Gaza में ट्रंप के प्लान को UN की मंजूरी, मुस्लिम देशों का रुख देख अमेरिका के सामने पीछे हटे चीन-रूस

By अभिनय आकाश | Nov 19, 2025

गाजा शांति समझौते को लेकर अमेरिका अपनी पीठ थपथपाने में जुटा हुआ है। लेकिन इजराइल रुकने का नाम नहीं ले रहा है। वो रुक-रुक कर गाजा पर हमले करता जा रहा है। अक्टूबर महीने के आखिर में इजराइल के हमले में 100 से ज्यादा फिलिस्तीनियों की मौत हो गई। दरअसल गाजा शांति समझौता उस संघर्ष को रोकने के लिए हुआ जिसमें 67,000 से ज्यादा फिलिस्तीनियों की मौत हुई। 19 लाख लोग बेघर हो गए। इजराइली हमले में गाजा का 80% हिस्सा तबाह हो गया। बात 7 अक्टूबर 2023 की सुबह की है। हमास लड़ाकों ने इजराइल के दक्षिणी क्षेत्र पर हमला कर दिया। हमास आतंकियों ने सुपरनोवा फेस्टिवल को निशाना बनाया जिसमें करीब 1200 इजराइलियों की मौत हो गई। जबकि 251 लोगों को बंधक बना लिया गया। उस हमले के बाद हमास को खत्म करने के मकसद से इजराइल ने आर-पार की लड़ाई शुरू की। आज आपको बता देते हैं कि क्या गाजा शांति प्रस्ताव से दशकों पुराना विवाद सुलझ जाएगा? यूएन से मिली हरी झंडी के बाद हमास को क्या ये कबूल होगा। संयुक्त राष्ट्र में आखिर वीटो वाले चीन और रूस ने क्यों वॉकआउट का रास्ता चुना।

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ट्रंप के प्रस्ताव को मंजूरी

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने गाजा मुद्दे पर ट्रंप के प्रस्ताव को मंजूरी देकर मध्य पूर्व में एक और शांति को ना सिर्फ मजबूती दी बल्कि आम फिलिस्तीनियों को अब तक की सबसे बड़ी राहत पहुंचाई। प्रस्ताव को हरी झंडी मिलने के बाद अब गाजा में अंतरराष्ट्रीय बल भेजने का रास्ता साफ हो गया। जिसके बाद युद्ध से तबाह हुए इलाकों में शांति और मानवीय मदद को आगे बढ़ाया जाएगा। प्रस्ताव में ट्रंप के नेतृत्व वाले बोर्ड ऑफ फीस को गाजा की अंतरिम प्रशासनिक संस्था के रूप में मान्यता दी गई है। इसी में द्वि-राष्ट्र समाधान का संकेत भी मौजूद है जो आगे जाकर राजनैतिक समाधान के तहत फिलिस्तीन के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्र का सपना पूरा करेगा। हालांकि इस पर कोई समय सीमा या फिर शर्तें निर्धारित नहीं की गई हैं।

क्या है ट्रंप का गाजा प्लान

ट्रंप ने सितंबर में 20 पॉइंट का अपना यह प्लान जारी किया था। इसमें गाजा को आतंकवाद मुक्त और स्थिर क्षेत्र के रूप में विकसित करने का टारगेट रखा गया था। गाजा के पुनर्निर्माण और शासन के लिए बोर्ड ऑफ पीस नाम की एक इंटरनैशनल संस्था बनाने का भी जिक्र है। इस प्रस्ताव में इंटरनैशनल सैनिकों की तैनाती, सीजफायर और शासन आदि के रोडमैप का जिक्र है। गाजा के लिए एक स्पेशल फोर्स इंटरनैशनल स्टैबलाइजेशन फोर्स (ISF) के गठन की भी बात है।गाजा के शासन की कमान एक अंतरराष्ट्रीय निकाय बोर्ड ऑफ पीस (बीओपी) के हाथ में रहेगी। इस बोर्ड के डायरेक्टर खुद ट्रम्प होंगे। ट्रम्प का गाजा प्लान सिर्फ शांति नहीं, रियल एस्टेट का बड़ा मौका है। दामाद जेरेड कुश्नर ने 2024 में कहा था कि गाजा की समुद्री पट्टी 'बहुत कीमती हो सकती है। उनकी फर्म एफिनिटी पार्टनर्स को सऊदी अरब से 16,800 करोड़ रु. मिले हैं। गाजा पुनर्निर्माण में प्राइवेट सेक्टर को 30 साल की टैक्स छूट और जमीन के अधिकार मिलेंगे। ट्रम्प खुद बोर्ड ऑफ पौस के चेयरमैन बनकर नियंत्रण रखेंगे। इवांका, डोनाल्ड जूनियर और एरिक के ट्रम्प ऑर्गेनाइजेशन के खाड़ी देशों में प्रोजेक्ट हैं। विशेषज्ञ इसे ट्रम्प परिवार का भारी कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट बता रहे हैं।

गाजा का 2 हिस्सों में बंटवारा

गाजा पट्टी की चौड़ाई औसतन 8 से 10 किमी है उत्तर में यह 6 किमी जबकि दक्षिण में 12 किमी तक चौड़ी है। अमेरिकी योजना के मुताबिक गाजा को दो मुख्य हिस्सों ग्रीन जोन और रेड जोनमें बांटने का प्रस्ताव है। दोनों हिस्से लगभग 4-4 किमी के माने जा रहे हैं। इनके बीच करीब 1 किमी का बफर/येलो जोन होगा, जहां इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स (आईएसएफ) की तैनाती होगी। ग्रीन जोन में निर्माण कार्य होगा जबकि 23 लाख से ज्यादा फिलिस्तीनी रेड जोन में रहने को मजबूर होंगे। गाजा में इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स के 10 से 15 हजार सैनिक तैनात होंगे। इंडोनेशिया, अजरबैजान, पाकिस्तान, मिस्त्रयूएई जैसे मुस्लिम देश सैनिक भेज सकते हैं।

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हमास ने फैसले को किया खारिज

हमास ने सुरक्षा परिषद के इस फैसले को खारिज कर दिया है। हमास ने कहा कि यह प्रस्ताव फिलिस्तीनियों के अधिकारों और मागो को पूरा करने में विफल और गाजा पर एक अतर्राष्ट्रीय न्यास थोपने का प्रयास करता है। हमास ने विशेष रूप से स्थिरीकरण बल को सशस्त्र समूहों को निष्क्रिय करने का निर्देश देने वाले प्रावधानो की तीखी आलोचना की। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, हमास ने कहा-अतर्राष्ट्रीय फोर्सेस को गाजा पट्टी के अदर कार्य और भूमिकाएं सौपना, इसकी तटस्थता को समाप्त करता है।

अरब देशों को क्या फायदा

यूरोपीय देश और अमेरिका के करीबी समझे जाने वाले अरब मुल्क अगर आगे भी इसी तरह सक्रिय रहें तो 'बोर्ड ऑफ पीस' और 'इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स', दोनों को इस्राइल की जेबी संस्था बनने से रोका जा सकता है। विश्व बैंक यूएन के मुताबिक गाजा की पुनर्विकास की अनुमानित लागत करीब 5.8 लाख करोड़ रुपए है। सऊदी अरब, यूएई, कतर, मित्र जैसे देश ट्रम्प प्लान को समर्थन दे रहे हैं, बदले में इजराइल से संबंध सामान्य करना और ईरान के खिलाफ मजबूत गठबंधन चाहते हैं। गाजा पुनर्निर्माण में ये देश सैनिक भी भेजेंगे ताकि हमास पूरी तरह खत्म हो। सऊदी अरब इजराइल से नॉर्मलाइजेशन के लिए गाजा फंडिंग का इस्तेमाल कर रहा है। यूएई हमास को खतरा मानता है, कतर क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाना चाहता है। ये देश बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होकर गाजा शासन में हिस्सा लेंगे, लेकिन फिलिस्तीनी राज्य की स्पष्ट गारंटी मांग रहे हैं। हैं। प्राइवेट कंपनियों को 30 साल टैक्स छूट, लैंड राइट्स और ट्रेड हब का लाभ मिलेगा

पाकिस्तान का रुख दिलचस्प

सबसे दिलचस्प भूमिका पाकिस्तान की रही। जो मुस्लिम देश होने के चलते आमतौर पर फिलीस्तीन के पक्ष में खड़ा रहने का दावा करता है लेकिन पाक ने अमेरिकी प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया और अब गाजा में तैनात होने वाली इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स के लिए सैनिक भेजने पर भी सहमत हो गया है। अनुमान है कि पाकिस्तान 1,500 से 2,000 सैनिक तक भेज सकता है। प्रस्ताव पास होते ही ट्रम्प ने इसे 'गाजा में शांति की नई शुरुआत' बताया और पाकिस्तान की ओर इशारा करते हुए कहा कि जो देश आगे आएंगे, वे भविष्य के बोर्ड ऑफ पीस में महत्वपूर्ण भागीदार होंगे।

रूस-चीन ने क्यों अमेरिका के सामने पीछे खींचे अपने कदम

ट्रंप के उस 20 सूत्रीय योजना को शामिल कर लिया गया जिस पर कभी रूस और चीन ने विरोध जताया था। लेकिन अरब सहित कई मुस्लिम देशों के रुख को देखकर दोनों देशों ने प्रस्ताव पर वीटो करने से परहेज किया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गाजा में शांति, सुरक्षा और पुनर्निर्माण को लेकर जब महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा गया तो मुस्लिम देशों के रुख को देखते हुए चीन और रूस ने अमेरिका के सामने अपने कदम पीछे खींच लिए। जिसके बाद 15 सदस्य देशों में से ब्रिटेन, फ्रांस, सोमालिया सहित 13 देशों की मदद से प्रस्ताव पास हो गया। हालांकि भविष्य में फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र देश का दर्जा देने की संभावना को लेकर इजराइल विफरा हुआ है। इसके बाद पश्चिम एशिया में शांति को लेकर एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पास हो गया। इसके बाद ना सिर्फ हमास के हथियार छीनने का रास्ता साफ हो गया है बल्कि एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश बनाने के मुद्दे को भी मजबूती मिली है। गौर करने वाली बात है कि रूस और चीन यूएनएससी के स्थायी समिति सदस्य हैं, उनके विरोध से प्रस्ताव वीटो हो जाता। हालांकि रूस और चीन ने इस प्रस्ताव के पक्ष या विपक्ष में वोट भले न डाले हों, लेकिन उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स इजरायल या नैटो की सैन्य शक्ति जैसा नहीं, संयुक्त राष्ट्र की पीस कीपिंग फोर्स जैसा ही व्यवहार करे। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के लिए बुरा समय चल रहा है, लेकिन उनके मानकों से दूर जाना विस्फोटक स्थितियों को जन्म दे सकता है।

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