By अभिनय आकाश | May 20, 2026
भारतीय लोकतंत्र के शुरुआती सालों में एक ऐसी वैचारिक जंग छिड़ी थी, जिसने देश के सामाजिक ढांचे की दिशा तय कर दी। आज हम बात कर रहे हैं पंडित नेहरू के उस सेक्युलर विजन की, जिसने अपनों को ही विरोध की मेज पर ला खड़ा किया। एक तरफ नेहरू थे, जो 'हिंदू कोड बिल' के जरिए समाज को आधुनिक बनाना चाहते थे, तो दूसरी तरफ देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे, जिनका मानना था कि सरकार को केवल हिंदुओं के निजी कानूनों में दखल देने के बजाय इसे 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' के रूप में सबके लिए लाना चाहिए। इतना ही नहीं, इस लड़ाई में एक तीसरा सिरा बाबा साहब अंबेडकर का था, जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए नेहरू के कदम पीछे खींचने के फैसले से नाराज होकर कानून मंत्री के पद से इस्तीफा तक दे दिया था। नेहरू का सेक्युलरिज्म, क्या वो वाकई सुधारवादी था या फिर उसमें तुष्टीकरण और दोहरे मापदंडों के बीज छिपे थे? रिपोर्ट में हम उन अनकही बहसों और तीखे मतभेदों की पड़ताल करेंगे, जिन्होंने आधुनिक भारत के धर्मनिरपेक्ष चेहरे पर सवालिया निशान लगा दिए।
सुधार उपाय उनकी राष्ट्र-निर्माण परियोजना के केंद्र में था। लेकिन इससे भारत की आजादी के बाद पहले दशक में अन्य प्राथमिकताओं के लिए आवश्यक नाजुक राजनीतिक सहमति के खत्म होने का भी खतरा था। फरवरी 1951 तक, अम्बेडकर निष्क्रियता से नाराज थे। उन्होंने नेहरू को एक तीखा पत्र लिखा और विधेयक के विरोध पर प्रभावी ढंग से अंकुश नहीं लगाने के लिए उनकी आलोचना की। उन्होंने लिखा कि अगर नेहरू के आश्वासन के बावजूद विधेयक पारित नहीं हुआ तो यह सरकार के लिए हास्यास्पद, कायरतापूर्ण और अपमानजनक होगा। उसी पत्र में, अम्बेडकर ने चर्चा के लिए रखे गए कुछ संशोधनों को मूर्खतापूर्ण बताया।
महीनों बाद उनकी हताशा चरम पर पहुंच गई। सितंबर 1951 में बिल में देरी के कारण अम्बेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने विधेयक पर अपने काम को संविधान पर अपने काम से ज्यादा नहीं तो महत्वपूर्ण माना था। अंबेडकर ने अपने त्याग पत्र में कटुतापूर्वक लिखा कि चार खंड पारित होने के बाद इसे समाप्त कर दिया गया और दफना दिया गया। मुझे यह आभास हुआ कि प्रधानमंत्री ईमानदार हैं, हालांकि उनमें हिंदू कोड बिल को पारित कराने के लिए आवश्यक गंभीरता और दृढ़ संकल्प नहीं है।
नेहरू और अम्बेडकर द्वारा संसद में हिंदू कोड बिल पारित करने की कोशिश करने से पहले ही हिंदू समूहों के नेतृत्व में एक प्रतिरोध 'आंदोलन' पहले से चल रहा था। संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए स्थापित किए गए संविधान सभा में मार्च 1949 में विधेयक पर विचार-विमर्श हो रहा था। प्रस्तावित कानून को चुनौती देने के लिए अखिल भारतीय हिंदू विरोधी कोड विधेयक समिति नामक एक समूह का गठन किया गया। अपनी पुस्तक इंडिया आफ्टर गांधी में इतिहासकार रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि कैसे धार्मिक हस्तियों और रूढ़िवादी वकीलों ने देश भर में सैकड़ों बैठकें बुलाईं और खुद को धर्मयुद्ध से लड़ने वाले धर्मवीर के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार को हिंदू कानूनों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है, जो धर्म शास्त्रों पर आधारित थे। गुहा कहते हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने "आंदोलन के पीछे अपना पूरा जोर लगाया"। 11 दिसंबर 1949 को इसने दिल्ली के राम लीला मैदान में एक सार्वजनिक बैठक आयोजित की, जहाँ एक के बाद एक वक्ताओं ने इस विधेयक की निंदा की। एक ने इसे 'हिंदू समाज पर परमाणु बम' कहा। 12 दिसंबर 1949 को, जब विधेयक पर विचार-विमर्श फिर से शुरू हुआ, तो लगभग 500 लोगों ने संसद भवन के बाहर विरोध प्रदर्शन किया।
14 सितंबर 1951 को राजेंद्र प्रसाद ने पंडित नेहरु को पत्र लिखा था जिसमे सिर्फ हिन्दुओं के लिए हिन्दू कोड बिल लाने का विरोध करते हुए कहा था कि अगर जो प्रावधान किये जा रहे हैं वो ज्यादातर लोगों के लिए फायदेमंद और लाभकारी हैं तो सिर्फ एक समुदाय के लोगों के लिए क्यों लाए जा रहे हैं बाकी समुदाय इसके लाभ से क्यों वंचित रहें। उन्होंने कहा था कि वह बिल को मंजूरी देने से पहले उसे मेरिट पर भी परखेंगे। नेहरू ने उसी दिन उन्हें उसका जवाब भी भेज दिया जिसमें कहा कि आपने बिल को मंजूरी देने से पहले उसे मेरिट पर परखने की जो बात कही है वह गंभीर मुद्दा है। इससे राष्ट्रपति और सरकार व संसद के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है। संसद द्वारा पास बिल के खिलाफ जाने का राष्ट्रपति को अधिकार नहीं है। डाक्टर प्रसाद ने नेहरू को 18 सितंबर को फिर पत्र लिखा जिसमें उन्होंने संविधान के तहत राष्ट्रपति को मिली शक्तियां गिनाई साथ ही यह भी कहा कि वह मामले में टकराव की स्थिति नहीं लाना चाहेंगे। बात अधिकारों तक पहुंची और अंत में अटार्नी जनरल की राय ली गई तब मामला शांत हुआ था।