कैबिनेट तो एक स्वर में बोलती है पर पासवान और शेखावत के सुर अलग-अलग क्यों?

By अंकित सिंह | Sep 26, 2019

हमारे लिए पानी कितना महत्वपूर्ण है शायद इसे किसी को बताने की जरूरत नहीं है। पानी हमारे लिए जीवनदायिनी है। ऐसे में पानी के एक एक बूंद का काफी महत्व है। हालांकि आने वाला वक्त हमारे लिए बहुत ही संघर्षपूर्ण रहने वाला है जब पानी का संकट विकराल हो सकता है। इसी समस्या को समझते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया है। पानी राजनीति के हिसाब से भी हमारे देश में बहुत ही महत्वपूर्ण है। तभी तो केंद्र और कई राज्य सरकारें हर घर जल देने को लेकर गंभीर दिखती हैं। देश के कुछ हिस्से में पानी के मुद्दे पर ही चुनाव हो जाते हैं और लोगों को पानी फ्री में देने का वादा कर पार्टियां सत्ता में भी आ जाती हैं। लेकिन सवाल एक और उठता है कि पानी की गुणवत्ता क्या है? जैसे ही यह सवाल उठने लगता है इसका जवाब सीधा सत्ताधारी पार्टी से मांगा जाता है।

दिल्ली चुनाव को देखते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लगातार यह दावा कर रहे हैं कि वह दिल्ली में हर घर पानी पहुंचाने में सफल रहे हैं। वह लोगों को सस्ता और सुविधाजनक पानी मुहैया करा रहे हैं। साथ ही साथ उसकी गुणवत्ता पर भी जोर दे रहे हैं। लेकिन पानी की गुणवत्ता एक बड़ा मुद्दा तब बन गया जब केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने यह कह दिया कि दिल्ली में सप्लाई वाटर पीने के लायक नहीं है और उसकी गुणवत्ता बेहद ही खराब है। उन्होंने यह भी कह दिया कि पानी की गुणवत्ता को सुधारने के लिए वे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारियों के साथ बैठक करने के लिए भी सोच रहे हैं। रामविलास पासवान के इस दावे को उस समय महत्वहीन समझा जाने लगा जब केंद्र सरकार में मौजूद उन्ही के साथी गजेंद्र सिंह शेखावत ने यह कह दिया कि दिल्ली में पानी की गुणवत्ता यूरोपीय मानकों के हिसाब से बेहतर है। 

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गजेंद्र सिंह शेखावत नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी मंत्रालय जल शक्ति मंत्रालय का जिम्मा संभाल रहे हैं। शेखावत ने यह भी कह दिया कि निश्चित तौर पर यह उनकी (पासवान की) निजी राय होगी। कुछ महीने पहले हमने दिल्ली में 20 स्थानों के पानी के नमूनों की जांच की थी। सभी यूरोपीय मानकों से बेहतर मिले। शेखावत का यह बयान अरविंद केजरीवाल के लिए चुनाव से पहले किसी संजीवनी से कम नही है जिसका वह अपनी हर सभाओं में ढोल पीटेंगे। ऐसे में दो सवाल उठते हैं। पहला कि क्या मोदी कैबिनेट में शामिल मंत्रियों के बीच टकराव की स्थिति है? इसकी गुंजाइश ना के बराबर है। हां, यह जरूर हो सकता है कि मंत्रालयों के बीच समन्वय की कमी हो सकती है। यह भी संभव हो कि किसी खास क्षेत्र में किसी दिन सही पानी ना पहुंच सका हो और उसी के शिकार पासवान हो गए हों।    

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फिर दूसरा सवाल यह है कि अगर टकराव नहीं तो दो भाषा क्यों? इस सवाल के जवाब में एक लंबी चर्चा जरूर हो सकती है। चूंकि, गजेंद्र सिंह शेखावत और रामविलास पासवान दोनों अलग-अलग पार्टियों से हैं। गजेंद्र सिंह शेखावत की पार्टी भाजपा दिल्ली में मुख्य विपक्षी पार्टी है और ऐसे में हो सकता है उनकी पार्टी जल को बड़ा मुद्दा बनाकर चुनाव ना लड़ रही हो। रामविलास पासवान लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष हैं। हो सकता है पूर्वांचलियों की भारी तादाद को देखते हुए उनकी पार्टी आने वाला दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़े और वह पानी के ही मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल की सरकार को घेरने की कोशिश करें। लोजपा दिल्ली में विधानसभा चुनाव लड़ती रही है। संभावनाएं और आशंकाओं के मद्देनजर चर्चाओं का दौर लगातार चलता रहेगा पर इसका सही जवाब रामविलास पासवान और गजेंद्र सिंह शेखावत ही दे सकते हैं। हां, यह बात सच है कि अरविंद केजरीवाल को चुनाव में जाने से पहले गजेंद्र सिंह शेखावत के बयान से एक बड़ी कामयाबी मिल गई है जिसे वह पुरजोर तरीके से भुनाने की कोशिश करेंगे। 

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