महबूबा और अब्दुल्ला क्यों करते थे 370 की वकालत

By अभिनय आकाश | Jan 23, 2020

पीएम मोदी ने एक नारा दिया था सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास। जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म किया था तब भी कहा था कि इस फैसले से जम्मू कश्मीर के लोगों का साथ भी है विकास भी है और विश्वास भी है। अब करीब 6 महीने बाद केंद्र सरकार के मंत्री इसे परखने के लिए जम्मू कश्मीर पहुंचे। वो देखने आए थे कि 370 के खात्मे के 190 दिनों में कितनी बदली है रूत, कितनी बदली है रवानी और कितनी बदली है जिंदगानी। मोदी सरकार के एक मात्र मुस्लिम मंत्री घाटी आए, साथ में नजराने में हुकूमत का यकीन भी लाए। भरोसा कीजिए 370 का खात्मा आपके हक में है।

लोगों को उन्होंने अस्लाम वालेकुम कहकर संबोधित किया। बीजेपी के किसी भी नेता या किसी भी मंत्री का सार्वजनिक तौर पर ये संबोधन सुनने को कम ही मिलता है। मुख्तार अब्बास नकवी श्रीनगर के लाल चौक पर वेशभूषा, जुबान और लहजे से खालिस मुसलमान दिखना चाहते थे। आखिर वो भारत सरकार के इकलौते मंत्री हैं जो जम्मू कश्मीर के दौरे वाली सियासत में जम्मू से निकलकर घाटी पहुंचे। ये बताने कf अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद हालात सामन्य हो रहे हैं, आप महसूस कीजिए... 

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साल था 1953 जब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधान के तहत भारत सरकार की अनुमति के बिना कोई जम्मू कश्मीर की सीमा में दाखिल नहीं हो सकता था। 52 वर्षीय एक नेता इसके खिलाफत में मुखर होकर सामने आए जिनका नाम था श्यामा प्रसाद मुखर्जी और उन्होंने कश्मीर के लिए रवानगी भरी। जम्मू-कश्मीर सरकार ने राज्य में प्रवेश करने पर मुखर्जी को 11 मई 1953 को हिरासत में ले लिया। मुखर्जी के साथ उस वक्त एक और नेता मौजूद थे जो आगे चलकर देश के प्रधानमंत्री भी रहे नाम था भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी। 

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श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तब के युवा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से कहा कि तुम वापस जाओ और देश भर में इस विषय को बताओ कि अपने ही देश के एक भाग में जाने पर मुझे हिरासत में ले लिया गया। ठीक बारह दिन बाद यानि 23 जून 1953 को जेल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमयी तरीके से मौत हो जाती है। वक्त बीतता है और इस बदलते वक्त के साथ तिलक के प्रभाव और जनमानस के दबाव तले 2 सीटों वाली पार्टी उम्मीदों, आशाओं और वादों की पूर्ति की आकांक्षा के साथ प्रचंड बहुमत हासिल कर देश के तख्त पर विराजमान होती है। 

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साल 2018 में भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस के मौके पर जम्मू कश्मीर के दौरे पर थे और राष्ट्रवाद के मुद्दे को प्रखरता से उठाते हुए शाह ने यह साफ संकेत दे दिए थे कि भाजपा धारा 370 और आर्टिकल 35 ए को लेकर आर-पार के मूड में है। मोदी सरकार पार्ट-2 के गठन के बाद अमित शाह देश के गृह मंत्री बनते हैं। अमित शाह कुछ अलग तरह के गृह मंत्री हैं और पारंपरिक राजनीति में विश्वास नहीं रखते हैं। जम्मू कश्मीर की समस्या पर वर्तमान सरकार के नजरिए को स्पष्टता से रखते हुए अमित शाह ने सदन में साफ कर दिया कि एकता अखंड और संप्रुभता के सूत्र में भारत को बांधना है और इसमें धारा 370 सबसे बड़ी अड़चन है। अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर को टॉप एजेंडे में रखा है। दो दिनों के अपने दौरे से लौटने के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने धारा 370 को एक अस्थाई व्यवस्था करार दिया है। शाह ने  कहा कि 370 हमारे संविधान का अस्थायी मुद्दा है और ये शेख अब्दुल्ला साहब की अनुमति से ही हुआ है। इतिहास पर गौर करें तो आर्टिकल 370 के विरोध में जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1952 में एक नारा दिया था ‘एक देश, दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे। जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे के विरोध में जनसंघ संस्थापक द्वारा लगाये गये इस नारे के 67 साल बाद बीजेपी ने इसे निरस्त कर अंजाम तक पहुंचाया।

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ये कश्मीर ही है, जिसने खुद मोदी सरकार को विवश कर दिया कि वह धारा 370 को खत्म करे। इसके लिए घाटी के अलगाववादियों से लेकर आतंकवादियों और नेता-जनता सब जिम्मेदार हैं। सभी ने मिलकर धारा 370 को हटाने के लिए जमीन तैयार की है, जिसका इस्तेमाल भाजपा ने किया और एक ऐतिहासिक फैसला लिया। धारा 370 का पूरा फायदा अलगावादी नेता उठाते थे। इसके जरिए वह लोगों को भड़काने का काम भी करते थे। उनका बस यही मकसद था कि कैसे कश्मीर को एक अलग देश बनाया जाए। पाकिस्तान का समर्थन करने वाले हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के गुट के चेयरमैन सैयद अली शाह गिलानी अक्सर ही पाकिस्तान का गुणगान करते थे और भारत को बुरा भला कहते थे। उनके कई ऐसे वीडियो भी सामने आए हैं, जिसमें वह नारा लगाता हैं- 'हम पाकिस्तानी, पाकिस्तान हमारा।' अब जरा सोचिए, जो अलगाववादी पाकिस्तान की बातें करें, हिंदुस्तान को बुरा कहें, वह तो भारत सरकार को धारा 370 के खिलाफ कदम उठाने के लिए मजबूर ही कर रहे हैं।

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370 हटने पर खून खराबा होने और तिरंगे को कंधा नहीं मिलने जैसी धमकी देने वाले घाटी के तीन पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती पिछले छह महीने से प्रदेश में नजरबंद हैं। लेकिन हमेशा कश्मीर के ये नेता 370 की वकालत करते नजर आए। जिसके पीछे की मंशा लोगों की भलाई नहीं बल्कि इनका निजी स्वार्थ ही था। जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का ऐलान करते वक्त राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि इसके चलते राज्य का विकास रुका और इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला। गृहमंत्री गलत नहीं कह रहे थे। आंकड़ों पर नजर डालें तो देश की टैक्स देने वाली जनता का 10 फीसदी पैसा लेने के बावजूद वहां के राजनेता कश्मीर में रहने वाली देश की एक फीसदी आबादी का भी ढंग से विकास नहीं कर पाये और वहां की अर्थव्यवस्था कमजोर की कमजोर बनी रही। केंद्र से जोरदार मदद मिलने के बावजूद राज्य में आतंकवाद और कर्ज का ग्राफ चढ़ता रहा। पिछले 6 दशकों से कश्मीर ने चार लाख करोड़ रूपया प्रत्यक्ष सहायता के रूप में भारत सरकार से पाया। अप्रत्यक्ष और सीमाओं की रक्षा व आतंकवाद से निपटने के मामलों पर खर्च होने वाले हजारों करोड़ रूपये का कोई हिसाब नहीं है। क्या आप जानते हैं कि कुछ साल पहले देशभर में अगर गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों का प्रतिशत 26 था तो जम्मू कश्मीर में यह प्रतिशत 3.4 था। अर्थात जम्मू कश्मीर एक ऐसा राज्य था जहां गरीबों की संख्या 3.4 प्रतिशत थी और वह भी कश्मीर में नहीं गरीब सिर्फ जम्मू संभाग में थे। जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था की दो तिहाई जरुरतें केंद्रीय अनुदान से पूरी होती थीं जिसका ठीक से इस्तेमाल नहीं किया जाता था. राज्य सरकारें, ग्रामीण रोजगार, पीने का पानी, स्वास्थ्य व्यवस्था और दूसरे सामाजिक सेक्टरों में इस पैसे का इस्तेमाल करने में विफल रहीं।ईमानदारी से इस रकम को राज्य के विकास के लिए खर्च किया गया होता तो जम्मू कश्मीर की सड़कें सोने की होती।

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इसके अलावा 370 का उपयोग करके वहां भ्रष्टाचार को कंट्रोल करने वाले कानून लागू नहीं होने दिए गए। गौरतलब है कि BCCI की ओर से 2002 से 2012 के बीच जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन को सूबे में क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिए 113 करोड़ रुपये का फंड रिलीज किया गया था, लेकिन यह पूरी रकम खिलाड़ियों को प्रस्तावित सुविधाओं पर खर्च नहीं की गयी। ये तब का मामला है जब फारूक अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष हुआ करते थे। फारूक अब्दुल्ला के अलावा इस घोटाले में एसोसिएशन के तत्कालीन महासचिव मोहम्मद सलीम खान, कोषाध्यक्ष एहसान अहमद मिर्जा और जम्मू कश्मीर बैंक का एक कर्मचारी बशीर अहमद मिसगर भी इसमें शामिल थे। इसके अलावा बीजेपी के सहयोग से राज्य की मुख्यमंत्री रहीं महबूबा मुफ्ती से एंटी करप्शन ब्यूरो ने जम्मू और कश्मीर बैंक के चेयरमैन से कुछ मंत्रियों ने सिफारिश पर जवाब भी मांगा था। ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जो इन नेताओं द्वारा 370 की खिलाफत करने के पीछे की बड़ी वजह हैं। पिछले तीन दशक से विशेष दर्जा होने की वजह से राज्य में कोई भी केंद्रीय एजेंसी जांच नहीं कर सकती थी। एनआईए द्वारा आतंकवादियों के साथ सांठगांठ के आरोप में गिरफ्तार किए गए जम्मू एवं कश्मीर के पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) दविंदर सिंह की गिरफ्तारी को भी 370 के खात्मे के बाद जांच एजेंसी के खुलकर काम करने के रूप में देख सकते हैं। 

कुल मिलाकर, ‘बुढ्ढी अम्मा के बाल’ यानी हवा मिठाई के बारे में तो आप बखूबी जानते होंगे। कश्मीरियों के लिए अनुच्छेद 370 उसी मिठाई की तरह थी- देखने में खूब बड़ी और सुंदर लेकिन मुंह में डालते ही पता चलता था कि इसमें मिठाई तो बस कहने भर को है। 

-अभिनय आकाश

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