टीका से टिकाऊ हुआ टीका (व्यंग्य)

By अरुण अर्णव खरे | Jan 18, 2021

उन्होंने टीकाकरण से पहले टीका के डिब्बे को टीका लगाया... टीवी पर यह सीन देख कर दिल बाग़-बाग़ हो गया। ये हुई न बात... मन के भीतर से आवाज आई। हमें विश्वास हो गया कि अब विज्ञानं अपना काम करेगा। विज्ञानं और आस्था हमारे लिए हमेशा से एक दूसरे के पूरक रहे हैं पर विज्ञानं से ज्यादा भरोसा हमें अपनी आस्था पर है। हम अपनी आस्था के मुताबिक ही विज्ञानं पर भरोसा करते हैं। केवल विज्ञानं पर भरोसा करना हमें नहीं आता। इसीलिए हमने जब राफ़ेल मँगाए तो उनके उतरते ही सबसे पहला काम हमने उन पर टीका लगाने का किया। हमारा मानना है कि टीका लगने से राफ़ेल की मारक क्षमता में और वृद्धि हो गई व दुश्मन के मन में भय का भाव दोगुना हो गया।

उसके पहले भी हमसे एक गलती हुई थी। उसी गलती के कारण देश में वायरस के प्रकोप से संक्रमित मरीजों की संख्या करोड़ के आंकड़े को पार गई। देश में जब पहला मरीज़ मिला था तभी हम उसे पकड़ कर माथे पर हल्दी चावल का टीका लगा देते तो उसके अंदर जा घुसे वायरस का दम वहीं निकल जाता। दम नहीं भी निकलता तो कम से कम वह दूसरे पर चिपकने लायक तो नहीं ही बचता और हमें महामारी का इतना दुखद एवं घातक स्वरूप नहीं नहीं देखना पड़ता।

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हमारे यहाँ कहा भी जाता है कि देर आए दुरुस्त आए। सो हमने पिछली दो-दो गलतियों से सबक सीखा और उन गलतियों को सही समय पर सुधार लिया। टीका को टीका लगाकर हमने अपने टीकाकरण अभियान की शुरुआत की। डिब्बे के ऊपर आस्था का टीका क्या लगा, डिब्बे में बंद विज्ञानं के टीका में हमारी आस्था जाग गई। हमें अपनी आस्था पर हमेशा अपनी काबिलियत से ज्यादा भरोसा रहा है। टीकाकरण शुरु हुए दो दिन हो गए और कहीं से कोई शिकायत नहीं मिली... यह सुखद परिणाम आना ही था सो आ रहा है। टीका पर टीका टिप्पणी करने वाले टीका के टिकाऊ सिद्ध हो जाने से चुप हैं।

- अरुण अर्णव खरे

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