भाषण देने में ही नहीं विदेश यात्राओं पर खर्च में भी मोदी ने मनमोहन को पीछे छोड़ा

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Dec 31, 2018

हमारे प्रधानमंत्री लोग अपनी विदेश यात्राओं पर कितनी बेरहमी से पैसा बहाते हैं, इसका पता अभी राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल से पता चला है। नरेंद्र मोदी ने पिछले साढ़े चार साल में अपनी विदेश यात्राओं पर 2000 करोड़ रु. से भी ज्यादा खर्च कर दिए हैं। यदि उनकी पिछले 5-6 ताजा यात्राओं के बिल भी जोड़ लिये जाएं तो यह आंकड़ा 2500 करोड़ को छू सकता है। 

मोदी ने मनमोहन सिंह को भाषणबाजी में तो मात किया ही है, देश का रुपया नाली में बहाने में भी पीछे छोड़ दिया है। डॉ. सिंह ने अपने दूसरे कार्यकाल में लगभग साढ़े 13 सौ करोड़ रु. विदेश यात्राओं पर खर्च किए लेकिन वे अपने साथ ढेरों पत्रकारों को भी ले जाते थे और उनसे खुल कर बात भी करते थे। उनके साथ ऐसे पत्रकार भी जाते थे, जिनके अखबार और चैनल उनकी मजाक उड़ाया करते थे लेकिन हमारे प्रचारमंत्रीजी सिर्फ एजेंसियों के पत्रकारों को साथ ले जाते रहे ताकि उनकी सिर्फ ठकुरसुहाती खबरें छपती रहें। 

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फोटोग्राफरों को वे विशेष रुप से ले जाते थे ताकि उनकी नौटंकियों के दर्शन भारत की जनता को जबर्दस्त ढंग से हो सकें। मोदी ने 55 देशों की यात्रा की और मनमोहनसिंह ने 33 ! अभी तो चार-पांच महिने बचे हुए हैं। जाते-जाते हमारे प्रचारमंत्रीजी दो-चार झटकों में 5-10 देशों में और घूम आएं तो उन्हें विश्व-यात्री का खिताब हासिल हो जाएगा। इन विदेश यात्राओं से देश का क्या फायदा हुआ है, उसके बारे में मैं अलग से लिखूंगा। बेचारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, जो कि मोदी से कहीं ज्यादा समझदार और बेजोड़ वक्ता है, उतने देशों में नहीं गई हैं, जितनों में माननीय सर्वज्ञजी फेरा लगा आए हैं। 

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प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के लिए कुछ विदेश-यात्राएं करना जरूरी भी होता है लेकिन इतनी घुमक्कड़ी करना कहां तक शोभनीय है और वह भी भारत-जैसे देश में, जहां अस्पताल के अभाव में हर साल लाखों लोगों की जानें चली जाती हैं और स्कूलों के अभाव में करोड़ों बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं। 2500 करोड़ रु. से देश के 600 जिलों में छोटे-छोटे स्कूल और अस्पताल आसानी से खुल सकते थे। नेताओं की विदेश यात्राएं सामान्य जहाजों में क्यों नहीं हो सकती? विशेष जहाज करने का अर्थ है, हजारों की जगह करोड़ों रु. खर्च करना। ये नेता विदेशों में हमारे राजदूतों के बंगलों में क्यों नहीं ठहर सकते ? पांच और सात-सितारा होटलों के करोड़ों के बिल भरते हुए उनके हाथ क्यों नहीं कांपते ? माले मुफ्त, दिले-बेरहम !

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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