चुनाव से पहले सिद्धू-चन्नी के बीच बढ़ी तकरार ! क्या सत्ता बचा पाने में कामयाब होगी कांग्रेस ?

By अनुराग गुप्ता | Jan 17, 2022

चंडीगढ़। पंजाब में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। 14 फरवरी को मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे और 10 मार्च को चुनाव परिणाम सामने आएंगे। ऐसे में सत्ताधारी कांग्रेस के सामने अपनी सरकार को बचाने की चुनौती तो है ही उससे बड़ी चुनौती प्रदेश के नेताओं को एकजुट करने की है। क्योंकि पार्टी की प्रदेश इकाई अंर्तकलह से जूझ रही है और दो बड़े खुद को ही मुख्यमंत्री का अगला दावेदार मानते हैं तभी तो मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने हाल ही में अमरिंदर सिंह वाला कार्ड खेलकर पार्टी से मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की बात कही। 

मुख्यमंत्री चन्नी ने एक चैनल के साथ बातचीत में कहा था कि कांग्रेस ने जब पिछले चुनाव में मुख्यमंत्री चेहरे को घोषित कर दिया तो उन्हें जीत मिली थी। जबकि उससे पहले उन्होंने कोई चेहरा घोषित नहीं किया था, ऐसे में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। इसलिए पार्टी को मुख्यमंत्री के चेहरे की घोषणा कर देनी चाहिए। वहीं दूसरी तरफ प्रदेशाध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू सरकार के मुखिया नहीं होने के बावजूद खुद को मुखिया ही समझते हैं और इसका उदाहरण हाल ही में देखा गया।

सिद्धू ने चंडीगढ़ प्रेस क्लब मे आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में अकेले ही कई सारे ऐलान करते हुए पंजाब मॉडल पेश किया था। इस दौरान पंजाब मॉडल से जुड़ा हुआ एक पोस्टर भी दिखाई दिया था, जिसमें मुख्यमंत्री चन्नी नहीं दिखाई दे रहे थे। इस दौरान सिद्धू ने एक बार और साफ की थी कि पंजाब की जनता तय करेगी की मुख्यमंत्री कौन होगा, ना की आलाकमान।

कांग्रेस लगातार सिद्धू पर नकेल कसने की भी कोशिश करती रही है लेकिन हर बार सिद्धू कुछ ऐसा कर देते थे जो पार्टी नेताओं को रास नहीं आता था। सिद्धू की हरकतें दूसरे बड़े नेताओं को नागवार गुजरी हैं और प्रदेश की मेनिफेस्टो कमेटी भी नाराज बताई जा रही है। क्योंकि मेनिफेस्टो कमेटी को लगता है कि अगर सारे फैसले सिद्धू को ही करने है तो फिर उनकी जरूरत ही क्या है। इतना ही नहीं टिकट बंटवारे को लेकर भी सिद्धू और चन्नी के बीच खींचतान जारी है। 

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भाई को टिकट नहीं दिला पाए चन्नी

चन्नी अपने भाई डॉ. मनोहर सिंह को पार्टी का टिकट नहीं दिला पाए, जिसके बाद उनके भाई ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का मन बनाया है। आपको बता दें कि मनोहर सिंह बस्सी पठाना से चुनाव लड़ना चाहते थे और चन्नी ने उन्हें टिकट दिलाने का प्रयास भी किया लेकिन उनका प्रयास सफल नहीं हो पाया। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, सिद्धू नहीं चाहते थे कि पार्टी चन्नी के भाई को टिकट दे। ऐसे में उन्होंने डॉ. मनोहर सिंह की जगह मौजूदा विधायक गुरप्रीत सिंह जीपी की उम्मीदवारी का समर्थन किया था।

अपनी सरकार से नाराज हैं नेता

पिछले दिनों पंजाब दौरे में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा चूक मामले को लेकर पार्टी सांसद मनीष तिवारी और पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सुनील जाखड़ ने अपनी ही सरकार को निशाने पर लिया। जिसकी वजह से भी पार्टी की मुश्किलें बढ़ी हैं। हाल ही में मनीष तिवारी ने कहा था कि पंजाब को एक ऐसे मुख्यमंत्री की जरूरत है जो चुनौतियों से निपट सके और कड़े फैसले करने की क्षमता रखता हो। पंजाब को गंभीर लोगों की जरूरत है जिनकी राजनीति सोशल इंजीनियरिंग, मनोरंजन, मुफ्त की रेवड़ी बांटने वाली नहीं हो। 

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दरअसल, सिद्धू को लेकर एक बात सामने आती है कि वो किसी के साथ भी नहीं चल सकते हैं। इसे आप कुछ इस तरह से समझ सकते हैं जब मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह थे तब भी उन्होंने अपनी ही सरकार पर सवाल उठाए थे और उनके पार्टी से चले जाने के बाद चन्नी सरकार पर भी उन्होंने सवाल खड़े किए। इतना ही नहीं गृह मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा के साथ भी विवाद सामने आ गया। गृह मंत्री ने साफ शब्दों में कहा था कि सिद्धू को कुछ परेशानी है। मैं उनके परिवार के साथ पुराने संबंध साझा करता हूं, लेकिन जब से मैं पंजाब का गृह मंत्री बना हूं, वह मुझसे नाराज हैं। अगर उन्हें गृह मंत्रालय चाहिए, तो मैं पद छोड़ दूंगा और उन्हें इसकी पेशकश करूंगा।

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