By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Aug 11, 2021
भारत के सर्वोच्च न्यायाधीश एनवी रामन्ना ने भारत की न्याय-व्यवस्था के बारे में दो-टूक बात कह दी है। विज्ञान भवन के एक समारोह में उन्होंने कहा कि भारत के पुलिस थानों में गिरफ्तार लोगों के साथ जैसी बदसलूकी की जाती है, वह न्याय नहीं, अन्याय है। वह न्याय का अपमान है। गरीब और अशिक्षित लोगों की कोई मदद नहीं करता। उन्हें कानूनी सहायता मुफ्त मिलनी चाहिए। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि वे भी हमारी न्याय व्यवस्था के अंग हैं। अदालतों तक पहुँचने का खर्च इतना ज्यादा है और मुकदमे इतने लंबे समय तक अधर में लटकते रहते हैं कि करोड़ों गरीब, ग्रामीण, अशिक्षित लोगों के लिए हमारी न्याय-व्यवस्था बिल्कुल बेगानी बन गयी है।
वर्तमान सरकार ने ऐसे कई कानूनों को रद्द करने का साहस जरूर दिखाया है लेकिन पिछले 75 साल में हमारे यहां एक भी सरकार ऐसी नहीं बनी, जो संपूर्ण कानून और न्याय-व्यवस्था पर पुनर्विचार करती। यह तो संतोष और थोड़े गर्व का भी विषय है कि इस घिसी-पिटी व्यवस्था के बावजूद हमारे कई न्यायाधीशों ने सच्चे न्याय के अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। न्याय-व्यवस्था को सुधारने के लिए कुछ पहल एकदम जरूरी हैं। सबसे पहले तो सभी कानून मूलतः हिंदी में लिखे जाएं। अंग्रेजी का पूर्ण बहिष्कार हो। बहस और फैसलों में भी! ये दोनों वादी और प्रतिवादी की भाषा में हों। वकीलों की लूट-पाट पर नियंत्रण हो। गरीबों को मुफ्त न्याय मिले। हर मुकदमे पर फैसले की समय-सीमा तय हो। मुकदमे अनंत काल तक लटके न रहें। अंग्रेजों के ज़माने में बने कई असंगत कानूनों को रद्द किया जाए। न्यायाधीशों को सेवा-निवृत्ति के बाद किसी भी लाभ के पद पर न रखा जाए ताकि उनके निर्णय सदा निष्पक्षता और निर्भयतापूर्ण हों। न्यायपालिका को सरकार और संसद के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नियंत्रणों से मुक्त रखा जाए। स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र की सबसे मजबूत गारंटी है।
- डॉ. वेदप्रताप वैदिक