अमेरिका ने पाक पर लगाया करोड़ों डॉलर का दाँव, बलूचिस्तान के बारूद पर बैठकर सोना खोदेंगे ट्रंप !

By नीरज कुमार दुबे | Dec 11, 2025

अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान के सबसे अस्थिर और विद्रोह-ग्रस्त प्रांत बलूचिस्तान में स्थित रिकोडिक (Reko Diq) तांबा–सोना खदान के लिए 1.25 अरब डॉलर के यूएस EXIM बैंक वित्तपोषण को मंजूरी दे दी है। यह वही परियोजना है जिसे वर्षों से सुरक्षा संकट, राजनीतिक विवाद और बलूच विद्रोहियों की हिंसा ने कभी आगे बढ़ने नहीं दिया। इस निवेश के साथ निकट भविष्य में 2 अरब डॉलर तक की अमेरिकी मशीनरी और सेवाएँ पाकिस्तान भेजी जाएँगी। अमेरिकी चार्ज द’अफ़ेयर्स नटाली बेकर ने कहा है कि यह परियोजना अमेरिका के लिए 6,000 और बलूचिस्तान में 7,500 नौकरियाँ उत्पन्न करेगी। उन्होंने रिकोडिक को दोनों देशों के लिए लाभकारी आदर्श मॉडल बताया है।

हम आपको बता दें कि रिकोडिक दुनिया के सबसे बड़े अविकसित तांबा–सोना भंडारों में से एक है। माना जाता है कि यहां 15 मिलियन टन तांबा और 26 मिलियन औंस सोना है। कनाडा की दिग्गज कंपनी बैरिक गोल्ड पहले ही 2028 तक उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य तय कर चुकी है। इस परियोजना का 50% मालिकाना बैरिक के पास है, जबकि पाकिस्तानी संघीय व बलूचिस्तान सरकार के पास 25-25% हिस्सेदारी है। रिपोर्टों के अनुसार इस परियोजना से 37 वर्षों में 70 अरब डॉलर से अधिक मुक्त नकदी प्रवाह उत्पन्न होने की संभावना है।

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हालाँकि, सुरक्षा खतरे सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। बलूच विद्रोही गुट लगातार सेना, खनन परियोजनाओं और विदेशी निवेश पर हमले करते रहे हैं। हाल ही में बलूच नेताओं ने स्पष्ट चेतावनी दी कि कोई भी विदेशी निवेशक बलूचिस्तान के कब्जे को वैधता देने की गलती नहीं करे। बलूच नेशनल मूवमेंट के अध्यक्ष नसीम बलूच ने इसे बलूच जनता की संपत्ति पर पाकिस्तानी कब्जे को बढ़ावा देने वाला कदम बताया।

इसी बीच विश्व बैंक की IFC, एशियन डेवलपमेंट बैंक और अन्य वैश्विक उधारदाता 2.6 अरब डॉलर से अधिक का वित्त पैकेज जोड़ रहे हैं। साथ ही सऊदी अरब की मनारा मिनरल्स भी 10–20% हिस्सेदारी खरीदने पर बातचीत कर रही है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल वही है कि क्या पाकिस्तान इतने लंबे समय तक सुरक्षा, बुनियादी ढाँचे और राजनीतिक स्थिरता की गारंटी दे पाएगा? देखा जाये तो अमेरिकी निवेश ऐसे समय में आया है जब वाशिंगटन चीन-प्रभुत्व वाली खनिज आपूर्ति शृंखलाओं से बाहर निकलने के लिए नए स्रोत तलाश रहा है। फिर भी, रिकोडिक पर यह दाँव एक हाई-रिस्क जुआ माना जा रहा है।

यह भी देखने में आ रहा है कि रिकोडिक में अमेरिकी निवेश सिर्फ आर्थिक सौदा नहीं बल्कि यह भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात पर फेंकी गई भारी-भरकम चाल है। पाकिस्तान इसे बड़ी जीत बताकर छाती ठोक रहा है पर असलियत यह है कि अमेरिका ने यह पैसा दक्षिण एशिया के सबसे अस्थिर इलाके में आग से खेलने के अंदाज़ में डाला है। सवाल यह नहीं कि अमेरिका क्यों आया? सवाल यह है कि वह इतना देर से और इतनी जगह पर क्यों आया?

हम आपको बता दें कि यह निवेश उस समय हो रहा है जब बलूचिस्तान में विद्रोह चरम पर है। बलूच नेता साफ चेतावनियाँ दे रहे हैं कि यह निवेश उनके लिए शोषण का नया अध्याय है। बलूच नेता कह रहे हैं कि प्रांत में दशकों से मौजूद असंतोष और सैन्य दमन को देखते हुए कोई भी समझदार निवेशक पहले सौ बार सोचे। लेकिन अमेरिका ने शायद जानबूझकर जोखिम को स्वीकार कर लिया है। ऐसा लगता है कि यह सौदा पाकिस्तानी नहीं, बल्कि अमेरिकी एजेंडे का हिस्सा है। दरअसल, अमेरिका का असली मकसद है चीन को पछाड़ना। आज की सच्चाई यह है कि दुनिया में तांबा, सोना और अन्य क्रिटिकल मिनरल्स नई सदी का तेल बन चुके हैं। चीन खासकर अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में इस क्षेत्र में भारी पकड़ बना चुका है। अमेरिका बड़ी तेजी के साथ नए स्रोत ढूँढ़ रहा है और पाकिस्तान का रिकोडिक, जो तिब्बती–ईरानी खनिज बेल्ट का हिस्सा है वह अमेरिकी रणनीति में एक खूबसूरत चेकमेट जैसा दिखता है।

इसके साथ ही बलूचिस्तान का भौगोलिक महत्व इस कदम को और तीखा बनाता है। ईरान की सरहद पास है, अफ़ग़ानिस्तान की अनिश्चितता बगल में है, चीन–पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) ठीक सिर के ऊपर है। ऐसे में अमेरिका एक ही प्रहार में चीन को संकेत देता है कि हम अभी भी आपके बगल में मौजूद हैं और आपके बंदरगाह (ग्वादर) के पीछे की जमीन पर निवेश करने की ताकत रखते हैं।

वहीं पाकिस्तान इस निवेश को आर्थिक राहत समझ रहा है, लेकिन असल में वह एक रणनीतिक जाल में फँसता दिख रहा है। देश की सुरक्षा एजेंसियों का इतिहास बताता है कि वह बलूचिस्तान को सेना-प्रभुत्व वाला इलाका मानती हैं। पर विदेशी निवेश वहीं चलता है जहाँ जनता को न्यूनतम सहमति या सुरक्षा मिले। यह दोनों ही पाकिस्तान के पास नहीं हैं। रिकोडिक के लिए न रेल लाइन है, न स्थायी सड़कें, न विश्वसनीय सुरक्षा तंत्र। ऊपर से बलूचिस्तान में हर विदेशी निवेश, चाहे चीनी हो, सऊदी हो या अब अमेरिकी, यह विद्रोही गुटों का प्राथमिक निशाना बन जाता है। सवाल उठता है कि कनाडा की बैरिक गोल्ड इतने वर्षों में हिल-डुल भर नहीं सकी तो अमेरिका किस आत्मविश्वास से यहां आ रहा है?

अमेरिका के इस क्षेत्र में आने से यह भी आशंका है कि चीन–अमेरिका प्रतिस्पर्धा नई तीव्रता पर पहुँचेगी। दरअसल, अमेरिका रिकोडिक को चीन की आपूर्ति शृंखला का प्रभुत्व तोड़ने के लिए इस्तेमाल करेगा। ऐसे में पाकिस्तान दोनों महाशक्तियों के बीच रस्साकशी में फँस जाएगा। इस परियोजना से ईरान भी असहज होगा क्योंकि अमेरिका समर्थित विशाल रणनीतिक परियोजना उसकी सीमा के ठीक पास उभरना तेहरान को बिल्कुल रास नहीं आएगा। साथ ही अमेरिकी परियोजना से अफगानिस्तान का प्रभाव भी बढ़ेगा क्योंकि इसकी सुरक्षा और आपूर्ति रूट तालिबान द्वारा नियंत्रित इलाकों के बेहद करीब हैं। तालिबान इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश करेगा। साथ ही इस परियोजना से बलूच विद्रोह को नई ऊर्जा मिलेगी। विदेशी निवेश उनके लिए हमेशा दमन के नए प्रतीक के रूप में देखा गया है। परिणामस्वरूप सुरक्षा स्थिति और बिगड़ सकती है। 

बहरहाल, यह निवेश पाकिस्तान के लिए आर्थिक संजीवनी नहीं बल्कि शक्ति के वैश्विक खेल में एक गैंबलिंग चिप है। अमेरिका को चाहिए क्रिटिकल मिनरल्स, पाकिस्तान को चाहिए डॉलर, लेकिन बलूचिस्तान को चाहिए न्याय, अधिकार और सुरक्षा जो किसी भी सौदे में शामिल नहीं हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि रिकोडिक आने वाले वर्षों में दक्षिण एशिया की नई भू-रणनीतिक लड़ाई का केंद्र बन सकता है। साथ ही अगर पाकिस्तान ने बलूचिस्तान की राजनीतिक समस्या को सैन्य तरीके से संभालने की भूल जारी रखी, तो अमेरिकी निवेश भी उसी तरह डूबेगा जैसे पहले के तमाम विदेशी प्रोजेक्ट डूब चुके हैं। यह सही है कि अमेरिका ने एक बड़ा दाँव लगाया है लेकिन यह भी सच्चाई है कि यह दाँव जितना चमकदार दिखता है, उतना ही बारूद के ढेर पर रखा हुआ है।

-नीरज कुमार दुबे

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