Myth vs Facts: क्या चर्चों पर बढ़ेगा नियंत्रण? भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने दावों को किया खारिज, समझाया पूरा गणित

By अभिनय आकाश | Aug 10, 2026

अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने 'फ़ॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट' में प्रस्तावित बदलावों का बचाव करते हुए कहा है कि इनका मकसद पारदर्शिता बढ़ाना और यह पक्का करना है कि संगठनों को विदेशी पैसा तय प्रक्रिया के ज़रिए ही मिले। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक और राजनीतिक क्षेत्रों में विदेशी पैसे के लेन-देन को रेगुलेट करना देश की सुरक्षा से जुड़ा एक संप्रभु फ़ैसला है और कई लोकतांत्रिक देशों में ऐसा आम तौर पर किया जाता है। रविवार को X पर कई पोस्ट में, क्वात्रा ने एक अमेरिकी सांसद की कुछ दिन पहले जताई गई चिंताओं का जवाब दिया। सांसद का दावा था कि FCRA में बदलावों से भारतीय सरकार को चर्चों और चैरिटी संस्थाओं पर नियंत्रण करने का अधिकार मिल जाएगा। इन आशंकाओं को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि यह कानून सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है और किसी खास समुदाय को निशाना नहीं बनाता।

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पूजा स्थलों के बारे में उन्होंने कहा पूजा स्थलों की अपनी सुरक्षा व्यवस्था होती है। अगर किसी ऐसे संगठन ने पूजा स्थल से जुड़ी कोई संपत्ति बनाई है जिसका FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द हो गया है, तो पूजा-पाठ जारी रखने के लिए वह संपत्ति उसी धर्म के किसी दूसरे FCRA-रजिस्टर्ड संगठन को सौंप दी जाती है। FCRA बिल, 2026 सरकार को एक तय अथॉरिटी बनाने का अधिकार देता है। यह अथॉरिटी विदेशी चंदे और उससे बनाई गई संपत्तियों का मैनेजमेंट संभालेगी, जब किसी संगठन का FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाए, सरेंडर कर दिया जाए या रिन्यू न होने की वजह से खत्म हो जाए। इसमें यह भी कहा गया है कि अगर संपत्ति कोई पूजा स्थल है, तो अथॉरिटी को यह पक्का करना होगा कि उसका धार्मिक स्वरूप बना रहे। क्वात्रा ने उन सुझावों को भी खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि इन बदलावों का मकसद सिविल सोसाइटी को मिलने वाली विदेशी मदद को रोकना है। उन्होंने कहा, "हजारों संगठन FCRA के तहत रजिस्टर्ड हैं और उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत, रिसर्च और मानवीय कार्यों के लिए नियमित रूप से विदेशी फंड मिलता है। उन्होंने आगे कहा कि भारत में 30 लाख से ज़्यादा NGO हैं, और उनमें से सिर्फ़ 14,450 के पास ही FCRA रजिस्ट्रेशन है। उन्होंने कहा इस तरह, सिविल सोसाइटी के ज़्यादातर संगठन पूरी तरह से इस कानून के दायरे से बाहर हैं।

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