Balochistan में रेल सेवाएं ठप, मोबाइल बंद, सामान छोड़ कर भाग रहे पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मी, Islamabad के छूटे पसीने

By नीरज कुमार दुबे | Feb 06, 2026

बलूचिस्तान में हालात एक बार फिर धधक उठे हैं और इस बार आग इतनी तेज है कि इस्लामाबाद तक उसकी तपिश महसूस की जा रही है। पूरे प्रांत में रेल सेवाएं अनिश्चित समय के लिए रोक दी गई हैं। कारण साफ है– सुरक्षा बलों ने मंजूरी देने से हाथ खड़े कर दिए हैं क्योंकि कई जिलों और शहरों में सैन्य अभियान, झड़पें और उग्र गतिविधियां लगातार जारी हैं। पाकिस्तान रेल प्राधिकरण ने घोषणा की है कि जफर रेल सेवा जो क्वेटा से पेशावर जाती है, बोलन डाक रेल जो क्वेटा से कराची चलती है, चमन की स्थानीय यात्री रेल और प्रांत के भीतर तथा बाहर जाने वाली अन्य सेवाएं फिलहाल बंद रहेंगी। यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित न कर पाने को कारण बताया गया है।

पाकिस्तान की बेचैनी को और हवा तब मिली जब रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद में माना कि इतने विशाल और विरल आबादी वाले क्षेत्र पर पहरा देना कठिन है और बलूच लड़ाके बेहतर हथियारों से लैस हैं। उन्होंने कहा कि विद्रोहियों के पास महंगे यंत्र और लाखों डॉलर के हथियार हैं। साथ ही उन्होंने इस पूरे प्रकरण के लिए भारत पर भी आरोप लगाया, हालांकि भारत ने आरोपों को खारिज किया है।

दूसरी ओर, क्षेत्र में हालिया हमलों के बाद चीन ने ग्वादर और बलूचिस्तान के अन्य हिस्सों में अपनी जमीनी गतिविधियां रोक दी हैं। यह कदम वहां काम कर रहे चीनी कर्मचारियों और निवेश की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंता को दिखाता है। चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से जुड़े अनेक ढांचे सीधे निशाने पर हैं, जिससे ग्वादर बंदरगाह फिर तनाव का केंद्र बन गया है। हम आपको बता दें कि ग्वादर कभी एक शांत मछुआरा बस्ती था। 1783 से यह लगभग दो सौ वर्ष तक ओमान के सुल्तान के अधीन रहा। 1958 में समझौते के बाद इसे पाकिस्तान ने लगभग 30 लाख पाउंड देकर अपने अधिकार में लिया। इससे पहले ओमान के सुल्तान ने इसे भारत को देने का प्रस्ताव भी रखा था, जिसे नई दिल्ली ने ठुकरा दिया था। यदि उस समय निर्णय अलग होता तो आज अरब सागर का सामरिक मानचित्र बिल्कुल अलग दिखता।

2017 में ग्वादर बंदरगाह का संचालन 40 वर्ष के पट्टे पर एक चीनी कंपनी को सौंप दिया गया। बंदरगाह की आय का लगभग 91 प्रतिशत हिस्सा उसी कंपनी को जाता है और पाकिस्तान को लगभग 9 प्रतिशत मिलता है। स्थानीय बलूच समुदाय का आरोप है कि जमीन अधिग्रहण, सीमित रोजगार, पर्यावरण हानि और भारी सुरक्षा बंदोबस्त ने उन्हें अपने ही क्षेत्र में पराया बना दिया है। इसलिए ग्वादर उनके लिए विकास नहीं, वंचना का प्रतीक बन गया है।

हम आपको बता दें कि बलूचिस्तान पाकिस्तान के कुल भूभाग का 40 प्रतिशत से अधिक है और खनिज संपदा से भरपूर है, फिर भी यह सबसे गरीब प्रांतों में गिना जाता है। दशकों से बलूच नेताओं का आरोप रहा है कि इस्लामाबाद संसाधन लेता है, पर बदले में विकास और अधिकार नहीं देता। जबरन गायब किए जाने, कड़ी सैन्य कार्रवाई और असहमति पर शिकंजे ने लोगों में अलगाव की भावना को और गहरा किया है।

इसी बीच, अमेरिका समर्थित एक विशाल खनन परियोजना ने इस क्षेत्र को वैश्विक नजरों में ला दिया है। पाकिस्तान ने अमेरिकी निर्यात आयात बैंक के जरिये लगभग 1.3 अरब डॉलर के निवेश आश्वासन हासिल किए हैं। रेको डिक क्षेत्र में तांबा और सोना खनन की लगभग 7 अरब डॉलर की यह परियोजना 2028 तक उत्पादन शुरू करने की उम्मीद रखती है। इसमें एक कनाडाई कंपनी की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जबकि शेष हिस्सा पाकिस्तानी संघीय उपक्रमों और बलूचिस्तान सरकार के पास है। अनुमान है कि यह परियोजना दशकों में अरबों डॉलर की आय दे सकती है। लेकिन सवाल वही है– क्या स्थानीय जनता को इसका लाभ मिलेगा या यह भी असंतोष की आग में घी डालेगा?

हम आपको बता दें कि ईरान के सिस्तान बलूचिस्तान से लगे इस पूरे पट्टी क्षेत्र में पहले से अस्थिरता रही है। सीमा पार हमले, हथियार और मादक पदार्थ तस्करी तथा सुन्नी उग्रवादी गुटों की गतिविधियां हालात को और जटिल बनाती हैं। कभी कभी दोनों देश एक दूसरे की जमीन पर उग्रवादी ठिकानों को निशाना बनाने के दावे भी करते रहे हैं।

इन सबके बीच पाकिस्तान के नीति गलियारों में एक डर खुलकर सामने आ रहा है कि कहीं एक व्यापक बलूच भूभाग की कल्पना आकार न लेने लगे जो पाकिस्तान और ईरान दोनों के हिस्सों को जोड़ दे। यदि ऐसा हुआ तो यह इलाका खनिज, समुद्री मार्ग और मध्य एशिया पहुंच के कारण अत्यंत सामरिक महत्व का केंद्र बन सकता है। यही कारण है कि इस उभार ने पाकिस्तान की नींद उड़ा दी है। देखा जाये तो बलूचिस्तान आज पाकिस्तान की कमजोर नस बन चुका है। वर्षों की उपेक्षा, कठोर सैन्य नीति और संसाधनों की असमान लूट ने वहां गहरा असंतोष बोया है जिसकी फसल अब उग्र रूप में सामने है। हर संकट पर बाहरी साजिश का शोर मचाना आसान है, पर अपने घर की दरारों को भरना कठिन।

चीन का निवेश, अब अमेरिका समर्थित खनन और अरब सागर से जुड़ा सामरिक महत्व, इन सबने बलूचिस्तान को विश्व राजनीति का अखाड़ा बना दिया है। पर किसी भी गलियारे, बंदरगाह या खदान से पहले वहां के लोगों का भरोसा जरूरी है। यदि स्थानीय जनता को लगे कि उनकी जमीन, पानी और खनिज पर उनका हक नहीं, तो कोई भी सुरक्षा बंदोबस्त स्थायी शांति नहीं दे सकता।

बहरहाल, पाकिस्तान के लिए यह चेतावनी का समय है। केवल बल से प्रांत नहीं संभलते। राजनीतिक संवाद, न्याय और बराबरी ही टिकाऊ रास्ता हैं। वरना बलूचिस्तान की गूंज दूर तक जाएगी और उसके झटके पूरे क्षेत्र की सामरिक संतुलन को हिला सकते हैं। अभी भी समय है कि इस आग को समझदारी से बुझाया जाए, वरना यह लपटें और ऊंची होंगी।

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