क्या कभी आत्मदैन्य से मुक्त हो सकेंगे हम?

By प्रो. संजय द्विवेदी | Oct 19, 2026

कोई भी राष्ट्र जिस स्थिति में होता है, उसके लिए वह खुद जिम्मेदार होता है। जापानी जैसे हैं ,उनका देश वैसा ही है। इसी तरह की बात इजरायल, चीन और ईरान या किसी भी देश के बारे में हो सकती है। भारत भी वैसा ही है, जैसे हम हैं! ऐसे में कभी विदेशी आक्रांताओं,कभी मैकाले और कभी अपनी आजादी के बाद सत्ता में आए नायकों को कोसते हुए हम अपने कर्तव्यबोध से मुक्त हो जाते हैं। कोई भी राष्ट्र अपने नागरिकों की सामूहिक चेतना के आधार पर विकसित होता है। उसका इतिहासबोध, संस्कृतिबोध, मित्रबोध और शत्रुबोध मिलकर उसका निर्माण करते हैं। इनसे ही राष्ट्रीय मानस या राष्ट्रीय भाव बनता है।

इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट नहीं बनेगा नेताओं का अखाड़ा

औसत भारतीय का आचरण अंग्रेजी शासनकाल में कैसा था, कहने की जरूरत नहीं है। हम कोहिनूर को छोड़कर कांच की ओर दौड़ रहे थे। अंग्रेजी भाषा और संस्कृति श्रेष्ठता की परिचायक बन गई। जब तक अपना कोई व्यक्ति या कार्य पश्चिम में स्थापित न हो जाए, उसे हम श्रेष्ठ मानने को तैयार नहीं थे। अंग्रेजी शासन और उसके बाद के आजादी के साल भी आत्मगौरव के अभाव में गुजरे साल बनकर रह गए। सत्ता के आतंक और सत्ता से जुड़े रहने के आकर्षण से हमने 'अपने जीवन मूल्यों का  सनातन सिद्ध राजमार्ग' छोड़कर 'अंग्रेजियत की पगडंडियों' पर चलना प्रारंभ कर दिया, जो हमारा देखा-परखा रास्ता नहीं था। जाहिर है इस मार्ग पर हम नेतृत्वकर्ता नहीं, अनुगामी ही बन सकते थे। हमारे एकत्व को चोटिल करने के सचेतन प्रयास प्रारंभ हुए। भारतीय शिक्षा पद्धति को अंग्रेजी राज में कैसे नष्ट किया गया, इसे धर्मपाल जी को पढ़कर ही समझ में आएगा। 'स्व' के स्थान पर 'परकीय' विचारों की स्थापना के प्रयास खूब चले। हम एक 'राष्ट्र' नहीं हैं, बताया गया। अनेक स्थानीयताओं को राष्ट्रीयता के बरक्स स्थापित करने के अकादमिक प्रयास भी खूब चले, सफल भी हुए।  कैसे और कितने विभाजन गढ़े जा सकते हैं, सारा जोर इसी पर था। भारतीय ज्ञान परंपरा पर चल रहे लोगों के आत्मविश्वास को समाप्त कर इस पूरे विचार को ही पोंगापंथ और पिछड़ेपन के रुप में आरोपित किया जाना फैशन बन गया।

राजनीतिक परिवर्तन के कारण लंबे समय के बाद भारत फिर से खुद को खोज रहा है। अपनी जड़ों की तरफ वापसी करना चाहता है। जिसे 'विचारों की घर वापसी' कहकर संबोधित किया गया। जरूरी है कि भारत प्रेमी बौद्धिक वर्ग सत्य के सूर्य की स्थापना करने के लिए अध्यवसाय में जुट जाए। सिर्फ भावनात्मक प्रवचनों, कार्यक्रमों से आगे बढ़कर भ्रमों के निवारण का जतन करे। ऐसे कुशल बौद्धिक योद्धा ही अपनी ज्ञान परंपरा को सामने लाकर तथ्य, प्रमाणों के साथ उनकी युगानुकुल व्याख्या करेंगे। इसके लिए हमें लोकसंग्रही और विनम्र बनना पहली शर्त है। परंपरा,जीवन पद्धति और परिवार पर छाए संकटों के बीच ये प्रयत्न ही हमें आत्मशक्ति देंगे। दुनिया भर में चल रहे सभ्यतागत संघर्ष के बीच भारत को अपनी वृहत्तर भूमिका का निर्वहन करना है, क्योंकि हमारे पास दुनिया को देने के लिए समावेशी विचार है। जहां साझापन सौंदर्य की तरह है, विविधता और बहुलता का यहां उत्सव मनाया जाता है। हम पूजा में भी अनेक देवताओं की पूजा करते हैं। बहुलतावादी समाज होने कारण हमने मतभिन्नता का सदैव स्वागत किया। इसका उदाहरण हमारी 'शास्त्रार्थ' परंपरा है। इसलिए "एक किताब,एक विचार, एक देवता " को मानने और दूसरे विचार को समाप्त करने को आतुर विचार भारत को नहीं समझ सकते। जहां दुनिया के हर पंथ के लोग नैसर्गिक सहजता से सांस ले सकते हैं। यहां कोई श्रेष्ठ और निकृष्ट नहीं है। सब समान रूप से इस धरती मां की संतानें हैं। ऐसे में भारत केंद्रित विमर्श ही विश्व शांति का मार्ग है। 'स्वत्व' ही मार्ग है, जिस पर चलने के लिए हमें महात्मा गांधी, धर्मपाल, सीताराम गोयल, दीनदयाल उपाध्याय, वासुदेव शरण अग्रवाल, निर्मल वर्मा, विद्यानिवास मिश्र का अध्ययन मदद कर सकता है। इससे भारत के मूल विचार को समझने तथा भारत का मौलिक चिंतन स्थापित करने में मदद मिलती है। इससे ही ग़लत बातों का खंडन करते हुए हम सही विमर्श की स्थापना में सफल हो पाएंगे।

भारतीय उदात्त जीवन मूल्यों के आधार पर संपूर्ण विश्व के लिए हमें ही वैश्विक बौद्धिक नेतृत्व देना होगा। जिसकी एक झलक हमें स्वामी विवेकानंद में दिखती है। ऐसे में ‘स्वबोध‘ का जागरण ही विकल्प है। पहले हमारे अपने विचार को भारत तो स्वीकार करे। वह आत्मदैन्य से मुक्त होकर 'भारत' को 'भारत' (इंडिया नहीं) की नजर से देखना प्रारंभ करे। वैचारिक साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए कई स्तरों पर कार्य करने की आवश्यकता है। इसे इस तरह से समझिए कि गोरा बनाना और अंग्रेजी सिखाना आज भी हिंदुस्तान में दो सबसे बड़े व्यापार हैं। यही उपनिवेशवादी मानसिकता है। इसके चलते ही हमारे गांव उजड़ते चले गए और संयुक्त परिवार बिखर गए। आज एकल परिवारों के नाते अलग तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक संकट हमारे सामने हैं। जाति, भाषा, क्षेत्र,पंथ की लड़ाइयों को छोड़कर भी बहुत सी विभाजनकारी बातें हर दिन आज भी खोजी जाती हैं , फिर आख्यान (नरेटिव) गढ़े जाते हैं। भारत जिसे कभी 'इंडिया' बनाने की कोशिशें हुईं, उसे भारत बनाए रखने के लिए हमें ही आगे आना होगा। क्योंकि भारत का नष्ट होना, उस विचार का मिट जाना होगा, जिसने हमें "वसुधैव कुटुम्बकम्" का संदेश दिया। जिसने हमें राम, कृष्ण,शिव, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक देव जैसे नायक दिए। जिसने "सर्वे भवन्तु सुखिन:" में अपनी मुक्ति देखी और लोक-मंगल जिसका मूलमंत्र रहा।

- प्रो. संजय द्विवेदी 
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

प्रमुख खबरें

HFCL के इतिहास का सर्वश्रेष्ठ तिमाही प्रदर्शन, MD Mahendra Nahata ने की नतीजों की घोषणा

देश और दुनिया की दोपहर की बड़ी खबरें, पढ़ें प्रमुख राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम

Malaysia Airlines लगा सकती है Green Levy, और महंगे हो सकते हैं हवाई टिकट

Kolkata में चोरबागान भगदड़ के बाद 3 दुर्गा पूजा समितियों को Fire Safety नोटिस