By अनन्या मिश्रा | Jan 15, 2026
हिंदू धर्म और भारतीय परंपराओं में भगवान की पूजा-अर्चना और भक्ति का गहरा आध्यात्मिक ऊर्थ होता है। अक्सर हमारे घर के बड़े-बूढ़े या फिर मंदिर के पुजारी सलाह देते हैं कि कभी भी हमें ठाकुर जी की प्रतिमा के दर्शन बिल्कुल सामने से दर्शन नहीं करना चाहिए। क्योंकि यह सिर्फ एक परंपरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक कारण छिपे हैं। चाहे घर का छोटा सा मंदिर हो या फिर वृंदावन का बांके बिहारी जैसा भव्य और दिव्य धाम हो। भगवान के दर्शन करने का एक विशेष सलीका होता है।
यह सलीका भगवान और भक्त के बीच के संबंध को अधिक गहरा और सुरक्षित बनाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर क्यों ठाकुर जी के सामने खड़े होकर उनके दर्शन नहीं करने चाहिए।
जब भी हम ठाकुर जी के ठीक आंखों के सामने खड़े होते हैं, तो उस तीव्र ऊर्जा को हमारा शरीर सहन नहीं कर पाता है। यह वैसा ही है, जैसे सूरज की रोशनी को सीधे देखने पर आंखें चौंधिया जाती हैं। लेकिन जब आप किनारे से ठाकुर जी के दर्शन करते हैं, तो हम उस ऊर्जा को धीरे-धीर और सौम्य तरीके से ग्रहण कर पाता है।
इसके अलावा भगवान के सामने सीधे खड़े होना 'अहंकार' का भी प्रतीक माना जा सकता है, जैसे हम किसी बराबरी वाले व्यक्ति के सामने खड़े हो रहे हैं। इसके उलट थोड़ा हटकर या तिरछा खड़े होने से 'दास्य भाव' और 'विनम्रता' को दर्शाता है।
जब भी हम किनारे खड़े होकर झुककर भगवान के दर्शन करते हैं, तो हमारे अंदर यह भाव जागता है कि हम ईश्वर के चरणों के सेवक हैं। हमारी यह विनम्रता ईश्वर तक हमारी प्रार्थना को पहुंचाने का माध्यम बनती है।
भक्ति शास्त्र के मुताबिक व्यक्ति को भगवान के दर्शन किश्तों में करना चाहिए। पहली बार में चरण, फिर कमर और फिर वक्षस्थल और अंत में मुखारविंद यानी की चेहरे के दर्शन करने चाहिए। लेकिन अगर आप सीधे सामने खड़े होकर भगवान के दर्शन करते हैं, तो हमारा ध्यान भटक सकता है।
आप किनारे खड़े होकर बारीकी से ठाकुर जी के स्वरूप को निहार सकते हैं। ब्रज की परंपरा में तो भगवान को 'नजर' लगने का भी भाव होता है। इसलिए भक्त सीधे सामने खड़े होकर भगवान को एकटक नहीं देखते हैं, जिससे हमारे आराध्य को नजर न लग जाए।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार, मंदिर में मूर्तियों को ऐसे स्थान पर रखा जाता है, जहां पर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगे सबसे अधिक होती है। वहीं मूर्ति के एकदम सामने इन तरंगों का केंद्र होता है। सीधे सामने खड़े होकर दर्शन करने की बजाय थोड़ा हटकर खड़े होने से यह तरंगे धीरे-धीरे हमारे शरीर के चक्रों को प्रभावित करती है।