By रेनू तिवारी | Feb 05, 2026
मलयालम सिनेमा के दिग्गज निर्देशक जीथु जोसेफ आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। मोहनलाल अभिनीत 'दृश्यम' (Drishyam) की शानदार सफलता ने उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे भरोसेमंद और रचनात्मक कहानीकारों की कतार में खड़ा कर दिया। 'दृश्यम 2' की सफलता, जो ओटीटी पर रिलीज होने के बावजूद वैश्विक स्तर पर सराही गई, ने यह साबित कर दिया कि जीथु जोसेफ के पास दर्शकों की नब्ज पकड़ने की अद्भुत कला है। मलयालम सिनेमा अपनी बेहतरीन और अनोखी कहानियों के लिए जाना जाता है, और 'वलथु वशते कल्लिन' (जिसका अर्थ है: द थीफ ऑन द राइट साइड) इसी श्रेणी में एक नई और प्रभावशाली कड़ी है। यह फिल्म एक साथ कई भावनाओं को समेटे हुए है- इसमें डर है, हंसी है और अंत में एक गहरा संदेश भी।
फिल्म की कहानी एक मध्यमवर्गीय परिवार और एक चोर के इर्द-गिर्द घूमती है। कहानी तब गति पकड़ती है जब एक रात एक चोर गलती से एक ऐसे घर में घुस जाता है जहाँ पहले से ही कुछ अप्रत्याशित (unexpected) घट रहा होता है।
अक्सर फिल्मों में चोर को विलेन दिखाया जाता है, लेकिन यहाँ निर्देशक ने एक दिलचस्प मोड़ दिया है। घर के अंदर के "सभ्य" लोगों के राज जैसे-जैसे खुलते हैं, दर्शक यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि असली 'चोर' या 'अपराधी' कौन है- वह जो बाहर से ताला तोड़कर आया है, या वे जो घर के भीतर मुखौटा पहनकर रह रहे हैं।
कसी हुई पटकथा और डार्क कॉमेडी का सटीक मिश्रण इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी पटकथा है, जो डार्क कॉमेडी और थ्रिलर के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाए रखती है। लेखक ने सामान्य दिखने वाली स्थितियों में भी हास्य और तनाव को इस तरह पिरोया है कि दर्शक हर पल उत्सुक रहता है। फिल्म का व्यंग्यात्मक लहजा समाज के तथाकथित 'सभ्य' वर्ग पर तीखा प्रहार करता है, जिससे कहानी मनोरंजन के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर कर देती है।
मानव स्वभाव का वास्तविक चित्रण और अभिनय कलाकारों का अभिनय फिल्म का दूसरा सबसे मजबूत स्तंभ है। चोर के किरदार में अभिनेता ने गजब की स्वाभाविकता दिखाई है; उसकी मासूमियत और चालाकी एक साथ पर्दे पर उभरती है। वहीं दूसरी ओर, घर के सदस्यों के रूप में अन्य कलाकारों ने मानवीय लालच, डर और पाखंड की परतों को बहुत गहराई से जिया है। किरदारों के बीच का संवाद और उनके भावों का उतार-चढ़ाव फिल्म को बहुत ही सजीव बनाता है।
प्रभावशाली निर्देशन और सीमित दायरे का बेहतरीन उपयोग निर्देशक ने सीमित संसाधनों और एक ही लोकेशन (घर के अंदर) का उपयोग करने के बावजूद फिल्म के रोमांच को कम नहीं होने दिया है। एक ही बंद जगह में पूरी फिल्म को शूट करना चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन कैमरे के कोणों (Camera Angles) और लाइटिंग के जरिए निर्देशक ने एक रहस्यमयी और घुटन भरा माहौल पैदा किया है, जो कहानी की मांग के अनुरूप है। यह निर्देशन की परिपक्वता को दर्शाता है कि दर्शकों का ध्यान कहीं भी भटकता नहीं है।
नैतिकता और सामाजिक संदेश का गहरा जुड़ाव फिल्म केवल एक चोरी की घटना नहीं है, बल्कि यह नैतिकता और 'सही बनाम गलत' के बीच की धुंधली रेखा की पड़ताल करती है। यह मजबूती से यह संदेश देती है कि अपराधी केवल वह नहीं है जो कानून तोड़ता है, बल्कि वे भी हैं जो समाज की नजरों में ऊंचे पदों पर बैठकर अनैतिक कृत्य करते हैं। फिल्म का अंत दर्शकों के मन में एक गहरा प्रभाव छोड़ता है और उन्हें अपने स्वयं के नैतिक मूल्यों का मूल्यांकन करने के लिए प्रेरित करता है।
धीमी रफ्तार: फिल्म की शुरुआत थोड़ी धीमी है और कहानी को मुख्य बिंदु तक पहुँचने में समय लगता है।
सीमित अपील: यह एक 'मास' मसाला फिल्म नहीं है। जो लोग केवल एक्शन या तेज रफ्तार थ्रिलर पसंद करते हैं, उन्हें यह फिल्म थोड़ी 'आर्टिस्टिक' लग सकती है।
वलथु वशते कल्लिन एक ऐसी फिल्म है जिसे दिमाग खोलकर देखने की जरूरत है। यह न केवल आपका मनोरंजन करती है, बल्कि आपको समाज के दोहरे मानदंडों के बारे में सोचने पर मजबूर कर देती है। अगर आप मलयालम सिनेमा के रियलिस्टिक और डार्क थ्रिलर के प्रशंसक हैं, तो यह फिल्म आपके लिए एक शानदार अनुभव होगी।
रेटिंग: 4/5