मारो-पीटो की राजनीति से पता नहीं कब बाहर निकलेगा पश्चिम बंगाल

By नीरज कुमार दुबे | Sep 21, 2019

पश्चिम बंगाल में अब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्यपाल जगदीप धनखड़ के बीच विवाद बढ़ गया है। विवाद भी ऐसे समय बढ़ा जब मुख्यमंत्री केंद्र से रिश्ते सुधारने के लिए दिल्ली में प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों से मुलाकात करने गयी हुई थीं। मुख्यमंत्री की इस दिल्ली यात्रा के एजेंडे में राज्य का नाम बदलने का एजेंडा भी शामिल है लेकिन उन्हें सोचना चाहिए कि क्या नाम बदल जाने से ही राज्य में सबकुछ बदल जायेगा। जरूरत नाम बदलने की नहीं पश्चिम बंगाल की कानून व्यवस्था की हालत बदलने की है। जी हाँ, राज्य की कानून व्यवस्था का हाल कैसा है इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि एक केंद्रीय मंत्री को सरेआम वहां मारा-पीटा जाता है और उसे बचाने के लिए खुद राज्य के राज्यपाल को आना पड़ता है।

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अब सवाल यह था कि हालात कौन संभाले ? उधर, मामले की जानकारी जब राज्य के राज्यपाल जगदीप धनखड़ तक पहुँची तो उन्होंने तुरंत दिल्ली में मौजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बात कर हस्तक्षेप करने को कहा। राज भवन के सूत्रों के अनुसार राज्यपाल ने प्रदेश के मुख्य सचिव से मामले में तत्काल कार्रवाई करने को भी कहा था। धनखड़ ने साफ कहा कि विश्वविद्यालय में केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो और अन्य का घेराव किया जाना गंभीर मामला है। मामले पर नजर रखे हुए कुलाधिपति राज्यपाल ने हालात संभालने के लिए खुद विश्वविद्यालय जाना सही समझा और भारी पुलिस बल के साथ वहाँ पहुँच गये। राज्यपाल वहाँ का मंजर देख कर हैरान रह गये क्योंकि आंदोलनकारी छात्र राज्यपाल के सामने भी प्रदर्शन कर रहे थे और कोशिश कर रहे थे कि वह भी केंद्रीय मंत्री के साथ परिसर से चले जाएं। विश्वविद्यालय के कुलाधिपति राज्यपाल जगदीप धनखड़ के सामने वामपंथी छात्र संगठनों- एसएफआई, एएफएसयू, एफईटीएसयू और आईसा और टीएमसीपी के छात्रों ने प्रदर्शन किया। छात्रों ने उनका रास्ता रोक दिया और उनके वाहन के बोनट पर प्रहार किया। इस बीच पुलिसकर्मी छात्रों से हटने का अनुरोध करते रहे। वहीं, राज्यपाल धनखड़ केंद्रीय मंत्री की मदद करते और उन्हें बचाते हुए दिखे। विश्वविद्यालय अध्यापक संघ के एक प्रवक्ता ने बताया है कि स्थिति को गंभीर होता देख छात्रों को मनाने के लिए अध्यापक आगे आए जिसके बाद धनखड़ और बाबुल सुप्रियो शाम में तीन नंबर गेट से अपने वाहन में सवार होकर बाहर निकल पाये।

मामले पर टिप्पणी करते हुए बाबुल सुप्रियो ने कहा है, ‘‘मैं यहां राजनीति करने नहीं आया था। विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों के व्यवहार से दुखी हूं, जिस तरह उन्होंने मेरे साथ धक्का-मुक्की की। उन्होंने मेरे बाल खींचे और मुझे धक्का दिया।’’ छात्रों के इस तरह के बर्ताव को निंदनीय बताते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि वे अन्य छात्रों और सेमिनार आयोजकों को उकसा कर शांति के माहौल को बिगाड़ने की कोशिश कर रहे थे और भगदड़ जैसी स्थिति पैदा करना चाह रहे थे। बाबुल सुप्रियो ने यह दावा भी किया कि प्रदर्शनकारियों ने खुद को खुल्लम-खुल्ला नक्सली बताकर उन्हें उकसाने का प्रयास किया। 

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उधर इस प्रदर्शन में शामिल AFSU नेता देवराज देवनाथ ने कहा कि फासीवादी ताकतों को परिसर में नहीं आने दिया जाएगा। उन्होंने कहा, ‘‘हम भाजपा, आरएसएस और एबीवीपी को जेयू जैसे उदार संस्थान में उनकी विचारधारा का प्रसार नहीं करने देंगे।’’ लेकिन देवनाथ जैसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है या नहीं? क्या अपनी विचारधारा के प्रसार का अधिकार सिर्फ वामपंथियों को है?वामपंथियों के बारे में यही कहा जा सकता है कि उन्हें चिंतन करना चाहिए कि वह क्यों देश में तेजी से सिकुड़ते चले जा रहे हैं।

दूसरी ओर तृमणूल कांग्रेस राज्यपाल पर सवाल उठाते हुए कह रही है कि वह संविधान के संरक्षक हैं और उन्हें बिना निर्वाचित सरकार को बताये भाजपा नेता का बचाव करने नहीं जाना चाहिए था। मुख्यमंत्री ने भी राज्यपाल से विश्वविद्यालय नहीं जाने का अनुरोध किया था। लेकिन सवाल यहाँ सवाल उठाने वालों से है। क्या बाबुल सिर्फ भाजपा नेता हैं? वह एक केंद्रीय मंत्री हैं और यदि केंद्रीय मंत्री के कपड़े फाड़ दिये जाते हैं, उनके बाल खींचे जाते हैं तो और भी कुछ हो सकता है इसीलिए अगर राज्यपाल वहाँ चले गये और मंत्री को बचा लिया तो इसमें मामले कां संभाल लेने की उनकी कवायद और मानवीयता के नाते उठाये गये कदम के तौर पर लिया जाना चाहिए।

बहरहाल, यह मामला जल्द शांत होने वाला नहीं है क्योंकि भाजपा ने इस घटना के विरोध में बंद बुलाया और प्रदर्शन किया। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और पार्टी के पश्चिम बंगाल मामलों के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने कहा है कि यह घटना राज्य में बिगड़ती कानून व्यवस्था का पर्याप्त सबूत है। बाबुल सुप्रियो के साथ तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं की ओर से की गयी हिंसा का यह कोई पहला मामला नहीं है लेकिन आधिकारिक कार्यक्रमों में भी यदि बंगाल में केंद्रीय मंत्रियों के साथ ऐसा बर्ताव होता रहेगा तो हमारे संघीय ढांचे का क्या होगा? 

-नीरज कुमार दुबे

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