लुढ़कता रुपया (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Jun 01, 2022

चबुतरे पर बैठे भजनखबरी ने कहा- "ससुरा! यह रुपया तो लुढ़कता ही जा रहा है। रुकने का नाम नहीं ले रहा। सत्तर साल तो सत्तर साल! पिछले आठ साल में भी लुढ़कता ही जा रहा है। न जाने किसकी नजर लग गई। अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले दिनों में हालत बड़ी खराब हो जाएगी। तुम्हें क्या लगता है टकलू! यह रुपया इतना क्यों लुढ़क रहा होगा?”

इसे भी पढ़ें: सभी के लिए माफ़ी (व्यंग्य)

जैसे ही टकलू ने यह सवाल पूछा तभी आसमान से एक बूँद टपककर उसकी खोपड़ी पर आ गिरी। यह देख भजनखबरी ने प्रसन्नता के साथ कहा– “रुपए को लुढ़कने से बचाया जा सकता है, बशर्ते कि उसे गोल न बनाकर चौकोर बनाया जाए। तब किसी माई के लाल में इतना दम नहीं होगा कि वह हमारे रुपए को लुढ़का सके।“ इतना कहते हुए भजनखबरी रोटी के बदले मैगी खाने चला गया।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

प्रमुख खबरें

लगातार आशीर्वाद के लिए लोगों का आभार, प्रधानमंत्री मोदी ने उपचुनावों में BJP की जीत के लिए वोटरों का किया धन्यवाद

Kerala High Court ने दी 8 हफ्ते की मोहलत, पशु मंडियों पर निगरानी समितियां न बनने पर लग सकती है रोक

Cockroach Janta Party के पुराने प्रदर्शन में नियमों का उल्लंघन, Delhi Police ने जंतर-मंतर पर सुरक्षा बढ़ाई

लाहौर में Gurdwara Janam Asthan Guru Ramdas Ji का होगा विस्तार, 13 मरला जमीन परिसर में जुड़ेगी