By अभिनय आकाश | Apr 10, 2026
पेंटागन और व्हाइट हाउस के बीच चीन को लेकर उपजे मतभेद अब खुलकर सामने आ गए हैं। दरअसल, पिछले साल जब सैन्य अधिकारियों ने राष्ट्रपति ट्रंप के सामने रक्षा रणनीति का एक ड्राफ्ट पेश किया, जिसमें चीन को अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया गया था, तो ट्रंप ने न केवल उस पर असहमति जताई बल्कि उसे पूरी तरह से बदलने का आदेश दे दिया। जनवरी में जारी हुई संशोधित 'नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी' में इसका असर साफ दिखा, जहाँ दशकों पुराने सख्त रुख को छोड़कर बीजिंग के प्रति अचानक एक नरम और सुलह वाला लहजा अपनाया गया है। यह बदलाव दर्शाता है कि ट्रंप प्रशासन अब चीन के साथ पुरानी दुश्मनी के बजाय एक नई कूटनीतिक दिशा की ओर बढ़ रहा है। अमरीकी राजनीति में अमूमन हर सरकार अपनी नई रक्षा रणनीति बनाती है, लेकिन ट्रंप 2.0 अपने ही पिछले कार्यकाल के फैसलों को पलटकर सबको हैरान कर रहा है। जिस चीन को 'ट्रंप 1.0' के दौरान अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन और प्रतिद्वंद्वी घोषित किया गया था, अब उसके प्रति व्हाइट हाउस के तेवर पूरी तरह बदल चुके हैं। ट्रंप 2.0 का नया मंत्र अब 'टकराव' नहीं, बल्कि 'शांति' नजर आ रहा है।
चीन को लेकर वह अलग- अलग बातें करते रहे हैं। कभी वह उससे जियो-पॉलिटिकल या आर्थिक चिंताओं की बात करते हैं तो कभी शी जिनपिंग के साथ डील करने की। साथ ही, वह हिंद-प्रशांत को लेकर पिछली सरकार की नीतियों पर सवाल भी उठा चुके हैं। ट्रंप ने अपनी सरकार में कई चीन विरोधियों को जगह दी है, लेकिन इनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो चीन को लेकर संतुलित या पॉजिटिव रवैया रखते हैं। लंबे समय से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता और व्यापारिक तनाव के बावजूद, ट्रंप प्रशासन ने चीन के साथ व्यवहार में सावधानी बरती है। इसका एक प्रमुख कारण दुर्लभ खनिजों, इलेक्ट्रिक वाहनों में प्रयुक्त महत्वपूर्ण घटकों, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरणों और नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों पर बीजिंग का प्रभुत्व है। र्लभ धातुओं को लेकर हुए गतिरोध ने चीन की जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता को उजागर किया है, जिससे अमेरिकी औद्योगिक उत्पादन को सीधा नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में बीजिंग के खिलाफ कठोर टैरिफ रणनीति अपनाना एक जोखिम भरा विकल्प बन गया है।
राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत वैश्विक व्यापार और सुरक्षा व्यवस्था को एकतरफा रूप से उलट-पुलट कर, विदेशी सहायता रोककर और विदेशों में लोकतंत्र को बढ़ावा देने के वाशिंगटन के प्रयासों को समाप्त करके विश्व में अमेरिका की भूमिका को बदलने के प्रयास से हुई। लक्ष्य अभी भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अमेरिका-केंद्रित द्विपक्षीय संबंधों के हब-एंड-स्पोक मॉडल में पुनर्गठित करना है, जिससे केवल अमेरिका को लाभ हो। अन्य सरकारों को संदेश स्पष्ट था: इस राह पर चलो, वरना परिणाम भुगतने होंगे। लेकिन ट्रंप के कई प्रयासों के अप्रत्याशित परिणाम निकले हैं। विशेष रूप से, उन्हें उम्मीद थी कि चीनी वस्तुओं का प्रभावी बहिष्कार आर्थिक रूप से कमजोर बीजिंग को अमेरिका के लिए अधिक अनुकूल व्यापार शर्तों को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर देगा। इसके विपरीत, चीन ने दुर्लभ खनिजों पर प्रतिबंध लगा दिए, जो डिजिटल युग की उपभोक्ता और सैन्य प्रौद्योगिकियों की एक विशाल श्रृंखला के लिए आवश्यक घटक हैं। इस कदम ने राष्ट्रपति ट्रंप को पीछे हटने और अमेरिकी निर्मित सेमीकंडक्टर और अन्य प्रौद्योगिकियों तक चीनी पहुंच के रूप में रियायतें देने के लिए मजबूर कर दिया - एक ऐसा कदम जिसे ट्रंप और उनसे पहले राष्ट्रपति बाइडेन प्रतिबंधित करने के लिए दृढ़ संकल्पित रहे हैं।
अमेरिकी प्रशासन के भीतर चीन को घेरने की हर कोशिश अब पूरी तरह ठप पड़ती नजर आ रही है। खबर है कि वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने कड़ा फरमान जारी किया है कि चीन से जुड़े किसी भी एक्शन के लिए उनकी लिखित मंजूरी अनिवार्य होगी। आलम यह है कि बड़े-बड़े अधिकारी फाइलों पर दस्तखत के लिए घंटों उनके दफ्तर के बाहर या उनकी कार के इंतजार में खड़े रहते हैं। स्थिति इतनी अजीब हो गई है कि एक चीनी राउटर कंपनी पर प्रतिबंध लगाने के लिए अधिकारियों को रिपोर्ट की भाषा तक बदलनी पड़ी ताकि उसमें चीन या उस कंपनी का नाम न आए। हैरानी की बात तो यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने 'स्टेट ऑफ द यूनियन' भाषण तक में अपने इस सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी का नाम तक नहीं लिया। ट्रंप प्रशासन के इस यू-टर्न से सुरक्षा सलाहकार और चीन के प्रति सख्त रुख रखने वाले हॉक्स अधिकारी गहरे सदमे में हैं। वे तंज कसते हुए इसे 'बुसान फ्रीज' का नाम दे रहे हैं यानी वह समझौता जिसने चीन के खिलाफ चल रही हर कार्रवाई को बर्फ की तरह जमा दिया है। दरअसल, इस नरम रुख के पीछे ट्रंप की बड़ी रणनीति आगामी मई में शी जिनपिंग के साथ होने वाली मुलाकात की जमीन तैयार करना है, ताकि एक नाजुक व्यापारिक समझौते को बचाया जा सके।