चाय, चमचा और चुटकी नमक (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | May 03, 2025

कहते हैं कि अगर आपकी चाय में नमक पड़ जाए तो या तो आप बहुत बड़े नेता बनने वाले हैं, या फिर किसी ने आपके जीवन की मिठास में सेंध लगा दी है। मेरे मोहल्ले के शशिकांत जी ने दोनों कर डाले – नेता भी बन गए और मोहल्ले की बहुओं की आँखों से गंगाजल भी बहवा दिया। वो जब सुबह-सुबह अपनी बीवी को "गुड मॉर्निंग" कहते थे तो बीवी नमकदानी फेंक देती थी – “तुमसे तो गुडनाइट ही बेहतर है।” मोहल्ले में कोई मरता, तो शशिकांत जी सांत्वना देने से पहले पूछते, “मौत अचानक हुई या रूटीन की?” उनके चेहरे पर हमेशा एक स्थायी व्यंग्य होता – मानो जिंदगी को उन्होंने ईएमआई पर ले रखा हो।

हर मोहल्ले में एक चमचा होता है। पर शशिकांत जी के यहाँ तो चमचों की पूरी पंचायत थी– रामलाल, जमुना प्रसाद, और विमलेश। ये लोग हर बात पर ताली बजाते– “वाह साहब! आपने तो गधे को भी घोड़ा बना दिया!” शशिकांत जी मुस्कराते, “सही पकड़े हैं।” उन्होंने हर समस्या का हल चाय में ढूंढा – बेरोजगारी? एक चाय दो, नौकरी लग जाएगी। गड्ढों वाली सड़क? चाय पर चर्चा कर लो, सड़क तो न बदलेगी, मन जरूर बदल जाएगा। एक बार तो उन्होंने कहा – “जीडीपी गिर रही है? कोई बात नहीं, कप तो उठ रहा है न?” और पूरा मोहल्ला हँसते-हँसते रो पड़ा।

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घर में शशिकांत जी के बच्चे उन्हें ‘पापा’ नहीं, ‘पब्लिक स्पीकर’ कहते थे। जब भी उनकी बेटी उनसे नए जूते मांगती, वो कहते– “बेटी, असली सुंदरता आत्मा की होती है, पैर की नहीं।” बेटे ने एक बार कहा, “पापा, स्कूल में सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं।” जवाब मिला – “तो क्या हुआ? मैं भी नेता बना हूं, मेरा भी मज़ाक उड़ता है, फिर भी जनता मुझे वोट देती है।” घर की रसोई में नमक खत्म हो जाए, तो शशिकांत जी कहते – “चलो बेटा, समाज को सुधारने चले चलते हैं, वापसी में नमक भी ले आएंगे।”

उनकी पत्नी– गीता देवी– अब तक तो भगवद्गीता की भी सारी शिक्षाएँ भूल चुकी थीं। कहती थीं, “जैसे कृष्ण ने अर्जुन को समझाया, वैसे ही मैं भी हर रोज इन्हें समझाती हूं– लेकिन ये महाभारत तो क्या, महाअव्यवस्था रचकर ही दम लेते हैं।” एक दिन गीता देवी ने गुस्से में कहा, “अब बस! या तो तुम, या चाय की दुकान।” शशिकांत जी बोले– “तो फिर मैं चाय को चुनता हूं।” और मोहल्ले में पहली बार तालियाँ नहीं, सिसकियाँ सुनाई दीं।

उनकी दुकान पर रोज़ नए-नए नारे लगते– “देश बदलेगा, जब चाय उबलेगा!” लेकिन धीरे-धीरे उनकी चाय में न नशा रहा, न चर्चा। ग्राहक कम हुए, और व्यंग्य ज्यादा। लोग कहते– “शशिकांत जी की चाय पीने से पेट तो नहीं भरता, पर दुख जरूर उबल जाता है।” एक दिन एक बूढ़ी अम्मा आईं, चाय पी और बोलीं– “बेटा, यह चाय नहीं, यह तो मेरी बुढ़ापे की दवा बन गई है।” और वहीं कुर्सी पर बैठकर रो पड़ीं। शशिकांत जी ने उन्हें देखा और पहली बार उनकी आँखों में व्यंग्य नहीं, पानी था।

समाज सुधारते-सुधारते शशिकांत जी अब खुद समाज की चाय बन चुके थे– जिसे कोई पीता नहीं, सिर्फ छोड़ देता है। एक दिन दुकान बंद मिली। दरवाज़े पर लिखा था– “अब न चाय बचेगी, न चुटकी नमक। समाज में सब कुछ नमकीन है, पर दिल अब बेस्वाद हो चुका है।” मोहल्ला ठहरा, लोग ठिठके– और पहली बार, उनकी गैर-मौजूदगी में शोर नहीं, सन्नाटा था।

शशिकांत जी अब नहीं हैं। कहते हैं, अंतिम समय में उन्होंने कहा – “मेरी अस्थियाँ किसी सरकारी गड्ढे में बहा देना... कम से कम वहाँ कुछ भराव तो होगा।” मोहल्ले में उनकी याद में एक पत्थर रखा गया – उस पर लिखा है – "यहाँ वो आदमी बैठता था, जो समाज को चाय के प्याले में घोलकर पी जाना चाहता था।"

हर शाम अब वहाँ लोग चुपचाप बैठते हैं– बिना चाय, बिना नमक – पर आँखों में नमी, और दिल में ‘उरतृप्त’ पीड़ा लिए हुए।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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