By अभिनय आकाश | Nov 30, 2019
एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीज़र्न्स) ये भारत और खासकर असम की राजनीति का एक चर्चित विषय है। अवैध घुसपैठियों की पहचान करने वाले NRC को पूरे देश में लागू किया जाएगा। गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में ये बड़ा ऐलान किया है। वहीं ममता बनर्जी पिछले दो दिनों से कह रही हैं कि वो बंगाल में इसे लागू नहीं होने देंगी। इस पर जमकर राजनीति हो रही है क्योंकि NRC राज्यों में वोटरों पर सीधा असर डाल सकता है। इसलिए हमने सोचा की NRC के पूरे मामले को आसान से तथ्यों के आधार पर आपके सामने रख दें।
सबसे पहले 4 लाइनों में समझ लीजिए कि आखिर NRC है क्या?
बांग्लादेश से असम की सीमा लगती है कोई बैरियर नहीं है। तो वहां से कभी रोजगार कभी अच्छी ज़िन्दगी की चाह लिए कभी जंग से बचने के लिए लाखों बंगला मुसलमान और हिन्दू असम आकर बसने लगे। लेकिन इन्होंने वीजा नहीं लिया न ही कोई दूसरा कागज बनवाया। ऐसे में असम के लोगों को लगा की वो अपने ही राज्य में माइनॉरिटी हो जाएंगे। आंदोलन चला खून खराबा हुआ फिर राजीव गांधी ने 1985 में आंदोलनकारियों से असम एकॉर्ड नामक समझौता किया। वादा किया गया की असम के विदेशी नागरिक बाहर किये जाएंगे। बीच में मामला ठंडा पड़ा लेकिन फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एक कवायद शुरू हुई। एक सूची बने जिसमे असम में रहने वाले सभी भारतीयों के नाम हों। यही NRC है।
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असम में अंतिम NRC 31 अगस्त को जारी की गई थी, जिसमें 19 लाख आवेदनकर्ताओं के नाम हटा दिए गए थे। अब यह NRC पूरे देश में लागू किया जाएगा। इसका मकसद देश में गैर-कानूनी तौर पर रह रहे विदेशी लोगों को बाहर करना है। NRC कोई नया या अद्भुत विचार नहीं है। 1950 में ही इस पर काम किया जा चुका है। तारीखों के आइने से समझते हैं असम NRC को लेकर अब तक क्या हुआ।
NRC की 1950 से लेकर अब तक की पूरी कहानी
एनआरसी और नागरिकता संशोधन बिल को एक ही जैसे मु्द्दे की तरह देखा जाता है। लेकिन दोनों में बहुत ही ज्यादा अंतर है। चलते-तलते आपको ये भी बता देते हैं कि नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी के बीच में अंतर क्या है।
NRC पड़ोसी देशों से आए घुसपैठियों की पहचान के लिए है वहीं नागरिकता संशोधन विधेयक धार्मिक प्रताड़ना के शिकार शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए है। NRC से धर्म का कोई लेना-देना नहीं है और नागरिकता संशोधन बिल के मुताबिक पाकिस्तान, अफगानिस्तान. बांग्लादेश के 6 धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को नागरिकता मिलेगी जो पलायन करके भारत आए। इनमें हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन, ईसाई और पारसी लोग शामिल हैं। NRC अभी सिर्फ असम में लागू हुई है और मोदी सरकार का इसे पूरे देश में लागू करने का इरादा है वहीं नागरिकता संशोधन बिल किसी एक राज्य नहीं बल्कि पूरे देश में शरणार्थियों पर लागू होगा। अब इस दोनों ही मामले में लड़ाई दो बातों पर हो रही है। ममता बनर्जी कह रही हैं कि वो पश्चिम बंगाल में NRC को लागू नहीं होने देंगी। वहीं गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कर दिया है कि वो इसे पूरे देश में लागू करेंगे। दूसरा मुद्दा नागरिकता संशोधन विधेयक है जिसके बारे में विवाद ये है कि इसे मुस्लिम विरोधी बताया जा रहा है और कहा जा रहा है कि घुसपैठियों को लेकर धर्म के आधार पर अंतर किया जा रहा है। इस पर सरकार का मानना है कि गैर मुस्लिम धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होकर भारत आए। इन्हें नागरिकता मिलनी चाहिए।