Chai Par Sameeksha: UCC की ABC समझिये, जानिये समान नागरिक संहिता का भारत पर क्या असर पड़ेगा

By प्रभासाक्षी ब्यूरो | Jul 03, 2023

प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क के खास साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह समान नागरिक संहिता, मणिपुर के हालात और तमिलनाडु  के राज्यपाल के फैसले से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की गयी। इस दौरान प्रभासाक्षी संपादक ने कहा कि समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो बयान दिया है वह इस मुद्दे के प्रति केंद्र सरकार की सोच को स्पष्ट करता है। देखना होगा कि सभी सुझाव मिलने के बाद विधि आयोग के मसौदा प्रस्ताव से क्या सामने आता है। वैसे देखा जाये तो जब भारत का संविधान में भी सभी नागरिकों के समान अधिकार की बात कही गयी है और सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी इस संबंध में कानून लाने के लिए सरकार को कहा गया है, ऐसे में इस मुद्दे को टालने की बजाय इसका हल निकालना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों को उन राजनीतिक विवादों को नहीं झेलना पड़े जिसका आज की पीढ़ी सामना कर रही है।

प्रभासाक्षी संपादक ने साथ ही कहा कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मणिपुर का दौरा कर राहत शिविरों में रह रहे हिंसा प्रभावित लोगों का हाल जाना। देखा जाये तो यह अच्छा प्रयास है क्योंकि शांति स्थापित करने के प्रयासों में सभी को सहयोग करना चाहिए। साथ ही पीड़ितों के साथ खड़े होकर उनका दुख-दर्द बाँटना चाहिए और हरसंभव सहायता भी करनी चाहिए। लेकिन यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह सब सिर्फ राजनीतिक लाभ-हानि की दृष्टि से नहीं किया जाये। दरअसल, संवेदनशील स्थिति में वीआईपी की सुरक्षा बड़ी चुनौती होती है इसलिए किसी भी हिंसा प्रभावित क्षेत्र में नेताओं को दौरा करते समय जिद पर अड़ने की बजाय स्थानीय प्रशासन की बात सुननी चाहिए।

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तमिलनाडु मामला

प्रभासाक्षी संपादक ने कहा कि तमिलनाडु के राज्यपाल ने एक मंत्री को बर्खास्त करने के फैसले पर विवाद बढ़ने के बीच कानूनविदों की राय लेने तक आदेश को स्थगित कर दिया है। यह संभवतः भारत में पहला मामला है जब राज्यपाल ने बगैर मुख्यमंत्री की सिफारिश के किसी मंत्री को बर्खास्त कर दिया। लगभग ऐसा ही एक मामला Kerala में भी सामने आया था जब राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर एक मंत्री को हटाने के लिए कहा था, मगर मुख्यमंत्री ने इंकार कर दिया था। राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों को दायरे में रह कर काम करने की नसीहत समय-समय पर अदालतों द्वारा दी जाती रही है, मगर फिर भी ऐसे विवाद खड़े होना दुर्भाग्यपूर्ण है। 

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