By कमलेश पांडे | Feb 04, 2026
दुनिया के दो बड़े लोकतंत्र और पहली-चौथी अर्थव्यवस्था वाले देश अमेरिका व भारत में पुनः प्रेम के पींगे परवान चढ़ने शुरू हो गए। तमाम अंतर्राष्ट्रीय व द्विपक्षीय विरोधाभासों के बीच पारस्परिक सहयोग के विभिन्न जटिल पहलुओं पर जो रजामंदी दिखाई गई और फिर यह तय हुआ कि 'धीरे धीरे प्यार को बढ़ाना है, हद से गुजर जाना है!' जिसके अपने वैश्विक निहितार्थ हैं। शायद इसी हद पर 'वसुधैव कुटुम्बकम' और 'सर्वे भवंतु सुखिनः' की गारंटी निर्भर है।
ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि अमेरिका-भारत-यूरोपीय संघ यानी जी-7 प्रभुत्व वाले प्रेम त्रिकोण और भारत-रूस-चीन यानी ब्रिक्स देश वाले प्रेम त्रिकोण के बीच भारत कब, कैसे और कितना गुटनिरपेक्ष संतुलन बना पाएगा, अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बरकरार रख पाएगा? क्योंकि सब कुछ इन्हीं द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बातों-मुलाकातों पर निर्भर करेगा।
इसलिए कूटनीतिक हल्के में इस बात की आशंका अभी से ही जताई जा रही है कि आखिर अमेरिका कब तक अपने इस परिवर्तित स्टैंड पर कायम रहा पाएगा? क्या भारत को हांकने या फंसाने की उसकी फितरत बदल पाएगी? और यदि नहीं तो फिर नए भारत की उस पर क्या सधी प्रतिक्रिया होगी? जैसा कि भारत ने रणनीतिक ट्रेलर अमेरिका को दिखा भी दिया है जिसकी वजह से बिगड़ैल ट्रंफ 9 महीने बाद ही सही पर पुनः काबू में आए हैं। ऐसा इसलिए कि भारत के पास द्विपक्षीय विकल्पों की कमी नहीं है!
इस प्रकार देखा जाए तो डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी के बीच के संबंध जो साल 2025 की गर्मियों में व्यापारिक तनाव, रूस से भारत के भरोसेमंद संबंधों और टैरिफ पर टैरिफ युद्ध के कारण ठंडे पड़ गए थे, अब फरवरी 2026 आते आते गर्म होने लगे हैं। अब इनके बीच का वासंतिक प्रेम पुनः जाग गया है और आर्थिक रुमानियत और रणनीतिक अठखेल पुनः परवान चढ़ने के संकेत मिलने लगे हैं।
जहां तक मोदी-ट्रंफ के बीच के तनाव के मुख्य कारणों की बात है तो 2025 में ट्रंप ने भारत के निर्यात पर 50% तक टैरिफ बढ़ा दिए, खासकर टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स और जेम्स पर, जिससे द्विपक्षीय व्यापार वार्ता रुक गई। समझा जाता है कि भारत का रूस से तेल और हथियार खरीदना अमेरिका को पसंद नहीं आया, जबकि पाकिस्तान के प्रति ट्रंप का नरम रुख भी विवादास्पद रहा। वहीं, चुनावी राजनीति और "अमेरिका फर्स्ट" नीति ने व्यक्तिगत रसायन को प्रभावित किया।
और अब जब मोदी-ट्रंप के आपसी रिश्ते पर जमी बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया की बात हुई तो बताया गया कि ट्रंप ने सितंबर 2025 में ही मोदी की तारीफ की और रिश्तों को "खास" बताया, जिसका मोदी ने सोशल मीडिया पर जवाब भी दिया। भारत की "चुप्पी कूटनीति" और एससीओ (SCO) जैसे मंचों पर मजबूत स्थिति और भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) ट्रेड डील ने अमेरिका को भारत की अहमियत समझाई। लिहाजा, फरवरी 2026 में ही ट्रंप की मोदी से फोन कॉल ने जमी बर्फ को पूरी तरह पिघला दिया, जिससे ट्रेड डील की राह आसान हुई।
कहना न होगा कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील में टैरिफ विवाद फरवरी 2026 में पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की फोन वार्ता से सुलझा। अमेरिका ने भारत पर टैरिफ 25% से घटाकर 18% कर दिया, जबकि भारत ने रूसी तेल खरीद बंद करने और अमेरिकी उत्पादों पर जीरो टैरिफ का वादा किया। इस समझौते की मुख्य शर्तें इस प्रकार हैं- ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर घोषणा की कि मोदी के अनुरोध पर तत्काल प्रभाव से रेसिप्रोकल टैरिफ कम किया गया। रूस से तेल आयात रोकना, अमेरिका/वेनेजुएला से अधिक खरीद, और नॉन-टैरिफ बैरियर्स हटाना प्रमुख रियायतें रहीं। कुल टैरिफ 50% से घटकर 18% हो गया, जिसमें रूसी तेल से जुड़ा 25% दंड समाप्त हुआ।
जहां तक इनको सुलझाने की प्रक्रिया की बात है तो बेहद लंबी वार्ताओं के बाद (अगस्त 2025 से जनवरी 2026 तक) फोन कॉल ने अंतिम मुहर लगाई। भारत ने कृषि, डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्र बचाए, जबकि अमेरिका को व्यापार घाटा कम करने का लाभ मिला। यह द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक ले जाने का रास्ता साफ करता है।
इस प्रकार ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ (खासकर रूसी तेल खरीदने के कारण) अब पूरी तरह हटाए लिए गए हैं, क्योंकि हालिया टेलीफोनिक वार्ताओं से सकारात्मक प्रगति हुई है। सितंबर 2025 में भारत-अमेरिका के बीच 7 घंटे की बैठक के बाद चर्चाएं तेज हुईं, जहां 25% अतिरिक्त टैरिफ हटाने पर सहमति बनी। भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार अनंत नागेश्वरन ने कहा कि 8-10 हफ्तों में विवाद सुलझ सकता है, जिसमें रेसिप्रोकल टैरिफ भी घटेंगे।
इसलिए फरवरी 2026 तक ट्रंप-मोदी फोन कॉल ने गति दी, लेकिन पूर्ण समाधान SCO जैसे मंचों पर निर्भर है। फिर भी चुनौतियां अभी बाकी हैं। 50% टैरिफ स्टील, एल्यूमीनियम, टेक्सटाइल पर अभी प्रभावी हैं, हालांकि निर्यात में 20% वृद्धि हुई। अमेरिकी सांसदों ने इन्हें खत्म करने की मांग की, लेकिन ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति बाधा बनी हुई है।
इस प्रकार भारत अमेरिका डील के द्विपक्षीय मायने स्पष्ट हैं। भारत और अमेरिका के बीच हालिया डीलें, विशेष रूप से रक्षा और व्यापार समझौते, द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण हैं। ये डीलें रणनीतिक साझेदारी को गहरा करती हैं, भले ही टैरिफ जैसे विवाद बने रहें। खासकर रक्षा समझौते का अपना महत्व हैं। भारत-अमेरिका ने 10 साल के रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए, जो 2015 की रणनीतिक साझेदारी पर आधारित है। यह क्षेत्रीय स्थिरता, सूचना साझाकरण और हिंद-प्रशांत में चुनौतियों (जैसे चीन का प्रभाव) का सामना करने के लिए आधारशिला बनेगा। टैरिफ तनाव के बावजूद रक्षा सहयोग बढ़ रहा है।
जहां तक व्यापार डील की प्रगति की बात है तो दोनों देश 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखते हैं, जिसमें हाल ही में ट्रंप ने भारत पर टैरिफ 25% से घटाकर 18% किया। जबकि, दूध, कृषि और डेटा स्थानीयकरण जैसे मुद्दों पर बातचीत जारी है, लेकिन रेसिप्रोकल टैरिफ और GSP लाभ बहाली चुनौतियां बनी हुई हैं। पहला चरण सितंबर-अक्टूबर 2025 तक पूरा करने की कोशिश थी।
इन बातों का द्विपक्षीय प्रभाव यह पड़ेगा कि ये डीलें आर्थिक निर्यात बढ़ावा, रोजगार सृजन और रक्षा तकनीक हस्तांतरण लाएंगी। भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं में दोनों देशों का अभिसरण मजबूत होगा, हालांकि टैरिफ और बाजार पहुंच पर असहमति बनी रहेगी। कुल मिलाकर, ये संबंधों को स्थिरता प्रदान करेंगे।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक