प्रधानी के चक्कर में... (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | May 06, 2021

बड़ी देर से मोबाइल कान से सटाए प्रधानी के उम्मीदवार रामभरोसे किसी से बात कर रहे थे। कह रहे थे– चाहे कुछ भी हो जाए चुनाव हमें ही जीतना है। हम अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे, लेकिन जीतकर रहेंगे। लोगों में आशा और विश्वास की नई किरण बनकर उभरेंगे। वर्तमान प्रधान को धूल न चटवा दिया तो मेरा नाम भी रामभरोसे नहीं। इतना कहते हुए मोबाइल काट दिया। बाहर कार चालू खड़ी है। ईंधन धुआँ होता जा रहा है। रामभरोसे जी कार चढ़ने ही वाले थे कि तभी पत्नी टपक पड़ी और बोली– अजी सुनते हो, दोपहर में भोजन करने तो आयेंगे न? कूढ़ते हुए रामभरोसे जी ने कहा– तुम्हें दोपहर की लगी है। मुझे जीवन भर की लगी है। एक बार जो हम प्रधान बन जायेंगे तब देखना इतना कमायेंगे, इतना कमायेंगे कि हमारी आने वाली सात पुश्तें बैठकर खायेंगी। इतना कहते हुए वे चुनावी रैली की ओर चल पड़े।

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आखिरकार वह दिन आ ही गया। लोगों ने बढ़-चढ़कर वोट का प्रतिशत ऐसे बढ़ाया जैसे उनको इसके सिवा कुछ आता ही नहीं। भारी वोटिंग को देख रामभरोसे की बाँछे खिल उठीं। मतगणना शुरू हुई। रामभरोसे मतगणना का परिणाम देख कोमा में चले गए। उनके चुनाव चिह्न अंगूठे पर एकमात्र एक वोट मिला। वह वोट किसी और का नहीं खुद का था। अंगूठा दिखाने के चक्कर में लोगों ने तो उन्हें जिता दिया। लेकिन अंगूठा दबाने के चक्कर में उन्हें हरा दिया। प्रधानी के चक्कर में रामभरोसे ने अपना सब कुछ गंवा दिया। पाप बेचारे प्रधानी के नाम पर खुद गौण बन गए।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त'

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