By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Jan 19, 2026
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने रविवार को कहा कि विवेक ज्ञान से भिन्न होता है और उनका मानना है कि विवेक का आशय इस बात को जानने से है कि कानून के अक्षरशः पालन पर कब जोर देना है और कब उस उद्देश्य को समझना है जिसकी पूर्ति के लिए वह कानून बनाया गया है।
पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय न्यायिक विज्ञान विश्वविद्यालय, कोलकाता के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि ज्ञान पुस्तकों, संभवत: कक्षा और प्रशिक्षण से शीघ्रता से प्राप्त किया जा सकता है लेकिन उसके बाद जो कुछ भी होता है वह अनुभव, त्रुटि और निरंतर चिंतन के माध्यम से कहीं अधिक धीरे-धीरे, अक्सर अपूर्ण रूप से आकार लेता है। प्रधान न्यायाधीश इस विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी हैं।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘विवेक का अर्थ यह जानना है कि कब बोलना है और कब मौन रहना अधिक महत्वपूर्ण है।’’ उन्होंने चार साल के अंतराल के बाद आयोजित दीक्षांत समारोह में कहा, ‘‘यह जानना जरूरी है कि कानून के अक्षरशः पालन पर कब जोर दिया जाए और इसके पीछे के उद्देश्य को समझा जाए।’’
स्नातक और स्नातकोत्तर उत्तीर्ण छात्रों को दीक्षांत समारोह में उनकी डिग्री प्रदान की गई, जिसमें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जे. बागची तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल उपस्थित थे।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहां तुरंत राय बन जाती है और बिना इंतजार किए प्रतिक्रिया की उम्मीद की जाती है।’’ उन्होंने कहा कि ऐसी दुनिया में विवेकशीलता दुर्लभ हो गई है और इसलिए यह ‘‘अत्यंत मूल्यवान’’ है।