छोटी सी कमेटी का महत्त्व (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jul 22, 2025

पिछले दिनों हमारे शहर में, राजनीति की सामाजिक प्रेरणा से ऐतिहासिक नायकों की मूर्तियां स्थापित की गई। यह सब एक विशाल सक्रिय कमेटी जिसमें हर रंग के लोग शामिल रहे, द्वारा लिए गए महत्त्वपूर्ण निर्णय के आधार पर हुआ। इस बेहद ज़रूरी काम के बाद, शहर के बहुत पुराने बाग़ के उद्धार के लिए कार्यकारी अधिकारी से सम्पर्क किया गया।    

पिछले कई सालों में म्युनिसिपल कमेटी में जितने भी कार्यकारी अधिकारी आए उन्हें ससम्मान बाग़ में लाया गया है। उन्हें दिखाया कि बाग़ की हालत ख्रराब है। सभी ने आश्वासन देते हुए खट्टे मीठे वायदे किए। एक बेचारे अधिकारी तो पूरे समय फोन ही सुनते रहे। अब यह नए जनाब आए हैं जिनका जन्म इसी शहर में हुआ है। बताते हैं अपनी जन्मभूमि से सचमुच प्यार करते हैं और भावनात्मक रूप से हमेशा जुड़े रहते हैं। कुछ वरिष्ठ नागरिकों के आग्रह पर अपना कीमती वक़्त निकालकर यहां तशरीफ़ लाए हैं। साथ में इनके मनपसंद पार्षद हैं जिनकी बात यह मानते हैं। 

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ऐतिहासिक बाग़ में कचरा यहां वहां संभाल कर रखा हुआ है। रास्ते टूटे पड़े हैं। कुत्तों को न लाने और घुमाने वाला बोर्ड गुम है तभी तो आधा दर्जन कुत्ते घूम रहे हैं। क्यारियों में फूल उगाने का समय नहीं मिला। तालाब की मछलियां मर रही हैं। सूखे पेड़ खुद ही टूट कर गिर रहे हैं। वरिष्ठ नागरिक कक्ष में ताला जड़ा हुआ है। इ टॉयलेट की लाश खड़ी है। बातचीत के दौरान समझदार पार्षद ने अपना बहुमूल्य सुझाव दिया, एक छोटी सी कमेटी बनाते हैं, सरजी, अच्छा रहेगा। एक वरिष्ठ नागरिक ने पूछा उससे क्या होगा। उन्होंने समझाया कि कमेटी ज्यादा बड़ी नहीं होगी, क्यूंकि बड़ी कमेटी में ज्यादा सदस्य होते हैं जब मीटिंग करो तो सभी के पास समय नहीं होता, बार बार बुलाने पर भी कम बंदे आते हैं लेकिन कहते हैं खबर में नाम ज़रूर डाल देना। इसलिए एक छोटी सी कमेटी बना लेते हैं जी।    

कमेटी छोटी होगी तो मीटिंग आसान होगी। कमेटी बनाने से कई अच्छे सुझाव मिल जाते हैं जी, काम अच्छे तरीके से हो जाता है। कोई पंगा नहीं रहता सरजी। हमने पूछा तो बताया कि उसमें एक अधिकारी होगा, दो तीन पार्षद, शासक पार्टी का एक बंदा और एक लोकल महिला नेता। 

एक महीने बाद वरिष्ठ नागरिकों ने जानना चाहा, क्या कमेटी बन गई है तो सही जवाब मिला, सरकारी कमेटी बनाने बारे तुम क्या जानो आम आदमी, यह संजीदा लोकतान्त्रिक कार्य होता है। उनसे वैसे ही जानना चाहा कि क्या कूड़ा कचरा साफ़ करवाने और उठवाने के किए भी किसी की स्वीकृति की ज़रूरत है। दो चार मजदूर ही तो चाहिए। वे बोले सर, हमारे यहां किसी भी काम में, कोई न कोई, किसी किसी न किस्म का, नई तरह का पंगा कर देता है सरजी। इसलिए काम होने से पहले सबसे ज़रूरी काम है कमेटी बनाकर सलाह लेना। इससे समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है कि देखो कबाड़ उठाने के लिए भी कमेटी बना रहे हैं। कमेटी के फैसलों पर कोई तर्जनी तो क्या चिचली उंगली भी नहीं उठा सकता जी।  

मिलजुल कर काम करना हमारी समृद्ध कार्यसंस्कृति की स्थापित परम्परा है जी। यह सुझाव सभी को मानना ही पड़ा। छोटी सी कमेटी का निर्माण बहुत ज़रूरी है जी। कमेटी में कौन कौन होगा, इस बारे गहन विचार विमर्श जारी है सरजी।     

- संतोष उत्सुक

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