By Ankit Jaiswal | Mar 02, 2026
सुप्रीम कोर्ट ने एक ट्रायल कोर्ट के आदेश पर गंभीर आपत्ति जताई है, जिसमें कथित तौर पर एआई की मदद से तैयार किए गए ऐसे केस लॉ का हवाला दिया गया था जो आधिकारिक अभिलेखों में मौजूद ही नहीं थे। अदालत ने इसे न्यायिक आचरण के खिलाफ बताते हुए सख्त टिप्पणी की है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गैर-मौजूद फैसलों का हवाला देना न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कमजोर करता है और आम जनता के विश्वास को चोट पहुंचाता है। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी न्यायाधीश का कर्तव्य है कि वह आदेश पारित करने से पहले उद्धृत कानूनी प्राधिकरणों का स्वतंत्र रूप से सत्यापन करे।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि तकनीक, विशेषकर एआई आधारित शोध उपकरण, कानूनी अनुसंधान में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, उन्हें अंतिम सत्य मान लेना और बिना जांचे-परखे आदेश में शामिल करना गंभीर पेशेवर चूक की श्रेणी में आता है। बता दें कि हाल के वर्षों में न्यायिक और कानूनी क्षेत्र में डिजिटल टूल्स का उपयोग तेजी से बढ़ा है, लेकिन उनके उपयोग के साथ सावधानी और जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी मानी जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उचित कार्रवाई पर विचार करने का निर्देश दिया है। साथ ही यह दोहराया कि न्यायिक अनुशासन, प्रामाणिक स्रोतों पर निर्भरता और तथ्यात्मक सटीकता ही न्याय प्रणाली की नींव हैं। अदालत का संदेश साफ है कि तकनीकी सुविधा के नाम पर मूलभूत सत्यापन प्रक्रिया से समझौता नहीं किया जा सकता और न्याय की पारदर्शिता बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है।