अंत, अंतर और अंतर्यामी (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त | Jan 29, 2021

मोहन की एक ही बुरी लत है। वह है– शराब। शराब और मोहन का संबंध चोली-दामन जैसा है। जेब में पैसे हों तो बरबस उसके पैर मधुशाला की ओर चल पड़ते हैं। सगे-संबंधियों, पड़ोसियों, शादियों, शुभ-अशुभ कार्यों में यदि पीने को मिल जाए तो फिर कहना ही क्या! एक शाम वह मेरे कमरे के सामने से गुजर रहा था। मुझे देखकर उसने कहा, “लगता है साहब आज आप बड़े फुर्सत में हैं। भाभी जी नहीं हैं क्या? बच्चे भी नहीं दिखाई दे रहे हैं?” मैंने कहा, “अंतर्यामी जी! सभी घर पर हैं। भाभी जी रसोई में और बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। और बताओ तुम्हारा हाल-चाल कैसा है?'' मोहन ने दुखी मन से कहा, “क्या बताऊँ साहब, आजकल तबीयत नासाज़ रहती। परसों चक्कर खाकर नीचे गिर गया था। डाक्टर ने जाँच-पड़ताल के बाद कहा कि मेरा लीवर खराब हो रहा है। यदि और कुछ दिन शराब पीऊँगा तो अवश्य मर जाऊँगा। अब शराब तो दूर चाय-कॉफी पीने से भी मना कर दिया है।” 

थोड़ी देर बाद मैंने यह सारी घटना अपनी श्रीमती को बताया। वह हँस कर कहने लगीं, “मोहन बहुत बड़ा बुद्धिजीवी है। वह पहुँचा हुआ राजनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री जितना चतुर है। देश में आर्थिक संकट गहराने का कारण बेरोजगारी में वृद्धि है। आज जनता में खरीदने की क्षमता गिरती जा रही है। इस संकट से बाहर निकलने का एक मात्र उपाय रोजगार उपलब्ध कराना है। जनता की आय में वृद्धि करनी होगी। इसके लिए संपन्न लोगों से कर उगाही के मार्ग खोजने पड़ेंगे। सामान्य लोगों का मानना है कि ऐसा करने से देश की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है। किंतु बुद्धिजीवी कहते हैं कि जितनी नौकरियाँ घटाई जायेंगी, जितना वेतन घटाया जायेगा, संपन्न लोगों को कर में जितनी कटौती दी जाएगी, सरकार जितना कम खर्च करेगी यह देश उतना विकास करेगा। 

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बुद्धिजीवी भी जानते हैं कि सामान्य जनता की विचारधारा पर चलने से देश की आर्थिक स्थिति बदल सकती है। किंतु उनकी मजबूरी यह है कि वे सरकार को यह सब नहीं सुझा सकते। ऐसा करने पर सरकार की जेब ढीली हो जाएगी। सरकार कार्पोरट कंपनियों की पिछलग्गु है। यह सभी जानते हैं कि शराब पीना सेहत के लिए हानिकारक है, फिर भी सरकार आए दिन शराब के लाइसेंस देती जा रही है। जब सरकार के आलाकमान की यह सोच है तो मोहन की क्या गलती है? उसकी सोच सरकार की सोच से कम थोड़ी न है!” पत्नी के मुँह से मोहन की प्रशंसा सुन रहा नहीं गया। मैंने तड़ाक से पूछ ही लिया कि यदि वह बुद्धिजीवी है तो हम क्या हैं? इस पर पत्नी मुस्कुराकर रसोई के भीतर जाते हुए कहा कि अभी आपके लिए चाय लाती हूँ।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

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