तिब्बती नव वर्ष के अवसर पर तिब्बती मुख्य मंदिर मैक्लोडगंज 3 मार्च से खुल जाएगा

By विजयेन्दर शर्मा | Feb 28, 2022

धर्मशाला। तिब्बती वाटर टाईगर वर्ष-2149, तिब्बती नव वर्ष के अवसर पर तिब्बती मुख्य मंदिर मैक्लोडगंज 3 मार्च, 2022 से खुल जाएगा। इस दौरान कोविड-19 मामलों को देखते हुए मंदिर आने वाले आगंतुक कोविड नियमों का पालन करते हुये मंदिर परिसर में आ सकेंगे। यह जानकारी देते हुए थेखचेन चोयलिंग चैरिटेबल सोसायटी ने बताया कि मंदिर आने वाले आगंतुकों को मंदिर परिसर में आपकी यात्रा के दौरान मास्क पहनना, सुरक्षित दूरी बनाए रखना तथा मंदिर में प्रवेश करने से पहले अपने हाथ को सैनिटाइज करना आवश्यक होगा।

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तिब्बती नववर्ष नए साल की खुशियां मनाने का त्योहार है। भारत व दूसरे देशों में रह रहे तिब्बती लोसर के जशन की तैयारियां दस दिन पहले ही से शुरू कर देते हैं। धर्मशाला से सटे मैक्लोडगंज में निर्वासन में रह रहे तिब्बती समुदाय में तिब्बती नववर्ष लोसर को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है।  यहां रह रहे तिब्बती 1 लोसर पर्व मनाते हैं। निर्वासित तिब्बतियों द्वारा पारंपरिक ढंग से लोसर पर्व को मनाया जाता है। अलग-अलग दिन तिब्बतियों द्वारा विभिन्न कार्यक्रम प्रस्तावित किए जाते हैं। तीन दिवसीय लोसर पर्व के लिए दस दिन पहले निर्वासित तिब्बती खरीददारी शुरू कर देते हैं।

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तिब्बती नववर्ष लोसर के प्रथम दिन को तिब्बती समुदाय के सभी लोग घरों में ही रहते हैं। परंपरा के अनुसार तिब्बती परिवारों के बच्चे और पुरुष नहाते हैं व महिलाओं के नहाने की परंपरा है। तिब्बती परिवार अपने घरों की साफ-सफाई करके आकर्षक ढंग से सजाते हैं। तिब्बती युवाओं तेन्जिन छवांग, तेन्जिन देदेन, छेरिंग फुंग्चुक ने बताया कि लोसर पर्व का उन्हें साल भर इंतजार रहता है। इस पर्व के दौरान निर्वासित तिब्बती विशेष पूजा अर्चना कर ईष्टदेव से बुरी आत्माओं को घरों से दूर करने तथा उनके घरों में निवास करने की कामना की जाती है।

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तिब्बती समुदाय लोसर पर्व के लिए दो माह पहले छांग (देसी मदिरा) तैयार करना शुरू कर देता है। देसी मदिरा का पहले अपने ईष्ट को भोग लगाया जाता है, उसके बाद स्वयं या रिश्तेदारों को आदान-प्रदान किया जाता है। वहीं समुदाय पर्व के दौरान भगवान को चढ़ाने के लिए मैदे से खपस (मटर कीतरह दिखने वाले) व्यंजन बनाते हैं।तिब्बती बुजुर्गों के अनुसार पुराने समय में लोसर पर्व पर भेडा काटा जाता था और उसका सिर ईष्ट देव को चढ़ाया जाता था। अब बदलते दौर में मांस के बजाय समुदाय के लोग मक्खन से बना भेड़ का सिर ईष्टदेव को चढ़ाकर पूजा करते हैं। समुदाय के लोगों का कहना है कि अब भेड़ काटना पसंद नहीं करते हंै, जिसके चलते मक्खन से भेड़ का सिर बनाकर इसे चढ़ाया जाता है।लोसर पर्व पर मैक्लोडगंज के प्रमुख बौद्ध मठ में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। तिब्बत में तो लोसर पर्व का आयोजन 15 से 20 दिनों तक चलता है, लेकिन भारत के विभिन्न हिस्सों में रह रहे तिब्बती तीन दिनों तक इस पर्व को मनाते हैं। इस दिन तिब्बतियों द्वारा भिखारियों को दान दिया जाता है।

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