शिक्षक दिवस.... मिलिये राज्य शिक्षक सम्मान पाने वाले दिव्यांग शिक्षक राजिंद्र कुमार से

By विजयेन्दर शर्मा | Sep 05, 2021

शिमला। कांगडा जिला के ज्वालामुखी से सटी टिहरी पंचायत में प्राईमरी स्कूल टीहरी में तैनात अध्यापक राजिंद्र कुमार को भी आज हिमाचल सरकार शिक्षक सम्मान के साथ सम्मानित कर रही है। उन्होंने दिव्यांगता के अभिशाप को अपने लक्ष्य में कभी भी बाधा नहीं बनने दिया। जिसके चलते वह नया इतिहास रचते चले गये।

 

 

टीहरी प्राईमरी स्कूल प्रदेश के उन गिने चुने सरकारी स्कूलों में से एक है, जहां अच्छी खासी तादाद में छात्र पढाई करने आते हैं। इस स्कूल में 150 छात्र पढ़ते हैं। इसका श्रेय राजिन्द्र कुमार को ही जाता है। इसके लिये दूसरे साथी शिक्षकों के साथ मिलकर  पास पडोस के अभिभावकों को अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढऩे के लिए प्रेरित किया। जिसके सार्थक परिणाम सामने आये। 

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उन्होंने अपने स्तर पर ही सहयोगी अध्यापकों के साथ स्कूल में स्मार्ट नर्सरी कक्षाएं शुरू करने का जिम्मा उठाया, इस कक्षा को चलाने के लिए परस्पर सहयोग से एक अध्यापिका रखी। जिनका वेतन सभी अध्यापक तथा पंचायत के कुछ लोग एकत्रित करके देते रहे। प्री नर्सरी में 25 बच्चे पढ़ रहे हैं।

राजिंद्र कुमार ने 1992 में बतौर वालंटियर शिक्ष कइस स्कूल में पढाना शुरू किया। 1998 में वह शिक्षा विभाग में नियमित हुए।  खेलों में मन के मुताबिक उन्हें भले ही सफलता नहीं मिली लेकिन शिक्षक बनकर उन्होंने छात्रों को पढ़ाया और उन्हें खेलों का रास्ता भी दिखाया।

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वह तीन साल की उम्र में ही पोलियो से दिव्यांग हो गये थे। उनकी दो बेटियां व एक बेटा है। वह खुद सरकारी स्कूल में पढ़े और बच्चों को भी सरकारी स्कूल से ही उच्च शिक्षित किया। बड़ी बेटी रितु एमए तक पढ़ी है, जबकि दूसरी बेटी रुचि एमए बीएड की पढ़ाई कर रही है। उनका बेटा भारतीय सेना में सेवाएं दे रहा है।

वह मानते हैं कि माता-पिता की मेहनत व आशीर्वाद से आज उन्हें बड़ी कामयाबी मिली है। मैं दिव्यांग था, लेकिन परिजलों ने कभी महसूस नहीं होने दिया। मिलने वाला सम्मान उन सब साथियों के सहयोग का परिणाम है जो हर स्थिति में उनके साथ खड़े रहे। पोलियो का शिकार होने के बाद पिता स्वर्गीय जवाहर सिंह उन्हें कंधों पर बैठाकर 12 किलोमीटर दूर ज्वालामुखी अस्पताल लेकर पहुंचते थे।

उनके स्कूल के मुख्याध्यापक रणवीर सिंह राणा ने कहा कि राजेन्दर सिंह के शिक्षा क्षेत्र में किए गए प्रयासों का ही परिणाम है कि स्कूल में बच्चों की अच्छी संख्या है। उन्होंने न केवल बच्चों को पढ़ाया, बल्कि खेलों में भी पारंगत बनाया है।

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