By अभिनय आकाश | May 20, 2026
इतिहास की अदालत में एक ऐसा किरदार खड़ा है, जिसे लेकर देश आज भी दो हिस्सों में बंटा नजर आता है। एक तरफ वो नेता, जिसने आज़ाद भारत को आधुनिक सोच, IIT, वैज्ञानिक संस्थानों और लोकतांत्रिक ढांचे की मजबूत नींव दी… और दूसरी तरफ वही शख्स, जिसकी कुछ राजनीतिक और रणनीतिक भूलों ने कश्मीर से लेकर चीन सीमा तक ऐसे जख्म दिए, जिनकी टीस आज भी महसूस होती है। पंडित जवाहरलाल नेहरू एक ऐसा नाम, जिसके विजन पर कभी तालियां बजती हैं, तो कभी उसकी ‘हिमालयी भूलों’ पर तीखे सवाल उठते हैं। सवाल ये है कि क्या नेहरू आधुनिक भारत के सबसे बड़े निर्माता थे… या फिर उनकी गलतियों की कीमत देश आज तक चुका रहा है? आज़ादी के दशकों बाद भी आखिर क्यों नेहरू की नीतियां आज की सियासत का सबसे बड़ा कुरुक्षेत्र बनी हुई हैं? क्या वो एक दूरदर्शी राजनेता थे या उनके फैसलों ने भारत के भविष्य को ऐसे भंवर में फंसाया जिससे निकलना आज भी चुनौती है? आइए, आज इस पूरे मामले की तह तक चलते हैं और नेहरू के उन विवादित अध्यायों रे पन्नों को खंगालते हैं, जिन्होंने देश का भूगोल और भविष्य दोनों बदल दिए। सरदार को लेकर भाजपा और कांग्रेस में लगातार संग्राम होता रहा है। इसके पीछे की वजह इतिहास के पन्ने भी हैं। जहां एक पार्टी में रहते हुए भी जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल कई मुद्दों पर अलग-अलग राय रखते थे। लगभग छह दशक पहले दुनिया को अलविदा कह चुके लौह पुरूष को विरासत के दावेदार उन्हें अपने खेमों का सरदार बताते हैं। सरदार वल्लभ भाई पटेल एक ऐसा किरदार जिनके जिक्र के बिना न तो भारतीय इतिहास की आजादी की कहानी पूरी होती है और न ही आधुनिक भारत के मौजूदा ढांचे की परिकल्पना। महान सम्राटों से लेकर विदेशी आतातायियों तक, विस्तारवाद से लेकर साम्राज्यवाद तक इस देश ने सबकुछ देखा और झेला। लेकिन एक सरदार ने कुछ महीनों में वो कर दिखाया, जो शताब्दियों में नहीं हो पाया। आजादी के बाद जिस भारत का सपना देखा जा रहा था, वो इतने टुकड़ों में बंटा हुआ था जिसे एक कर पाना बेहद मुश्किल था। लेकिन सरदार के लौह इरादों ने खंड-खंड भारत को अखंड कर दिखाया। सरदार पटेल के कद को समझ पाना शायद ही संभव हो लेकिन इस कृतज्ञ राष्ट्र ने उनकी दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा बनाकर अपनी श्रद्धांजलि दी है। सरदार पटेल ने अपनी व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं को दरकिनार कर देश को हमेशा प्राथमिकता दी। उन्होंने अपनी पार्टी को एक रखा, देश की एकता से कभी समझौता नहीं किया। ये कहानी उन चार वर्षों की है जब देश के दो कर्णधार सरदार वल्लभ भाई पटेल और नेहरू अपने-अपने तरीके से देश का भविष्य तय करने में लगे थे।
इतिहास को खंगालने पर आपको कई ऐसे तथ्य मिल जाएंगे। बीआर अंबेडकर और मोहम्मद अली जिन्ना की प्रतियोगिता महात्मा गाँधी से थी और वो उनकी आलोचना खुले तौर पर कई बार करते भी थे। लेकिन जवाहर लाल नेहरू का कांग्रेस में ही कई लोगों से कई मामलों में मतभेद था। यह मतभेद वैचारिक, नीतिगत और असुरक्षा के अंतर्गत था। सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद और पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे नेताओं का नज़रिया नेहरू से अलग था। कई अवसरों पर ये मतभेद सतह पर भी आए। पटेल और राजेंद्र प्रसाद का जिक्र हमने पहले किया। अब आपको इतिहास के एक और किरदार के बारे में बताते हैं जिसका कांग्रेस का अध्यक्ष बनना नेहरू को रास न आया और उन्हें त्यागना पड़ा था अपना पद। जहां तक बात सरदार पटेल, नेहरू के बीच के संबंधों की है तो इसे लेकर भी जिक्र अकसर हो जाता है और इतिहास के हवाले से कई संदर्भ पेश किए जाते हैं। इन्हीं संदर्भों में एक वक्त ऐसा भी आया जब देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री में चिट्ठियों से बात होने लगी। फिर एक दिन प्रधानमंत्री के नाम ऐसी चिट्ठी आई जिसमें गृह मंत्री पटेल ने लिखा कि हम साथ-साथ काम नहीं कर सकते। नेहरू की डिप्लोमेसी पटेल को पसंद नहीं थी। यहां तक कि वो जवाहर लाल नेहरू की राय से इत्तेफाक न रखने पर अपनी नाखुशी साफ जाहिर कर देते थे। पटेल और नेहरू के रिश्ते उस वक्त भी मेलजोल भरे नहीं रहते थे, जब गांधी जी जिंदा थे। 6 जनवरी 1948 को गांधी जी के नाम नेहरू ने एक खत में लिखा था कि ये सच है कि सरदार पटेल और मेरे बीच न सिर्फ व्यावहारिक मतभेद हैं, बल्कि आर्थिक और संवैधानिक विषयों को भी देखने में भी हम भिन्न हैं। तब जवाब में पटेल ने भी गांधी को ही 16 जनवरी 1948 को एक पत्र लिखा था। ‘पूज्य बापू, जवाहर लाल का भार तो मुझसे भी ज्यादा है और वे अपने दुख अपने अंदर ही लेकर बैठे हैं। शायद अपने बुढ़ापे के कारण मैं उनके लिए ज्यादा काम का नहीं रह गया। ऐसी परिस्थिति में आप मुझे मेरी जिम्मेदारी से मुक्त कर दें तो ये देश और मेरे लिए लाभदायक होगा’। अब न नेहरू हैं न पटेल लेकिन उनके रिश्ते सियासत में हमेशा चर्चा में रहते हैं।
साल 1949 में संयुक्त राष्ट्र में जम्मू कश्मीर के लोगों को जमनत संग्रह का अधिकार दिया था। ये भारत सरकार की बड़ी भूल की वजह से हुआ था। वर्ष 1947 में जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को संयुक्त राष्ट्र की मदद से सुलझाने की कोशिश की गई। जबकि ये घरेलू मामला था। आजादी के तुरंत बाद अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया था और भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। जवाब में भारत की सेना पाकिस्तान से कश्मीर के वो सारे इलाके जीतकर लगातार आगे बढ़ रही थी। तभी अचानक प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने युद्ध विराम का ऐलान कर दिया। दुनिया में यह एकलौता उदाहरण है जहां जीतती हुई सेना को युद्ध विराम के कारण पीछे लौटना पड़ा। अचानक हुए इस फैसले से पाकिस्तान को जम्मू कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा करने का मौका मिल गया और युद्ध खत्म होने से पहले ही 1948 में जवाहर लाल नेहरू कश्मीर का मामला लेकर स्वयं ही संयुक्त राष्ट्र में चले गए और यहीं उनकी भूल थी। इस वजह से पाकिस्तान को पीओके से हटाया नहीं जा सका। जिसका नतीजा है कि पाकिस्तान कश्मीर को आज भी भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने जनवरी 1948 में इस मामले को उठाया। न्यायविद सर जफरुल्ला खान ने पाकिस्तानी स्थिति के पक्ष में पांच घंटे तक बात की। सरदार वल्लभभाई पटेल के निजी सचिव वी शंकर ने अपने संस्मरण स्कोफिल्ड में कहा है कि भारत की तरफ से ब्रिटिश प्रतिनिधि, फिलिप नोएल-बेकर की भूमिका से नाखुश था, कहा जाता है कि परिषद को पाकिस्तान की स्थिति की ओर धकेल रहा था। जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की ओर से किए गए हमले की हमारी शिकायत पर सुरक्षा परिषद में चर्चा ने बहुत प्रतिकूल मोड़ ले लिया है। जफरुल्ला खान, ब्रिटिश और अमेरिकी सदस्यों के समर्थन से, उस शिकायत से ध्यान हटाकर जम्मू-कश्मीर के प्रश्न पर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद की समस्या की ओर ध्यान हटाने में सफल रहा था। सरदार पटेल के निजी सचिव के अनुसार जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान के हमले को उसकी आक्रामक रणनीति के कारण पृष्ठभूमि में धकेल दिया गया था। मानों जैसेहमने उसका मुकाबला करने के लिए कुछ नम्र और रक्षात्मक मुद्रा अपना रखी हो। 20 जनवरी, 1948 को, सुरक्षा परिषद ने विवाद की जांच के लिए भारत और पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र आयोग (यूएनसीआईपी) की स्थापना के लिए एक प्रस्ताव पारित किया और मध्यस्थता प्रभाव से कठिनाइयों को दूर करने की संभावना" को अंजाम दिया। सरदार पटेल नेहरू द्वारा मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने से असहज थे, और उन्हें लगा कि यह एक गलती है। स्कोफिल्ड में उन्होंने लिखा कि न केवल विवाद लंबा चला गया है, बल्कि सत्ता की राजनीति की बातचीत में हमारे मामले की योग्यता पूरी तरह से खो गई है।