साक्षात्कारः तेनजिंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवार्ड विजेता अनीता कुंडु से खास बातचीत

By डॉ. रमेश ठाकुर | Aug 31, 2020

एवरेस्टों की चोटियों को अपने कदमों से नापने वाली देश−दुनिया की प्रसिद्ध पर्वतारोही अनीता कुंडू गत शुक्रवार को राष्ट्रपति के हाथों पर्वतारोहण के शीर्ष सम्मान 'तेनजिंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवार्ड' से नवाजी गईं। उनकी उपलब्धि पर पूरा देश गौरवान्वित है। अनीता ने कई दुर्गम ऊंची चोटियों के कारस्टेन्स पिरामिड पहाड़ों को चढ़कर अलग कीर्तिमान स्थापित किया हुआ है। उनकी उपलब्धियों को देखते हुए हरियाणा सरकार ने इस माह 'तेनजिंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवार्ड' के लिए केंद्र सरकार से सिफारिश की थी। अनीता इस समय हरियाणा पुलिस में इंस्पेक्टर के पद पर भी आसीन हैं। राष्ट्रीय अवार्ड मिलने पर डॉ. रमेश ठाकुर ने पर्वतारोही अनीता कुंडू से विस्तृत बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश।

उत्तर- मैं हरियाणा सरकार और विशेष कर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहूंगी, जिन्होंने अवार्ड के लिए मेरे नाम की सिफारिश राष्ट्रपति महोदय से की। साथ ही सभी देशवासियों का अभिवादन करना चाहूँगी जो वर्षों से मुझे स्नेह−दुलार दे रहे हैं। उनकी शुभकामनाएं ही मुझे पहाड़ों को अपने कदमों से नापने की हिम्मत देती हैं। अवार्ड ने मेरी जिम्मेदारियों को बढ़ा दिया है। कोशिश रहेगी, उन जिम्मेदारियों का निर्वाह कर सकूं।

प्रश्न- दिखने में दुबली−पतली हो, जबकि एवरेस्ट चढ़ना किसी खतरे से कम नहीं होता, कैसे उठाती हैं आप ये जोखिम?

उत्तर- कोई भी चुनौती हिम्मत−साहस के समक्ष बौनी हो जाती है। दिल में अगर कुछ करने का जज्बा हो, तो क्या कुछ नहीं किया जा सकता। ये सच बात है कि एवरेस्ट पर चढ़ना सपने को हकीकत में तब्दील करने जैसे होता है। मैंने तीन बार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर चढ़ाई की है जिसमें एक बार मेरे खाते में असफलता भी आई है। जब मैं चाइना की तरफ से चढ़ाई कर रही तो उन्होंने चढ़ाई करने से रोक दिया था। इसके अलावा मैंने हिंदुस्तान की अनेकों चोटियों को अब तक फतह किया है। नेपाल की एक टेक्निकल चोटी आइसलैंड को भी कदमों से नापा है। पर्वतों की चोटियां अब जीवन का हिस्सा बन गई हैं। इसलिए अब डर नहीं लगता। मुझे पर्वतों पर अब अपनी छतों पर चढ़ने जैसा लगता है।

प्रश्न- कितना इत्तेफाक रखती हैं कि पर्वतारोही का जीवन हमेशा खतरों से घिरा होता है?

उत्तर- बिल्कुल सच बात है। पर्वतारोही की जिंदगी जोखिमों से भरी होती है। उसकी जिंदगी कई बार मौत से सामना करती है। इंडोनेशिया की कारस्टेन्स पिरामिड चोटी समूचे जगत में एक अलग पहचान रखती है। यही वजह है कि इस चोटी को दुनिया के सात महाद्वीपों की दुर्गम चोटियों में शामिल किया गया है। मिशन के वक्त लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट की नही, बल्कि दुआओं की जरूरत होती है। जब हमें चोट लगती है तो उस समय खैरियत जानने वाला भी नहीं होता। अपनी मरहम पट्टी को भी खुद करना पड़ता है। कब क्या करना, बिना समय व्यर्थ किए निर्णय तुरंत लेना पड़ता है। कृत्रिम ऑक्सीजन के सहारे आगे चढ़ना होता है। −30 से −50 तापमान में भी खुद को बीमारियों से बचाना होता है।

इसे भी पढ़ें: साक्षात्कारः अर्जुन ने कहा- महाभारत के दोबारा प्रसारण ने रिश्तों की तहजीब को सिखाया

प्रश्न- हरियाणा के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाली साधारण लड़की कैसे बनीं पर्वतारोही?

उत्तर- देखिए, साधारण तो आज भी हूं। मैं हरियाणा के फरीदपुर की रहने वाली हूं। पर्वतों पर चढ़ने का जुनून बचपन से ही था। पिता जी की अल्पायु में ही देहांत हो गया था। उसके बाद घर की जिम्मेवारियों के बोझ को उठाने के साथ−साथ अपने मिशन को प्राप्त करना पहाड़ चढ़ने जैसे हो गया था। लेकिन उन सपनों को मैंने हकीक़त में पहाड़ चढ़कर पूरा किया। मेरे घर में आज भी करीब पंद्रह भैंसे हैं जिनका चारा मैं खुद करती हूं। नियमित रूप से मैं सुबह जल्दी उठकर भैंसों को चारा डालती हूं। एक्सरसाइज करती हूं। इसके अलावा घर के दूसरे काम निपटा कर फिर कॉलेज जाती हूं। मैं आम लड़की जैसा जीवन जीना आज भी पसंद करती हूं।

प्रश्न- चढ़ाई के दौरान किसी भी तरह का कोई हादसा होता है, तो उसका जिम्मेदार कौन होता है?

उत्तर- खुद पर? चढ़ाई से पहले बाक़ायदा सरकार को लिखित में खिलाड़ी को देना होता है। मैं जब भी अपने मिशन पर निकलती हूं तो उससे पहले हरियाणा सरकार को लिखित में हर घटना की जिम्मेदारी खुद की बताकर जाती हूं। इसके अलावा जो भी कानूनी प्रक्रियाएं होती हैं उसे फॉलो करती हूं। हरियाणा सरकार का मुझे हमेशा से सहयोग मिला है। प्रदेश सरकार की मैं इसलिए भी शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मेरी कामयाबी पर पुलिस विभाग में इंस्पेक्टर की नौकरी प्रदान की है। मैं खुद को गौरवान्वित महसूस करती हूं कि मेरी वजह से हरियाणा और पूरे देश का मान बढ़ा।

प्रश्न- संसार में कौन से ऐसे खतरनाक एवरेस्ट हैं जिन्हें चढ़ने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है?

उत्तर- बिना प्रशिक्षण के कोई भी एवरेस्ट नहीं चढ़ा जा सकता। कुछ ऐसे एवरेस्ट हैं तो हमेशा भयंकर बर्फीले तूफानों से घिरे होते हैं। ऐसे पहाड़ों पर चढ़ने का मतलब जिंदगी से जंग लड़ने जैसा होता है। तूफानी पहाड़ों पर चढ़ने का मेरे पास भी कड़वा अनुभव है। इंडोनेशिया में चढ़ाई के वक्त बीच में तूफान आ गया था जिसके चलते रैपलिंग के जरिए हमें तुरंत सुरक्षित बेस कैंप लौटना पड़ा था। उस दौरान हमारी टीम की दो विदेशी साथियों को गंभीर चोटें भी आईं थीं। तीन साथी शारीरिक पीड़ा से घिर गयी थीं, जिसके चलते उन्हें यात्रा छोड़कर नीचे उतरना पड़ा। लेकिन अगली सुबह जब मौसम साफ हुआ तो बाकी सदस्यों ने फिर से चढ़ाई शुरू की। एक बार तो ऐसा प्रतीत हुआ था कि हमारा मिशन पूरा नहीं हो पाएगा, लेकिन मेरे साथ सवा सौ करोड़ देशवासियों का प्यार था जिससे मैं अपने मिशन में सफल होकर अपने वतन लौटी थी।

-जैसा डॉ. रमेश ठाकुर से पर्वतारोही अनीता कुंडू ने बताया।

प्रमुख खबरें

Team India में अब चलेगी Gautam Gambhir की? Suryakumar Yadav की Captaincy पर लेंगे आखिरी फैसला!

TVK कैबिनेट में शामिल होने पर Thirumavalavan की सफाई, बोले- VCK कार्यकर्ताओं ने मुझे मजबूर किया

पाक आर्मी चीफ Asim Munir की तेहरान यात्रा सफल? USA को उम्मीद, Iran आज मान लेगा डील

Rajnath Singh का Shirdi से ऐलान: कोई ताकत नहीं रोक सकती, India बनेगा Top Arms Exporter