बच्चों को संक्रमक रोगों से दूर रखने के लिए करें शीतलाष्टमी पर पूजा

By प्रज्ञा पाण्डेय | Mar 27, 2019

शीतला अष्टमी उत्तर भारत में मनायी जाती है। शीतला अष्टमी चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनायी जाती है। ऐसा माना जाता है कि जो भी शीतला सप्तमी और अष्टमी का व्रत रखता है और तन-मन से पूजा करता है माता शीतला उसके कष्टों का निवारण करती हैं। ऐसी मान्यता है चिकन पॉक्स, चेचक और खसरा जैसे रोग शीतला माता के आशीर्वाद से ठीक हो जाते हैं। शीतला माता की पूजा लोग अपने बच्चों और परिवार को रोगों से बचाने के लिए करते हैं। इस बार शीतला अष्टमी 28 मार्च 2019 को है। 

शीतलासप्तमी भी है खास 

हमारे देश में शीतलाअष्टमी तो मनायी ही जाती है शीतलासप्तमी का भी खास महत्व है। शीतलासप्तमी को गुजरात में शीतला सातम कहा जाता है। इस दिन भी शीतला माता की पूजा की जाती है। इसके अलावा राजस्थान के जोधपुर में भी शीतलाष्टमी की धूमधाम से पूजा की जाती है। 

वैज्ञानिक आधार

शीतला देवी की पूजा के लिए साफ-सफाई का हमारे पर्यावरण पर भी असर पड़ता है। सफाई से तरह-तरह की संक्रामक बीमारियों से छुटकारा मिलता है।

शीतला देवी का रूप 

शीतला माता के हाथ में झाड़ू और कलश रहता है। झाड़ू सफाई का प्रतीक है और यह लोगों को सफाई के प्रति जागरूक करता है। साथ ही इनके हाथ में कलश भी होता है जिसमें 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है। हिन्दू पौराणिक कथाओं के हिसाब से शीतला माता चेचक और खसरा की देवी हैं। उनके आशीर्वाद से ये रोग दूर हो जाते हैं। शक्ति के दो रूप माने जाते हैं देवी दुर्गा और देवी पार्वती। शीतला माता को शक्ति के इन दोनों रूपों का अवतार माना जाता है। 

रोगों से रक्षा 

शीतला अष्टमी के दिन व्रत रखने से और विधिवत पूजन से बीमारियां घर से दूर रहती हैं और परिवार के सदस्य निरोगी बने रहते हैं। इस दिन घर की रसोई में हाथ की पांचों अंगुलियों से घी दीवार पर लगाया जाता है। उसके बाद उस पर रोली और चावल लगाकर शीतला माता की आरती गायी जाती है। इसके अलावा घर के पास के चौराहे पर भी जल अर्पित किया जाता है जो स्वच्छता का प्रतीक होता है। 

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भोग की विधि 

शीतलाष्टमी के दिन माता को भोग लगाने के लिए बासी खाना तैयार किया जाता है जिसे बसौड़ा भी कहा जाता है। इस दिन बासी खाना माता को नैवैद्य के रूप में चढ़ाया जाता है जिसे बाद में भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में बांट दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन के बाद बासी खाना बंद कर देना चाहिए। शीतलाष्टमी के दिन माता शीतला को भोग लगाने के बाद घर में चूल्हा नहीं जलता। परिवार के सभी सदस्य वही प्रसाद खाकर ही पूरा दिन बीताते हैं। शीतला माता की पूजा विशेष रूप से बसंत और ग्रीष्म ऋतु में होती है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ की अष्टमी को शीतला मां की पूजा का विधान है। 

-प्रज्ञा पाण्डेय

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