By अभिनय आकाश | Sep 29, 2026
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को फैसला सुनाया कि नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) के लिए सिर्फ़ 'एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन' (कोर्ट के बाहर किया गया कबूलनामा) ही एकमात्र आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज़ की हिरासत को रद्द कर दिया और उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने अफरोज़ की अपील को मंज़ूरी देते हुए कहा कि हालांकि एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन एक अहम सबूत हो सकता है, लेकिन प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश देने के लिए ज़रूरी संतुष्टि तक पहुँचने से पहले हिरासत लेने वाले अधिकारी को अन्य संबंधित परिस्थितियों पर भी विचार करना चाहिए। कोर्ट ने पाया कि अफरोज़ के मामले में हिरासत लेने वाला अधिकारी इन बातों पर विचार करने में नाकाम रहा और इसलिए उसने प्रिवेंटिव डिटेंशन की शक्ति का गलत इस्तेमाल किया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हिरासत को सही ठहराया था। कोर्ट ने कहा कि हिरासत का आदेश देने वाले अधिकारी ने उसके सामने रखी गई जानकारी पर विचार किया था और हिरासत के लिए जिन दस्तावेज़ों का इस्तेमाल किया गया था, वे अफ़रोज़ को दिए गए थे। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) के आदेश की न्यायिक समीक्षा करते समय, कोर्ट को यह देखना चाहिए कि क्या अधिकारी ने ज़रूरी जानकारी पर ठीक से विचार किया है, न कि इस बात पर कि वह जानकारी कितनी काफ़ी है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अधिकारी द्वारा विचार की गई जानकारी के आधार पर हिरासत को सही नहीं ठहराया जा सकता। बेंच ने इस बात पर विचार किया कि क्या कोर्ट के बाहर किया गया कबूलनामा (एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन) प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश का आधार बन सकता है और क्या अधिकारी द्वारा इस्तेमाल की गई जानकारी कानूनी रूप से काफ़ी थी। (ANI) कोर्ट ने कहा कि कोर्ट के बाहर किया गया कबूलनामा अकेले प्रिवेंटिव डिटेंशन को सही नहीं ठहरा सकता। इस अधिकार का इस्तेमाल करने से पहले अधिकारी को अन्य ज़रूरी और ठोस परिस्थितियों पर भी विचार करना चाहिए। अफ़रोज़ के मामले में, कोर्ट ने पाया कि अधिकारी ऐसे कारकों पर विचार करने में नाकाम रहा और नतीजतन, उसने उस मकसद के लिए अधिकार का इस्तेमाल किया जिसका समर्थन उसके सामने मौजूद जानकारी से नहीं होता था।