अभी सियासी संक्रांति बाकी है (व्यंग्य)

  •  डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
  •  जनवरी 15, 2021   17:16
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अभी सियासी संक्रांति बाकी है (व्यंग्य)

इस पर्व के अवसर पर कुछ राज्यों में कुक्कुटनाथों के बीच जोरदार भिड़ंत करवाते हैं। इस बार यह भिडंत कुछ कोरोना के चलते तो कुछ बर्ड फ्लू के चलते नदारद रही। वैसे भी हमारे देश में भिड़ंत के अवसर थोड़े न लुप्त होते हैं! जब जी चाहा जहाँ चाहा शुरू हो गए।

सूर्य देवता बहुत दिनों के बाद मकर राशि में प्रविष्ट हुए। चलिए कोई एक तो हैं जो समय पर अपना काम करते हैं, वरना चुनावी वायदों की तरह मुकरने वाले कुकुरमुत्ते की भला दुनिया में कोई कमी है। सूर्य देवता की मकर राशि में प्रविष्टि को लेकर भारत भर में एक ही तरह के अलग-अलग नाम वाले त्यौहार मनाए जाते हैं। अब भला सूर्य के संक्रांत को लोहड़ी कह लीजिए या फिर पोंगल, गुड़ी पड़वा कह लीजिए या फिर बिहू क्या फर्क पड़ता है। नाम बदलने से काम बदलने लगें तो देश का भला कब का हो जाता। वैसे भी यही एक त्यौहार है जिसका किसी राक्षस देवी-देवता के जन्म अथवा राक्षस संहार से कोई कनेक्शन नहीं है। यह तो चौबीस कैरेट वाला प्योर लोगों का त्यौहार है, स्त्रियों का त्यौहार है और बच्चों का त्यौहार है।

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इस पर्व के अवसर पर कुछ राज्यों में कुक्कुटनाथों के बीच जोरदार भिड़ंत करवाते हैं। इस बार यह भिडंत कुछ कोरोना के चलते तो कुछ बर्ड फ्लू के चलते नदारद रही। वैसे भी हमारे देश में भिड़ंत के अवसर थोड़े न लुप्त होते हैं! जब जी चाहा जहाँ चाहा शुरू हो गए। विशेष बात यह रही कि जिन किन्हीं राज्यों में यह कुक्कुट भिड़ंत होती है वहाँ के तुगलकी प्रशासकों ने यह फरमान जारी कर दिया कि कुक्कुटों के मुख पर मास्क का कवच धारण करवाना अनिवार्य होगा। जहाँ इंसानों की मौत की कोई वैल्यू नहीं वहाँ कुक्कुटों की चिंता करने वाले इन तुगलकी महाप्रभुओं की जितनी प्रशंसा की जाए कम है।

हमारे त्यौहारों का राजनीति के साथ चोली-दामन-सा संबंध है। अब देखिए न शीतलहर के बीच सूर्य देवता का मकर राशि में प्रवेशोत्सव के रूप में मनाने के लिए हमारे किसान महीनों से दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर चाकचौबंद बैठे हैं। वह भी पूरे लंगर के साथ! कोई माई का लाल उन्हें हटा के दिखाएँ! लोगों के लिए सूर्य मकर राशि में जब प्रवेश करेगा तब करेगा, लेकिन किसानों के चलते सियासी सूर्य कब का प्रवेश कर चुका है। कर्नाटक में येडुरप्पा सरकार ने कैबिनेट विस्तार कर अपनी सियासी पोंगली खिलाने में तनिक भी चूक नहीं की। कइयों की लपलपाती जीभें इस पोंगली के लिए तरसकर रह गयीं।

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वैसे भी वर्ष में मकर संक्रांति पर्व एक बार आता है। किंतु चुनावों का संक्रांत पर्व वर्ष के बारह महीनों कहीं न कहीं चलता ही रहता है। कहीं साधारण चुनाव तो कहीं नगर निकाय के चुनाव, कहीं ग्राम चुनाव तो कहीं कुछ। सूर्य एक बार के लिए पूर्व की जगह पश्चिम से उदित हो जाएगा लेकिन हमारे चुनावों की निरंतरता को रोकने की हिम्मत भगवान के पास भी नहीं है। विश्वास न हो तो बिहार का चुनाव ही ले लो। लाख दुनिया कोरोना से मर रही थी, लेकिन बिहार के चुनावों ने कोरोना को ही मार दिया। मानो ऐसा लगता है कि इस देश में चुनाव को छोड़कर सब परिवर्तनशील है। अब देखिए न बंगाल में सभी अपनी-अपनी पतंग उड़ाने में लगे हैं। सभी एक-दूसरे को काटने पर तुले हैं। कोई पतंग कटकर इस पाले में गिर रही है तो कोई पतंग उस पाले में। तमिलनाडु में एक पोंगली समाप्त हुई कि नहीं चुनावी पोंगली की सुगबुगाहट जोरों पर है। वही हालत असोम के बिहू की है। जाने वहाँ कौन कैसा नाचेगा पता नहीं, लेकिन किसी न किसी का बिहू निकलना पक्का है। किंतु पर्व मनाने का जो जिगरा केंद्र सरकार के पास है, वह और किसी के पास नहीं है। तभी तो किसानों को एक साथ शिवरात्रि, होली पर्व मनाने के लिए डेरा डाले ऱखने के लिए परोक्ष रूप से कह चुकी है। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। न सरकार किसानों की माँगें मानेगी न किसान आंदोलन समाप्त करेंगे।

सारी दुनिया एक तरफ तो ट्रंप की दुनिया एक तरफ है। सारे लोग हवा के संग पतंग उड़ाते हैं तो वे उल्टी दिशा में अपनी पतंग उड़ाने की जिद पर अड़े हैं। उनसे तो अच्छे दुधमुंहे बच्चे हैं जो एक बार के लिए समझाने पर समझ तो जाते हैं। ट्रंप, ट्रंप न हुए कचरा डंप करने वालों के मसीहा हो गए हैं। ये सब सियासी संक्रांति है। जनता के लिए असली संक्रांति युगों से बाकी है। न वे संक्रांत होंगे और न उनका फेर बदलेगा। उनके भाग्य का सूर्य अभी भी संक्रांत होने के लिए तरस रहा है।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त







उचित दूरी का मतलब... (व्यंग्य)

  •  संतोष उत्सुक
  •  फरवरी 25, 2021   17:01
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उचित दूरी का मतलब... (व्यंग्य)

अब पुराना गाना जुबान पर आ रहा है, मानो तो मैं गंगा मां हूं न मानो तो बहता पानी। हमने मां विषय पर लाखों कविताएं लिखी लेकिन गंगा को सामान्य पानी समझ कर गंदा करते रहे। अमिताभ जैसी आभा ने करोड़ों बार समझाया कि उचित दूरी बनाकर रखें...

कृपया उचित दूरी बनाए रखें, सुन सुन कर मेरा मन आज भी संगीतमय हो उठता है और गुनगुनाने भी लगता है, उचित दूरी क्या है यह उचित दूरी क्या है। यह वैसा ही लगता है जैसा हम किसी ज़माने में गाया करते थे, चोली के पीछे क्या है या ज़्यादा शरीफाना अंदाज़ में आज भी गा सकते हैं, पर्दे के पीछे क्या है पर्दे के पीछे क्या है। लेकिन हम गा ऐसे रहे हैं, परदे में रहने दो पर्दा न उठाओ। उचित दूरी का मतलब दो गज तो है लेकिन यह अभी तक भेद ही है कि दो गज की दूरी व्यवहार में कितनी है। इस दूरी के अपने अपने प्रयोग हैं जिन्होंने सबके भेद खोल दिए हैं। हम सब यही मानने लगे हैं कि जो उचित है वह अनुचित है और जो अनुचित है वह वास्तव में उचित है ठीक जैसे अनेक बार असवैंधानिक को वैधानिक मान लिया जाता है।

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अब पुराना गाना जुबान पर आ रहा है, मानो तो मैं गंगा मां हूं न मानो तो बहता पानी। हमने मां विषय पर लाखों कविताएं लिखी लेकिन गंगा को सामान्य पानी समझ कर गंदा करते रहे। अमिताभ जैसी आभा ने करोड़ों बार समझाया कि उचित दूरी बनाकर रखें, बार बार हाथ धोएं लेकिन सर्दी में सभी को गर्म पानी नहीं मिलता तभी शायद बार बार हाथ धोना मुश्किल है। जितनी दूरी उचित लगे, बनाकर रखी जाने बारे सलाह देने वाले भी ऐसी सलाह देते हैं जैसे, बीते न बिताए रैना बिरहा की जाई रैना। गलत चीज़ों से उचित दूरी न बनाए रखने के कारण डॉक्टर के पास जाना पड़ा, वहां एक कंपनी का विज्ञापन बोर्ड लगा हुआ था जिसमें लिखा हुआ था कि एक से डेढ़ गज की दूरी बनाए रखें। हमें यह किसी सूझ बूझ वाले समझदार व्यक्ति द्वारा रचाया लगा। उन्हें मालूम है आम क्लिनिक में खड़े होने की जगह भी नहीं होती तभी तो उचित दूरी की परिभाषा खुद ही बनानी ज़रूरी है। कोई पूछे, जनता के सेवक ने जनता के साथ उचित बातें करनी हों तो उचित दूरी बनाकर ही बात करेगा लेकिन उस उचित दूरी का निर्धारण उसे उस पुल के निर्माण की तरह करना होगा जो वह उचित जगह बनवाता है। मास्क लगाकर रखेगा तो मुस्कराहट कैसे अपनी वोट तक पहुंचाएगा। तभी यह सवाल बार बार होता है कि उचित दूरी क्या है, उचित दूरी का मतलब.... 

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एक सरकारी कार्यालय जाना हुआ जहां रोज़ काफी जनता आती है, वहां प्रवेश द्वार पर लिखे अनुरोध के अनुसार उचित दूरी तीन से छ फुट तक मानी गई। उचित शारीरिक दूरी को नए प्रायोगिक अर्थों में सामाजिक दूरी परिभाषित किया जा रहा है। यह एक सरकारी विवरणी की तरह हो गई है जिसमें नियंत्रक कार्यालय को उचित अंतराल पर पुष्टि भेज दी जाती है कि हमारे शाखा कार्यालय में अपाहिज व्यक्तियों के लिए रैंप का उचित प्रावधान किया गया है, लेकिन वास्तव में वहां सीमेंट की सीढियां ही रहती हैं। कहने और करने का व्यवहारिक फर्क रहता है। मुहब्बत कम होते ज़माने में, उचित दूरी का मतलब आई हेट यू ... भी तो नहीं हो सकता। जवाबों के बीच वही सवाल खड़ा है.......उचित दूरी क्या है।

संतोष उत्सुक







टूल किट की किटकिटाहट (व्यंग्य)

  •  डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
  •  फरवरी 23, 2021   17:44
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टूल किट की किटकिटाहट (व्यंग्य)

काश हमारे पास भी कोई दिशा रवि होती तो कितना अच्छा होता, जो हमारे सभी तरह के पेंच टाइट करने वाले पाने ढूँढ़ कर दे देती। अब दिशा को कौन बताए कि यहाँ किसी का पेंच ढीला है तो किसी का कुछ। किसी के मुँह का ढक्कन खुला हुआ है तो किसी के हाथ-पैर छूटे हुए हैं।

आप लोग टूल किट तो जानते ही होंगे। नहीं जानते? अरे भैया! वही औजारों की पेटी जिसमें ढूँढ़ने पर सब कुछ मिल जाता है सिर्फ हमारी जरूरत की चीज़ को छोड़कर। यह दुनिया भी तो एक टूल किट है। जहाँ सभी टूल सिर्फ और सिर्फ किट-किट करते रहते हैं। यह किट-किट बंद हो जाए तो संयुक्त राष्ट्र संघ लंबी छुट्टी के लिए जा सकता है। न किट-किट बंद होगी न कोई लंबी छुट्टी पर जाएगा।

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काश हमारे पास भी कोई दिशा रवि होती तो कितना अच्छा होता, जो हमारे सभी तरह के पेंच टाइट करने वाले पाने ढूँढ़ कर दे देती। अब दिशा को कौन बताए कि यहाँ किसी का पेंच ढीला है तो किसी का कुछ। किसी के मुँह का ढक्कन खुला हुआ है तो किसी के हाथ-पैर छूटे हुए हैं। किसी का खाली दिमाग बंद होने का नाम नहीं ले रहा है। इन सबके लिए टूल किट की जबरदस्त जरूरत आन पड़ी है। वह न जाने किस दिशा से आशा की रवि किरण बनकर आयी है कि सभी उसी के नाम का जप करने में व्यस्त हैं। टूल-अटूल किट-किट करावै, जब-जब दिशा का नाम सुनावै। दिशा ने मानो जंग लगे टूल किटों में जान फूँक दी है। जिन टूल के बारे में कल तक देश नहीं जानता था अब सबकी जुबान पर दिशानामी का रट्टा लगा हुआ है।

दिशा टूलकिट का अपने ढंग से इस्तेमाल करना चाहती थी। न जाने उससे कहाँ गड़बड़ हो गई कि टूल किट के खुलते ही तरह-तरह के स्क्रू ड्राईवर, स्पैनर, की-सैट, और चाबी-पाने खुलकर बिखर गये। किसान सरकार के पेंच टाइट करने में लगी थी वहीं सरकार दिशा जैसे टूल किटों की मालकिनों को टाइट करने में लगी थी। टाइट करने का असर यह हुआ कि किसी को दस्त तो किसी को उल्टी होने लगी। कुछ तो जंपिंग-जपांग करने में अपना हुनर दिखाने लगे।

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कोई महंगाई के टूल किट से समाज के सोने वाले लोगों को उठाने के लिए यूज होने वाले हैशटैग के अलावा किस दिन, किस वक्त और क्या ट्वीट्स या पोस्‍ट्स रूपी टूलोपयोग करना है, के बारे में बताता तो कितना अच्छा होता। यहाँ सभी अपने-अपने टूल किटों की किटकिटाहट में लगे हैं। कितना अच्छा होता कि सोशल मीडिया के टूलकिट में कट, कॉपी, पेस्ट मटेरियल और अंधभक्तों की हुड़दंग से बचाने वाले टूल्स होते। यहाँ महंगाई के बारे में कुछ कहने जाओ पेट्रोल, डीजल की कीमतें बढ़ाकर आम जनता के पेंच टाइट कर दिए जाते हैं। अस्पतालों के बारे में बात करो तो धर्म का पेंच बीच में फिट कर देते हैं। नौकरी देने के बारे में बात करो तो प्राइवेटीकरण का हथौड़ा लिये सरकारी संस्थाओं का रूप-नक्शा ही बदल दिया जाता है। देश में मुश्किल यह है कि जिनके पास टूल किट है उन्हें इस्तेमाल करना नहीं आता। जिन्हें इस्तेमाल करने आता है उनके पास टूल किट नहीं है। देश को तोड़ने वाली दिशा को जेल की दिशा तो दिखा दी गयी, लेकिन जो देश को जोड़ने का स्वांग रचाते हैं उनकी दिशा और दशा कैसे तय करेंगे....इसी को कहते हैं जिसका टूल उसी की किट...मैं हूँ फिट और तू है अनफिट।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त







कल्पना बड़े काम की चीज़ है (व्यंग्य)

  •  संतोष उत्सुक
  •  फरवरी 19, 2021   10:24
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कल्पना बड़े काम की चीज़ है (व्यंग्य)

महामारी की स्थिति में भी कर्मठ राजनेता राजनीति बिल्कुल नहीं कर रहे। धार्मिक नेता, मानवता, सदभाव, समानता व सहृदयता की ज़बान बोल रहे हैं। नैतिकता झूम झूम कर सभ्य, सांस्कृतिक नृत्य कर रही है। कलाकार केवल धन अर्जन के लिए नहीं बेहतर सामाजिक बदलावों के लिए जुट गए हैं।

किसी भी समस्या को हल करने का सबसे सुरक्षित और सफल हथियार कल्पना है। कल्पना कोई भी काम कहीं भी बैठे निबटा सकती है। संक्रमण काल में अनुशासन के कारण घर बैठे बैठे कल्पना के पौधे इतने उग गए कि फेसबुक, व्ह्त्सेप के खेत अभी तक लहलहा रहे हैं। कल्पना कुछ भी करवा सकती है, जैसे हम यह मान सकते हैं कि आम आदमी को सड़क, खेत, झोपडी, आश्रम, शिविर या खोली में कभी कभी खाने को मिलता रहे तो वह हमेशा जीवित रह सकता है। सर्दी के मौसम में छोटे से कमरे में आठ दस बंदे, पानी रहित शौचालय, साबुन रहित हाथ धोना आम आदमी को ज्यादा दुखी नहीं करता।

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यह आर्थिक कल्पना की वास्तविक उड़ान है कि कुछ हज़ार रूपए उनके लिए काफी होते हैं क्यूंकि उनके सादा, सरल जीवन को सामान्य रूप से जीने के लिए ज्यादा चीज़ों की ज़रूरत नहीं। यह लघुकल्पना भी सकारात्मक है कि स्थिति ठीक होते ही कुछ न कुछ रोज़गार मिल ही जाएगा, विकट समय में किए गए वायदे पूरे किए जाएंगे। ‘कल्पना कीजिए और सुखी रहिए’ बेहद सफल सामाजिक योजना है। भूख से सहमी हुई ख़बरें देखकर हम यह कल्पना कर सकते हैं कि सभी को भरपेट खाना मिलता रहे तो कितनी अच्छी दुनिया हो। क्या हर्ज़ है अगर हम यह अनुमान लगा लें कि हमारे चैनल निष्पक्ष होकर सामाजिक मुद्दों की उचित आवाज़ बन गए हैं। महामारी की स्थिति में भी कर्मठ राजनेता राजनीति बिल्कुल नहीं कर रहे। धार्मिक नेता, मानवता, सदभाव, समानता व सहृदयता की ज़बान बोल रहे हैं। नैतिकता झूम झूम कर सभ्य, सांस्कृतिक नृत्य कर रही है। कलाकार केवल धन अर्जन के लिए नहीं बेहतर सामाजिक बदलावों के लिए जुट गए हैं। यह वास्तविकता नहीं बलिक कल्पना की ही शक्ति है जिसके आधार पर हम देशभक्त, राष्ट्रवादी, नैतिकतावादी, समाजवादी, लोकतांत्रिक, कर्मठ और ईमानदार हो सकते हैं।

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यह भी जाना बुझा तथ्य है कि कल्पना दर्द की कहानी को आसानी से आंकड़ों में तब्दील कर सकती है। यह कार्य हमारे विशेषज्ञ बेहतर तरीके से निरंतर करते हैं। यह कल्पना का ठोस धरातल ही है जिस पर प्रेमी अपनी प्रेमिका, भावी पति अपनी भावी पत्नी के लिए सदियों से बार बार कितने तरह के चांद उतार लाया है। असली फूल भी तो उन्हें कल्पना लोक में ही ले जाते हैं। क्या पत्थर में ईश्वर की मान्यता की रचना इंसान की कल्पना का नायाब उदाहरण नहीं। वास्तविकता तो हर एक कठिनाई को मुसीबत में बदल देती है, दुःख के कचरे में गिरे हुए भी हम सुवासित सुख की कल्पना करते हैं। बातों बातों में साबित हो गया न कि कल्पना बड़े काम की चीज़ है, ये बेदाग़ बे दाम की चीज़ है।

- संतोष उत्सुक







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