By नीरज कुमार दुबे | May 13, 2026
भारतीय वायु सेना अब स्वदेश में विकसित तेजस Mk1A लड़ाकू विमान को पश्चिमी सीमा पर तैनात करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। वायु सेना की योजना है कि तेजस Mk1A के पहले चार स्क्वॉड्रनों को राजस्थान के अग्रिम वायु ठिकानों पर तैनात किया जाए। इनमें बीकानेर स्थित नाल वायु सेना स्टेशन और फलोदी वायु सेना स्टेशन प्रमुख हैं। पाकिस्तान सीमा के निकट स्थित होने के कारण ये दोनों ठिकाने सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। देखा जाये तो यह कदम भारत की सैन्य आधुनिकीकरण नीति, पश्चिमी मोर्चे की रणनीति और स्वदेशी रक्षा क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा परिवर्तन माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिमी सीमा के निकट तेजस Mk1A की तैनाती से भारतीय वायु सेना की त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होगा। अग्रिम ठिकानों पर विमानों की मौजूदगी के कारण किसी भी हवाई घुसपैठ, सीमा तनाव या आपात स्थिति में कम समय में कार्रवाई संभव हो सकेगी। इसके साथ ही पश्चिमी रेगिस्तानी क्षेत्रों में निगरानी, अवरोधन और आक्रमण की तैयारी भी पहले से अधिक मजबूत होगी। वायु सेना अब ऐसी व्यवस्था विकसित कर रही है जिसमें विमानों को तुरंत उड़ान भरने के लिए हर समय तैयार रखा जाए। इसे त्वरित प्रतिक्रिया चेतावनी व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है।
हम आपको बता दें कि तेजस Mk1A भारत के स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान कार्यक्रम का उन्नत संस्करण है, जिसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने विकसित किया है। पहले के संस्करणों की तुलना में इसमें कई आधुनिक और उन्नत क्षमताएं जोडी गई हैं। इसमें सक्रिय इलेक्ट्रानिक स्कैन सरणी राडार लगाया गया है, जो दूर तक लक्ष्य की पहचान और निगरानी करने में सक्षम है। इसके अलावा इसमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली भी है, जो दुश्मन के राडार और मिसाइल प्रणाली से बचाव में सहायता करती है।
यह विमान दृष्टि सीमा से बाहर मार करने वाली मिसाइलों से लैस है, जिनमें स्वदेशी अस्त्र मिसाइल भी शामिल है। इससे तेजस दूर से ही दुश्मन के विमानों या लक्ष्यों पर हमला कर सकता है। इसके अतिरिक्त इसमें हवा में ईंधन भरने की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे इसकी मारक क्षमता और संचालन अवधि बढ़ जाती है। बेहतर विमानन प्रणाली, आधुनिक संचार उपकरण और उन्नत सुरक्षा तंत्र इसे भारतीय वायु सेना के लिए अधिक प्रभावी और भरोसेमंद बनाते हैं। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इन विशेषताओं से विमान की जीवित रहने की क्षमता, युद्धक लचीलापन और संचालन प्रभावशीलता में बड़ा सुधार हुआ है।
तेजस Mk1Aकी तैनाती को लेकर नाल और फलोदी दोनों ठिकानों पर विशेष तैयारी की जा रही है। यहां मजबूत संरक्षित विमान आश्रय बनाए गए हैं ताकि किसी भी बाहरी हमले की स्थिति में विमानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। इसके अलावा नए रखरखाव केंद्र, मिशन योजना केंद्र और आधुनिक तकनीकी सुविधाएं भी विकसित की गई हैं। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आधुनिक लड़ाकू विमानों का संचालन बिना किसी बाधा के हो सके।
भारतीय वायु सेना पहले से ही तेजस Mk1A के दो स्क्वॉड्रनों का संचालन कर रही है, जिनमें नंबर 45 फ्लाइंग डैगर्स और नंबर 18 फ्लाइंग बुलेट्स शामिल हैं। वर्ष 2020 में इन विमानों को पहली बार पाकिस्तान सीमा के निकट संचालन के लिए तैनात किया गया था। अब Mk1A संस्करण की तैनाती के साथ वायु सेना अपनी पश्चिमी सीमा सुरक्षा को और अधिक मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
यह तैनाती केंद्र सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति के अनुरूप भी मानी जा रही है। दरअसल भारत रक्षा क्षेत्र में विदेशी निर्भरता कम करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रहा है। भारतीय वायु सेना ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को 180 तेजस Mk1A विमानों का आदेश दिया है, जो देश के इतिहास में स्वदेशी लड़ाकू विमानों की सबसे बड़ी खरीद में से एक माना जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल आधुनिक सैन्य क्षमता विकसित करना ही नहीं, बल्कि संकट की स्थिति में विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता कम करना भी है।
हालांकि इस महत्वपूर्ण परियोजना को कुछ चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा है। तेजस Mk1A की आपूर्ति में इंजन उपलब्धता और प्रमाणन प्रक्रिया से जुड़ी देरी सामने आई थी। कुछ रिपोर्टों में बताया गया था कि विमान की आपूर्ति तय समय से पीछे चली गई है। इसके बावजूद हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने दावा किया है कि कई विमान सेवा में शामिल किए जाने के लिए तैयार हैं और इंजन आपूर्ति स्थिर होते ही इनकी डिलीवरी तेज कर दी जाएगी।
हम आपको बता दें कि भारतीय वायु सेना के पास वर्तमान में स्वीकृत संख्या से कम लड़ाकू स्क्वॉड्रन हैं। ऐसे में तेजस कार्यक्रम को भविष्य की जरूरतों को पूरा करने वाला महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। बहरहाल, पश्चिमी सीमा पर तेजस Mk1A की तैनाती केवल एक सैन्य कदम नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक सोच, तकनीकी आत्मनिर्भरता और आधुनिक वायु शक्ति निर्माण की दिशा में एक निर्णायक पहल के रूप में देखी जा रही है।