By अभिनय आकाश | May 20, 2026
पूरी दुनिया के लिए चीन हमेशा से एक पहेली बना हुआ है। नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक भारत भी अपने बड़े भाई जैसे लगने वाले पड़ोसी देश को समझ नहीं पाए। वजह साफ है क्योंकि चीन की कम्युनिस्ट सरकार की कथनी और करनी में बड़ा फर्क है, जिसका सबूत उसके नेता बीते 74 सालों में हर मौके पर भारत को धोखा देकर देते रहे हैं। पंडित नेहरू, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी ये वो भारत के प्रधानमंत्रियों के नाम हैं जिन्होंने चीन का दौरा किया और उससे रिश्ते सुधारने की भरसक कोशिश की, लेकिन नतीजा पूरी दुनिया जानती है। चीन के बारे में एक कहावत तो हमेशा से ही प्रसिद्ध रही है कि ऐसा कोई सगा नहीं जिसे उसने ठगा नहीं। भारत की तरफ से चीन से दोस्ती की हर कोशिश की गई। भारत की आजादी से पहले से ही जवाहर लाल नेहरू का मानना था कि चीन और भारत में काफी समानता हैं और दोनों एक दूसरे के कापी अच्छे दोस्त साबित हो सकते हैं। इसी उम्मीद में शायद प्रधानमंत्री बनने के बाद जब पंडित नेहरू ने साल 1949 में पहली दफा अमेरिका की यात्रा की तो अपने देश के गंभीर मुद्दे के साथ चीन को लेकर भी चर्चा की थी। उन्होंने रिपब्लिक ऑफ चाइना की वकालत करते हुए अमेरिका के सामने उसे मान्यता देने की बात कही थी। नेहरू द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सीट के लिए चीन का पक्ष लेने का मुद्दा समय समय पर मोदी सरकार की तरफ से उठाया जाता रहा हैय़ दिवंगत अरुण जेटली ने 2019 में इस मुद्दे को उठाया था। नेहरू के कई आलोचकों ने इसे भारत के लिए एक चूका हुआ अवसर बताया है। यह सच है कि नेहरू ने 1950 में अमेरिका और 1955 में सोवियत संघ द्वारा सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के प्रस्तावों को ठुकरा दिया था, लेकिन इन प्रस्तावों की प्रकृति और उस समय की भू-राजनीतिक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में इस मुद्दे पर विस्तार से बताते हुए लिखा है कि वास्तव में क्या हुआ था और नेहरू ने सुरक्षा परिषद में चीन का समर्थन क्यों किया था।
साल 1950 की बात है, जब अमेरिका ने तत्कालीन भारतीय राजदूत और जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित से एक बेहद अहम मसले पर संपर्क साधा था। यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में 'रिपब्लिक ऑफ चाइना' (RoC) को हटाकर उसकी जगह भारत को स्थायी सदस्यता सौंपने को लेकर था। अगस्त 1950 के आखिर में विजयलक्ष्मी पंडित ने वाशिंगटन डीसी से अपने भाई नेहरू को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अमेरिकी राजनयिकों के साथ हुई इस बातचीत का पूरा ब्योरा दिया था। उन्होंने अपने खत में लिखा था, अमेरिकी विदेश विभाग (स्टेट डिपार्टमेंट) में जो खिचड़ी पक रही है, उसकी जानकारी आपको होनी चाहिए। यह पूरा मामला सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के पद से चीन को बेदखल करने और उसकी जगह भारत को बिठाने का है। पिछले हफ्ते मेरी जॉन फोस्टर डलेस और फिलिप जेसप से मुलाकात हुई थी। दोनों ने ही इस मुद्दे को छेड़ा था, और डलेस तो विशेष रूप से इस बात को लेकर काफी उत्सुक थे कि इस दिशा में जल्द से जल्द कोई ठोस कदम उठाया जाए। एक हफ्ते के भीतर ही नेहरू ने अपनी बहन के पत्र का जवाब दिया। उन्होंने लिखा कि जहां तक हमारा सवाल है, हम इस प्रस्ताव को कतई स्वीकार नहीं करेंगे। यह हर नजरिए से गलत होगा। यह स्पष्ट रूप से चीन का अपमान होगा और इसका सीधा मतलब हमारे और चीन के रिश्तों में दरार पड़ना होगा। नेहरू ने अपने खत में यह भी स्पष्ट किया कि भारत, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) को संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में शामिल करने की वकालत जारी रखेगा। हालांकि, उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि भारत निश्चित तौर पर सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का पूरा हकदार है, "लेकिन हम चीन की कीमत पर वहां बिल्कुल नहीं जाएंगे।
अमेरिका का यह अनौपचारिक प्रस्ताव एक ऐसे संवेदनशील वक्त में आया था, जब 'शीत युद्ध' की तपिश एशिया तक पहुंच रही थी। चीन में कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आ चुकी थी और जून 1950 में कोरियाई प्रायद्वीप में युद्ध भड़क गया था। उस दौरान अमेरिका और उसके सहयोगी देश दक्षिण कोरिया के साथ खड़े थे, जबकि चीन और सोवियत संघ उत्तर कोरिया की सेनाओं को अपना समर्थन दे रहे थे। अमेरिका इस बात से काफी उत्साहित था कि उत्तर कोरिया के आक्रमण को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र में लाए गए अमेरिकी प्रस्तावों का भारत ने समर्थन किया था। संभवतः इसी वजह से अमेरिकी विदेश विभाग (स्टेट डिपार्टमेंट) ने भारत को अपने प्रभाव क्षेत्र यानी अपने गुट में लाने की उम्मीद के साथ उससे यह संपर्क साधा था। 2015 के एक लेख में इतिहासकार एंटोन हार्डर लिखते हैं कि अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा भारत के प्रति यह दृष्टिकोण, भले ही अनौपचारिक हो और उच्चतम स्तर का न हो, फिर भी इसे काफी ईमानदार माना जाना चाहिए। भले ही, कुछ वर्षों बाद सोवियत संघ के ‘प्रस्ताव’ की तरह, इस प्रस्ताव के वास्तव में साकार होने की संभावना कम हो, फिर भी इसे भारत के साथ अधिक भरोसेमंद संबंध बनाने की अमेरिका की इच्छा के एक महत्वपूर्ण प्रदर्शन के रूप में देखा जा सकता है।
साल 1955 में सोवियत नेता निकोलाई बुल्गानिन ने जवाहरलाल नेहरू को बताया कि सोवियत संघ (यूएसएसआर) भविष्य में सुरक्षा परिषद के छठे सदस्य के रूप में भारत को शामिल करने का सुझाव देने पर विचार कर रहा है। अमेरिका के प्रस्ताव से उलट, सोवियत संघ यह बिल्कुल नहीं चाहता था कि भारत 'रिपब्लिक ऑफ चाइना' (RoC) को हटाकर उसकी जगह ले। वे अपने कम्युनिस्ट सहयोगी (चीन) के लिए संयुक्त राष्ट्र के दरवाजे खुले रखना चाहते थे। हालांकि, नेहरू ने उनके इस प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया। उनका तर्क था कि इस तरह के किसी भी कदम के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन की आवश्यकता होगी, और फिलहाल ऐसा करने का समय सही नहीं है। सोवियत संघ का यह प्रस्ताव कोई ठोस या पक्का प्रस्ताव होने के बजाय महज़ भारत की 'टोह लेने' (feeler) की एक कोशिश भर था। इस बात की पुष्टि बुल्गानिन के उस बयान से होती है, जिसमें उन्होंने नेहरू से स्पष्ट कहा था: "हमने सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता का सवाल महज़ आपके विचार जानने के लिए उठाया था।
नेहरू नहीं चाहते थे कि अमेरिका की भू-राजनीतिक रणनीति के कारण भारत किसी पड़ोसी देश के साथ संघर्ष में उलझ जाए। लेकिन पीआरसी को उनका समर्थन द्विपक्षीय संबंधों से परे भी था। जैसा कि रॉय लिखते हैं कि यह महाशक्तियों के संबंधों की सामान्य स्थिति के बारे में उनके अवलोकनों पर आधारित था। नेहरू अंतरराष्ट्रीय स्थिरता के लिए महान शक्तियों के बीच सहयोग की आवश्यकता में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि यदि पीआरसी जैसी किसी महान शक्ति को अलग-थलग कर दिया जाए, तो इससे युद्ध छिड़ सकता है। रॉय के शोध पत्र (रिसर्च पेपर) के अनुसार, बीसवीं सदी की शुरुआत के घटनाक्रमों ने नेहरू को यह सिखा दिया था कि जिन महाशक्तियों को दुनिया से अलग-थलग कर दिया जाता है, वे अक्सर वैश्विक अस्थिरता का बड़ा कारण बन जाती हैं। ऐसे दौर में जब दुनिया ने परमाणु बमों की तबाही देखी थी, एक असंतुष्ट और अलग-थलग पड़े चीन के परिणाम दुनिया के लिए बेहद भयानक हो सकते थे।
रिसर्च पेपर में आगे कहा गया है, वैश्विक व्यवस्था को स्थिर बनाए रखने के लिए यह जरूरी था कि चीन को सुरक्षा परिषद में शामिल किया जाए और उसे 'वीटो' (Veto) का अधिकार दिया जाए। उनका मानना था कि ऐसा करने से चीन को शांत रखा जा सकेगा और उसकी विस्तारवादी (रिवीजनिस्ट) नीतियों पर लगाम लगाई जा सकेगी। इस प्रकार, संयुक्त राष्ट्र में चीन की दावेदारी का समर्थन करना, दुनिया के देशों के बीच शक्ति संतुलन बनाए रखने की नेहरू की कूटनीतिक कोशिशों का ही एक अहम हिस्सा था। पंडित को लिखे अपने 1950 के पत्र में नेहरू ने यह आशंका भी व्यक्त की थी कि यदि चीन सुरक्षा परिषद में प्रवेश पाने में विफल रहता है, तो इससे सोवियत संघ और कुछ अन्य देश संयुक्त राष्ट्र से पूरी तरह बाहर निकल सकते हैं। इससे विदेश विभाग को खुशी हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ होगा संयुक्त राष्ट्र का वह स्वरूप समाप्त हो जाना जिसे हम जानते हैं। इसका अर्थ युद्ध की ओर और अधिक बढ़ना भी होगा। संयुक्त राष्ट्र द्वारा पीआरसी को चीन की वैध सरकार के रूप में मान्यता देने में अंततः 1971 तक का समय लग गया।