By सुखी भारती | Aug 26, 2021
भगवान श्रीराम जी का चयन भला अनुचित कैसे हो सकता है? वास्तव में सत्य तो यह है कि वे जिसे भी चुन लें, वही उचित पात्र हो जाता है। उन्होंने त्रिलोक पति रावण से भिड़ने के लिए वानरों की सेना का चयन किया। वे वानर जिन्हें रावण समझता है कि वानर और मनुष्य तो हमारा आहार हैं। लेकिन प्रभु ने वानरों को चुना, तो प्रभाव यह हुआ कि समस्त राक्षस जाति उल्टे वानरों का ही आहार बन गए। लेकिन जिस समय प्रभु श्रीसीता जी के लिए अपने संदेश वाहक का चयन करते हैं, तो हर किसी को न चुन केवल श्रीहनुमान जी को ही चुनते हैं। यहाँ भी वे किसी को भी चुन सकते थे। कारण कि वे किसी भी अपात्र को चुन लें, तो पात्र तो उसे बन ही जाना है। अब क्योंकि प्रभु तो जनमानस को जीवन का आदर्श समझा रहे हैं। सामान्य मानव में तो प्रभु जैसा सामर्थ्य नहीं होता कि वह जिसे भी चुन ले, वही पात्र बन जाता है। इसलिए कहना चाह रहे हैं कि जब भक्ति की खोज में निकलना हो, तो पहले किसी संत का ही चयन करना होता है। ऐसा संत जो श्रीहनुमान जी भाँति पूर्ण हो। श्रीराम जी ने तो लीला रचने हेतु श्रीहनुमान जी का चयन कर लिया। लेकिन जैसा कि हमने विगत अंक में जाना कि प्रभु द्वारा श्रीहनुमान जी के चयन पर भी आपत्ति है। ‘बल’ विषय को लेकर, एक प्रश्नकर्ता का समाधान तो प्रभु ने कर ही दिया था। लेकिन जब बात आई कि श्रीहनुमान जी जानकी माता को प्रभु के बिरह का बखान भला कैसे करेंगे। जिसका सबसे प्रमुख कारण यह है, कि श्रीहनुमान जी तो ठहरे विशुद्ध बाल ब्रह्मचारी। और एक ब्रह्मचारी को पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंधों के दुख-सुख का भला क्या ज्ञान? वे क्या जानें कि पति से जब पत्नी बिछुड़ती है, तो उस बिछोह की पीड़ा क्या होती है? तभी तो समाज में एक वर्ग का यह प्रश्न उचित जान पड़ता है कि मुद्रिका श्रीहनुमान जी की अपेक्षा सुग्रीव को ही देकर, सीता मईया के पास भेजा जाना चाहिए था। कारण कि सुग्रीव को पत्नी बिछोह की पीड़ा का बहुत अच्छे से अनुभव है। उसे पता है कि बिन अपनी प्रियत्मा के जीवन कितना नीरस व वीरान लगता है। निश्चित ही सुग्रीव श्रीराम जी की आंतरिक अवस्था को अधिक अच्छे से महसूस कर, माता सीता के समक्ष प्रभु की अवस्था का सही चित्रण कर सकता है। लेकिन पता नहीं क्यों श्रीराम जी ने इस विषय पर चिंतन ही नहीं किया। लेकिन सज्जनों क्या श्रीराम जी का कोई भी कार्य तर्कहीन व दिशाभ्रमित हो सकता है? नहीं न! तो सुग्रीव का चयन न करके, श्रीहनुमान जी का चयन भला कैसे अनुचित हो सकता है। यहां भी श्रीराम जी प्रश्नकर्ता का उत्तर बड़े मार्मिक तरीके से देते हैं।
‘राम काज करिबे को आतुर।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।’
श्रीसीता जी के समक्ष जब श्रीहनुमान जी जायेंगे, तो दोनों ही क्योंकि मेरे अत्यधिक प्रेमी हैं, तो दोनों को ही मेरी चर्चा में परमानंद की प्राप्ति महसूस होगी। जितना श्रीहनुमान जी सुनाते जायेंगे, श्रीसीता जी का बिरह की मार से छलनी हृदय राहत का अनुभव करेगा। रही बात कि श्रीहनुमान जी तो बाल ब्रह्मचारी हैं, तो वे भला श्रीसीता जी को पति-पत्नी के बीच संबंधों का कैसे वर्णन करेंगे। तो इस दृष्टिकोण से आप देख ही क्यों रहे हैं, कि श्रीहनुमान जी को कोई पति-पत्नी के प्रसंग गाने पड़ेंगे। क्या आप नहीं जानते कि श्रीहनुमान जी श्रीसीता जी को माता और हमें पिता के भाव से देखते हैं। संसार में भी अगर किसी बालक के माता-पिता विलग हो जायें, और बालक को अपनी माता के समक्ष अपने दूर बैठे पिता की मनोदशा बयां करने का अवसर मिल जाये, तो क्या वह अपनी माता को अपने पिता के बारे में नहीं बतायेगा। निश्चित ही वह सब प्रकार से सब वास्तुस्थिति का वर्णन करेगा ही करेगा। ठीक ऐसे ही श्रीहनुमान जी अपनी माता श्रीसीता जी के समक्ष अपने पिता, अर्थात मेरी वास्तविक स्थिति की चर्चा तो करेगा ही न। भला इसमें कैसा संकोच। इसलिए श्रीसीता जी के पास श्रीहनुमान जी को भेजने का हमारा निर्णय किसी भी प्रकार से अनुचित नहीं था।
आगे श्रीसीता जी की खोज में वानर कहाँ तक सफल हो पाते हैं, जानेंगे अगले अंकों में...(क्रमशः)...जय श्रीराम...!
-सुखी भारती