बंगला छूटे ना तोरी कसम (व्यंग्य)

By पीयूष पांडे | Oct 01, 2019

जिस तरह किसी ज़माने में एक राक्षस की जान तोते में कैद थी, उसी तरह आजकल कई राजनेताओं की जान बंगलों में कैद होती है। ऐसे ऐसे ‘बंगला पकड़’ राजनेता मौजूद हैं, जो ‘जान जाए पर बंगला ना जाए’ की तर्ज पर एक अदद बंगले के लिए जान पर खेलने को तैयार रहते हैं। अब देखिए, करीब 80 पूर्व सांसद दिल्ली में बंगला खाली करने को तैयार नहीं हैं। लोकसभा के पैनल ने चेतावनी दी, लेकिन बंगला पकड़ टस से मस नहीं हुए। अब उनके बिजली, पानी और गैस कनेक्शन काटे जाने की तैयारी हो रही है।

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मैंने कहा, “सर, मैं तो फ्रीलांसर हूं। लेकिन ये बताइए, वो कौन से पत्रकार हैं, जो एक पूर्व सांसद का इंटरव्यू लेने के लिए इतने बेचैन रहते हैं। मैं उनका भी इंटरव्यू करना चाहता हूं।'' उन्होंने अपने होंठों को बायीं तरफ से चंद्राकार अवस्था में लाकर कुटिल मुस्कुराहट दी। फिर बोले, “अच्छा ज्यादा समय नहीं है। बोलो क्या पूछना है।”

मैंने कहा, ‘आप इतने आदेश के बाद बंगला क्यों नहीं छोड़ रहे।'

वो बोले, ‘कई साल इस बंगले में रहा हूं। यहीं रहते हुए मेरी शादी हुई। फिर यहीं से बेटे की शादी कराई। सरकार असहिष्णु है। एक पूर्व सांसद को लगभग पुश्तैनी बंगले से हटाना चाहती है। ये वो बंगला है, जहां रहते हुए हमने न जाने कितनी बार सरकार को गिराने की धमकी दी। ना जाने कितनी बार अलग-अलग पार्टियों में शामिल होने के एवज में मोटी मिठाई ली। यहां बैठकर न जाने कितने चेलों ने घपले-घोटाले का प्लान बनाया। आज सब अच्छी जगह सैट हो गए हैं। लेकिन, हम एक चुनाव क्या हारे, हमें बंगला छोड़ने को कहा जा रहा है। इससे हमारे कार्यकर्ता निराश हैं।

‘कार्यकर्ता? उन्हें क्यों निराशा हो रही है। आपको बंगला छोड़कर जाने को कहा जा रहा है, हिन्दुस्तान छोड़कर नहीं।' मैंने कहा। वो बोले, ‘अरे हिन्दुस्तान छोड़ने को कहा जाता तो कार्यकर्ता खुश होते। क्योंकि हम हिन्दुस्तान छोड़कर कहीं जाएंगे तो यूरोप-अमेरिका में ही सैटल होंगे ना। बंगला छोड़कर जाना तो ऐसा है, जैसे भूलोक छोड़कर जाने को कहा जा रहा है। केंद्र की राजनीति में बरसों रहने के बाद बंदा अगर देश की राजधानी में एक अदद सरकारी बंगला अपने कब्जे में नहीं रख पाए तो कार्यकर्ता नैराश्य के भाव में चले जाते हैं और पार्टी छोड़ छोड़कर भागने लगते हैं।'

‘लेकिन नए सांसद बनेंगे तो उन्हें भी बंगले चाहिए ना ? मैंने सीधे पूछा।

वो बोले- ‘देखो गुरु, राजनीति में इतना सिर पकाने के बाद बंदा एक सरकारी बंगला न धर पाए तो क्या फायदा समाजसेवा का। दिल्ली में जमीन कम है क्या। 100-200-500 बंगले और बनवा दो। और नेता बिरादरी अगर आपस में एक दूसरे के लिए ही खड़ी नहीं होगी तो कौन होगा। आज जो राजनेता पूर्व सांसदों से बंगले खाली करने को कह रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि हर वर्तमान भविष्य में पूर्व होता है।'

मैं कंफ्यूज था कि भाईसाहब क्या फिलॉसफी दे रहे हैं। मैंने पूछा- ‘आप चाहते क्या हैं?’ वो बोले- ‘मेरे चाहने से होता क्या है। चाहते तो थे कि चुनाव जीतें। चुनाव जीतकर मंत्री पद पाएं। लेकिन-हुआ क्या। चुनाव में करोड़ों ठंडे हो गए और अब सरकार की हठधर्मिता देखिए राजधानी का बंगला भी छीनना चाहती है। सच तो यह है कि सरकारी बंगला हर नेता का आइडेंटिटी कार्ड होता है। जिसके पास सरकारी बंगला नहीं, उसे कार्यकर्ता नेता नहीं मानते। मैंने ही इस बंगले में ना जाने कितनी टोंटियां लगाईं, एसी लगाए, मार्बल लगवाया। क्या ये दिन देखने के लिए। सरकारी बंगला हर पूर्व सांसद, हर पूर्व मंत्री का जन्मसिद्ध अधिकार है। उससे सरकारी बंगला किसी का बाप कभी खाली ना करा सके-इस बाबत संविधान में संशोधन होना चाहिए। सरकारी बंगले की पानी-बिजली काटने की हिम्मत दिखाने वाले अधिकारियों को तो फौरन सस्पेंड किया जाना चाहिए।'

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मैंने कहा- ‘तो क्या आप टोंटियां, एसी वगैरह निकालकर ले जाएंगे?’

‘अव्वल तो हम जाएंगे नहीं। और जाएंगे तो बंगले के दर-ओ-दीवार से अपनी कमाई की हर चीज उखाड़ ले जाएंगे।’

मैंने कहा- ‘आप सरकारी बंगला खाली करने को तैयार नहीं हैं। सोचिए कितने करोड़ लोगों के पास रहने को एक झोपड़ी तक नहीं है।'

‘उन्हें घर दिलाना पूर्व सांसद का काम नहीं है। वो काम प्रधानमंत्री करा तो रहे हैं। चलो अब फूटो। तुमने एक भी कायदे का सवाल नहीं पूछा।' वे नाराज होते हुए बोले।

मैंने कहा, ‘सर यही तो दिक्कत है। आजकल कायदे का सवाल ही तो कोई नहीं पूछ रहा।‘ उन्होंने मुझे गौर से देखा मैंने शायद कोई बहुत मूर्खतापूर्ण या बहुत महत्वपूर्ण बात कह दी थी !!

-पीयूष पांडे

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