वह दिन दूर नहीं, जब हिंदी को बचाने के लिए भी जनांदोलन की जरूरत पड़ेगी

By डॉ. रमेश ठाकुर | Sep 14, 2021

इलाहाबाद हाईकोर्ट में बहस के दौरान पिछले सप्ताह न्यायमूर्ति शेखर यादव का एक बयान काफी चर्चाओं में रहा। चर्चा की वजह उनका हिंदी प्रेम था। बहस के दौरान उन्होंने दोनों तरफ के अधिवक्ताओं से हिंदी में जिरह करने को कहा और ये भी बोला कि मैं हिंदी में ही फैसला दूंगा। दरअसल, इस तरह की घटनाएं हिंदी के लिए लड़ने वालों को संबल देती हैं। ये देखकर दुख होता है कि आधुनिक युग की चकाचौंध में धनाढ्य और विकसित लोग हिंदी भाषा को नकारते जा रहे हैं और अंग्रेजी की तरफ दौड़ रहे हैं। अंग्रेजी के विरुद्ध में कोई नहीं, लेकिन अपनी पारंपरिक जुबान को किसी भाषा के लिए दूर करना भी उचित नहीं? हम हिंदुस्तानियों ने जबसे पश्चिमी सभ्यता, उनकी भाषा, चालचलन आदि की कॉपी की है, तभी से हिंदी के समक्ष कांटे बिछ गए हैं। यही कारण है कि वैश्वीकरण और उदारीकरण के मौजूदा दौर में हमारी जननी भाषा दिनों दिन पिछड़ती जा रही है।

हिंदी को बचाने के ढोंग में कोई कमी नहीं? इसमें धनाढ्य इंसान या फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले सबसे आगे रहते हैं। ये नौटंकी अगर यूं ही चलती रही तो वह दिन दूर नहीं, जब दूसरी भाषाओं की तरह हिंदी को बचाने के लिए भी जनांदोलन की जरूरत पड़ेगी। हिंदी के प्रति सरकारों की उदासीनता सबसे ज्यादा अखरती है। आजादी से लेकर अब तक की हुकूमतों ने हिंदी के साथ बड़ा घोर अन्याय किया। देश ने पहले इस भाषा को राष्ट्रभाषा माना, फिर राजभाषा का दर्जा दिया और अब इसे संपर्क भाषा भी नहीं रहने दिया है। आज हिंदी दिवस है, बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, हिंदी के लिए छाती कूटी जाएंगी, आगे आने के लिए कसमें खाई जाएंगी। पर अगले ही दिन सबकुछ भूल जाएंगे। 

कहें कुछ भी अंग्रेजी बोलने वालों का आकर्षण हिंदी बोलने वालों के मुकाबले काफी प्रभावशाली होता है। इसी कारण हिंदी भाषियों की गिनती अब पिछड़ेपन में होने लगी है। अंग्रेजी के बढ़ने और हिंदी के पिछड़ने का एक और बड़ा नुकसान हुआ है। हिंदुस्तान भर में बोली जाने वाली हजारों राज्य भाषाएं कहीं लुप्त हो गई हैं। इसी मजबूरी के चलते अभिभावक अपने बच्चों को हिंदी की जगह अंग्रेजी सीखने की सलाह देते हैं। बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिला न दिलवाकर, अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाने लगे हैं। दरअसल इनमें उनका भी कोई दोष नहीं, क्योंकि अब ठेठ हिंदी बोलने वालों को रोजगार भी आसानी से नहीं मिलता और ऊपर से उन्हें देहाती-गंवार और बोला जाने लगा है।

  

देखा जाए तो हिंदी की दुर्दशा के पीछे हिंदी समाज ही है। उसका पाखंड है, उसका दोगलापन और उसका उनींदापन है। संस्कृति की उन्नति उसके समाज की तरक्की का आईना होती है। मगर इस मायने में हिंदी समाज का बड़ा विरोधाभाषी है। अब हिंदी समाज अगर देश के पिछड़े समाजों का बड़ा हिस्सा निर्मित करता है तो यह भी बिल्कुल आंकड़ों की हद तक सही है कि देश के समृद्ध तबके का भी बड़ा हिस्सा हिंदी समाज ही है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि आज यह भाषा समाज की उपेक्षा का दंश झेल रही है। हिंदी की लाज सिर्फ ग्रामीणों ने ही बचाई हुई है। वहां अब भी हिंदी को पूजते हैं, मानते और बोलते हैं। ज्यादातर बड़ी पत्र-पत्रिकाएं और न्यूज चैनल हिंदी के ही हैं। हिंदुस्तान में आज भी छोटे-बड़े दैनिक, साप्ताहिक और अन्य समयाविधि वाले हजारों अखबार प्रकाशित होते हैं और हजारों पत्रिकाएं हैं, 132 से ज्यादा हिंदी चैनल हैं, उसके बावजूद भी हिंदी लगातार पिछड़ गई। हिंदी जुबान को बचाने के प्रति केंद्र व राज्य सरकारें भी प्रचार-प्रसार नहीं करतीं। इसलिए हिंदी भाषा आज खुद अपनी नजरों में दरिद्र भाषा बन गई है। लोग इस भाषा को गुलामी की भाषा की संज्ञा देते हैं। 

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सवाल उठता है आखिर क्यों हिंदी को नौकरशाह, शासन-प्रशासन व संपन्न लोगों की भाषा नहीं माना जाता। आजादी के 75 साल में जितनी दुर्दशा हिंदी की हुई है उतनी दूसरी भाषा की नहीं? अगर हालात ऐसे ही रहे तो हिंदी को बचाने के लिए भी हमें एक जन आंदोलन करना पड़ेगा। उसके लिए किसी एक को बहुत बड़ा किरदार निभाना पड़ेगा। मौजूदा वक्त में देश के करोड़ों छात्र जो आईआईटी, तकनीकी, बिजनेस और मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं, वे हिंदी भाषा से लगभग दूर हो गए हैं। उनके पाठ्यक्रमों से हिंदी पूरी तरह से नदारद है। देश में ऐसे बच्चों की संख्या कम नहीं है जो आज हिंदी सही से बोल और लिख, पढ़ नहीं सकते। लेकिन अब हिंदी को विदेशों में ज्यादा तरजीह दी जा रही है। विभिन्न देशों के कालेजों में अब हिंदी की पढ़ाई कराई जाती है। उसके पीछे कारण यही है कि विदेशी लोग भाषा के बल से भारत में घुसपैठ करना चाहते हैं। जब वह हिंदी बोल और समझ लेंगे तब वह आसानी से यहां घुस सकते हैं। 

-डॉ. रमेश ठाकुर

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