगना या पुराने दोस्तों से मिलना-जुलना बंद कर देना स्कूल में चल रही बुलिंग का बड़ा संकेत हो सकता है।
सोशल मीडिया से अचानक दूरी: अगर बच्चा पहले ऑनलाइन एक्टिव था और अचानक उसने फोन का इस्तेमाल बंद कर दिया है, या फोन देखते ही डर जाता है और दोस्तों का जिक्र आते ही भड़क जाता है, तो संभव है कि वह साइबर बुलिंग का शिकार हो रहा हो।
चोट के निशान और सामान का नुकसान: बच्चे के शरीर पर बार-बार चोट या खरोंच के निशान दिखना, कपड़े फटे होना या किताबों, टिफिन और स्टेशनरी का अक्सर गायब या टूटा हुआ होना शारीरिक प्रताड़ना का साफ संकेत है।
सुरक्षा और भरोसे का अहसास कराएं: सबसे अहम कदम यह है कि आप बच्चे को विश्वास दिलाएं कि वह आपके साथ सुरक्षित है। बुलिंग एक बेहद संवेदनशील विषय है, इसलिए बिना गुस्सा हुए बेहद प्यार और सहजता से उससे पूछें कि क्या कोई बात उसे परेशान कर रही है। सबसे जरूरी बात, बच्चे को यह यकीन दिलाएं कि उसके साथ जो कुछ भी हो रहा है, उसमें उसकी कोई गलती नहीं है।
शांति से पूरी बात सुनें और नोट करें: जब बच्चा हिम्मत जुटाकर अपनी बात कहे, तो बीच में टोके बिना पूरी घटना को ध्यान से सुनें। उस समय तुरंत कोई अत्यधिक भावनात्मक या आक्रामक प्रतिक्रिया न दें। घटना की तारीख, समय और इसमें शामिल लोगों की जानकारी नोट कर लें या लिख लें, ताकि स्कूल प्रशासन से बात करते समय आपके पास सटीक तथ्य मौजूद हों।
बच्चे को हिंसक न बनने दें, सही रास्ता दिखाएं: बच्चे को कभी भी 'जैसे को तैसा' करने या पलटकर हिंसा करने की सलाह न दें, क्योंकि इससे स्थिति और बिगड़ सकती है। उसे समझाएं कि मदद मांगना कमजोरी नहीं है। स्कूल के टीचर्स, काउंसलर और मैनेजमेंट से सीधे संपर्क करें और एक सुरक्षित माहौल बनाने की दिशा में मिलकर काम करें।