By एकता | Feb 27, 2026
रमजान का पवित्र महीना दुआओं के कबूल होने का एक खास समय है। दुआ इबादत की जान है और एक मोमिन के लिए सबसे बड़ा सहारा है। पवित्र कुरान में, अल्लाह कहते हैं, 'मुझे पुकारो, और मैं तुम्हारी पुकार सुनूंगा। जो लोग घमंड की वजह से मेरी इबादत से दूर हो जाते हैं, वे बेइज्जत होकर जहन्नम में जाएंगे।' पैगंबर मुहम्मद ने कहा कि रोजा रखने वाले की दुआएं कभी खाली नहीं जातीं, खासकर इफ्तार के समय। इसके अलावा, सेहरी से पहले वाली रात और लैलत अल-कद्र के दौरान पढ़ी जाने वाली दुआओं को बहुत अहमियत दी जाती है।
रमजान बरकत, रहमत और माफी का महीना है। यह हमारी नमाजों और इबादतों को बढ़ाने का सबसे अच्छा मौका है। मुसलमानों को पूरे दिन अल्लाह को याद करना चाहिए, खासकर सेहरी और इफ्तार के समय।
रमजान की आखिरी दस रातें बहुत कीमती होती हैं क्योंकि उनमें 'लैलत अल-कद्र' (ताकत की रात) होती है। पैगंबर ने हजरत आयशा को इस रात के लिए यह खास दुआ सिखाई थी।
दुआ: 'अल्लाहुम्मा इन्नाका अफुवुन तुहिब्ब अल-अफवा फाफू अन्नी।'
अर्थ: ऐ अल्लाह, तू माफ करने वाला है और तुझे माफी पसंद है, इसलिए मुझे माफ कर दे।
रमजान के दौरान हमें कुरान और सुन्नत में बताई गई इन दुआओं को बार-बार दोहराना चाहिए।
दुआ: रब्बाना अतिना फिद-दुनिया हसनतन वा फिल-अखिरती हसनतन वा किना अजाब-अन-नार।
अर्थ: ऐ हमारे रब! हमें इस दुनिया में भी भलाई दे और परलोक में भी, और हमें आग के अजाब से बचा।
दुआ: रब्बिज-अलनी मुकीम-अस-सलाती वा मिन जुर्रियाती, रब्बाना वा तकब्बल दुआ।
अर्थ: मेरे रब! मुझे और मेरी औलाद को नमाज कायम करने वाला बना। ऐ हमारे रब, मेरी दुआ कुबूल कर।
दुआ: अल्लाहुम्मा अ-इन्नी अला जिक्रिका वा शुक्रिका वा हुस्नी इबादतिका।
अर्थ: ऐ अल्लाह! मुझे अपनी याद, अपने शुक्र और बेहतरीन तरीके से इबादत करने में मदद दे।
दुआ अल्लाह से जुड़ने का एक खूबसूरत जरिया है। इस रमजान अपनी सहरी, इफ्तार और रातों को दुआओं से रोशन करें। अल्लाह आपकी हर जायज दुआ कुबूल फरमाए और आपको अपनी रहमतों से नवाजे।