Supreme Court ने खारिज की फांसी से मृत्युदंड देने की याचिका, केंद्र को समीक्षा की छूट

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 18, 2026

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मृत्युदंड के मामलों में दोषी को फांसी पर लटकाकर मौत देने की मौजूदा व्यवस्था को समाप्त करने और उसकी जगह कम पीड़ादायक तरीकों, जैसे नस के जरिए घातक इंजेक्शन देने को अपनाने का अनुरोध किया गया था। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि उसका फैसला केंद्र सरकार को इस बात की व्यापक समीक्षा करने से नहीं रोकता कि वर्तमान में मृत्युदंड देने की जो व्यवस्था है, उसके स्थान पर कोई वैकल्पिक तरीका अपनाया जा सकता है या नहीं। इसके लिए केंद्र किसी विशेषज्ञ समिति का गठन कर सकता है।

याचिका में फांसी की जगह ‘‘नस के जरिए घातक इंजेक्शन देकर, गोली मारकर, बिजली का झटका देकर या गैस चैंबर के जरिए’’ अपेक्षाकृत कम पीड़ादायक तरीकों से मृत्युदंड देने का अनुरोध किया गया था। सुनवाई के दौरान मल्होत्रा ने कहा था कि मृत्युदंड पाए दोषी को कम से कम यह विकल्प दिया जाना चाहिए कि वह फांसी या घातक इंजेक्शन में से किस तरीके से मौत की सजा चाहता है। मार्च 2023 में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि वह इस बात की जांच के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने पर विचार कर सकता है कि मृत्युदंड के दोषी को फांसी देना उचित और कम पीड़ादायक तरीका है या नहीं।

न्यायालय ने इस संबंध में केंद्र से ‘‘बेहतर आंकड़े’’ भी मांगे थे। हालांकि, शीर्ष न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि वह विधायिका को मृत्युदंड देने का कोई विशेष तरीका अपनाने का निर्देश नहीं दे सकता। केंद्र सरकार ने 2018 में इस कानूनी प्रावधान का पुरजोर समर्थन किया था कि मृत्युदंड के मामले में दोषी को केवल फांसी देकर ही मौत दी जाए।

केंद्र ने पीठ से कहा था कि घातक इंजेक्शन और गोली मारने जैसे अन्य तरीके कम पीड़ादायक नहीं हैं। गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव द्वारा दायर जवाबी हलफनामे में कहा गया था कि फांसी देकर मौत देना ‘‘त्वरित और सरल’’ है तथा इसमें ऐसी कोई चीज नहीं है जो कैदी की पीड़ा को ‘‘अनावश्यक रूप से बढ़ाए’’। यह हलफनामा जनहित याचिका के जवाब में दायर किया गया था।

याचिका में विधि आयोग की 187वीं रिपोर्ट का हवाला दिया गया था, जिसमें मृत्युदंड देने की मौजूदा व्यवस्था को हटाने की सिफारिश की गई थी।

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