ट्रंप के ट्रेड फतवों को खारिज कर मोदी ने अमेरिका को भारत की ताकत का अहसास करा दिया है

By नीरज कुमार दुबे | Aug 07, 2025

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर एकतरफा तरीके से भारी-भरकम टैरिफ (शुल्क) लगाने और व्यापारिक फतवों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सख्त और संतुलित रुख सामने आया है। प्रधानमंत्री मोदी ने बिना अमेरिका या ट्रंप का नाम लिए यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अपने किसानों, मछुआरों और पशुपालकों के हितों पर किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। यह एक ऐसा कदम है जो भारत की आत्मनिर्भरता, संप्रभुता और जनहित को प्राथमिकता देने का संकेत देता है।

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इसके जवाब में प्रधानमंत्री मोदी ने दो टूक कहा कि “भारत किसानों, मछुआरों और डेयरी किसानों के हितों पर कभी समझौता नहीं करेगा। हमें इसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, इसकी मुझे जानकारी है, और मैं इसके लिए तैयार हूं। भारत इसके लिए तैयार है।” देखा जाये तो यह बयान न केवल साहसी था, बल्कि यह अमेरिका को एक स्पष्ट संदेश भी था कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बराबरी के स्तर पर संवाद चाहता है, न कि दबाव में।

इसके साथ ही, भारत सरकार ने ट्रंप की मांगों को लेकर एक स्पष्ट ‘रेड लाइन’ खींच दी है। विशेष रूप से कृषि, डेयरी और जेनेटिकली मोडिफाइड (GM) खाद्य पदार्थों के क्षेत्र में अमेरिका को बाजार में खुला प्रवेश देने से इंकार कर दिया गया है। देखा जाये तो भारत में छोटे किसान, जो जीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं, अमेरिकी कृषि उत्पादों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते, क्योंकि अमेरिका के बड़े-बड़े फार्मों को सरकार की तरफ से भारी सब्सिडी मिलती है। यदि इन उत्पादों को भारत में बिना शुल्क के आने दिया गया, तो भारतीय किसानों की आजीविका पर सीधा खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसी तरह, डेयरी सेक्टर में भी अमेरिका ने ज़ीरो ड्यूटी की मांग की है, लेकिन भारत ने इसे सिरे से नकार दिया है। भारत की डेयरी व्यवस्था लाखों छोटे पशुपालकों के जीवन से जुड़ी हुई है और यह न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक स्थायित्व से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।

इसके अलावा, जेनेटिकली मोडिफाइड फूड एक और विवादास्पद क्षेत्र है, जहां भारत ने ट्रंप प्रशासन की ज़बरदस्ती को सख्ती से नकार दिया है। हम आपको बता दें कि भारत में जीएम फूड को लेकर वैज्ञानिक और सामाजिक चिंताएं बनी हुई हैं। अमेरिका की तरफ से ऐसे खाद्य पदार्थों के निर्यात पर दबाव बनाया गया, जबकि भारत ने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से अस्वीकार्य माना। वहीं तेल की खरीद को लेकर भी भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि यह निर्णय भारत की ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर बाजार आधारित तरीकों से लिया गया है, न कि किसी एक देश को लाभ पहुंचाने के लिए।

देखा जाये तो डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति में एक तरफा लाभ लेने की प्रवृत्ति दिखती है। उन्होंने जिन अन्य देशों के साथ समझौते किए, वहां भी टैरिफ कम करने के बदले कोई ठोस रियायत नहीं दी। भारत के साथ भी ट्रंप प्रशासन ने 10% से 20% तक के अतिरिक्त शुल्क इस्पात, एल्युमिनियम, ऑटोमोबाइल्स आदि पर लगाए, जबकि भारत से उन्होंने पूर्ण टैक्स माफी की मांग की। भारत ने अमेरिका को तेल, खाद, रक्षा उपकरण आदि की खरीद का प्रस्ताव दिया जिससे व्यापार घाटा संतुलित किया जा सके, परंतु ट्रंप ने इसे ‘अपर्याप्त’ कहकर नकार दिया।

जहां तक प्रधानमंत्री मोदी के बयान की बात है तो उनका यह रुख केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक स्वतंत्रता, कृषि आधारित समाज की सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टिकोण की रक्षा का एक मजबूत संकेत है। ट्रंप को समझना होगा कि भारत अब वैश्विक मंच पर केवल एक उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि एक आत्मनिर्भर, आत्मसम्मान से युक्त राष्ट्र के रूप में खड़ा हो रहा है। डोनाल्ड ट्रंप की व्यापारिक धमकियों को प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह सिरे से नकारते हुए अपने देश के किसानों, मछुआरों और पशुपालकों के हितों की रक्षा की है, वह न केवल अमेरिका के लिए एक बड़ा झटका है, बल्कि यह भारत की सशक्त विदेश नीति की एक मिसाल भी बन गया है।

बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप की व्यापारिक धमकियों के आगे न झुकते हुए भारत के किसानों, मछुआरों और पशुपालकों के हितों की रक्षा का संकल्प लिया है। यह रुख भारत के आत्मसम्मान और राष्ट्रीय हितों की रक्षा का स्पष्ट प्रमाण है, जो अमेरिका सहित पूरी दुनिया को भारत की नई कूटनीतिक शैली का संदेश देता है। साथ ही प्रधानमंत्री का स्पष्ट बयान यह भी दर्शाता है कि भारत संवाद में विश्वास रखता है अगर कोई धमकी या फतवा देगा तो भारत करारा जवाब देगा।

-नीरज कुमार दुबे

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