Shatak Movie Review |आशीष मॉल द्वारा डायरेक्ट एरिया फिल्म है दिल से लिखी गई देश की कहानी

By न्यूज़ हेल्पलाइन | Feb 20, 2026

भारत में कुछ कहानियाँ सिर्फ खबरों का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि उन लोगों की धड़कनों में बसती हैं जिन्होंने उन्हें खून-पसीने से सींचा है। 'शतक' उन्हीं चंद फिल्मों में से है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के बारे में सिर्फ ऊपर-ऊपर से बात नहीं करती, बल्कि आपको उस दौर में ले जाती है जहाँ आप इसके शुरुआती 50 सालों के सफर को खुद महसूस कर पाते हैं। ​एक बेहद साधारण सी शुरुआत से लेकर देश के बड़े ऐतिहासिक मोड़ों तक, यह फिल्म इतिहास को किताबी पन्नों से निकालकर एक इंसानी रूप देती है। यह दर्शकों को उस हिम्मत, कड़े संघर्ष और निस्वार्थ सेवा भाव से रूबरू कराती है, जिसने इस संगठन की नींव को इतना मजबूत बनाया।

 

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फिल्म की शुरुआत होते ही आप इसकी खूबसूरती में खो जाते हैं, जहाँ असली एक्टिंग और कमाल की तकनीक इस तरह घुली-मिली है कि आपको फर्क ही नहीं पता चलता। खास बात यह है कि फिल्म अपनी टेक्नोलॉजी का दिखावा नहीं करती, बल्कि उसे इस तरह इस्तेमाल करती है कि गुजरा हुआ कल एकदम असली लगने लगे। वे छोटे-छोटे मैदान, साधारण सी मीटिंग्स और एक बड़े सपने की ओर बढ़ते वे शुरुआती कदम... हर चीज को इतनी बारीकी से बनाया गया है कि आप खुद को उसी दौर में महसूस करने लगते हैं।

 

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​इस पूरी कहानी की जान हैं डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार। फिल्म उन्हें किसी ऊंची मूर्ति की तरह नहीं, बल्कि एक चलते-फिरते, अनुशासित और जिद्दी इंसान के रूप में दिखाती है, जिनके सेवा भाव और मजबूत चरित्र ने आरएसएस की नींव खड़ी की। उनके शुरुआती दिनों का संघर्ष, आजादी की जंग में उनके बलिदान और संगठन की वह सादगी भरी शुरुआत देख कर दिल भर आता है। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि कोई भी बड़ा आंदोलन किसी शोर-शराबे से नहीं, बल्कि एक छोटे से सच्चे विचार और अटूट लगन से शुरू होता है।


जब कहानी माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) के दौर में पहुँचती है, तो फिल्म थोड़ी और गंभीर और गहरी हो जाती है। संघ पर लगे प्रतिबंधों का समय, खासकर महात्मा गांधी की हत्या के बाद वाला दौर, बहुत ही धैर्य के साथ दिखाया गया है। यहाँ फिल्म का पूरा फोकस इस बात पर है कि कैसे सूझबूझ और नैतिक हिम्मत के साथ संगठन को दोबारा खड़ा किया गया। ये सीन दिखाते हैं कि उस वक्त चुनौतियां कितनी बड़ी थीं और उनसे पार पाने के लिए कितने पक्के इरादों की जरूरत थी।


​इसके साथ ही, यह फिल्म भारत के राष्ट्र-निर्माण के खास पलों को भी छूती है। दादरा और नगर हवेली की आजादी के दृश्यों को बहुत ही सम्मान के साथ पेश किया गया है, वहीं कश्मीर के घटनाक्रम यह साफ करते हैं कि कैसे मुश्किल समय में संघ ने पर्दे के पीछे रहकर मार्गदर्शन किया। ये सारे हिस्से संगठन के सफर को देश की बड़ी कहानी से जोड़ते हैं और याद दिलाते हैं कि दूरदर्शिता और सेवा का जज्बा क्या होता है।


'शतक' की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह सिर्फ बड़े नेताओं की नहीं, बल्कि उन आम स्वयंसेवकों की कहानी कहती है जो पर्दे के पीछे रहकर देश के लिए समर्पित रहे। घर छोड़ते वे नौजवान, मुश्किलों का सामना करते उनके परिवार और खामोशी से किए गए वे बड़े बलिदान फिल्म इन सबको इतनी गहराई और अहसास के साथ दिखाती है कि हर सीन दिल को छू जाता है। ये इंसानी जज्बात ही हैं जो दशकों पुराने इस संगठनात्मक इतिहास को दर्शकों के लिए बेहद करीबी और सच्चा बना देते हैं।


इस फिल्म को पर्दे पर उतारने वाली पूरी टीम की मेहनत साफ दिखती है। अनिल डी. अग्रवाल की सोच, कृधन मीडियाटेक और वीर कपूर का प्रोडक्शन, और आशीष तिवारी (Ada 360 Degree LLP) के साथ मिलकर की गई कोशिशों ने फिल्म को एक खास वजन दिया है। डायरेक्टर आशीष मॉल ने जिस संजीदगी और रिस्पेक्ट के साथ इस पूरे विषय को हैंडल किया है, वो वाकई तारीफ के काबिल है। फिल्म में कहीं भी फालतू का शोर या सनसनी फैलाने की कोशिश नहीं की गई है, बल्कि कहानी को अपनी रफ्तार से बहने दिया गया है ताकि हर सीन अपना पूरा असर छोड़ सके।


'शतक' सिर्फ इतिहास दिखाने वाली फिल्म नहीं है, बल्कि यह उस यकीन और अटूट जज्बे को एक सलाम है जिसने सब कुछ खामोशी से सहते हुए भी अपना काम जारी रखा। यह फिल्म आपको उन इंसानी कहानियों से रूबरू कराती है जिन्होंने इस संगठन को खड़ा किया, और साथ ही देश के एक बड़े सफर के बारे में सोचने पर मजबूर कर देती है।


​फिल्म के आखिरी सीन तक पहुँचते-पहुँचते आप आरएसएस के शुरुआती 50 सालों को सिर्फ जान नहीं पाते, बल्कि उन्हें गहराई से महसूस करने लगते हैं। और यही वजह है कि फिल्म खत्म होते ही आप इसके अगले हिस्से का बेसब्री से इंतजार करने लगते हैं।

 


डायरेक्शन: आशीष मॉल

प्रोड्यूसर: वीर कपूर

प्रोडक्शन स्टूडियो: कृधान मीडियाटेक

कॉन्सेप्ट: अनिल धनपत अग्रवाल

को-प्रोड्यूसर: आशीष तिवारी

एसोसिएट प्रोड्यूसर: अशोक प्रधान, मयंक पटेल, कबीर सदानंद

राइटर: नितिन सावंत, रोहित गहलोत, उत्सव दान

एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर: अभिनव शिव तिवारी

समय: 112 मिनट

रेटिंग: 3.5/5 स्टार्स

 

  

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