FCRA Bill 2026: विदेशी फंडिंग पर रोक नहीं लगाएगा नया FCRA बिल, एम्बेसडर विनय क्वात्रा ने दी सफाई

प्रस्तावित FCRA संशोधन बिल 2026 को लेकर जारी बहस के बीच अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने सरकार का पक्ष रखा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर बिल से जुड़े दावों को मिथक बताया। क्वात्रा के अनुसार, इस बिल का मकसद विदेशी फंडिंग रोकना नहीं बल्कि वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासन को बेहतर बनाना है।
विदेशी चंदे और NGO की फंडिंग से जुड़े Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को लेकर देश में बहस तेज है। विपक्ष और कई संगठनों की ओर से बिल के प्रावधानों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। खासकर विदेशी फंड से बने NGO के एसेट्स, धार्मिक संस्थाओं और छोटे सामाजिक संगठनों पर इसके संभावित असर को लेकर चिंता जताई जा रही है। इसी बीच अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक लंबी पोस्ट सीरीज के जरिए बिल से जुड़े कुछ दावों को ‘मिथक’ बताते हुए सरकार का पक्ष सामने रखा है। क्वात्रा का कहना है कि प्रस्तावित बदलावों का मकसद विदेशी फंडिंग को बंद करना नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल में पारदर्शिता बढ़ाना, व्यवस्था को बेहतर बनाना और नियमों को ज्यादा स्पष्ट करना है। उन्होंने बिल को लेकर उठाए जा रहे पांच प्रमुख सवालों का जवाब देते हुए यह समझाने की कोशिश की कि FCRA का ढांचा भारत में नया नहीं है और विदेशी फंड पर निगरानी दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में भी होती है।
बिल को लेकर उठने वाले प्रमुख सवालों में से एक यह है कि क्या भारत विदेशी फंड के जरिए होने वाले सिविल सोसायटी के काम को ही सीमित करना चाहता है। क्वात्रा के मुताबिक, ऐसा कहना सही नहीं होगा। उनका तर्क है कि विदेशी वित्तीय प्रवाह पर निगरानी रखना राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक हित से जुड़ा अधिकार है। भारत में विदेशी योगदान को नियंत्रित करने का कानून भी नया नहीं है। FCRA का पहला संस्करण 1976 में आया था, जिसे बाद में 2010 में नए ढांचे के साथ बदला गया। इसके बाद 2016, 2018 और 2020 में भी इसमें संशोधन किए गए।
उनके मुताबिक 2026 का प्रस्तावित बदलाव भी इसी प्रक्रिया की अगली कड़ी है, जिसका जोर पारदर्शिता, बेहतर प्रशासन और स्पष्ट नियमों पर है। सरकार की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि FCRA कानून विदेशी चंदा लेने पर पूरी तरह रोक नहीं लगाता। स्वास्थ्य, शिक्षा, राहत कार्य, रिसर्च और मानवीय गतिविधियों जैसी कई गतिविधियों के लिए नियमों के तहत विदेशी योगदान लिया जा सकता है।
इसे भी पढ़ें: Monsoon Session: संसद में FCRA बिल और परिसीमन पर अनिश्चितता, विपक्ष का विरोध
दूसरा बड़ा सवाल NGO और चैरिटेबल संस्थाओं को लेकर है। आलोचकों की चिंता है कि नए प्रावधानों से विदेशी फंड पर निर्भर संस्थाओं के लिए काम करना और मुश्किल हो सकता है। क्वात्रा ने इस दावे के जवाब में कहा कि भारत में विदेशी योगदान का प्रवाह घटने के बजाय बढ़ा है। उनके मुताबिक, 2010-11 में करीब 1.2 अरब डॉलर का विदेशी योगदान दर्ज किया गया था, जो बाद के वर्षों में बढ़कर करीब 2.67 अरब डॉलर तक पहुंचा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत में NGO की संख्या लाखों में है, जबकि FCRA के तहत पंजीकृत संस्थाओं की संख्या इसका एक छोटा हिस्सा है। यानी देश में काम कर रहे अधिकांश सिविल सोसायटी संगठन FCRA के दायरे में ही नहीं आते।
सरकार की तरफ से समझाया जा रहा है कि FCRA का मूल ढांचा तीन बुनियादी बातों पर टिका है—रजिस्ट्रेशन कराना, निर्धारित प्रक्रिया के तहत विदेशी पैसा प्राप्त करना और उस पैसे के इस्तेमाल का हिसाब देना। दूसरे शब्दों में, सरकार का तर्क है कि कानून का उद्देश्य सामाजिक संस्थाओं के काम को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से आने वाला पैसा किस उद्देश्य से आया और कहां खर्च हुआ, इसकी जानकारी साफ रहे।
FCRA बिल पर सबसे ज्यादा चर्चा शायद NGO और अन्य संस्थाओं की संपत्ति को लेकर हो रही है। प्रस्तावित कानून में एक ‘Designated Authority’ की व्यवस्था की गई है। अगर किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, संस्था खुद अपना पंजीकरण सरेंडर कर देती है या उसका पंजीकरण खत्म हो जाता है, तो विदेशी योगदान और उससे बनाई गई संपत्तियों की देखरेख की व्यवस्था इस प्राधिकरण के जरिए की जाएगी। PRS के मुताबिक, यही 2026 बिल का एक प्रमुख नया ढांचा है। सरकार का कहना है कि विदेशी फंड से जुड़ी संपत्तियों के अस्थायी रूप से किसी सरकारी प्राधिकरण के अधीन जाने की अवधारणा पूरी तरह नई नहीं है। नया बिल मुख्य रूप से इस प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए एक स्पष्ट तंत्र तैयार करता है।
इसे भी पढ़ें: ZPM FCRA Bill का संसद में समर्थन नहीं करेगी, यदि Mizoram की चिंताएं दूर न हुईं
प्रस्तावित व्यवस्था में अगर संस्था तय अवधि के भीतर अपना FCRA पंजीकरण दोबारा हासिल या बहाल कर लेती है, तो उसकी संपत्ति और इस्तेमाल न हुआ विदेशी फंड वापस किए जाने का प्रावधान है। वहीं, अगर निर्धारित समय में पंजीकरण बहाल नहीं होता, तो संपत्तियों के स्थायी रूप से प्राधिकरण के अधीन जाने की स्थिति बन सकती है। यही प्रावधान विपक्ष और कई संगठनों की चिंता का बड़ा कारण है। आलोचकों का सवाल है कि अगर किसी NGO का रजिस्ट्रेशन खत्म या नवीनीकृत नहीं होता, तो क्या विदेशी फंड से बनी उसकी संपत्तियों पर भी उसका नियंत्रण चला जाएगा। सरकार दूसरी तरफ इसे लंबे समय से मौजूद व्यवस्था में प्रशासनिक स्पष्टता लाने वाला कदम बता रही है।
बिल पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि इससे धार्मिक संस्थाओं, पूजा स्थलों, अस्पतालों और स्कूलों जैसी संपत्तियों पर असर पड़ सकता है। क्वात्रा ने इस आशंका को खारिज करते हुए कहा कि FCRA किसी खास धर्म या समुदाय को निशाना बनाने वाला कानून नहीं है। उनके मुताबिक, कानून सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है, चाहे वे किसी भी धर्म, समुदाय या विचारधारा से जुड़े हों। सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि धार्मिक कल्याण से जुड़ी गतिविधियां—जैसे पूजा स्थलों का रखरखाव, धार्मिक शिक्षा और अन्य सामाजिक-धार्मिक कार्य—नियमों के तहत विदेशी फंडिंग के लिए पात्र बने रह सकते हैं। प्रस्तावित व्यवस्था में पूजा स्थल से जुड़ी संपत्ति के लिए धार्मिक चरित्र बनाए रखने की बात भी कही गई है। PRS के मुताबिक, अगर किसी ऐसी संस्था का पंजीकरण खत्म होता है जिसकी संपत्ति किसी पूजा स्थल से जुड़ी है, तो प्राधिकरण को उसकी धार्मिक प्रकृति को बनाए रखने का ध्यान रखना होगा।
इसे भी पढ़ें: उत्तराखंड पहुंचे Mallikarjun Kharge का बीजेपी पर हमला, राम मंदिर चढ़ावा विवाद और छात्रों के आंदोलन पर मांगा जवाब
क्वात्रा ने उस दावे को भी खारिज किया जिसमें कहा जा रहा है कि प्रस्तावित बदलाव किसी खास धर्म या अल्पसंख्यक समुदाय को प्रभावित करने के लिए लाए जा रहे हैं। उनका कहना है कि FCRA का नियम संगठन की धार्मिक पहचान के आधार पर अलग-अलग नहीं होता। यानी हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख या किसी अन्य समुदाय से जुड़े संगठन—सभी पर कानून का ढांचा समान रूप से लागू होता है। यही वजह है कि सरकार का कहना है कि धार्मिक या सामुदायिक पहचान को आधार बनाकर बिल को देखने के बजाय विदेशी योगदान की निगरानी और उसके इस्तेमाल की पारदर्शिता के नजरिए से इसे समझना चाहिए।
बिल के समर्थन में एक और तर्क यह दिया जा रहा है कि विदेशी फंडिंग की निगरानी सिर्फ भारत की नीति नहीं है। क्वात्रा ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के उदाहरण देते हुए कहा कि इन जगहों पर भी विदेशी प्रभाव और विदेशी वित्तीय प्रवाह से जुड़े नियम मौजूद हैं या उन्हें मजबूत किया जा रहा है। उन्होंने अमेरिका के Foreign Agents Registration Act (FARA) और FATCA का उदाहरण दिया। ऑस्ट्रेलिया में 2018, कनाडा में 2024 और ब्रिटेन में 2025 में संबंधित व्यवस्थाएं लागू होने का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि विदेशी फंड और विदेशी प्रभाव को लेकर नियमन दुनिया भर में चर्चा का विषय है।
आखिर FCRA बिल है क्या?
Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को केंद्र सरकार ने 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया था। यह मौजूदा FCRA, 2010 में बदलाव का प्रस्ताव रखता है। बिल का मुख्य फोकस उन परिस्थितियों में विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियों के प्रबंधन पर है, जब किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाए, सरेंडर कर दिया जाए या उसका नवीनीकरण न हो। बिल में ‘Designated Authority’ की व्यवस्था के अलावा संपत्तियों के प्रबंधन, पंजीकरण बहाल होने की स्थिति में उनकी वापसी, अपील की व्यवस्था और कुछ दंड प्रावधानों में बदलाव जैसे प्रस्ताव भी शामिल हैं। PRS के अनुसार, बिल में FCRA उल्लंघन के लिए अधिकतम जेल की सजा को पांच साल से घटाकर एक साल करने का भी प्रस्ताव है। फिलहाल यह विधेयक संसद के विचाराधीन है। दूसरी तरफ, सरकार ने 2026 के संशोधित FCRA नियम 22 जून को अधिसूचित किए थे, जो लागू हैं।
There are many misunderstandings in the media and in civil society about the proposed Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill(FCRA), 2026.
Here is the Myth vs. Reality check.— Amb Vinay Mohan Kwatra (@AmbVMKwatra) August 10, 2026
अन्य न्यूज़













