Tamilnadu Elections के लिए BJP ने बिछाई गजब की चौसर, अनुभवी मोहरों को मैदान में उतार कर विरोधियों की मुश्किलें भी बढ़ाईं

By नीरज कुमार दुबे | Dec 16, 2025

तमिलनाडु में 2026 के विधानसभा चुनावों को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तैयारियों को तेज़ कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा था कि भाजपा का अगला लक्ष्य तमिलनाडु है। इसके बाद पार्टी ने राज्य में संगठनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर सक्रियता बढ़ा दी है। इसी क्रम में भाजपा ने वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को एक बार फिर तमिलनाडु का चुनाव प्रभारी नियुक्त किया है। उनके साथ केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और मुरलीधर मोहोल को सह-प्रभारी बनाया गया है। यह नियुक्तियाँ इस बात का संकेत हैं कि भाजपा राज्य में आगामी चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रही है।

हम आपको याद दिला दें कि पीयूष गोयल पहले भी 2019 के लोकसभा चुनावों में तमिलनाडु के प्रभारी रह चुके हैं और उस समय उन्होंने भाजपा तथा अन्नाद्रमुक (AIADMK) के बीच गठबंधन को आकार देने में अहम भूमिका निभाई थी। अन्नाद्रमुक के महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पादी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) को एक सख़्त और कुशल वार्ताकार माना जाता है और ऐसे में गोयल का अनुभव भाजपा के लिए उपयोगी माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, गोयल सीट बंटवारे के साथ-साथ गठबंधन से जुड़े अन्य संवेदनशील मुद्दों पर भी ईपीएस से बातचीत करेंगे।

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हम आपको यह भी बता दें कि भाजपा इस समय अन्नाद्रमुक पर यह दबाव बना रही है कि वह ओ. पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) और टी.टी.वी. दिनाकरन जैसे विद्रोही नेताओं को कम से कम एनडीए के सहयोगी के रूप में स्वीकार करे। ईपीएस इन नेताओं को दोबारा अन्नाद्रमुक में शामिल करने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन भाजपा का मानना है कि इन्हें एनडीए से बाहर रखना मुकुलथोर समुदाय के मतदाताओं को दूर कर सकता है, जिसका नुकसान सीधे-सीधे भाजपा-अन्नाद्रमुक गठबंधन को होगा।

सूत्रों के मुताबिक, ओपीएस ने हाल की बैठकों में भाजपा नेतृत्व को यह भरोसा दिलाया है कि वह फरवरी तक किसी अन्य राजनीतिक विकल्प की ओर नहीं जाएंगे। वहीं टीटीवी दिनाकरन का रुख अधिक आक्रामक माना जा रहा है, क्योंकि वह ईपीएस के नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। भाजपा नेतृत्व आने वाले हफ्तों में दिनाकरन से भी संपर्क साधने की योजना बना रहा है, ताकि मुकुलथोर वोटों का विभाजन रोका जा सके।

भाजपा ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह 2026 के विधानसभा चुनाव में पहले की तुलना में अधिक सीटों की मांग करेगी। पार्टी का दावा है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में उसे लगभग 11 प्रतिशत वोट शेयर मिला था और पूरे एनडीए को करीब 18 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। ऐसे में भाजपा 2021 की तरह 20 सीटों पर संतोष नहीं करेगी। पार्टी ने लगभग 50 सीटें अपने लिए और 15 सीटें ‘मैत्रीपूर्ण सहयोगियों’ के लिए चिन्हित की हैं, जिन पर कमल के चुनाव चिह्न पर उम्मीदवार उतारे जा सकते हैं।

इसी बीच, भाजपा ने असम के लिए भी संगठनात्मक नियुक्तियाँ की हैं। वरिष्ठ नेता बैजयंत पांडा को असम का चुनाव प्रभारी बनाया गया है। पांडा इससे पहले 2021 के असम विधानसभा चुनावों में भाजपा को सत्ता में वापस लाने में अहम भूमिका निभा चुके हैं। यह नियुक्तियाँ यह दर्शाती हैं कि भाजपा चुनावी प्रबंधन में अनुभवी और भरोसेमंद नेताओं पर दांव लगा रही है।

देखा जाये तो तमिलनाडु लंबे समय से भाजपा के लिए एक कठिन राजनीतिक मैदान रहा है। द्रविड़ राजनीति की गहरी जड़ें, भाषा और सांस्कृतिक पहचान का सवाल तथा डीएमके-अन्नाद्रमुक की पारंपरिक पकड़, इन सबके बीच भाजपा को अब तक सीमित सफलता ही मिली है। लेकिन हालिया घटनाक्रम यह संकेत देता है कि भाजपा इस बार केवल “सहयोगी की भूमिका” में नहीं रहना चाहती, बल्कि राज्य की राजनीति में निर्णायक हस्तक्षेप करने की रणनीति पर काम कर रही है।

पीयूष गोयल की पुनर्नियुक्ति महज़ सामान्य राजनीतिक फैसला नहीं है, बल्कि यह भाजपा की रणनीतिक सोच को दर्शाता है। पीयूष गोयल न केवल एक अनुभवी मंत्री हैं, बल्कि जटिल गठबंधनों को संभालने में भी माहिर माने जाते हैं। उनकी शांत लेकिन दृढ़ कार्यशैली ईपीएस जैसे नेताओं से बातचीत में संतुलन बना सकती है। वहीं अर्जुन मेघवाल का संगठनात्मक अनुभव और संसदीय समझ तथा मुरलीधर मोहोल की युवा ऊर्जा और जमीनी संपर्क क्षमता इस टीम को और मज़बूत बनाती है।

वहीं असम में बैजयंत पांडा की भूमिका भाजपा की उस रणनीति का उदाहरण है, जिसमें चुनावी प्रबंधन को एक पेशेवर कौशल के रूप में देखा जाता है। हम आपको याद दिला दें कि पांडा ने पहले भी साबित किया है कि वह संगठन, सरकार और सहयोगी दलों के बीच समन्वय स्थापित करने में सक्षम हैं। यह मॉडल अब तमिलनाडु में भी लागू किया जा रहा है।

तमिलनाडु में भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह खुद को केवल अन्नाद्रमुक की “जूनियर पार्टनर” छवि से बाहर निकाले। अधिक सीटों की मांग और अलग पहचान बनाने की कोशिश इसी दिशा में उठाया गया कदम है। यदि भाजपा ओपीएस और टीटीवी जैसे नेताओं को एनडीए में बनाए रखने में सफल होती है, तो यह न केवल सामाजिक संतुलन को साधेगा बल्कि डीएमके के खिलाफ एक व्यापक मोर्चा भी तैयार करेगा।

बहरहाल, भविष्य की राजनीति के लिहाज़ से देखें तो भाजपा तमिलनाडु में धीरे-धीरे एक वैकल्पिक ध्रुव बनाना चाहती है। संगठनात्मक विस्तार, नेतृत्व में विविधता और राष्ट्रीय स्तर की जीतों, जैसे बिहार में एनडीए की हालिया सफलता, का हवाला देकर पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि वह केवल उत्तर भारत की पार्टी नहीं रही। यदि यह रणनीति ज़मीन पर असर दिखाती है, तो आने वाले वर्षों में तमिलनाडु की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर सकती है, जहां भाजपा केवल दर्शक नहीं, बल्कि निर्णायक खिलाड़ी होगी।

-नीरज कुमार दुबे

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