माँ के उच्चारण मात्र से ही समाप्त हो जाती है हर तरह की बाधाएं

By राजेश कश्यप | May 11, 2019

'माँ' यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम−रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनो मस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। 'माँ' वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। 'माँ' की ममता और उसके आँचल की महिमा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। नौ महीने तक गर्भ में रखना, प्रसव पीड़ा झेलना, स्तनपान करवाना, रात−रात भर बच्चे के लिए जागना, खुद गीले में रहकर बच्चे को सूखे में रखना, मीठी−मीठी लोरियां सुनाना, ममता के आंचल में छुपाए रखना, तोतली जुबान में संवाद व अठखेलियां करना, पुलकित हो उठना, ऊंगली पकड़कर चलना सिखाना, प्यार से डांटना−फटकारना, रूठना−मनाना, दूध−दही−मक्खन का लाड़−लड़ाकर खिलाना−पिलाना, बच्चे के लिए अच्छे−अच्छे सपने बुनना, बच्चे की रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी चुनौती का डटकर सामना करना और बड़े होने पर भी वही मासूमियत और कोमलता भरा व्यवहार...ये सब ही तो हर 'माँ' की मूल पहचान है। इस सृष्टि के हर जीव और जन्तु की 'माँ' की यही मूल पहचान है।

हमारे वेद, पुराण, दर्शनशास्त्र, स्मृतियां, महाकाव्य, उपनिषद आदि सब 'माँ' की अपार महिमा के गुणगान से भरे पड़े हैं। असंख्य ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों, पंडितों, महात्माओं, विद्वानों, दर्शनशास्त्रियों, साहित्यकारों और कलमकारों ने भी 'माँ' के प्रति पैदा होने वाली अनुभूतियों को कलमबद्ध करने का भरसक प्रयास किया है। इन सबके बावजूद 'माँ' शब्द की समग्र परिभाषा और उसकी अनंत महिमा को आज तक कोई शब्दों में नहीं पिरो पाया है। 

कुल मिलाकर, संसार का हर धर्म जननी 'माँ' की अपार महिमा का यशोगान करता है। हर धर्म और संस्कृति में 'माँ' के अलौकिक गुणों और रूपों का उल्लेखनीय वर्णन मिलता है। हिन्दू धर्म में देवियों को 'माँ' कहकर पुकारा गया है। धार्मिक परम्परा के अनुसार धन की देवी 'लक्ष्मी माँ', ज्ञान की देवी 'सरस्वती माँ' और शक्ति की देवी 'दुर्गा माँ' मानीं गई हैं। नवरात्रों में 'माँ' को नौ विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। मुस्लिम धर्म में भी 'माँ' को सर्वोपरि और पवित्र स्थान दिया गया है। हजरत मोहम्मद कहते हैं कि 'माँ' के चरणों के नीचे स्वर्ग है।' ईसाइयों के पवित्र ग्रन्थ में स्पष्ट लिखा गया है कि 'माता के बिना जीवन होता ही नहीं है।' ईसाई धर्म में भी 'माँ' को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इसके साथ ही भगवान यीशु की 'माँ' मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है। बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया गया है। यहूदी लोग भी 'माँ' को सर्वोच्च स्थान पर रखते हैं। यहूदियों की मान्यता के अनुसार उनके 55 पैगम्बर हैं, जिनमें से सात महिलाएं भी शामिल हैं। सिख धर्म में भी 'माँ' का स्थान सबसे ऊँचा रखा गया है। 

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कहने का अभिप्राय यह है कि चाहे कोई भी देश हो, कोई भी संस्कृति या सभ्यता हो और कोई भी भाषा अथवा बोली हो, 'माँ' के प्रति अटूट, अगाध और अपार सम्मान देखने को मिलेगा। 'माँ' को अंग्रेजी भाषा में 'मदर' 'मम्मी' या 'मॉम', हिन्दी में 'माँ', संस्कृत में 'माता', फारसी में 'मादर' और चीनी में 'माकून' कहकर पुकारा जाता है। भाषायी दृष्टि से 'माँ' के भले ही विभिन्न रूप हों, लेकिन 'ममत्व' और 'वात्सल्य' की दृष्टि में सभी एक समान ही होती हैं। 'मातृ दिवस' संसार भर में विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। यूरोपीय देशों में 'मदरिंग सनडे' के रूप में मनाया जाता है। चीन में दार्शनिक मेंग जाई की माँ के जन्मदिन को 'मातृ−दिवस' के रूप में मनाया जाता है। नेपाल में वैशाख कृष्ण पक्ष में 'माता तीर्थ उत्सव' मनाया जाता है। अमेरिका व भारत सहित कई अन्य देशों में मई के दूसरे रविवार को 'मातृ दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इंडोनेशिया में प्रतिवर्ष 22 दिसम्बर को 'मातृ−दिवस' मनाने की परंपरा है। 

-राजेश कश्यप  

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