<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><rss xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0">
  <channel>
    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
    <link>https://www.prabhasakshi.com/</link>
    <item>
      <title><![CDATA[असम-नगालैंड के बीच दशकों का विवाद खत्म, तेल समझौता संपन्न, शाह ने पूर्वोत्तर का भाग्य ही बदल दिया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/assam-nagaland-oil-deal-and-assam-nagaland-border-dispute-analysis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही मोदी सरकार को पूर्वोत्तर से एक बड़ी रणनीतिक सफलता मिली है। केंद्र, असम और नगालैंड के बीच तेल और प्राकृतिक गैस अन्वेषण को लेकर हुआ त्रिपक्षीय समझौता भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के अभियान का निर्णायक अध्याय है। दशकों से विवाद और अस्थिरता में फंसे असम, नगालैंड सीमा क्षेत्र में तेल खोज का रास्ता खोलकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस मिशन को नई ताकत दे दी है, जिसका लक्ष्य विदेशी तेल निर्भरता घटाकर भारत को ऊर्जा महाशक्ति बनाना है। यही वजह है कि अमित शाह ने इसे विकसित पूर्वोत्तर और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में भारत सरकार, असम सरकार और नगालैंड सरकार के बीच असम-नगालैंड सीमावर्ती क्षेत्रों में खनिज तेल संचालन के संबंध में एक त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। इस मौके पर केन्द्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी, असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा और नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो सहित केंद्र, असम एवं नगालैंड सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। अमित शाह ने इसे ऐतिहासिक क्षण बताते हुए साफ कहा कि इस समझौते ने विकसित पूर्वोत्तर के रास्ते में खड़ी अंतिम बड़ी बाधा हटा दी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/india-tightens-border-security-against-bangladeshi-infiltrators" target="_blank">India Bangladesh Border पर BSF और BGB के बीच तीखी बहस, बांग्लादेश को आखिरकार वापस लेना पड़ा घुसपैठिया</a></h3><div>हम आपको बता दें कि असम और नगालैंड की सीमा से लगे विवादित क्षेत्र में तीन दशक से अधिक समय से तेल और खनिज अन्वेषण ठप पड़ा था। अधिकार क्षेत्र को लेकर दोनों राज्यों के बीच तनाव बना रहता था, जिसके कारण हजारों करोड़ रुपये की संपदा जमीन के नीचे दबी रह गई। अब इस समझौते के तहत एक हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में तेल, गैस और खनिज संसाधनों की खोज और उत्पादन का रास्ता खुल गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों राज्यों ने संसाधनों के बंटवारे पर 50-50 की सहमति बनाई है। यही वह राजनीतिक परिपक्वता है जिसने इस समझौते को टकराव से निकालकर साझेदारी के मॉडल में बदल दिया।</div><div><br></div><div>अमित शाह ने दावा किया कि इस एक समझौते से प्रतिदिन एक हजार से पंद्रह सौ बैरल तेल उत्पादन क्षमता को दस गुना तक बढ़ाया जा सकता है। केवल एक तेल क्षेत्र से पंद्रह हजार करोड़ रुपये से अधिक की संभावित प्राप्ति का अनुमान जताया गया है। यह बयान केवल आर्थिक संभावना का संकेत नहीं, बल्कि उस रणनीतिक दिशा का संकेत है जिसमें भारत तेजी से आगे बढ़ना चाहता है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, पश्चिम एशिया में अस्थिरता और ऊर्जा आपूर्ति संकटों के दौर में भारत लंबे समय से आयातित तेल पर निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे समय में पूर्वोत्तर के विशाल तेल और गैस भंडार भारत के लिए नई ऊर्जा रीढ़ साबित हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>दरअसल यह समझौता केवल तेल निकालने का मसला नहीं है। यह पूर्वोत्तर को संघर्ष की पहचान से निकालकर सामरिक और आर्थिक शक्ति केंद्र में बदलने की कवायद है। अमित शाह ने कहा कि यदि नगालैंड में फैले तेल और गैस भंडार का पूरा दोहन हुआ तो भारत विदेशी देशों पर अपनी ऊर्जा निर्भरता काफी हद तक कम कर सकेगा। इसका सीधा मतलब है कि भारत अपने ऊर्जा हितों को लेकर अधिक स्वतंत्र रणनीति अपना सकेगा। देखा जाये तो ऊर्जा आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक मुद्दा नहीं होती, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मूल तत्व बन चुकी है।</div><div><br></div><div>साथ ही इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा बड़ा पहलू सुरक्षा और शांति से जुड़ा है। अमित शाह ने पूर्वोत्तर में हिंसा की घटनाओं में लगभग अस्सी प्रतिशत गिरावट का दावा करते हुए कहा कि वर्ष 2019 के बाद 12 शांति समझौते हुए हैं। यही कारण है कि अब सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को भी पूर्वोत्तर के अधिकांश हिस्सों से हटाने की तैयारी चल रही है। अमित शाह ने विश्वास जताया कि अगले वर्ष एक या दो राज्यों को छोड़कर पूरे पूर्वोत्तर से यह कानून हटाया जा सकता है। यह बयान बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि दशकों तक पूर्वोत्तर की पहचान उग्रवाद, सैन्य उपस्थिति और अस्थिरता से जुड़ी रही है। अब केंद्र सरकार यह संदेश देना चाहती है कि क्षेत्र संघर्ष से विकास की ओर बढ़ चुका है।</div><div><br></div><div>रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह समझौता चीन और दक्षिण पूर्व एशिया से जुड़ी भारत की व्यापक नीति से भी मेल खाता है। पूर्वोत्तर भारत लंबे समय तक केवल भौगोलिक सीमा माना जाता रहा, लेकिन अब उसे आर्थिक गलियारे, ऊर्जा केंद्र और संपर्क सेतु के रूप में विकसित किया जा रहा है। सड़क, रेल, निवेश, पर्यटन और ऊर्जा परियोजनाओं के जरिए केंद्र सरकार इस क्षेत्र को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रही है। तेल और गैस परियोजनाओं के सक्रिय होने से निजी निवेश बढ़ेगा, रोजगार पैदा होंगे और क्षेत्रीय असंतोष कम होगा। यही वह बिंदु है जहां विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं।</div><div><br></div><div>असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने भी कहा कि यह समझौता देश की दीर्घकालिक ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा। वहीं नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो की सहमति इस बात का संकेत है कि अब पूर्वोत्तर की राजनीति टकराव से अधिक आर्थिक साझेदारी की दिशा में बढ़ रही है। यही कारण है कि अमित शाह ने इसे जीत हार का नहीं, बल्कि सबकी जीत का समझौता बताया।</div><div><br></div><div>बहरहाल, अब स्पष्ट है कि यह त्रिपक्षीय समझौता केवल सीमाई विवाद सुलझाने का प्रयास नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर के भविष्य को नए सिरे से परिभाषित करने की शुरुआत है। यदि सरकार अपने दावों के अनुरूप तेल उत्पादन, निवेश और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सफल रहती है, तो आने वाले वर्षों में पूर्वोत्तर भारत की ऊर्जा शक्ति, सामरिक मजबूती और आर्थिक विस्तार का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 13:36:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/assam-nagaland-oil-deal-and-assam-nagaland-border-dispute-analysis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/12/assam-nagaland-oil-deal_large_1337_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[गृहिणियां राष्ट्र निर्माता हैं, समझिए कैसे? उनके कार्यगत योगदान को कदापि कम मत आंकिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/homemakers-are-nation-builders-understand-how-never-underestimate-contribution-through-their-work]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने हाल ही में गृहिणियों के योगदान पर एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि "गृहिणियां राष्ट्र निर्माता (Nation Builders) हैं" और उनके घरेलू व देखभाल संबंधी कार्यों का वास्तविक आर्थिक मूल्य है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी प्रमुख टिप्पणियों में कहा कि गृहिणी को केवल "आश्रित" (dependent) मानना गलत है; वास्तव में पूरा परिवार उनके श्रम और देखभाल पर निर्भर रहता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>लिहाजा, महिलाओं द्वारा किया जाने वाला अवैतनिक घरेलू और देखभाल कार्य भारत की GDP में अनुमानतः 15-17% तक योगदान देता है, फिर भी उसे पर्याप्त मान्यता नहीं मिलती। वह गृहणियां ही हैं जो बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा, संस्कार और मानव संसाधन निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में प्रत्यक्ष भूमिका निभाती हैं। इसलिए अदालत ने कहा कि घरेलू कार्य को आर्थिक विश्लेषण से बाहर रखना उचित नहीं है और कानून को गृहिणियों के श्रम, सेवा और त्याग का मूल्य स्वीकार करना चाहिए। निष्कर्ष यह कि गृहिणियां राष्ट्र निर्माता हैं, इसलिए उनके कार्यगत योगदान को कम मत आंकिए।</div><div><br></div><div>देखा जाए तो एक ऐतिहासिक कदम के रूप में सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में गृहिणी के घरेलू योगदान का मूल्यांकन करते हुए कम-से-कम ₹30,000 प्रतिमाह का मानक निर्धारित किया है तथा "loss of domestic care" को अलग क्षतिपूर्ति मद के रूप में मान्यता दी है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा था कि, "गृहिणी का घर में किया गया कार्य उसके कार्यालय जाने वाले पति के काम से कम मूल्यवान नहीं है।"&nbsp;</div><div><br></div><div>इसलिए न्यायपालिका का दृष्टिकोण अब स्पष्ट रूप से यह है कि गृहिणियां केवल परिवार की देखभाल करने वाली नहीं, बल्कि आर्थिक योगदानकर्ता और राष्ट्र निर्माता हैं। चुनौती अब यह है कि सरकारें, निजी संस्थान और समाज इस न्यायिक मान्यता को सामाजिक और आर्थिक नीतियों में कितना उतारते हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि गृहिणियों का योगदान भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि उनके श्रम को अक्सर "काम" के बजाय "कर्तव्य" मान लिया जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसी कारण उनके योगदान को वह संस्थागत मान्यता नहीं मिल पाती जिसकी वे हकदार हैं। सवाल है कि गृहिणियों का आर्थिक योगदान कितना बड़ा है? तो अर्थशास्त्रियों और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार यदि घर के भीतर किए जाने वाले कार्य—जैसे भोजन बनाना, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा, घरेलू प्रबंधन, भावनात्मक देखभाल आदि—का बाजार मूल्य जोड़ा जाए, तो इसका योगदान GDP के 15% से 40% तक आंका गया है। भारत में कई अध्ययनों ने इसे लगभग 15-17% या उससे भी अधिक बताया है।</div><div><br></div><h2># सवाल है कि फिर भी उनके इन महत्वपूर्ण कार्यों को मान्यता क्यों नहीं मिलती? तो जवाब निम्नलिखित होगा:-</h2><div><br></div><div>पहला, जीडीपी की गणना का तरीका: GDP केवल उन वस्तुओं और सेवाओं को गिनता है जिनका बाजार में लेन-देन होता है। गृहिणी का श्रम घर के भीतर होता है, इसलिए वह राष्ट्रीय आय के आंकड़ों में सीधे नहीं दिखता।</div><div><br></div><div>दूसरा, ऐतिहासिक सामाजिक दृष्टिकोण: सदियों से घरेलू कार्यों को महिलाओं का "स्वाभाविक दायित्व" माना गया। जब किसी कार्य को कर्तव्य मान लिया जाता है, तो उसका आर्थिक मूल्यांकन कम हो जाता है।</div><div><br></div><div>तीसरा, श्रम का अदृश्य होना: एक गृहिणी दिनभर में दर्जनों काम करती है, लेकिन वे छोटे-छोटे हिस्सों में बंटे होते हैं। इसलिए उनका श्रम उतना दिखाई नहीं देता जितना किसी कार्यालय या फैक्ट्री में काम करने वाले व्यक्ति का।</div><div><br></div><div>चौथा, नीति निर्माण में कम प्रतिनिधित्व: सत्ता और नीति-निर्माण संस्थानों में लंबे समय तक पुरुषों का वर्चस्व रहा। परिणामस्वरूप घरेलू श्रम के आर्थिक मूल्यांकन का प्रश्न प्राथमिकता नहीं बन पाया।</div><div><br></div><div>पांचवां, वेतन और मूल्य का भ्रम: समाज अक्सर मानता है कि जिस काम के बदले वेतन नहीं मिलता, उसका आर्थिक मूल्य भी नहीं है। जबकि गृहिणी का श्रम परिवार की आय और उत्पादकता को प्रत्यक्ष रूप से बढ़ाता है।</div><div><br></div><h2># सवाल है कि निजी क्षेत्र और सरकारें क्या कर सकती हैं?</h2><div>तो अपेक्षाएं निम्नलिखित होंगीं:-</div><div><br></div><div>पहला, घरेलू श्रम का नियमित आर्थिक मूल्यांकन। दूसरा, जनगणना और राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में गृहिणी श्रम का अलग लेखा-जोखा। तीसरा, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन और बीमा योजनाओं का विस्तार। चौथा, घरेलू कार्यों को "अनपेड वर्क" के रूप में नीति दस्तावेजों में मान्यता। और पांचवां, परिवारों में घरेलू जिम्मेदारियों का अधिक समान वितरण।</div><div><br></div><h2># जानिए, राष्ट्र निर्माण में गृहिणियों की भूमिका</h2><div><br></div><div>गृहिणी केवल घर नहीं संभालती, वह भविष्य की पीढ़ी का निर्माण करती है। एक शिक्षक, डॉक्टर, सैनिक, वैज्ञानिक, उद्यमी या नेता बनने से पहले हर व्यक्ति किसी परिवार में पलता-बढ़ता है। उस प्रक्रिया में गृहिणियों का योगदान आधारशिला जैसा होता है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि गृहिणियां केवल परिवार निर्माता नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माता भी हैं। चुनौती यह है कि समाज और संस्थाएं इस योगदान को भावनात्मक सम्मान के साथ-साथ आर्थिक और नीतिगत मान्यता भी दें।</div><div><br></div><h2># भारतीय हिंदी साहित्य में उन्हें श्रद्धा व भक्ति की दृष्टि से देखा गया है</h2><div><br></div><div>"नारी तुम केवल श्रद्धा हो" — नामक कवि जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध पंक्ति भारतीय समाज में स्त्री के सम्मान का आदर्श प्रस्तुत करती है। लेकिन आज यह प्रश्न स्वाभाविक है कि केवल श्रद्धा, सम्मान और प्रशंसा के शब्दों से कब तक काम चलेगा? यदि एक ओर स्त्री को "देवी", "शक्ति", "मां" और "राष्ट्र निर्माता" कहा जाए, और दूसरी ओर उसके श्रम, अधिकारों और योगदान को उचित मान्यता न मिले, तो यह विरोधाभास ही माना जाएगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/major-supreme-court-ruling-30000-monthly-compensation-sought-for-homemakers" target="_blank">Supreme Court का बड़ा फैसला, Homemakers को 'राष्ट्र निर्माता' मानकर 30,000 रु. मासिक मुआवज़ा</a></h3><div>गृहिणियों के संदर्भ में यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है। यदि वे परिवार की आधारशिला हैं, बच्चों के माध्यम से भविष्य के नागरिकों का निर्माण करती हैं, उनका अवैतनिक श्रम अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देता है, और सर्वोच्च न्यायालय भी उन्हें "राष्ट्र निर्माता" मानता है, तो फिर केवल काव्यात्मक सम्मान पर्याप्त नहीं है। इसलिए आज आवश्यकता है कि सम्मान के साथ आर्थिक मान्यता की, प्रशंसा के साथ सामाजिक सुरक्षा की, आदर्शवाद के साथ नीतिगत बदलावों की, और प्रतीकात्मक गौरव के साथ व्यावहारिक अधिकारों की।</div><div><br></div><div>इसी भावना को आधुनिक संदर्भ में यूँ कहा जा सकता है- नारी तुम केवल श्रद्धा हो, यह कहना अब पर्याप्त नहीं, तुम श्रम हो, सृजन हो, सामर्थ्य हो, तुम्हारा मूल्यांकन भी आवश्यक है। सम्मान के शब्द मधुर हैं, पर न्याय उससे भी अधिक आवश्यक है। दरअसल, 21वीं सदी की स्त्री-विमर्श का एक बड़ा संदेश यही है कि स्त्री को केवल पूजने या महिमामंडित करने के बजाय उसके योगदान को वास्तविक अवसर, अधिकार और मान्यता दी जाए। तभी "नारी तुम केवल श्रद्धा हो" जैसी पंक्तियां अपने पूर्ण अर्थ में सार्थक होंगी।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 13:34:55 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/homemakers-are-nation-builders-understand-how-never-underestimate-contribution-through-their-work</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/12/supreme-court_large_1335_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सांसद और विधायक भाग रहे, क्या ममता बनर्जी भी TMC छोड़ कर कांग्रेस में जा रही हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/mamata-banerjee-tmc-crisis-congress-merger-bengal-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय अपने सबसे उथल पुथल भरे दौर से गुजर रही है। कभी बंगाल की निर्विवाद ताकत मानी जाने वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस अब अंदरूनी बगावत, सांसदों और विधायकों के पलायन तथा राजनीतिक अस्तित्व के संकट से जूझती दिखाई दे रही है। दिल्ली में सोनिया गांधी के साथ ममता बनर्जी और राहुल गांधी के साथ अभिषेक बनर्जी की बैठकों ने इस संकट को और अधिक राजनीतिक रंग दे दिया है। भले ही कांग्रेस और तृणमूल दोनों सार्वजनिक रूप से किसी विलय की संभावना से इंकार कर रहे हों, लेकिन घटनाक्रम यह संकेत दे रहा है कि बंगाल की राजनीति में एक बड़ा पुनर्संयोजन शुरू हो चुका है। एक तरह से यह साफ नजर आ रहा है कि सिर्फ टीएमसी के सांसद, विधायक और पार्षद ही पाला नहीं बदल रहे हैं खुद टीएमसी प्रमुख अपनी पार्टी को खत्म कर कांग्रेस में वापस लौटना चाह रही हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि दिल्ली में राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी की डेढ़ घंटे लंबी मुलाकात तथा उससे पहले सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की बैठक ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। तृणमूल कांग्रेस ने इन बैठकों को लोकतंत्र और संविधान बचाने की साझा प्रतिबद्धता बताया, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह महज औपचारिक बातचीत नहीं थी। बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद जिस तरह तृणमूल कांग्रेस कमजोर हुई है और पार्टी के भीतर टूट की स्थिति बनी है, उसके बाद कांग्रेस से नजदीकी बनाना ममता बनर्जी की राजनीतिक मजबूरी बन गई है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/hat-trick-of-resignations-in-mamata-banerjee-tmc-mp-prakash-chik-baraik-also-quits-rajya-sabha" target="_blank">Mamata Banerjee की TMC में इस्तीफों की हैट्रिक, सांसद Prakash Chik Baraik ने भी Rajya Sabha छोड़ी</a></h3><div>स्थिति यह है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर विद्रोह अब खुली चुनौती का रूप ले चुका है। पार्टी के 80 में से 58 विधायक अलग होकर निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के साथ चले गए हैं। इस गुट को विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता भी मिल चुकी है। रितब्रत बनर्जी लगातार दावा कर रहे हैं कि वही “असली तृणमूल कांग्रेस” हैं और कांग्रेस के साथ किसी भी प्रकार के विलय या समझौते के खिलाफ हैं। उनका दावा है कि उनके साथ विधायकों की संख्या लगातार बढ़ रही है और कई सांसद भी उनके संपर्क में हैं।</div><div><br></div><div>राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस के साथ संभावित विलय या अत्यधिक नजदीकी की अटकलों ने तृणमूल कांग्रेस के भीतर असुरक्षा और बेचैनी को और बढ़ा दिया है। पार्टी के कई विधायक, सांसद और क्षेत्रीय नेता अपनी पूरी राजनीतिक पहचान कांग्रेस विरोध की जमीन पर बनाकर आगे बढ़े थे। ऐसे में उन्हें यह डर सता रहा है कि यदि ममता बनर्जी अंततः कांग्रेस के साथ विलय या व्यापक राजनीतिक समझौते की राह पर चलती हैं, तो उनकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान समाप्त हो जाएगी। यही कारण है कि तृणमूल में भगदड़ और तेज होने की संभावना जताई जा रही है। पार्टी के भीतर एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो कांग्रेस में लौटने के पक्ष में नहीं है और वह या तो अलग गुट के साथ रहना चाहता है या फिर नए राजनीतिक विकल्प तलाश रहा है। यही बेचैनी अब खुले विद्रोह और लगातार इस्तीफों के रूप में सामने आती दिखाई दे रही है।</div><div><br></div><div>संकट केवल विधानसभा तक सीमित नहीं है। संसद में भी तृणमूल कांग्रेस की नींव हिलती दिख रही है। राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे ने पार्टी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। उनसे पहले सुष्मिता देव और सुखेंदु शेखर राय भी पार्टी और राज्यसभा से इस्तीफा दे चुके हैं। सुष्मिता देव की असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा से मुलाकात ने यह अटकलें और तेज कर दी हैं कि तृणमूल कांग्रेस के कई नेता अब भारतीय जनता पार्टी की ओर रुख कर सकते हैं।</div><div><br></div><div>लोकसभा में भी तृणमूल के भीतर विद्रोही खेमे की ताकत बढ़ती दिखाई दे रही है। काकोली घोष दस्तिदार के नेतृत्व वाला गुट दावा कर रहा है कि उसे बीस से अधिक सांसदों का समर्थन हासिल है। सयोनी घोष, माला राय, युसुफ पठान, शताब्दी राय, शत्रुघ्न सिन्हा और रचना बनर्जी जैसे कई चर्चित नाम विद्रोही खेमे के साथ बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह गुट राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार को समर्थन देने के लिए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिख चुका है।</div><div><br></div><div>इन घटनाओं के बीच कांग्रेस की भूमिका बेहद दिलचस्प हो गई है। बंगाल कांग्रेस के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। अधीर रंजन चौधरी और अब्दुल मन्नान जैसे वरिष्ठ नेता ममता बनर्जी के साथ किसी भी तरह की नजदीकी के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं। मन्नान ने तो यहां तक कह दिया कि “गंदे पानी को साफ पानी में मिलाने से साफ पानी भी गंदा हो जाता है।” अधीर रंजन चौधरी ने ममता पर कांग्रेस को बंगाल से खत्म करने का आरोप लगाते हुए कहा कि अब वही ममता गांधी परिवार के सहारे की तलाश में हैं।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि जो राहुल गांधी को भविष्य का प्रधानमंत्री और विपक्ष का नेता मानता है, उसका स्वागत है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के आरोपों से बचने के लिए कांग्रेस की छतरी का इस्तेमाल करने वालों के लिए दरवाजे खुले नहीं हैं। यह बयान सीधे तौर पर तृणमूल के उन नेताओं की ओर इशारा माना जा रहा है जिन पर विभिन्न घोटालों के आरोप लगे हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि ममता बनर्जी का पूरा राजनीतिक उदय ही कांग्रेस के खिलाफ विद्रोह की जमीन पर खड़ा हुआ था। वर्ष 1998 में उन्होंने जोरशोर से कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। उस समय ममता ने कांग्रेस नेतृत्व पर बंगाल की राजनीति की अनदेखी करने और वामपंथ के सामने आत्मसमर्पण करने का आरोप लगाया था। इसके बाद उन्होंने खुद को कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्थापित किया और धीरे धीरे बंगाल में कांग्रेस की जड़ें कमजोर कर दीं। वर्ष 2011 में वाम मोर्चे को सत्ता से हटाने के बाद ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक विस्तार के लिए कांग्रेस से पूरी दूरी बना ली थी और लगातार गांधी परिवार तथा कांग्रेस नेतृत्व पर तीखे हमले करती रहीं। लेकिन अब जब तृणमूल कांग्रेस भीतर से टूट रही है, सांसद और विधायक पार्टी छोड़ रहे हैं और राजनीतिक जमीन खिसकती दिखाई दे रही है, तब वही ममता बनर्जी एक बार फिर कांग्रेस की जड़ों की ओर लौटती नजर आ रही हैं। यही वजह है कि दिल्ली में गांधी परिवार के साथ उनकी बैठकों को केवल शिष्टाचार मुलाकात मानने को राजनीतिक विश्लेषक तैयार नहीं हैं।</div><div><br></div><div>दरअसल, बंगाल की राजनीति अब केवल सत्ता की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि यह अस्तित्व की जंग बन चुकी है। तृणमूल कांग्रेस संगठनात्मक बिखराव से जूझ रही है और बात सिर्फ संसद या विधानसभा में उसके सदस्यों तक सीमित नहीं रह गयी है। बंगाल में कई निगमों से उसके महापौर या पार्षद इस्तीफा दे चुके हैं और पंचायतों में भी इसी तरह के इस्तीफों का दौर जारी है। इस सबके बीच भाजपा यह स्पष्ट कर चुकी है कि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के लिए उसके दरवाजे बंद हैं वहीं कांग्रेस इस संकट को अपने पुनर्जीवन के अवसर के रूप में देख रही है। राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी एकता की राजनीति को मजबूती देने के लिए कांग्रेस बंगाल में नई संभावनाएं तलाश रही है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ राजनीतिक समझौते की राह पर चलेंगी, या फिर पार्टी के भीतर का विद्रोह उन्हें और कमजोर कर देगा। यदि तृणमूल कांग्रेस का टूटना जारी रहा तो बंगाल की राजनीति में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है। आने वाले नगर निकाय चुनाव और उपचुनाव इस बदलाव की पहली बड़ी परीक्षा साबित होंगे। फिलहाल इतना तय है कि बंगाल की राजनीति में शुरू हुई यह हलचल केवल राज्य तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि राष्ट्रीय विपक्ष की राजनीति पर भी इसका गहरा असर पड़ने वाला है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 12:46:50 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/mamata-banerjee-tmc-crisis-congress-merger-bengal-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/11/sonia-mamata_large_1246_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मोदी ने नेहरु का रिकॉर्ड तोड़ने के साथ ही कांग्रेस का घमंड भी चकनाचूर कर दिया है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/modi-becomes-indias-longest-serving-elected-pm]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>“मोदी हैं तो मुमकिन है”, यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि पिछले बारह वर्षों में भारत की बदलती राजनीतिक और प्रशासनिक तस्वीर का सबसे सशक्त प्रतीक बन चुका है। जिस उपलब्धि को दशकों तक असंभव माना जाता रहा, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संभव कर दिखाया है। 10 जून 2026 को नरेंद्र मोदी ने देश के सबसे लंबे समय तक लगातार सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बनकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा लिया। लगातार 4399 दिनों तक देश का नेतृत्व करते हुए उन्होंने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के 4398 दिनों के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो यह उपलब्धि केवल एक रिकॉर्ड टूटने भर की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में आए एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन का प्रतीक भी है। नरेंद्र मोदी ने सिर्फ नेहरू का रिकॉर्ड नहीं तोड़ा है बल्कि उस राजनीतिक सोच को भी चुनौती दी है जिसमें लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि सत्ता पर केवल एक ही परिवार या एक ही दल का स्वाभाविक अधिकार है। दशकों तक देश की राजनीति गांधी परिवार और कांग्रेस पर केंद्रित रही, लेकिन एक गरीब परिवार से निकले, संघर्षों के बीच पले-बढ़े और कभी रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी ने लोकतंत्र की ताकत के बल पर देश की सर्वोच्च सत्ता तक पहुंचकर भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/narendra-modi-12-years-a-period-of-turning-trust-into-reality" target="_blank">नरेंद्र मोदी के 12 सालः भरोसे के हकीकत में बदलने का दौर</a></h3><div>मोदी का यह सफर करोड़ों सामान्य भारतीयों के लिए प्रेरणा का विषय है। यह संदेश देता है कि लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास होती है, और जनता जब ठान ले तो वह किसी भी स्थापित राजनीतिक समीकरण को बदल सकती है। लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता संभालते हुए और सबसे लंबे कार्यकाल का रिकॉर्ड बनाकर नरेंद्र मोदी ने यह साबित कर दिया है कि मजबूत नेतृत्व, स्पष्ट विजन और जनता के भरोसे के दम पर भारतीय राजनीति में असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो मोदी ने जो रिकॉर्ड बनाया है वह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह उस जनविश्वास की कहानी है जिसने नरेंद्र मोदी को लगातार तीन बार देश की सत्ता सौंपी। आजादी के बाद केवल जवाहरलाल नेहरू ही ऐसे नेता थे जिन्होंने लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतकर सरकार बनाई थी। नरेंद्र मोदी ने भी वही करिश्मा दोहराया, लेकिन उससे आगे जाकर लोकतांत्रिक राजनीति में एक नया अध्याय लिख दिया।</div><div><br></div><div>26 मई 2014 को जब नरेंद्र मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि आने वाले वर्षों में वह भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली और निर्णायक नेता बनकर उभरेंगे। 2019 में उन्होंने पहले से भी अधिक प्रचंड जनादेश हासिल किया और दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। 2024 के चुनाव में भले भारतीय जनता पार्टी अकेले दम पर बहुमत के आंकड़े से नीचे रही, लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की चमक और प्रभाव जरा भी कम नहीं हुआ। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने फिर सत्ता संभाली और मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने।</div><div><br></div><div>दरअसल नरेंद्र मोदी का यह सफर केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में भी उन्होंने लंबे समय तक प्रशासन संभालते हुए सुशासन का एक अलग मॉडल प्रस्तुत किया। अक्टूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने 4610 दिनों तक राज्य की कमान संभाली। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में मिलाकर मोदी अब नौ हजार दिनों से अधिक समय तक किसी निर्वाचित सरकार के प्रमुख रह चुके हैं। मार्च 2026 में उन्होंने सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग का 8930 दिनों का रिकार्ड भी तोड़ दिया था और देश के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले निर्वाचित प्रमुख बन गए थे।</div><div><br></div><div>उधर, मोदी के इस ऐतिहासिक मुकाम पर केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया से उन्हें बधाइयों का सिलसिला मिला। इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने प्रधानमंत्री मोदी को शुभकामनाएं देते हुए भारत और इटली के मजबूत होते रिश्तों का उल्लेख किया। अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर ने इसे दशकों की समर्पित जनसेवा और नेतृत्व का प्रमाण बताया। अमेरिकी सीनेटर जॉन कोर्निन ने मोदी के कार्यकाल को परिवर्तनकारी बताते हुए कहा कि 140 करोड़ लोगों के विश्वास ने उन्हें यह मुकाम दिलाया है। उन्होंने यह भी कहा कि मोदी के नेतृत्व में भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना और करोड़ों लोग गरीबी से बाहर निकले।</div><div><br></div><div>मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने भी मोदी की उपलब्धि को भारत की समृद्धि, विकास और वैश्विक प्रतिष्ठा से जोड़ा। श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुर कुमार दिसानायके और केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो ने भी प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा को समर्पण, संघर्ष और जनसेवा का प्रतीक बताया। यह साफ संकेत है कि आज नरेंद्र मोदी केवल भारत के नेता नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर एक प्रभावशाली व्यक्तित्व बन चुके हैं।</div><div><br></div><div>उधर, देश के भीतर भी मोदी की इस उपलब्धि को लेकर उत्साह का माहौल है। भाजपा नेताओं ने आज देशभर के विभिन्न धर्म स्थलों में प्रार्थना कर भारत की खुशहाली और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में विकसित भारत का संकल्प पूरा होने की कामना की। केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में मंत्रियों ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की सराहना करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा, समावेशी विकास और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में मोदी सरकार की उपलब्धियों की प्रशंसा की।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की बैठक में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की जमकर तारीफ की गयी और एक अभिनंदन प्रस्ताव भी पारित किया गया। इस बैठक में 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और एनडीए के वरिष्ठ नेताओं ने हिस्सा लिया। यह बैठक सत्तारुढ़ एनडीए की ओर से शक्ति प्रदर्शन भी माना जा रहा है। बैठक में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और टीडीपी प्रमुख एन. चंद्रबाबू नायडू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अभिनंदन का प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए एनडीए नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की जमकर तारीफ की।</div><div><br></div><div>बहरहाल, नरेंद्र मोदी की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत यही रही है कि उन्होंने खुद को केवल एक नेता नहीं, बल्कि बदलाव के प्रतीक के रूप में स्थापित किया है। साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचने वाला यह सफर आज करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा बन चुका है। यही कारण है कि जब देश की राजनीति में असंभव को संभव करने की बात होती है, तब एक ही आवाज सबसे ज्यादा गूंजती है— मोदी हैं तो मुमकिन है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 18:02:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/modi-becomes-indias-longest-serving-elected-pm</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/10/pm-modi_large_1802_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[नरेंद्र मोदी के 12 सालः भरोसे के हकीकत में बदलने का दौर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/narendra-modi-12-years-a-period-of-turning-trust-into-reality]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यदि मॉनिंग कंसल्ट की माने तो दुनिया के नेताओं की सूची पर एक नजर दौड़ाई जाएं तो केई भी वैश्विक नेता स्वीकार्यता में नरेन्द्र मोदी के आसपास भी नहीं टिकते। विपक्षी पार्टियां द्वारा लगातार देश और विदेश में अभियान चलाने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रेंकिंग या स्वीकार्यता के मामलें में वैश्विक नेताओं से बहुत आगे हैं। 68 प्रतिशत स्वीकार्यता नरेन्द्र मोदी की है जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की स्वीकार्यता रेंक लगातार नेगेटिव जा रही है। फालोवर्स में भी नरेन्द्र मोदी सबसे आगे हैं। दुनिया का संभवतः हमारा ही देश होगा जहां देश के बाहर भारत की छवि खराब करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जा रही उसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह स्वीकार्यता निश्चित रुप से भारत ही नहीं दुनिया के अन्य देशों में भी उनकी लोकप्रियता और सर्वमान्यता को दर्शाती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री पद पर रहने वाले चुनिंदा प्रधानमंत्री बन गए हैं। चुनिंदा इसलिए कि देश में पहले लोकसभा चुनाव 1952 में हुए पर पं. नेहरु 1947 से 1952 तक भी प्रधानमंत्री रहे।&nbsp; लगातार 12 साल कोई कम नहीं होते और वह भी लगातार 12 साल। सबसे बडी बात यह कि इस दौरान नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा ऐसे साहसिक निर्णय किये गये हैं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। माना तो यही जाता था कि कश्मीर में धारा 370 और 35 ए हटाना, राममंदिर का निर्माण, डिजिटल क्रांति, वैश्विक नेतृत्व, नोटबंदी, एक देश एक कर, घर घर शोचालय, घर घर कचरा संग्रहण, रक्षा उपकरणों का निर्यात, किसान सम्मान, मेक इन इंडिया, इंडिया फर्स्ट, बड़ी अर्थ व्यवस्था, तेजी से ढांचागत विकास, डिजिटल भुगतान, नक्सलवाद की नेस्तनाबूदी, आत्मनिर्भर भारत, परिवहन क्षेत्र में ढांचागत बदलाव आदि आदि समय समय पर की जाने वाली घोषणाएं केवल चुनाव जीतने के जुमले हैं पर लगभग असंभव माने जाने वाले यह काम आज धरातल पर उतरना सबसे बड़ी उपलब्धी मानी जा सकती है। इससे सबके साथ ही सबसे आश्चर्य जनक बात यह है कि लाख विरोध के बावजूद विपक्ष आज हाशिये में चला गया है।</div><div>&nbsp;</div><div>कश्मीर से धारा 370 और 35 ए की समाप्ति हो चुकी है। दुनिया के किसी देश ने खुलकर इसका विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखाई। बाबरी मस्जिद के स्थान पर राममंदिर का निर्माण हो चुका है तो तीन तलाक, सीएए, यूसीसी और यहां तक कि सर्जीकल स्ट्राइक के बाद ऑपरेशन सिन्दुर तक पर दुनिया के किसी देश की भारत के खिलाफ खुलकर आवाज उठाने की हिम्मत नहीं हो पाई है। आज अर्थ व्यवस्था में जिस तेजी से बदलाव आया है और चौथी बड़ी अर्थ व्यवस्था बनने के बाद अब तीसरी बड़ी अर्थ व्यवस्था बनने की और तेजी से कदम बढ़ चुके हैं। जनधन योजना के समय जिस तरह से आलोचना का दौर चला था आज भुगतान में डिजिटलीकरण में इसकी बड़ी भूमिका तय हो चुकी है। जो लगभग असंभव माना जा सकता था वह आज डिजिटल भुगतान के माध्यम से संभव हो पाया है और पांच रु. के टमाटर का भुगतान भी सब्जीवाले तक को यूपीआई से आसानी से होने लगा है। सरकारी सामाजिक सुरक्षा योजना के भुगतान, पेंशन, अनुदान आदि आज सीधे खातों में जाने लगे हैं। यह किसी दिवा स्वप्न से कम नहीं है। आईपीसी सीपीसी में बदलाव किया जा चुका है। तो जीएसटी में लाख कमियां गिनाने के बावजूद आज समूचा देश एक देश एक कर के छाते के नीचे आ चुका है। बुनियादी ढांचें में तेजी से बदलाव आया है। आज वंदे भारत और नमो भारत ट्रेन चलने लगी है तो 33 किमी प्रतिदिन हाईवे का निर्माण हो रहा है। एक्सप्रेस हाईवे से आवागमन आसान हुआ है। आयुष्मान योजना से 50 करोड़ लोगों को जोड़ा जा चुका है तो सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता का नेटवर्क विस्तारित किया गया है। आज 98 प्रतिशत घरों से घर घर कचरा संग्रहण होने लगा है तो अब घर घर में शोचालय बन चुके हैं। कोरोना के दौरान हमारे प्रयासों को सारी दुनिया द्वारा सराहा गया यहां तक कि कोरोना के दौरान जीवन रक्षक की भूमिका में भारत ने भूमिका निभाई। किसानों की आय में बढ़ोतरी के ठोस प्रयास हुए हैं तो किसान सम्मान निधि के माध्यम से किसानों को उनका आत्मसम्मान उपलब्ध कराया गया है। एमएसपी व्यवस्था में सुधार हुए हैं तो खेती किसानी के क्षेत्र में बदलाव छाप दिखाई दे रहा है। मेक इन इंडिया और इंडिया फर्स्ट भी आज साकार होता दिखाई दे रहा है। आज हम रक्षा उपकरणों का निर्यात करने लगे हैं तो सहस्त्रबलों के आधुनिकीकरण और निर्णय की स्वतंत्रता का परिणाम है कि आज सेनाएं आत्मगौरव के साथ आगे बढ़ रही है। आज देश आत्म निर्भर भारत की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/12-years-of-transformation-development-legacy-and-global-leadership" target="_blank">परिवर्तन के 12 वर्ष: विकास, विरासत और वैश्विक नेतृत्व</a></h3><div>जहां तक कूटनीतिक स्तर पर सफलता की बात है तो भारत आज पिछलग्गू देशों में नहीं बल्कि दुनिया का नेतृत्व करने की स्थिति में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लाख प्रयासों के बावजूद भारत के खिलाफ कुछ खास कर नहीं पा रहे हैं। पाकिस्तान के पक्ष में आज तुरकिया जैसे एकाध को छोड़कर कोई देश बोलने की स्थिति में नहीं है। मालदीव को नरेन्द्र मोदी के एक फोटो ट्वीट ने सबक सीखा दिया तो दूसरे देश भी भारत की ताकत को समझने लगे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>खैर यह सब होते हुए भी नरेन्द्र मोदी सरकार के सामने अभी चुनौतियां कम नहीं हैं। रोजगार सृजन, प्रति व्यक्ति आय में अंतर, शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, जल जीवन मिशन के बावजूद पेयजल की सहज उपलब्धता, खेती की बरसात पर निर्भरता, परिसीमन आदि ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिन पर ठोस काम किया जाना है। देश में जिस तरह से पेपर लीक होने के मामले सामने आये हैं इससे युवाओं में निराशा हुई है उसे दूर करने की चुनौती सामने हैं तो स्टार्ट अप और कौशल विकास के बावजूद बेरोजगारी की दर अभी भी चिंतनीय स्तर पर है। साइबर क्राइम और गेमिंग जैसी नई चुनौतियां तो सोशल मीडिया के दुरुपयोग और अत्यधिक उपयोग के साइड इफेक्ट आदि अनेक समस्याएं समाधान चाहती है। देश आज तेजी से एक देष एक चुनाव के धरातल पर उतरने का इंतजार कर रहा है। रिन्यूवल एनर्जी पर बहुत कुछ हासिल करने के बावजूद अमेरिका ईरान युद्ध के कारण जिस तरह से तेल और एलपीजी का संकट आया है इसका भी दीर्घकालीन समाधान खोजा जाना है। हांलाकि समस्याएं अनवरत और नियमित प्रक्रिया है पर दीर्घकालीन योजनाओं से आसानी से निपटा जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस सबके बावजूद देशवासियों को नरेन्द्र मोदी के प्रति पूरा भरोसा है। यही कारण है कि विपक्ष की लाख आलोचनाओं के बावजूद नरेन्द्र मोदी की स्वीकार्यता और भरोसे व उनके आत्मविश्वास में किसी तरह की कमी नहीं आई है। सौ टके की बात कही जाएं तो नरेन्द्र मोदी की अपार उपलब्धियों के बावजूद चुनौतियां भी अपार है और सबसे अच्छी बात यह कि देशवासियों का उनपर भरोसा भी पूरा है और वैश्विक स्वीकार्यता भी सबसे अधिक है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 15:01:03 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/narendra-modi-12-years-a-period-of-turning-trust-into-reality</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/10/pm-modi_large_1501_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Great Nicobar Project के जरिये Modi ने चला बड़ा Masterstroke, Indian Ocean के बीचोंबीच होगा भारत का सबसे बड़ा सैन्य किला]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/modi-played-a-major-masterstroke-through-the-great-nicobar-project]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मोदी सरकार ने हिंद महासागर में ऐसा दांव चला है, जिसने चीन की सबसे बड़ी रणनीतिक चिंता बढ़ा दी है। ग्रेट निकोबार में बनने वाला भारत का नया सैन्य और आर्थिक हब अब दुश्मनों के लिए खुली चेतावनी बन चुका है। जिस समुद्री रास्ते से दुनिया का सबसे बड़ा तेल और व्यापार गुजरता है, वहां अब भारत अपनी ताकत का स्थायी पहरा बैठाने जा रहा है। साफ है कि मोदी सरकार हिंद महासागर में भारत को सिर्फ मजबूत नहीं, बल्कि सबसे प्रभावशाली ताकत बनाने की तैयारी में जुट चुकी है।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष जिस हरित क्षेत्र हवाई अड्डे को मंजूरी दी थी, वह अगले पांच वर्षों में तैयार होने की उम्मीद है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हवाई अड्डा भारतीय नौसेना के संचालन नियंत्रण में रहेगा। यानी यह केवल नागरिक उड़ानों का केंद्र नहीं होगा, बल्कि हिंद महासागर में भारत की सैन्य शक्ति का नया अग्रिम मोर्चा बनेगा। यह दोहरे उपयोग वाला हवाई अड्डा भारत की समुद्री निगरानी क्षमता, सैन्य पहुंच और त्वरित कार्रवाई की ताकत को कई गुना बढ़ा देगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/india-strategic-move-great-nicobar-13000-crore-airport-to-be-built-focus-on-malacca-strait" target="_blank">Great Nicobar में भारत का Strategic Move, ₹13,000 करोड़ से बनेगा Airport, Malacca Strait पर नज़र</a></h3><div>हम आपको बता दें कि ग्रेट निकोबार की यह परियोजना चार बड़े स्तंभों पर आधारित है। इनमें अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, आधुनिक नगर, ऊर्जा संयंत्र और नौसैनिक हवाई अड्डा शामिल हैं। यह पूरा ढांचा भारत को उस समुद्री क्षेत्र में स्थायी उपस्थिति देगा, जहां से दुनिया के दो तिहाई तेल व्यापार और आधा कंटेनर यातायात गुजरता है। ग्रेट निकोबार केवल चालीस किलोमीटर दूर स्थित है उस सिक्स डिग्री चैनल से, जो अदन की खाड़ी से मलक्का जलडमरूमध्य तक फैले समुद्री व्यापार मार्ग का सबसे संवेदनशील हिस्सा माना जाता है।</div><div><br></div><div>यही वह इलाका है जहां चीन लगातार अपनी घुसपैठ बढ़ा रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में कई बाहरी ताकतें आर्थिक और सैन्य दबदबा बनाने में जुटी हैं। ऐसे में मोदी सरकार का यह कदम भारत को दक्षिण पूर्वी हिंद महासागर में निर्णायक बढ़त देगा। यानि अब भारत इस पूरे क्षेत्र में सुरक्षा साझेदार और संकट के समय सबसे पहले सहायता पहुंचाने वाली ताकत के रूप में उभरेगा।</div><div><br></div><div>रक्षा सूत्रों का साफ कहना है कि यह परियोजना तीस वर्ष पहले ही पूरी हो जानी चाहिए थी, लेकिन पिछली सरकारों की सुस्ती और दूरदृष्टि की कमी के कारण भारत ने बहुमूल्य समय गंवा दिया। अब मोदी सरकार उस रणनीतिक भूल को सुधार रही है। यह परियोजना भारत को अपने सैन्य संसाधनों की तेज आवाजाही, अग्रिम रसद आपूर्ति और समुद्री निगरानी में अभूतपूर्व क्षमता देगी।</div><div><br></div><div>विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रेट निकोबार के आसपास समुद्र में विशाल हाइड्रोकार्बन भंडार भी हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह परियोजना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी ऐतिहासिक साबित होगी। यानी यह केवल सैन्य ताकत का सवाल नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता का भी बड़ा आधार बनेगी।</div><div><br></div><div>साथ ही मोदी सरकार ने उन आलोचनाओं को भी करारा जवाब दिया है, जिनमें इस परियोजना को केवल व्यावसायिक योजना बताकर बदनाम करने की कोशिश की जा रही थी। रक्षा सूत्रों ने साफ कहा है कि इसे केवल कारोबारी परियोजना कहना भौगोलिक अज्ञानता का प्रमाण है। यह परियोजना सामरिक, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भारत के भविष्य की धुरी है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी परियोजनाएं पूरी पारदर्शिता और विधिवत ठेका प्रक्रिया के तहत संचालित की जा रही हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि परियोजना के विभिन्न हिस्सों पर तेजी से काम चल रहा है। कंटेनर बंदरगाह के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। नगर परियोजना पर व्यय वित्त समिति की बैठक हो चुकी है, जबकि द्रवीकृत प्राकृतिक गैस आधारित ऊर्जा संयंत्र की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार कर ली गई है। इससे स्पष्ट है कि मोदी सरकार केवल घोषणाएं नहीं कर रही, बल्कि जमीन पर तेजी से अमल भी कर रही है।</div><div><br></div><div>इसके साथ ही पर्यावरण को लेकर उठे सवालों पर भी सरकार ने तथ्यात्मक जवाब दिया है। पर्यावरण प्रभाव आकलन के अनुसार पूरे द्वीप के केवल 166.1 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को विकास के लिए चिन्हित किया गया है, जबकि 81.74 प्रतिशत क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यान, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र, वन और जनजातीय संरक्षण क्षेत्रों के रूप में सुरक्षित रहेगा। वन क्षेत्र के उपयोग में भी आधे से अधिक हिस्से को हरित क्षेत्र के रूप में सुरक्षित रखा जाएगा, जहां पेड़ों की कटाई नहीं होगी।</div><div><br></div><div>इसके साथ ही वन्यजीवों, प्रवाल भित्तियों और मैंग्रोव संरक्षण के लिए तीस वर्षों में दो हजार दो सौ बीस करोड़ रुपये से अधिक का विशेष संरक्षण कार्यक्रम भी तैयार किया गया है। लेदरबैक कछुए, निकोबार मेगापोड और मगरमच्छों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।</div><div><br></div><div>इस तरह स्पष्ट है कि ग्रेट निकोबार परियोजना मोदी सरकार का केवल विकास अभियान नहीं, बल्कि भारत की समुद्री शक्ति का नया शंखनाद है। यह वह मास्टरस्ट्रोक है जो आने वाले दशकों में हिंद महासागर की रणनीतिक तस्वीर बदल सकता है। भारत अब अपने समुद्री हितों की रक्षा केवल तटों से नहीं करेगा, बल्कि समुद्र के बीचोंबीच अपनी निर्णायक उपस्थिति दर्ज कराएगा।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 13:00:39 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/modi-played-a-major-masterstroke-through-the-great-nicobar-project</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/9/great-nicobar-project_large_1300_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर इंडिया गठबंधन की बैठक के राजनीतिक मायने क्या हैं? समझिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/what-exactly-are-the-political-implications-of-the-india-alliance-meeting]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>विगत दो-तीन वर्षों में कांग्रेस की सियासी विसात पर अपना अपना-सबकुछ लुटा-पिटा देने के बाद इंडिया (INDIA) गठबंधन के सहयोगियों की जो "नई दिल्ली बैठक" हुई, उसके राजनीतिक मायने कांग्रेस के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुए। क्योंकि इस बैठक में पहली बार नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की आवाज ध्यान से सुनी गई और उनके नेतृत्व को तथा उनकी पार्टी को गाहे-बगाहे चुनौती देने वाले क्षेत्रीय दलों के सुरमा भोपाली नेता दबी जुबान में अपनी भावना प्रकट करने को अभिशप्त हुए। खासकर नेशनल कांफ्रेंस के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, सपा प्रमुख अखिलेश यादव को छोड़कर।</div><div><br></div><div>इसलिए यह बैठक केवल एक नियमित विपक्षी बैठक तक सीमित नहीं रही, क्योंकि यह बैठक ऐसे समय हुई, जब कई सहयोगी दलों और कांग्रेस के बीच मतभेदों की बढ़ती-घटती खबरें सामने आई थीं, इसलिए इसके संदेश पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। मिली जानकारी के अनुसार, 8 जून को इंडिया (INDIA) गठबंधन की बैठक में लगभग 23 दलों के राजनेता शामिल हुए। बैठक में विपक्षी दलों ने अपनी एकजुटता दिखाने और आगे की राजनीतिक रणनीति पर चर्चा की। प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार, बैठक में लगभग 23 विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।जिनमें मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, सुप्रिया सुले के अलावा प्रमुख वामपंथी दलों के अनेक नेता उपस्थित रहे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/former-pm-hd-deve-gowda-wrote-an-article-explaining-the-secret-of-pm-modi-success" target="_blank">पूर्व प्रधानमंत्री HD Deve Gowda ने आलेख लिख कर बताया PM Modi की सफलता का राज, नेहरू और मोदी की तुलना करते हुए कह गये बड़ी बात</a></h3><div>कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार की नीतियों, विदेश नीति और मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। जबकि विपक्षी दलों ने संसद और सड़क दोनों स्तरों पर समन्वित आंदोलन चलाने तथा राष्ट्रीय मुद्दों पर साझा रुख अपनाने पर चर्चा की। साथ ही, 2029 लोकसभा चुनाव की तैयारी, विपक्षी एकता और गठबंधन के भविष्य की दिशा भी बैठक के एजेंडे में शामिल रही।&nbsp;</div><div><br></div><div>बैठक के दौरान मतदाता सूची पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवाल पर मंथन हुआ। फिर केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ संयुक्त रणनीति बनाई गई और संसद में विपक्षी दलों के बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया। इसके अलावा, विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों के बीच तालमेल और राजनीतिक सहयोग होने की पुष्टि की गई।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं, इस बैठक की कतिपय चुनौतियां भी सामने आईं, क्योंकि जहां तमिलनाडु में सत्ता से बेदखल हुई DMK ने कांग्रेस से नाराजगी होने के चलते इस बैठक से दूरी बनाई, जिससे गठबंधन के भीतर मतभेदों की चर्चा तेज रही। वहीं, आप के सुप्रीमो अरबिंद केजरीवाल की अनुपस्थिति भी चर्चा में रही। जबकि कुछ अन्य सहयोगी दलों की भूमिका और भागीदारी को लेकर भी सवाल बने रहे।</div><div><br></div><div>जहां तक इंडिया गठबंधन की इस बहुप्रतीक्षित बैठक के राजनीतिक मायने की बात है तो यह बैठक लोकसभा चुनाव 2024 के बाद विपक्ष की सबसे महत्वपूर्ण गैर-संसदीय बैठकों में से एक मानी जा रही है। जिसके माध्यम से विपक्ष ने संदेश देने की कोशिश की कि मतभेदों के बावजूद भाजपा के खिलाफ साझा मंच अभी कायम है। वहीं, भाजपा ने DMK की अनुपस्थिति और अन्य अंतर्विरोधों को लेकर गठबंधन की एकता पर सवाल उठाए हैं। इस बैठक के सबसे बड़े राजनीतिक निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:-&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, INDIA गठबंधन अभी समाप्त नहीं हुआ है: सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि तमाम मतभेदों, चुनावी झटकों और सहयोगी दलों की नाराज़गी के बावजूद विपक्षी दलों ने एक साझा मंच बनाए रखने का निर्णय लिया। 23 दलों की भागीदारी ने कांग्रेस को यह कहने का अवसर दिया कि गठबंधन अभी भी प्रासंगिक है। दूसरा, 2029 की तैयारी अभी से शुरू हो गई: बैठक का प्रमुख उद्देश्य केवल वर्तमान राजनीतिक मुद्दों पर प्रतिक्रिया देना नहीं था, बल्कि 2029 लोकसभा चुनाव के लिए दीर्घकालिक रणनीति तैयार करना भी था। विपक्ष भाजपा के विरुद्ध एक व्यापक राष्ट्रीय नैरेटिव गढ़ने की कोशिश में दिखा।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा, कांग्रेस फिर से समन्वयक की भूमिका में: बैठक से यह संकेत मिला कि कांग्रेस गठबंधन की धुरी बनी रहना चाहती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने विपक्षी एकता पर जोर दिया और केंद्र सरकार के विरुद्ध साझा संघर्ष का आह्वान किया। चौथा, गठबंधन की कमजोरी भी उजागर हुई: M. K. Stalin की DMK और Arvind Kejriwal की AAP का बैठक से दूर रहना बताता है कि विपक्षी एकता अभी भी कई अंतर्विरोधों से घिरी हुई है।&nbsp;</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि इस बैठक का बिहार की राजनीति पर प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि राजद नेता तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय मंच मिला। बैठक में Tejashwi Yadav की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि वे केवल बिहार तक सीमित नेता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विपक्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। वहीं, बिहार चुनाव में विपक्षी एकता का संदेशभी गया। ऐसे में यदि कांग्रेस, राजद और वाम दल तालमेल बनाए रखते हैं तो बिहार में NDA के खिलाफ विपक्षी चुनौती अपेक्षाकृत मजबूत रह सकती है।</div><div><br></div><div>वहीं, जाति और सामाजिक न्याय की राजनीति को भी बल मिला। क्योंकि राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पिछले कुछ समय से सामाजिक न्याय, जातीय गणना और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को साथ उठाते रहे हैं। बैठक से संकेत मिला कि यह विपक्ष का प्रमुख राजनीतिक एजेंडा बना रह सकता है। जहां तक 2029 के लोकसभा चुनाव पर संभावित प्रभाव की बात है तो इसका सकारात्मक पक्ष यह रहा कि भाजपा के विरुद्ध एक साझा राष्ट्रीय मंच बना रहता है। वहीं, संसदीय मुद्दों पर समन्वय बढ़ सकता है। साथ ही क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच संवाद कायम रहने की संभावना बनी रहती है। वहीं, जहां तक चुनौतियों की बात है तो सीट बंटवारा सबसे बड़ी समस्या रहेगा। क्योंकि कई राज्यों में सहयोगी दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं। वहीं, DMK और AAP जैसी पार्टियों की दूरी गठबंधन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश यह रहा कि INDIA गठबंधन ने अपने अस्तित्व और प्रासंगिकता का प्रदर्शन करने की कोशिश की। लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ कि विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपने भीतर की एकता बनाए रखना है। बिहार में इसका तात्कालिक लाभ महागठबंधन को मिल सकता है, जबकि 2029 के लिए यह बैठक विपक्षी पुनर्गठन की शुरुआत मानी जा सकती है—हालांकि सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सहयोगी दल भविष्य में अपने मतभेद कितनी प्रभावी ढंग से सुलझा पाते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 12:53:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/what-exactly-are-the-political-implications-of-the-india-alliance-meeting</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/9/india-alliance_large_1253_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[लोकतंत्र का व्यंग्य या लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर संकट?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/an-irony-of-democracy-or-a-crisis-of-democratic-norms]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह केवल मतदान की व्यवस्था नहीं, बल्कि संवाद, सहमति, असहमति, संवैधानिक मर्यादाओं और सामाजिक उत्तरदायित्वों का एक सशक्त तंत्र है। लोकतंत्र की शक्ति विरोध में निहित है, लेकिन उसकी गरिमा विरोध की शैली, उद्देश्य और मर्यादा से निर्धारित होती है। हाल के दिनों में चर्चित हुई तथाकथित ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) इसी संदर्भ में गंभीर विमर्श की मांग करती है। यह आंदोलन प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेषकर नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के विरोध के नाम पर उभरा। प्रारम्भ में यह सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक अभियान के रूप में सामने आया और बाद में दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंच गया। इसके समर्थकों ने इसे युवाओं के आक्रोश की अभिव्यक्ति बताया, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह वास्तव में शिक्षा सुधार का आंदोलन है या लोकतांत्रिक असंतोष को व्यंग्य, उपहास और राजनीतिक धु्रवीकरण की दिशा में मोड़ने वाला एक नया प्रयोग?</div><div><br></div><div>भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है। किंतु कोई भी अधिकार निरंकुश नहीं होता। लोकतंत्र में विरोध का उद्देश्य समाधान की खोज होना चाहिए, न कि अराजकता का विस्तार। यदि विरोध का स्वर केवल उपहास, आक्रोश और टकराव तक सीमित रह जाए, तो वह लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय कमजोर करने लगता है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का नाम ही एक नकारात्मक और व्यंग्यात्मक मानसिकता का परिचायक है। किसी राजनीतिक दल की नकल करते हुए स्वयं को “कॉकरोच” के प्रतीक से जोड़ना लोकतांत्रिक विमर्श को गंभीरता से अधिक तमाशे में बदलने का प्रयास प्रतीत होता है। लोकतंत्र में व्यंग्य का स्थान है, लेकिन व्यंग्य यदि विचार का स्थान ले ले, तो वह जनमत को भ्रमित भी कर सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/important-questions-arising-from-the-cockroach-janata-party-protest-at-jantar-mantar" target="_blank">'कॉकरोच जनता पार्टी' के जंतर-मंतर प्रदर्शन से उपजते महत्वपूर्ण सवाल!</a></h3><div>किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन उसकी मांगों और कार्यप्रणाली से किया जाता है। सीजेपी की प्रमुख मांगें हैं-परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, पेपर लीक की रोकथाम, शिक्षा मंत्री का इस्तीफा तथा युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना। इनमें से अधिकांश मांगें ऐसी हैं जिन पर देश का हर जिम्मेदार नागरिक सहमत हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन मांगों को मनवाने का तरीका भी उतना ही जिम्मेदार है? क्या कॉकरोच के मुखौटे पहनना, राजनीतिक व्यंग्य को आंदोलन का आधार बनाना और सोशल मीडिया पर उत्तेजक अभियानों को बढ़ावा देना शिक्षा सुधार का व्यावहारिक मार्ग है? क्या इससे सरकार, विशेषज्ञों और समाज के बीच सार्थक संवाद स्थापित होगा? इतिहास बताता है कि स्थायी परिवर्तन नारेबाजी से नहीं, बल्कि वैचारिक स्पष्टता, संगठनात्मक अनुशासन और रचनात्मक दबाव से आते हैं।</div><div><br></div><div>भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। लेकिन यही शक्ति यदि निराशा, बेरोजगारी और असंतोष से घिर जाए तो विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के लिए उपयोग का साधन भी बन सकती है। आज देश का युवा प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और भविष्य को लेकर चिंतित है। यह चिंता वास्तविक है। लेकिन हर वास्तविक चिंता के साथ एक खतरा भी जुड़ा होता है-उसका राजनीतिक दोहन। जब किसी आंदोलन के पीछे विभिन्न राजनीतिक समूहों, सत्ता-विरोधी संगठनों और वैचारिक एजेंडों की उपस्थिति दिखाई देने लगे, तब यह आशंका स्वाभाविक हो जाती है कि कहीं युवाओं की पीड़ा को राजनीतिक हथियार तो नहीं बनाया जा रहा। यदि छात्र आंदोलन शिक्षा सुधार की जगह सरकार-विरोधी अभियान में बदल जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान स्वयं छात्रों का होता है। युवाओं को यह समझना होगा कि वे किसी राजनीतिक प्रयोगशाला के उपकरण नहीं हैं। उनकी ऊर्जा राष्ट्र निर्माण के लिए है, किसी छिपे हुए राजनीतिक एजेंडे के लिए नहीं।</div><div><br></div><div>सीजेपी के समर्थकों द्वारा कभी-कभी नेपाल, बांग्लादेश अथवा अन्य देशों में हुए युवा आंदोलनों का उल्लेख किया जाता है। ऐसी तुलना न केवल जल्दबाजी है बल्कि भ्रामक भी हो सकती है। भारत की लोकतांत्रिक संरचना, संस्थागत शक्ति, न्यायिक व्यवस्था, मीडिया की स्वतंत्रता और संवैधानिक ढांचा पड़ोसी देशों से भिन्न है। जिन परिस्थितियों में अन्य देशों में जनआंदोलन उभरे, वे परिस्थितियां भारत में मौजूद नहीं हैं। भारत में चुनावी परिवर्तन की सशक्त व्यवस्था है। यहां सरकारें जनमत से बनती और बदलती हैं। इसलिए भारत के युवाओं को विदेशी या पड़ोसी देशों के आंदोलनों की भावनात्मक तुलना के बजाय भारतीय लोकतंत्र की विशेषताओं को समझना चाहिए। हर देश की राजनीतिक परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए विदेशी उदाहरणों के आधार पर भारत में असंतोष को भड़काना न तो बौद्धिक रूप से उचित है और न ही राष्ट्रीय हित में।</div><div><br></div><div>आज सोशल मीडिया किसी भी विचार को कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोकप्रियता और वैधता एक जैसी चीजें नहीं हैं। कई बार कोई विचार ट्रेंड तो बन जाता है, लेकिन उसके पास न स्पष्ट दृष्टि होती है, न कोई रचनात्मक कार्यक्रम और न कोई उत्तरदायित्व। सोशल मीडिया पर वायरल होना लोकतांत्रिक स्वीकृति का प्रमाण नहीं है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का तेजी से लोकप्रिय होना इस बात का संकेत अवश्य है कि युवाओं में असंतोष है, लेकिन यह इस बात का प्रमाण नहीं कि आंदोलन का मार्ग सही है। लोकतंत्र में ट्रेंडिंग हैशटैग से अधिक महत्व तथ्यों, नीति और संस्थागत संवाद का होता है। यदि राजनीति केवल मीम, व्यंग्य और डिजिटल आक्रोश तक सीमित हो जाए तो लोकतंत्र धीरे-धीरे विचारशील नागरिकता से हटकर भीड़तंत्र में बदल सकता है।</div><div>भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का संकल्प लिया है। यह लक्ष्य केवल आर्थिक विकास का नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता, संस्थागत विश्वास और राष्ट्रीय एकता का भी है। यदि युवा शक्ति का बड़ा हिस्सा निरंतर अविश्वास, नकारात्मकता और टकराव की राजनीति की ओर आकर्षित होता है, तो यह लक्ष्य प्रभावित हो सकता है। विकास के लिए केवल आलोचना नहीं, बल्कि सहभागिता भी आवश्यक है। युवाओं को सरकार से प्रश्न पूछने चाहिए, लेकिन साथ ही समाधान भी प्रस्तुत करने चाहिए। उन्हें जवाबदेही मांगनी चाहिए, लेकिन संस्थाओं के प्रति सम्मान भी बनाए रखना चाहिए। लोकतंत्र की सफलता विरोध और सहयोग के संतुलन में निहित है। इस पूरे प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पक्ष उन राजनीतिक दलों और नेताओं की भूमिका है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऐसे आंदोलनों को समर्थन देते दिखाई देते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>यदि कोई राजनीतिक दल वास्तव में शिक्षा सुधार चाहता है तो उसे संसद, विधानसभाओं और नीति मंचों पर ठोस प्रस्ताव रखने चाहिए। लेकिन यदि छात्र असंतोष को केवल सरकार को घेरने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, तो यह लोकतंत्र और युवाओं दोनों के साथ अन्याय है। राजनीतिक दलों को स्पष्ट करना चाहिए कि वे शिक्षा सुधार के लिए क्या ठोस कार्यक्रम रखते हैं। केवल विरोध का समर्थन करना पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र में जिम्मेदार विपक्ष का दायित्व विकल्प प्रस्तुत करना भी होता है। परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, पेपर लीक पर कठोर दंड, रोजगार सृजन, शिक्षा की गुणवत्ता और युवाओं के लिए अवसरों का विस्तार-ये सभी वास्तविक और महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। लेकिन इनका समाधान व्यंग्यात्मक राजनीति या प्रतीकात्मक आक्रोश में नहीं है। समाधान सरकार, न्यायपालिका, शिक्षाविदों, विशेषज्ञों, छात्र संगठनों और समाज के बीच निरंतर संवाद में है। आवश्यकता इस बात की है कि युवाओं के असंतोष को रचनात्मक ऊर्जा में बदला जाए। भारत का लोकतंत्र विरोध को स्वीकार करता है, लेकिन वह विरोध तभी सार्थक होता है जब वह व्यवस्था को तोड़ने के बजाय सुधारने की दिशा में आगे बढ़े।</div><div><br></div><div>‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसी प्रवृत्तियां पहली दृष्टि में लोकतांत्रिक व्यंग्य और युवा असंतोष की अभिव्यक्ति लग सकती हैं, लेकिन इनके दूरगामी प्रभावों की गंभीर समीक्षा आवश्यक है। यदि राजनीति उपहास, प्रतीकात्मक आक्रोश और डिजिटल उत्तेजना तक सीमित हो जाएगी, तो लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता प्रभावित होगी। भारत को आज ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो प्रश्न भी पूछें और समाधान भी खोजें। जो विरोध भी करें और राष्ट्र निर्माण में भागीदारी भी निभाएं। लोकतंत्र की शक्ति संघर्ष में नहीं-संवाद में है, विभाजन में नहीं-समन्वय में है और तात्कालिक उत्तेजना में नहीं-दीर्घकालिक राष्ट्रहित में है। इसलिए समय की मांग है कि युवा, राजनीतिक दल और समाज सभी मिलकर यह विचार करें कि क्या ‘कॉकरोच राजनीति’ वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करेगी, या फिर वह भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति, राजनीतिक मर्यादाओं और विकसित भारत-2047 के राष्ट्रीय संकल्प के सामने एक नई चुनौती बनकर उभरेगी। यही प्रश्न आज सबसे अधिक प्रासंगिक है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 12:43:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/an-irony-of-democracy-or-a-crisis-of-democratic-norms</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/9/cockroach-janata-party_large_1243_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[दिल्ली अग्निकाडों के हादसों की राजधानी बनी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/delhi-has-become-the-capital-of-fire-tragedies]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली की होटल में हुए अग्निकाड में मारे गए 21 लोगों की मौत से यह एक बार फिर साबित हो गया है कि देश में आम आदमी की जिन्दगी किसी भी सुरक्षित नहीं है। सरकारी की सुरक्षा जिम्मेदारी सिर्फ दिखावटी है। नागरिकों की सुरक्षा भ्रष्टाचार और मिलीभगत की भेट चढ़ रही है। सरकारें ऐसे हादसों से कभी सबक नही लेती। यही वजह हादसे दर हादसे होते चले जाते हैं और सरकारें सिर्फ लीपापोती करने में जुटी रहती हैं। दरअसल ऐसे हादसों में लापरवाही और भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार अफसरों को जब तक जेल भेज जाने का कानून नहीं बनेगा, हादसों की पुनरावृत्ति होती रहेगी।</div><div><br></div><div>दिल्ली के मालवीय नगर स्थित होटल फ्लोरिश स्टेज में भीषण आग लगने से 21 लोगों की मौत हो गई। मरने वाले 21 लोगों में बांग्लादेश-अफ्रीकी देशों के नागरिक भी शामिल हैं। मतलब यहां देश के लोग तो सुरक्षित हैं ही नहीं, विदेशी भी सुरक्षित नहीं हैं। होटल से दमकलकर्मियों ने कुल 37 लोगों को बाहर निकाला। वहीं 12 लोगों ने खिड़की से नीचे कूदकर अपनी जान बचाई।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/how-exactly-can-tragedies-like-the-malviya-nagar-hotel-fire-be-prevented-and-who-is-responsible" target="_blank">आखिर कैसे रूकेंगे मालवीय नगर होटल अग्निकांड जैसे हादसे, जिम्मेदार कौन?</a></h3><div>आश्चर्य यह है कि दिल्ली में केंद्र सरकार और राज्य की सरकार भाजपा की है। चुनाव जीतने के लिए भाजपा भ्रष्टाचार और डबल इंजिन से तेजी से विकास का दावा करती रही। ऐसे हादसे बताते हैं कि सरकार का एक भी इंजिन सही तरीके से काम नहीं कर रहा है। भाजपा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर शराब घोटालों में शामिल होने का आरोप लगाया था। केजरीवाल को न सिर्फ जेल जाना पड़ा बल्कि उनकी पार्टी आप दिल्ली विधानसभा का चुनाव भाजपा के हाथों हार गई। अदालत ने केजरीवाल को बरी कर दिया। तत्कालीन केजरीवाल सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप दिल्ली में सत्ता हासिल करने में भाजपा के लिए बड़ा कारण साबित हुआ। अदालत के इस फैसले से पहले हुए दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भाजपा बहुमत में आ गई।</div><div><br></div><div>दिल्ली की जिस होटल में यह भयानक हादसा हुआ, उसके पास बिल्डिंग की फायर सुरक्षा का अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं था।होटल में 25 कमरे हैं। दिल्ली के दमकल विभाग के मुताबिक बिल्डिंग में बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर के अलावा पांच मंजिलें हैं। इस पूरी बिल्डिंग में सिर्फ एक सीढ़ी और एक एलिवेटर मौजूद है। बिल्डिंग पूरी तरह से सील थी और इसमें वेंटिलेशन का कोई इंतजाम नहीं था। बाथरूम की खिड़कियों सहित सभी खिड़कियां पूरी तरह से बंद थीं। आग लगने पर ऐसी बिल्डिंग एक चिमनी की तरह काम करती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह हालत दिल्ली और राष्ट्र्रीय राजधानी परियोजना क्षेत्र के सैकड़ों होटलों और व्यवसायिक संस्थानों की है। इन संस्थानों के पास अग्नि दुर्घटनाओं से बचाव के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। इस खामी की जांच होती भी है तो मिलीभगत के कारण अफसर आंखे बंद कर लेते हैं। यही वजह है दिल्ली और आस—पास के क्षेत्रों में लगातार ऐसे अग्निकाडों की पुनरावृति हो रही है। ऐसे हादसों में लोग जल कर या दम घुटने से मर रहे हैं, किन्तु सरकारों ने बचाव के ठोस इंतजाम आज तक नहीं किए हैं।</div><div><br></div><div>यह होटल दिल्ली सरकार की बेड एंड ब्रेक फास्ट (बीएनबी) स्कीम के तहत चल रहा था। यह योजना केंद्र सरकार की है, जिसे राष्ट्रमंडल खेल के दौरान वर्ष 2010 में लागू किया गया था। उसके तहत छह कमरों को बीएनबी में स्वीकृति थी। उसे अग्निशमन, एमसीडी या पुलिस से मंजूरी की आवश्यकता नहीं है। दिल्ली में ऐसे 1000 से अधिक प्रतिष्ठानों में बीएनबी है। सवाल यही है कि क्या सरकारी योजना से चलने वाली ये होटलें—गेस्टहाउस क्या अग्नि दुर्घटनाओं के लिहाज से सुरक्षित हैं। इसका पुख्ता जवाब दिल्ली भाजपा सरकार और प्रशासन के पास नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><div>देश की राजधानी दिल्ली आग के गोले पर बैठी है। पिछले 6 महीनों में दिल्ली में आग की अलग-अलग घटनाओं में 66 लोगों की मौत हो चुकी है। 3 मई 2026 को विवेक विहार में एक एसी में विस्फोट के बाद चार मंजिला इमारत में आग लग गई। इस हादसे में 9 लोगों की मौत हो गई। 18 मार्च 2026 को पालम में पांच मंजिला इमारत में लगी आग ने 9 लोगों की जान ले ली। इसी तरह 14 मार्च 2024 को शाहदरा की एक इमारत में आग लगने से 4 लोगों की मौत हुई। 15 फरवरी 2024 को अलीपुर फैक्ट्री क्षेत्र में स्थित एक पेंट फैक्ट्री में भीषण आग से 11 लोगों की मौत हो गई थी। 13 मई 2022 को पश्चिमी दिल्ली के मुंडका में चार मंजिला व्यावसायिक इमारत में लगी आग में 27 लोगों की मौत हुई थी।</div><div><br></div><div>दिल्ली में अग्नि दुर्घटानाओं की पुनरावृत्ति जारी है। 12 फरवरी 2019 को करोल बाग स्थित होटल अर्पित पैलेस में आग लगने से 17 लोगों की जान चली गई थी। 8 दिसंबर 2019 को रानी झांसी रोड पर पेपर फैक्ट्री में लगी भीषण आग में 45 लोगों की मौत हो गई थी। 31 मई 1999 को दिल्ली के लाल कुंआ क्षेत्र स्थित रासायनिक बाजार में लगी आग में 57 लोगों की मौत हुई थी जबकि 27 लोग घायल हुए थे। इसी क्रम में 13 जून 1997 ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में लगी आग में 59 लोगों की मौत हुई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे।</div><div><br></div><div>दिल्ली की 80 प्रतिशत इमारतें भी आग से सुरक्षित नहीं हैं। दिल्ली में फायर सेफ्टी कानून है। ये कानून 1983 में आया था, जिसमें 15 मीटर से ऊंची इमारतों के लिए कानून बनाया गया था। लेकिन लोगों ने इस कानून का तोड़ निकालते हुए फायर सेफ्टी के दायरे में आने से बचने के लिए साढ़े 14 मीटर या 14.9 मीटर ऊंची इमारतें बनाने लगे। सिर्फ 25 हजार के करीब ही ऐसी इमारतें होंगी, जिसमे स्ट्रक्चर के लिहाज से फायर सेफ्टी के उपाय किए गए हैं और फायर एनओसी मिली हुई है।</div><div><br></div><div>दिल्ली फायर सर्विसेज ने साल 2025 में मार्च से अप्रैल के बीच 37 सरकारी अस्पतालों का फायर सेफ्टी और स्ट्रक्चरल इंटीग्रिटी यानी ढांचागत मजबूती का जायजा लिया। इनमें से नौ अस्पतालों में फायर क्लीयरेंस की मंजूरी नहीं थी। दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में 15 जून 2023 को एक कोचिंग सेंटर में आग से 60 से अधिक छात्र हुए थे। इस घटना पर हाई कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए दिल्ली के कोचिंग सेंटरों में अग्नि सुरक्षा को लेकर दिल्ली अग्निशमन विभाग से ऑडिट रिपोर्ट मांगी थी।</div><div><br></div><div>हाइकोर्ट के निर्देश पर अग्निशमन विभाग ने दिल्ली के पांच जगहों मुखर्जी नगर, करोलबाग, लक्ष्मी नगर, जनकपुरी, कालू सराय और साउथ एक्सटेंशन में 383 इमारतों का सर्वे किया, जिनमें कोचिंग सेंटर संचालित हो रहे हैं। सर्वे में पाया गया अधिकतर इमारतें अग्नि सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक हैं। अधिकतर इमारतों में अग्नि सुरक्षा के उपकरण तो थे, लेकिन उनकी स्थिति ऐसी नहीं थी कि आपात स्थिति में उसका इस्तेमाल किया जा सके।</div><div><br></div><div>सरकारों और राजनीतिक दलों के नेता ऐसे हादसों के बाद सिर्फ घडियालू आंसू बहाते हैं। ऐसे हादसों के बाद सरकार मुआवजा और जांच की घोषणा करके अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेती है। भविष्य में ऐसे हादसों नहीं हो, इसका पुख्ता इंतजाम कभी नहीं किया जाता। यह हालत देश की राजधानी दिल्ली की है। ऐसी दुर्घटनाओं के लिहाज से देश के बाकी हिस्सों में सुरक्षा इंतजामों का अंदाजा लगाया जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दिल्ली में अब तक हुए अग्निकांडों में सैकड़ों लोगों की मौत के बावजूद एक भी वरिष्ठ अधिकारी को सीधे जिम्मेदार मानते हुए जेल नहीं भेजा गया। कारण साफ है कि सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो, जितने भी कानून आज तक बनाए गए हैं, उनमें ऐसा कोई कानून नहीं बना है कि जिम्मेदारी नहीं निभाने पर अफसरों को जेल जाना पड़ेगा। यही वजह है कि अग्नि से सुरक्षा हो या ऐसे ही दूसरे क्षेत्रों में सुरक्षा मानक हो, ऐसे कानूनों की धज्जियां उड़ती रहती हैं और अफसर और नेता तमाशबीन बने रहते हैं। जब तक इस तरह के हादसों के लिए सीधे अफसरों को जिम्मेदार ठहराते हुए जेल की हवा नहीं खिलाई जाएगी, तब ऐसे हादसे होते रहेंगे।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 18:13:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/delhi-has-become-the-capital-of-fire-tragedies</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/8/malviya-nagar-hotel-fire_large_1813_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर आर्थिक सुनामी के राजनीतिक व आर्थिक मायने मायने क्या हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/after-all-what-are-the-political-and-economic-implications-of-the-economic-tsunami]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राहुल गांधी की "आर्थिक सुनामी" वाली चेतावनी को फिलहाल एक राजनीतिक चेतावनी और आर्थिक जोखिमों पर विपक्षी आक्रमण के रूप में देखा जाना चाहिए। क्योंकि उनका यह कहना कि भारत निश्चित रूप से आर्थिक सुनामी की ओर बढ़ रहा है, अभी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जल्दबाजी होगी। हालांकि वैश्विक परिस्थितियों और घरेलू आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए इस बहस को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।&nbsp;</div><div><br></div><div>आर्थिक मामलों के जानकार बताते हैं कि भारत में वास्तव में "आर्थिक सुनामी" आएगी या नहीं, इसका कोई निश्चित उत्तर अभी नहीं दिया जा सकता। लेकिन विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा हाल में दी गई चेतावनी ने आर्थिक और राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। क्योंकि राहुल गांधी का तर्क है कि वैश्विक संकट, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, महंगाई, ईंधन कीमतों और आर्थिक असमानता के कारण भारत एक बड़े आर्थिक झटके की ओर बढ़ सकता है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था के पास पर्याप्त "शॉक एब्जॉर्बर" हैं—विदेशी मुद्रा भंडार, नियंत्रित महंगाई, खाद्यान्न भंडार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और मजबूत कर-संग्रह जैसी व्यवस्थाएं—जो बाहरी संकटों का सामना करने में सक्षम हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2># सवाल है कि क्या सचमुच आर्थिक संकट का खतरा है?</h2><div><br></div><div>भारत के सामने कुछ वास्तविक चुनौतियाँ हैं: जैसे वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि की आशंका। निर्यात और निवेश पर अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर। रोजगार सृजन की चुनौती। और कृषि और एमएसएमई क्षेत्र पर दबाव। लेकिन साथ ही भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है, और कई आर्थिक संकेतक अभी व्यापक संकट की पुष्टि नहीं करते।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/after-pakistan-turkey-is-now-building-defence-ties-with-bangladesh" target="_blank">पाकिस्तान के बाद अब बांग्लादेश से रक्षा संबंध बना रहा तुर्किये, भारत को दो तरफ से घेरने की रणनीति!</a></h3><div>जानकार बताते हैं कि आर्थिक सुनामी कोई औपचारिक आर्थिक शब्द नहीं है, बल्कि ऐसी स्थिति को बताने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जब अर्थव्यवस्था को अचानक और व्यापक झटका लगे तथा उसके प्रभाव दूरगामी हों। इसके कुछ संकेत हो सकते हैं- जीडीपी वृद्धि दर में तेज गिरावट। बड़े पैमाने पर बेरोजगारी। बैंकिंग या वित्तीय संकट। शेयर बाजार में भारी गिरावट। मुद्रा पर दबाव और महंगाई का बढ़ना। निवेश और उपभोग में तीव्र कमी। इतिहास में Great Depression (1930 का दशक) और Global Financial Crisis (2008) जैसी घटनाओं को आर्थिक सुनामी के उदाहरण माना जा सकता है।</div><div><br></div><h2>सवाल है कि क्या भारत में पीएम मोदी के रहते यह आ सकती है?</h2><div><br></div><div>किसी भी सरकार या प्रधानमंत्री के रहते हुए आर्थिक संकट की संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। अर्थव्यवस्था अनेक घरेलू और वैश्विक कारकों से प्रभावित होती है, जैसे—वैश्विक मंदी या वित्तीय संकट। तेल की कीमतों में असाधारण वृद्धि। बड़े युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव। प्राकृतिक आपदाएं या महामारी। घरेलू नीति संबंधी गंभीर त्रुटियां। हालांकि भारत की अर्थव्यवस्था में कुछ ऐसी ताकतें भी हैं जो बड़े झटकों को सहने में मदद करती हैं— जैसे- विशाल घरेलू बाजार। अपेक्षाकृत मजबूत बैंकिंग और नियामक व्यवस्था। बढ़ता डिजिटल भुगतान तंत्र। बुनियादी ढांचे और विनिर्माण पर निवेश। विदेशी मुद्रा भंडार का पर्याप्त स्तर। दूसरी ओर, चुनौतियां भी मौजूद हैं—जैसे- युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार सृजन। कृषि आय में सुधार। निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाना। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता। और, आय असमानता और उपभोग मांग का प्रश्न।</div><div><br></div><div>इसलिए निष्पक्ष रूप से कहा जाए तो "पीएम मोदी के रहते आर्थिक सुनामी निश्चित रूप से आएगी" या "कभी नहीं आएगी"— दोनों दावे तथ्यात्मक रूप से सिद्ध नहीं हैं। भारत की आर्थिक स्थिति कई संकेतकों पर अपेक्षाकृत मजबूत दिखती है, लेकिन किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था की तरह यह वैश्विक और घरेलू जोखिमों से पूरी तरह मुक्त नहीं है। आर्थिक सुनामी की संभावना मुख्यतः नीतियों, वैश्विक परिस्थितियों और भविष्य की घटनाओं पर निर्भर करेगी, न कि केवल किसी एक नेता की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर।</div><div><br></div><h2># आखिर आर्थिक सुनामी के मायने क्या हैं?</h2><div><br></div><div>"आर्थिक सुनामी" एक रूपक (metaphor) है, जिसका अर्थ है ऐसा व्यापक और तीव्र आर्थिक संकट जो समाज, बाजार, उद्योग, रोजगार और सरकार की वित्तीय स्थिति को एक साथ प्रभावित कर दे। जिस प्रकार समुद्री सुनामी अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को झकझोर देती है, उसी प्रकार आर्थिक सुनामी भी अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्रों पर गहरा असर डालती है।</div><div><br></div><div>आइए जानते हैं आर्थिक सुनामी के प्रमुख संकेत के बारे में- पहला, शेयर बाजार में भारी गिरावट। दूसरा, निवेशकों की संपत्ति तेजी से घटती है। तीसरा, कंपनियों का बाजार मूल्य कम हो जाता है। चौथा, बेरोजगारी में तेज वृद्धि। पांचवां,&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">उद्योगों और कंपनियों में छंटनी बढ़ती है। छठा, नए रोजगार सृजन की गति धीमी पड़ जाती है। सातवां, बैंकिंग और वित्तीय संकट। आठवां, ऋण वसूली की समस्या बढ़ती है।&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">नौवां, बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर दबाव आता है। दसवां, मुद्रा और महंगाई पर असर। दसवां, राष्ट्रीय मुद्रा कमजोर हो सकती है। ग्यारहवां, आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। बारहवां, व्यापार और उद्योग में मंदी। तेरहवां,&nbsp;&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">उत्पादन घटता है। चौदहवां, निवेशक नए निवेश से बचते हैं।</span></div><div><br></div><h2># आर्थिक सुनामी के राजनीतिक मायने</h2><div><br></div><div>आर्थिक संकट केवल आर्थिक नहीं होता, बल्कि इसके राजनीतिक परिणाम भी होते हैं— पहला, सरकार की लोकप्रियता प्रभावित हो सकती है। दूसरा, विपक्ष को सरकार की नीतियों पर हमला करने का अवसर मिलता है। तीसरा, सामाजिक असंतोष और जनाक्रोश बढ़ सकता है। चौथा, चुनावी परिणामों पर असर पड़ सकता है। जहां तक भारत के संदर्भ में इसकी बात है तो भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था में "आर्थिक सुनामी" का अर्थ होगाकृ विकास दर में तीव्र गिरावट, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, निवेश और उपभोग में कमी, राजकोषीय दबाव, तथा आम नागरिकों की क्रय शक्ति पर नकारात्मक प्रभाव। हालांकि भारत की विशाल घरेलू मांग, सेवा क्षेत्र, कृषि आधार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार जैसी ताकतें ऐसे संकटों के प्रभाव को कुछ हद तक कम करने में मदद कर सकती हैं।</div><div><br></div><div>जहां तक राहुल गांधी की आशंका के राजनीतिक मायने का सवाल है तो यह कहा जा सकता है कि आर्थिक मुद्दों को चुनावी केंद्र में लाने की कोशिश कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की आय और छोटे कारोबारों की समस्याओं को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है। "आर्थिक सुनामी" जैसी अभिव्यक्ति इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा सकती है। वैसे भी मोदी सरकार के आर्थिक मॉडल पर सीधा हमला राहुल गांधी लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि वर्तमान आर्थिक व्यवस्था बड़े कॉरपोरेट समूहों के पक्ष में झुकी हुई है। यह बयान उसी राजनीतिक विमर्श को आगे बढ़ाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं वैश्विक संकट को घरेलू राजनीति से जोड़ना पश्चिम एशिया में तनाव, तेल की कीमतों में संभावित वृद्धि और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों को विपक्ष सरकार की आर्थिक नीतियों की परीक्षा के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। कुलमिलाकर 2029 के राजनीतिक नैरेटिव की तैयारी में कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि यदि भविष्य में आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ती हैं तो उसने पहले ही चेतावनी दी थी। वहीं भाजपा इसे "भय फैलाने की राजनीति" बताकर अपनी आर्थिक उपलब्धियों को सामने रख रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि आर्थिक सुनामी का वास्तविक मायने केवल आर्थिक आंकड़ों का बिगड़ना नहीं, बल्कि आम आदमी की आय, रोजगार, बचत, व्यापार और जीवन-स्तर पर एक साथ पड़ने वाला व्यापक नकारात्मक प्रभाव है। यही कारण है कि जब कोई राजनीतिक नेता या अर्थशास्त्री "आर्थिक सुनामी" की चेतावनी देता है, तो उसका आशय संभावित बड़े आर्थिक और सामाजिक झटके से होता है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 17:30:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/after-all-what-are-the-political-and-economic-implications-of-the-economic-tsunami</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/6/rahul-gandhi_large_1730_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पाकिस्तान के बाद अब बांग्लादेश से रक्षा संबंध बना रहा तुर्किये, भारत को दो तरफ से घेरने की रणनीति!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/after-pakistan-turkey-is-now-building-defence-ties-with-bangladesh]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दक्षिण एशिया की बदलती भू राजनीतिक बिसात पर अब एक नया और बेहद खतरनाक समीकरण तेजी से उभर रहा है। भारत विरोधी रवैये के लिए लंबे समय से चर्चित तुर्किये अब केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने बांग्लादेश के साथ भी अपने रक्षा और सामरिक रिश्तों को तेजी से विस्तार देना शुरू कर दिया है। ढाका पहुंचे तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने जिस तरह बांग्लादेश को दक्षिण एशिया की सुरक्षा संरचना का महत्वपूर्ण स्तंभ बताया, उसने नई दिल्ली की चिंता और गहरा दी है। इस बयान को भारत के चारों ओर रणनीतिक दबाव बनाने की सुनियोजित चाल के रूप में देखा जा रहा है।</div><div><br></div><div>तुर्किये ने साफ संकेत दे दिया है कि वह दक्षिण एशिया में अपनी मौजूदगी केवल व्यापार या मानवीय सहायता तक सीमित नहीं रखना चाहता। ढाका में हुई उच्च स्तरीय वार्ता में रक्षा सहयोग, रक्षा उत्पादन, सामरिक साझेदारी और आर्थिक विस्तार पर जिस गंभीरता से चर्चा हुई, वह भारत के लिए साधारण घटना नहीं है। बांग्लादेश ने तुर्किये को रक्षा सामग्री निर्माण में निवेश का खुला न्योता दिया है। दोनों देशों ने पारंपरिक सहयोग से आगे बढ़कर रणनीतिक साझेदारी की दिशा में कदम बढ़ाने की बात कही है। यह वही तुर्किये है जिसने पाकिस्तान के साथ मिलकर वर्षों तक भारत विरोधी मोर्चेबंदी की, कश्मीर मुद्दे पर खुलकर इस्लामाबाद का साथ दिया और इस्लामी सहयोग संगठन के मंचों पर भारत के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bangladeshi-infiltrators-are-in-a-tizzy-as-crackdown-continues-across-the-country" target="_blank">Vanakkam Poorvottar: भागते हैं घुसपैठिये, भगाने वाला चाहिए, Bangladeshi Infiltrators के बीच हड़कंप, देशभर में चल रही ताबड़तोड़ कार्रवाई</a></h3><div>उधर, दिल्ली की सबसे बड़ी चिंता यह है कि तुर्किये अब भारत के पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान और पूर्वी मोर्चे पर बांग्लादेश के साथ समानांतर सामरिक रिश्ते बना रहा है। यह दो तरफा दबाव की रणनीति जैसी दिखाई देती है। पाकिस्तान पहले से ही तुर्किये के रक्षा उद्योग, ड्रोन तकनीक और सैन्य प्रशिक्षण का लाभ उठा रहा है। अब यदि वही ढांचा बांग्लादेश तक पहुंचता है, तो भारत के लिए सुरक्षा समीकरण और जटिल हो जाएंगे। खास तौर पर तब, जब बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार अपनी विदेश नीति को नए ढंग से गढ़ने की कोशिश कर रही है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, तुर्किये और बांग्लादेश के बीच केवल रक्षा सहयोग ही नहीं, बल्कि आर्थिक और संस्थागत साझेदारी भी तेजी से बढ़ रही है। दोनों देश व्यापार को तेरह अरब डॉलर से बढ़ाकर बीस अरब डॉलर तक ले जाने की तैयारी में हैं। विशेष आर्थिक क्षेत्रों में तुर्किये को निवेश का निमंत्रण दिया गया है। वस्त्र, दवा निर्माण, जहाज निर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जा रहा है। ढाका में अंतरराष्ट्रीय स्तर का अस्पताल और नर्सिंग संस्थान स्थापित करने का प्रस्ताव भी दिया गया है। यह साफ दिखाता है कि तुर्किये केवल सैन्य साझेदारी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक प्रभाव स्थापित करने की नीति पर काम कर रहा है।</div><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तुर्किये दक्षिण एशिया में खुद को मुस्लिम दुनिया के प्रभावशाली संरक्षक के रूप में स्थापित करना चाहता है। रोहिंग्या मुद्दे पर उसकी सक्रियता, गाजा पर आक्रामक बयानबाजी और बांग्लादेश के साथ मानवीय सहयोग इसी रणनीति का हिस्सा हैं। लेकिन इसके पीछे छिपा बड़ा उद्देश्य क्षेत्रीय प्रभाव विस्तार और भारत की सामरिक चुनौती को बढ़ाना है।</div><div><br></div><div>वैसे तो तुर्किये लगातार यह कह रहा है कि भारत को उसके पाकिस्तान से रिश्तों की वजह से उससे दूरी नहीं बनानी चाहिए। लेकिन असली सवाल भरोसे का है। राष्ट्रपति एर्दोआन कई बार खुलकर कश्मीर पर पाकिस्तान के समर्थन में बयान दे चुके हैं। तुर्किये ने पाकिस्तान के साथ अपने रक्षा रिश्ते भी काफी मजबूत कर लिए हैं। इतना ही नहीं, पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य संघर्ष के दौरान तुर्किये ने पाकिस्तान को रक्षा उपकरण और ड्रोन तक मुहैया कराए थे। भारत ने पाकिस्तान की तरफ से आए जिन कई ड्रोनों को मार गिराया था, उनमें तुर्किये में बने ड्रोन भी शामिल थे। ऐसे में तुर्किये का भारत से दोस्ती और संतुलन की बात करना नई दिल्ली को एक सोची समझी रणनीतिक चाल जैसा लगता है। यही वजह है कि भारत भी अब तुर्किये को उसी की भाषा में जवाब दे रहा है।</div><div><br></div><div>दरअसल, भारत ने हाल के वर्षों में साइप्रस और ऑर्मेनिया के साथ अपने रक्षा संबंधों को तेजी से मजबूत किया है। ऑर्मेनिया अब भारतीय हथियारों का बड़ा खरीदार बन चुका है। साइप्रस के साथ भी भारत रणनीतिक और रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है। यह सीधे-सीधे तुर्किये को संदेश है कि यदि अंकारा भारत के पड़ोस में दखल बढ़ाएगा, तो नई दिल्ली भी तुर्किये के सामरिक क्षेत्र में जवाबी दबाव बनाएगी। जिस तरह तुर्किये पाकिस्तान और अब बांग्लादेश के जरिए भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है, उसी तरह भारत भी तुर्किये के विरोधी या प्रतिस्पर्धी देशों के साथ संबंध मजबूत कर रहा है। यह नई शीत प्रतिद्वंद्विता का संकेत है।</div><div><br></div><div>उधर, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की विदेश नीति भी इस समय भारत के लिए गहरी चिंता का विषय बनती जा रही है। भारत की ओर से सबसे पहले आधिकारिक यात्रा का निमंत्रण मिलने के बावजूद रहमान ने पहले मलेशिया और फिर चीन जाने का फैसला किया। ढाका ने साफ तौर पर यह संदेश देने की कोशिश की कि वह अब केवल भारत पर निर्भर रहने वाली नीति से आगे बढ़ना चाहता है। खास बात यह है कि चीन यात्रा के दौरान तीस्ता परियोजना समेत कई बड़े रणनीतिक मुद्दों पर बातचीत की संभावना जताई जा रही है। साथ ही तारिक रहमान की मलेशिया यात्रा को केवल एक सामान्य विदेश दौरे के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इसके पीछे साफ रणनीतिक सोच दिखाई दे रही है। बांग्लादेश नहीं चाहता था कि नई सरकार की पहली विदेश यात्रा सीधे भारत या चीन में से किसी एक देश की तरफ झुकाव का संकेत दे। यही वजह है कि ढाका ने मलेशिया को पहले पड़ाव के तौर पर चुना, ताकि वह खुद को तटस्थ दिखा सके और भारत, चीन प्रतिस्पर्धा से दूरी बनाने का संदेश दे सके। लेकिन इसके राजनीतिक और सामरिक मायने काफी बड़े हैं। मलेशिया यात्रा के बाद चीन जाने की तैयारी यह संकेत देती है कि बांग्लादेश अब अपनी विदेश नीति को नए संतुलन के साथ आगे बढ़ाना चाहता है। इससे भारत की चिंता इसलिए बढ़ रही है क्योंकि ढाका अब एक साथ चीन, तुर्किये, पाकिस्तान और अन्य इस्लामी देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने की दिशा में बढ़ता दिख रहा है। यह आने वाले समय में भारत के लिए कूटनीतिक और रणनीतिक चुनौती को और कठिन बना सकता है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो भारत के लिए यह समय बेहद सतर्क रहने का है। पाकिस्तान के साथ तुर्किये की साझेदारी पहले ही चिंता का कारण थी, लेकिन अब यदि बांग्लादेश भी उसी धुरी का हिस्सा बनने लगता है, तो यह भारत की पूर्वी सुरक्षा संरचना के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। हालांकि भारत को कम करके आंकना ढाका, इस्लामाबाद और अंकारा तीनों की सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है। भले ही बांग्लादेश चीन, पाकिस्तान और तुर्किये के साथ मिलकर नए समीकरण बनाने की कोशिश करे, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति बेहद दूरदर्शी और बहुस्तरीय मानी जाती है। कभी कभार ऐसा लग सकता है कि भारत चुप क्यों है, लेकिन इतिहास गवाह है कि सही समय आने पर प्रधानमंत्री मोदी का जवाब बेहद सटीक और ताकतवर होता है। कूटनीति का जवाब कूटनीति से और रणनीतिक चालों का जवाब उससे भी बड़ी चाल से देना ही मोदी की कार्यशैली रही है। यही वजह है कि आज भारत केवल अपने विरोधियों की गतिविधियों पर नजर नहीं रख रहा, बल्कि उनके हर कदम का जवाब देने के लिए समानांतर रणनीतिक मोर्चे भी तैयार कर रहा है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 15:42:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/after-pakistan-turkey-is-now-building-defence-ties-with-bangladesh</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/6/india-turkey-bangladesh_large_1542_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[तृणमूल कांग्रेस में टूट और ममता की बढ़ती चिन्ताएं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/fracture-in-trinamool-congress-and-mamatas-growing-concerns]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), जिसने पिछले डेढ़ दशक से बंगाल की राजनीति पर लगभग एकाधिकार स्थापित कर रखा था, आज आंतरिक असंतोष, नेतृत्व संबंधी प्रश्नों और जनविश्वास के संकट से जूझती दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर असंतुष्ट नेताओं और विधायकों की गतिविधियों ने यह संकेत दिया है कि संगठनात्मक एकता में दरारें उभर रही हैं। यह स्थिति केवल किसी एक राजनीतिक दल का संकट नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में राजनीतिक मूल्यों, जनभावनाओं और नेतृत्व की भूमिका पर पुनर्विचार का अवसर भी है। राजनीति में इतिहास बार-बार यह प्रमाणित करता रहा है कि जब भी सत्ता के साथ अहंकार जुड़ता है, जनता अंततः उसका उत्तर देती है। लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक होती है। चाहे वह इंदिरा गांधी का आपातकाल हो, पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन या दिल्ली में आम आदमी पार्टी का अंत या फिर उत्तर प्रदेश एवं बिहार की अनेक राजनीतिक घटनाएँ-हर जगह जनता ने यह संदेश दिया है कि सत्ता जनता की सेवा के लिए है, शासन के अहंकार के लिए नहीं।</div><div><br></div><div>ममता बनर्जी को कभी संघर्षशील, जुझारू और जननेता के रूप में देखा जाता था। उन्होंने वामपंथी शासन के लंबे दौर को समाप्त कर बंगाल में परिवर्तन का नया अध्याय लिखा। किंतु समय के साथ उनकी राजनीति पर अहंकारवाद, व्यक्तिवाद और तुष्टिकरण के आरोप बढ़ते गए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के भीतर निर्णय प्रक्रिया का अत्यधिक केंद्रीकरण और कुछ व्यक्तियों का बढ़ता प्रभाव अनेक वरिष्ठ नेताओं को असहज करता रहा है। यही कारण है कि समय-समय पर असंतोष के स्वर उभरते रहे हैं। राजनीतिक टिप्पणीकारों द्वारा प्रकाशित विश्लेषणों में भी यह प्रश्न उठाया गया है कि यदि किसी दल में संगठन से अधिक व्यक्ति महत्वपूर्ण हो जाए, तो वहां असंतोष स्वाभाविक रूप से जन्म लेता है। हाल के घटनाक्रमों ने इस आशंका को और बल दिया है। जिस प्रकार पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता और विधायक नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं, उससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल व्यक्तियों की नहीं, बल्कि संगठनात्मक संस्कृति की भी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/only-8-mlas-and-6-mps-turned-up-for-the-meeting-at-mamata-banerjee-residence" target="_blank">Mamata Banerjee के घर बैठक में पहुंचे सिर्फ 8 विधायक और 6 सांसद! तृणमूल में बगावत तेज, लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में दीदी!</a></h3><div>भारतीय राजनीति में हाल के वर्षों में आम आदमी पार्टी और उसके नेता अरविंद केजरीवाल का उदाहरण भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। वर्ष 2013 से लेकर 2024 तक दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकले केजरीवाल को जनता ने ईमानदार, पारदर्शी और वैकल्पिक राजनीति के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया। लेकिन समय के साथ सत्ता का केंद्रीकरण, विरोधियों के प्रति असहिष्णुता, राजनीतिक अहंकार और स्वयं को अजेय मान लेने की प्रवृत्ति उनके नेतृत्व पर हावी होती दिखाई दी। जनता ने देखा कि जो दल कभी राजनीतिक शुचिता और नैतिकता की बात करता था, वह भी सत्ता के उसी मोह और व्यक्तिकेंद्रित राजनीति का शिकार होता जा रहा है, जिसके विरुद्ध उसने संघर्ष प्रारम्भ किया था। परिणामस्वरूप दिल्ली की राजनीति में उसका प्रभाव कमजोर हुआ और जनता ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र में कोई भी नेता अथवा दल जनता से बड़ा नहीं होता। यह घटना इस सत्य को पुनः स्थापित करती है कि जनता लंबे समय तक अहंकार, अतिशयोक्ति और आत्ममुग्धता को स्वीकार नहीं करती।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के समक्ष खड़ी चुनौतियों को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। जब किसी दल का नेतृत्व स्वयं को संगठन और जनता से ऊपर मानने लगता है, तब असंतोष जन्म लेता है, कार्यकर्ता दूर होने लगते हैं और अंततः राजनीतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है। इतिहास बताता है कि लोकतंत्र में विनम्रता, संवाद, जनभावनाओं का सम्मान और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्धता ही स्थायी राजनीतिक सफलता की कुंजी हैं। किसी भी लोकतांत्रिक दल की शक्ति उसके विचार, संगठन और कार्यकर्ताओं में होती है, न कि केवल एक नेता में। जब दल विचारधारा की बजाय व्यक्तिपूजा पर आधारित होने लगते हैं, तब उनका संकट निश्चित हो जाता है। भारतीय राजनीति में अनेक उदाहरण हैं जहाँ परिवारवाद ने दलों की जड़ों को कमजोर किया। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विभाजन के पीछे भी नेतृत्व और उत्तराधिकार से जुड़े प्रश्न महत्वपूर्ण रहे। बंगाल में भी इसी प्रकार की चर्चाएँ समय-समय पर सामने आती रही हैं। तृणमूल कांग्रेस के सामने दूसरा बड़ा संकट उसकी सार्वजनिक छवि का है। शिक्षक भर्ती, नगर निकायों तथा अन्य प्रशासनिक मामलों से जुड़े विवादों ने जनता के मन में अनेक प्रश्न खड़े किए हैं। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होता है। यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही कम हो रही है, तो राजनीतिक नुकसान होना स्वाभाविक है।</div><div><br></div><div>इसके साथ ही पश्चिम बंगाल में लंबे समय से चल रही पहचान, नागरिकता, सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ से जुड़ी बहसों ने भी राजनीतिक वातावरण को प्रभावित किया है। भारतीय जनता पार्टी ने इन मुद्दों को राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया। भाजपा का तर्क रहा है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए और किसी भी प्रकार की तुष्टिकरण की राजनीति अंततः समाज को विभाजित करती है। यही कारण है कि बंगाल में भाजपा ने अपनी राजनीतिक रणनीति को राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और सुशासन के मुद्दों पर केंद्रित किया। भाजपा की बंगाल यात्रा भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अध्ययन का विषय है। कभी केवल दो सीटों तक सीमित रहने वाली पार्टी आज राज्य की सत्ता िशक्ति बन चुकी है। यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे वर्षों का संगठनात्मक विस्तार, बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं का निर्माण, राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रियता तथा स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने की रणनीति रही है। भाजपा ने बंगाल में यह संदेश देने का प्रयास किया कि वह केवल एक राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि वैचारिक विकल्प भी है। हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि केवल राष्ट्रवाद या धार्मिक पहचान के आधार पर किसी दल की स्थायी सफलता सुनिश्चित नहीं होती। लोकतंत्र में जनता विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा भी चाहती है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल के लिए आवश्यक है कि वह राष्ट्रीय भावना के साथ-साथ जनकल्याणकारी नीतियों को भी प्राथमिकता दे।&nbsp;</div><div><br></div><div>राष्ट्र और राजनीति का संबंध अत्यंत गहरा है। कोई भी राजनीतिक दल तभी दीर्घकालिक सफलता प्राप्त कर सकता है जब वह राष्ट्रहित, संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों और जनभावनाओं के प्रति प्रतिबद्ध रहे। यदि कोई दल ऐसे तत्वों का समर्थन करता हुआ दिखाई देता है जो राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध हों, तो जनता धीरे-धीरे उससे दूरी बनाने लगती है। भारत की लोकतांत्रिक चेतना इतनी परिपक्व हो चुकी है कि वह अंततः राष्ट्रहित और जनहित के बीच संतुलन स्थापित करने वाले नेतृत्व को ही स्वीकार करती है। पश्चिम बंगाल का वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य इसी सत्य की पुष्टि करता है। तृणमूल कांग्रेस के सामने चुनौती केवल बगावत या संगठनात्मक असंतोष नहीं है, बल्कि जनता के विश्वास को पुनः अर्जित करने की भी है। यदि पार्टी आत्ममंथन करती है, संगठन को लोकतांत्रिक बनाती है, पारदर्शिता बढ़ाती है और जनभावनाओं को समझने का प्रयास करती है, तो वह अपनी स्थिति को पुनः मजबूत कर सकती है। लेकिन यदि अहंकार, व्यक्तिवाद और तुष्टिकरण की राजनीति जारी रहती है, तो संकट और गहरा सकता है। यही लोकतंत्र का शाश्वत सत्य है और यही पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीति का सबसे बड़ा सबक भी। लोकतंत्र का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सत्ता स्थायी नहीं होती, किंतु मूल्य स्थायी होते हैं। राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं, लेकिन जनता की अपेक्षाएँ और राष्ट्र की आवश्यकताएँ हमेशा बनी रहती हैं। जो दल इन अपेक्षाओं को समझते हैं, वे इतिहास बनाते हैं और जो इन्हें अनदेखा करते हैं, वे इतिहास बन जाते हैं। आज बंगाल की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि तृणमूल कांग्रेस आत्मसुधार का मार्ग चुनती है या राजनीतिक पतन की ओर बढ़ती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 15:36:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/fracture-in-trinamool-congress-and-mamatas-growing-concerns</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/6/mamata-banerjee_large_1537_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अन्नामलाई का नई पार्टी बनाने का निर्णय आवेश में लिया गया फैसला नहीं, लंबे चिंतन का निष्कर्ष दिखाई देता है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/annamalai-decision-to-form-a-new-party-is-not-a-decision-taken-in-the-heat-of-the-moment]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>तमिलनाडु की राजनीति में एक नया भूचाल उस समय आ गया जब भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने पार्टी से इस्तीफा देकर अपने नए राजनीतिक आंदोलन की घोषणा कर दी। यह फैसला तमिलनाडु की जमी हुई राजनीतिक संस्कृति को चुनौती देने वाला एक बड़ा संदेश है। अन्नामलाई ने जिस साफगोई, साहस और वैचारिक दृढ़ता के साथ अपने फैसले को सामने रखा है, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अब किसी दल के सीमित दायरे में नहीं, बल्कि तमिल समाज की व्यापक आकांक्षाओं के प्रतिनिधि के रूप में उभरना चाहते हैं।</div><div><br></div><div>अन्नामलाई ने खुलकर कहा कि उनके भीतर लंबे समय से यह संघर्ष चल रहा था कि वह पहले भारतीय हैं या तमिल। यह बयान केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति के उस मूल द्वंद्व को सामने लाता है जिसमें राष्ट्रीय दलों को अक्सर क्षेत्रीय अस्मिता के सामने संघर्ष करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि चार दिसंबर 2025 को ही उन्होंने पार्टी नेतृत्व को इस्तीफे का फैसला बता दिया था, लेकिन उनसे चुनाव तक रुकने का अनुरोध किया गया। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उनकी लोकप्रियता और प्रभाव को लेकर कितना सजग था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/why-is-someone-who-has-never-won-an-election-more-in-the-news-than-vijay-in-tamil-nadu" target="_blank">जिसने आज तक नहीं जीता कोई चुनाव, तमिलनाडु में विजय से ज्यादा वो चर्चा में क्यों? अन्नामलाई का गेम और शाह का प्लान, पूरी कहानी कुछ और है</a></h3><div>पूर्व पुलिस अधिकारी रहे अन्नामलाई ने भारतीय जनता पार्टी में सकारात्मक बदलाव के उद्देश्य से प्रवेश किया था। उन्होंने कहा कि पार्टी में रहते हुए उन्होंने कभी तमिलनाडु की पहचान से समझौता नहीं किया। पिछले अठारह महीनों में संगठनात्मक मामलों को लेकर उनकी असहमति लगातार बढ़ती गई। यही कारण है कि उन्होंने अब एक स्वतंत्र राजनीतिक रास्ता चुनने का फैसला किया है। यह निर्णय किसी आवेश का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे चिंतन और रणनीतिक तैयारी का हिस्सा दिखाई देता है।</div><div><br></div><div>अन्नामलाई ने अपने नए आंदोलन "वी द लीडर" की घोषणा करते हुए साफ कर दिया कि उनका उद्देश्य केवल एक और राजनीतिक दल खड़ा करना नहीं, बल्कि राजनीति की भाषा और संस्कृति को बदलना है। उन्होंने परिवारवाद और व्यक्तिपूजा की राजनीति पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि किसी भी विधायक, सांसद या मंत्री का पद स्थायी नहीं होना चाहिए। यह बयान तमिलनाडु की उस परंपरागत राजनीति पर करारा प्रहार है जिसमें कुछ परिवारों और सीमित चेहरों के इर्दगिर्द सत्ता घूमती रही है।</div><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अन्नामलाई ने राजनीति में तकनीकी विशेषज्ञों, युवाओं और सामान्य नागरिकों की भागीदारी पर जोर दिया है। उन्होंने युवाओं से राजनीति में आने की अपील करते हुए कहा कि अब आम आदमी की नई पीढ़ी की राजनीति की नींव रखी जा रही है। यह सोच उन्हें पारंपरिक नेताओं से अलग करती है। देखा जाये तो तमिलनाडु में जहां लंबे समय से भावनात्मक नारों और जातीय समीकरणों के आधार पर राजनीति चलती रही है, वहां अन्नामलाई प्रशासनिक दक्षता, नैतिकता और प्रतिभा आधारित नेतृत्व की बात कर रहे हैं। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।</div><div><br></div><div>उनके आंदोलन के अंतर्गत कोयंबटूर में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम सेंटर फोर एथिक्स एंड पॉलिटिक्स की स्थापना का फैसला भी बताता है कि वह केवल चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि वैचारिक और नैतिक प्रशिक्षण की स्थायी व्यवस्था खड़ी करना चाहते हैं। यह दृष्टिकोण तमिलनाडु की राजनीति में एक नई बौद्धिक धारा पैदा कर सकता है। उनके आह्वान के कुछ ही समय बाद हजारों लोगों का उनके राजनीतिक आंदोलन से जुड़ना यह संकेत देता है कि जनता के एक हिस्से में बदलाव की बेचैनी पहले से मौजूद थी।</div><div><br></div><div>बताया जा रहा है कि अन्नामलाई ने भाजपा नेतृत्व के सामने दो स्पष्ट विकल्प रखे थे। एक तो उन्हें पर्याप्त स्वायत्तता और अधिकारों के साथ कम से कम सात वर्षों तक प्रदेश नेतृत्व दिया जाए, या फिर उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक राह चुनने दी जाए। यह मांग उनके आत्मविश्वास और दूरदृष्टि दोनों को दर्शाती है। साथ ही इस्तीफे का ऐलान करने से पहले दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन से उनकी मुलाकात तथा पार्टी नेतृत्व द्वारा उन्हें मनाने की कोशिश इस बात का प्रमाण है कि अन्नामलाई की अहमियत से भाजपा नेतृत्व वाकिफ है।</div><div><br></div><div>वैसे तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति भी अन्नामलाई के लिए अवसर लेकर आई है। हालिया विधानसभा चुनावों में द्रविड दलों को झटके लगे और अभिनेता विजय की पार्टी ने अप्रत्याशित सफलता हासिल की। इससे यह स्पष्ट हो गया कि राज्य की जनता अब पारंपरिक राजनीतिक ढांचे से बाहर विकल्प तलाश रही है। अन्नामलाई का मानना है कि राष्ट्रीय दलों के लिए यहां सीमित राजनीतिक जगह है, इसलिए एक मजबूत क्षेत्रीय विकल्प ही जनता की आकांक्षाओं को सही दिशा दे सकता है। उनकी यह समझ राजनीतिक रूप से बेहद व्यावहारिक और दूरदर्शी मानी जा रही है।</div><div><br></div><div>उधर, भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने भले ही कहा हो कि अन्नामलाई के जाने से पार्टी को कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन राजनीतिक वास्तविकता इससे अलग दिखाई देती है। अन्नामलाई ने तमिलनाडु में भाजपा को ऊर्जा, आक्रामकता और जनस्वीकार्यता दी थी। अब उनके अलग होने से भाजपा के सामने नेतृत्व और जनाधार दोनों की चुनौती खड़ी होगी। दूसरी ओर, अन्नामलाई यदि अपने आंदोलन को संगठित ढंग से आगे बढ़ाते हैं तो वह तमिलनाडु की राजनीति में तीसरी शक्ति के रूप में तेजी से उभर सकते हैं।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह स्पष्ट है कि अन्नामलाई ने केवल पार्टी नहीं छोड़ी, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति को नई दिशा देने की चुनौती स्वीकार की है। उनकी राजनीति में साहस है, वैचारिक स्पष्टता है और बदलाव की बेचैनी भी है। आने वाले वर्षों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या उनका यह आंदोलन तमिलनाडु की राजनीति में वैसा ही परिवर्तन ला पाएगा जिसकी वह कल्पना कर रहे हैं। फिलहाल इतना तय है कि अन्नामलाई ने राजनीति के मैदान में एक नई बहस छेड़ दी है और इस बहस को नजरअंदाज कर पाना किसी के लिए आसान नहीं होगा।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 15:23:09 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/annamalai-decision-to-form-a-new-party-is-not-a-decision-taken-in-the-heat-of-the-moment</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/5/annamalai_large_1523_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पर्यावरणीय संकट से समाधान की ओर बढ़ने का समय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-time-to-move-from-environmental-crisis-to-solutions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि पृथ्वी और मानवता के भविष्य को बचाने का वैश्विक संकल्प है। वर्ष 2026 का विश्व पर्यावरण दिवस ऐसे समय में आया है जब जलवायु परिवर्तन, प्लास्टिक प्रदूषण, जैव विविधता का क्षरण, जल संकट, वायु प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के अस्तित्व को गंभीर चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है। इस वर्ष की थीम “प्लास्टिक प्रदूषण का अंत” (ठमंज च्संेजपब च्वससनजपवद) केवल प्लास्टिक के उपयोग को कम करने का आह्वान नहीं है, बल्कि उपभोगवादी जीवनशैली और प्रकृति-विरोधी विकास मॉडल पर पुनर्विचार का भी संदेश है। आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को झेल रही है। कहीं भीषण गर्मी जीवन को असहनीय बना रही है, कहीं अनियंत्रित वर्षा और बाढ़ तबाही ला रही है, तो कहीं सूखा और जल संकट मानव अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। उत्तराखंड के जंगलों में आग, हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, महानगरों में प्रदूषण, बेंगलुरु जैसे तकनीकी नगरों में जल संकट और लगातार बढ़ती गर्मी इस बात के संकेत हैं कि पर्यावरणीय संकट अब भविष्य की नहीं, वर्तमान की वास्तविकता बन चुका है।</div><div><br></div><div>संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें चेतावनी दे रही हैं कि पिछले एक दशक में जलवायु संबंधी आपदाओं से लाखों लोगों की मृत्यु हुई है और खरबों डॉलर की आर्थिक क्षति हुई है। जैव विविधता का ह्रास, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण-ये तीनों संकट परस्पर जुड़े हुए हैं। यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया तो मानव सभ्यता के सामने अभूतपूर्व संकट खड़ा हो सकता है। 2015 के पेरिस जलवायु समझौते में वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, लेकिन आज भी दुनिया उस दिशा में अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि विश्व के सामने उपस्थित इस सबसे बड़े संकट को भारत की राजनीति में वह महत्व नहीं मिला, जिसका वह अधिकारी है। चुनावी घोषणापत्रों में पर्यावरण का उल्लेख तो होता है, लेकिन वह केवल औपचारिकता भर रह जाता है। राजनीतिक दल यह मानकर चलते हैं कि पर्यावरण, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन वोट दिलाने वाले मुद्दे नहीं हैं। परिणामस्वरूप पर्यावरणीय प्रश्न न तो चुनावी बहस का हिस्सा बनते हैं और न ही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का। जबकि सच्चाई यह है कि आने वाली पीढ़ियों का जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षा इसी प्रश्न पर निर्भर करती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/environment-gasping-for-breath-in-the-blind-race-for-development" target="_blank">विकास की अंधी दौड़ में दम तोड़ता पर्यावरण</a></h3><div>पर्यावरणीय संकट का मूल कारण विकास की वह अवधारणा है जिसमें प्रकृति को केवल संसाधन और उपभोग की वस्तु मान लिया गया है। हमने जंगलों को उद्योगों के लिए, नदियों को अपशिष्ट के लिए और भूमि को कंक्रीट के जंगलों में बदलने के लिए प्रयोग किया। प्रकृति हमें जीवन का आधार निःशुल्क देती है, लेकिन हमने उसके प्रति कृतज्ञता के बजाय दोहन का व्यवहार अपनाया। परिणामस्वरूप वनस्पतियों का विनाश, वन्य जीवों का संकट, भूमिगत जल का क्षय और प्रदूषण का विस्तार निरंतर बढ़ रहा है। भारतीय संस्कृति ने सदैव प्रकृति को पूजनीय माना है। वृक्षों, नदियों, पर्वतों और वनस्पतियों को केवल भौतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदाता के रूप में देखा गया। आयुर्वेद और वनौषधि विज्ञान इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं। जड़ी-बूटियों और वनस्पतियों ने हजारों वर्षों तक मानव स्वास्थ्य की रक्षा की, लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ में यह ज्ञान और प्राकृतिक संपदा दोनों उपेक्षित होते गए। आज जब नई-नई बीमारियां मानव जीवन को चुनौती दे रही हैं, तब पुनः प्रकृति और वनस्पति जगत की ओर लौटने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।</div><div><br></div><div>वर्तमान संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और नैतिक संकट भी है। वायु प्रदूषण लाखों लोगों की असामयिक मृत्यु का कारण बन रहा है। जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। कृषि व्यवस्था प्रभावित हो रही है। मौसम चक्र असंतुलित हो गया है। गरीब और कमजोर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। कभी इंदिरा गांधी ने कहा था कि ‘गरीबी सबसे बड़ा प्रदूषक है।’ आज यह कथन और अधिक प्रासंगिक हो गया है क्योंकि गरीबी और पर्यावरणीय विनाश एक-दूसरे को बढ़ाने वाले कारक बन गए हैं। भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनों की कमी नहीं है। 1972 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम से लेकर अनेक पर्यावरणीय कानून बनाए गए। लेकिन कानूनों और उनके प्रभावी क्रियान्वयन के बीच गहरी खाई बनी हुई है। अवैध खनन, वनों की कटाई, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की अनदेखी और पर्यावरणीय मंजूरियों में शिथिलता इस बात का प्रमाण हैं कि संस्थागत इच्छाशक्ति अभी भी पर्याप्त नहीं है।</div><div><br></div><div>फिर भी आशा की किरण दिखाई देती है। युवाओं में पर्यावरण के प्रति जागरूकता तेजी से बढ़ रही है। विभिन्न सर्वेक्षणों में बड़ी संख्या में युवाओं ने जलवायु संकट को गंभीर विषय माना है और सरकार से इस संबंध में शिक्षा एवं जनजागरण की अपेक्षा की है। यह संकेत है कि नई पीढ़ी पर्यावरण को केवल प्रकृति का नहीं, बल्कि अपने भविष्य का प्रश्न मान रही है। आवश्यकता इस चेतना को सामाजिक और राजनीतिक शक्ति में बदलने की है। समाधान क्या है? सबसे पहले विकास और पर्यावरण को विरोधी नहीं, पूरक मानने की दृष्टि विकसित करनी होगी। ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों को बढ़ावा देना, जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना, सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाना, जल संरक्षण को राष्ट्रीय अभियान बनाना, वृक्षारोपण को जनांदोलन का रूप देना और प्लास्टिक के उपयोग पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है। केवल सरकारी योजनाओं से यह कार्य संभव नहीं होगा, इसके लिए समाज, उद्योग, शिक्षा संस्थानों और नागरिकों की साझी भागीदारी चाहिए।</div><div><br></div><div>दूसरा, पर्यावरण को राजनीतिक एजेंडा बनाना होगा। जिस प्रकार रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य चुनावी मुद्दे बनते हैं, उसी प्रकार स्वच्छ वायु, स्वच्छ जल, हरित विकास और जलवायु सुरक्षा भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनें। मतदाता अपने प्रतिनिधियों से पर्यावरण संबंधी दृष्टि और प्रतिबद्धता के बारे में प्रश्न पूछें। जब जनता पर्यावरण को प्राथमिकता देगी, तब राजनीति भी उसकी ओर मुड़ेगी। तीसरा, शिक्षा व्यवस्था में पर्यावरणीय चेतना को व्यवहारिक रूप से शामिल करना होगा। बच्चों और युवाओं को केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ाव, जल संरक्षण, कचरा प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण के व्यावहारिक संस्कार दिए जाने चाहिए। चैथा, हमें अपनी जीवनशैली में परिवर्तन लाना होगा। अत्यधिक उपभोग, अपव्यय और सुविधावादी संस्कृति ने पर्यावरणीय संकट को बढ़ाया है। संयमित उपभोग, पुनर्चक्रण, स्थानीय संसाधनों का उपयोग और प्रकृति के प्रति संवेदनशील जीवनशैली ही स्थायी समाधान दे सकती है। यह दृष्टि भारतीय दर्शन और जीवन मूल्यों में पहले से विद्यमान है।</div><div><br></div><div>विश्व पर्यावरण दिवस 2026 हमें यह स्मरण कराता है कि पर्यावरण का प्रश्न केवल पेड़-पौधों या नदियों का प्रश्न नहीं हैय यह मानव सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न है। यदि हमने समय रहते अपनी नीतियों, विकास मॉडल और जीवनशैली में परिवर्तन नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें क्षमा नहीं करेंगी। लेकिन यदि हम सजगता, वैज्ञानिक दृष्टि, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक सहभागिता के साथ आगे बढ़ें, तो संकट को अवसर में बदल सकते हैं। भारत के पास विश्व को नई दिशा देने की क्षमता है। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, अहिंसा, संयम और संतुलित विकास की भारतीय दृष्टि आज पूरे विश्व के लिए मार्गदर्शक बन सकती है। आवश्यकता केवल इतनी है कि पर्यावरण को विकास का विकल्प नहीं, विकास का आधार माना जाए। यही विश्व पर्यावरण दिवस का संदेश है, यही भविष्य की सुरक्षा का मार्ग है और यही पृथ्वी के प्रति हमारी सच्ची जिम्मेदारी भी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 10:57:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-time-to-move-from-environmental-crisis-to-solutions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/5/world-environment-day_large_1057_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ममता बनर्जी की राजनीति खत्म या पिक्चर अभी बाकी है? Operation Crown Prince ने कैसे मचाया भूचाल?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/is-mamata-banerjee-political-career-over-or-is-the-picture-still-to-come]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले कुछ सप्ताहों के भीतर जिस तेजी से घटनाक्रम बदला है, उसने तृणमूल कांग्रेस और उसकी संस्थापक ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कभी बंगाल की राजनीति पर मजबूत पकड़ रखने वाली तृणमूल कांग्रेस आज अपने सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथों मिली करारी हार के बाद पार्टी के भीतर लंबे समय से सुलग रहा असंतोष अब खुली बगावत में बदल चुका है। महज 13 दिनों के भीतर घटनाओं की ऐसी श्रृंखला सामने आई, जिसने 28 वर्ष पुरानी पार्टी को विभाजन की कगार पर पहुंचा दिया।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि तृणमूल कांग्रेस की स्थापना ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर की थी। इसके बाद उन्होंने वाम मोर्चे के लंबे शासन के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा किया और 2011 में ऐतिहासिक जीत हासिल कर बंगाल की सत्ता पर कब्जा जमाया। 2016 और 2021 के चुनावों में भी पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथों मिली हार ने पार्टी की राजनीतिक जमीन हिला दी। सबसे बड़ा झटका यह था कि ममता बनर्जी को अपने पारंपरिक गढ़ भवानीपुर में शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही विधानसभा में टीएमसी की संख्या घटकर केवल 80 विधायकों तक सिमट गई।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/entire-party-disintegrated-the-inside-story-of-the-tmc-split" target="_blank">22 मई की वो दोपहर, बंग भवन का सन्नाटा... और सिर्फ 13 दिनों में बिखर गई पूरी पार्टी! TMC में दो फाड़ की इनसाइड स्टोरी</a></h3><div>चुनावी हार के बाद ही पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ने लगा था। कई विधायकों को लगने लगा कि संगठन और निर्णय प्रक्रिया में सांसद अभिषेक बनर्जी का प्रभाव लगातार बढ रहा है। पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत होने लगी कि तृणमूल का केंद्र धीरे-धीरे एक परिवार तक सीमित होता जा रहा है। छह मई को नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक में ममता बनर्जी द्वारा अभिषेक बनर्जी के लिए खड़े होकर तालियां बजाने का आग्रह इस असंतोष को और बढ़ाने वाला साबित हुआ।</div><div><br></div><div>पार्टी में मतभेद पहली बार खुलकर 19 मई को सामने आए, जब रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा ने पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि चुनाव से हटने की घोषणा करने वाले विधायक जहांगीर खान के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई? चूंकि जहांगीर को अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता था, इसलिए इसे सीधे तौर पर अभिषेक के प्रभाव को चुनौती माना गया। इसके बाद घटनाओं ने तेजी पकड़ ली। 22 मई को दिल्ली के बंग भवन में रिताब्रता बनर्जी और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की कथित मुलाकात ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। रिताब्रता ने बाद में विपक्षी नेताओं को प्रशासनिक बैठकों में बुलाने के शुभेंदु अधिकारी के फैसले की सार्वजनिक सराहना की। इसके बाद तृणमूल के भीतर संदेह और गहरा गया।</div><div><br></div><div>25 मई को विवाद ने नया मोड़ लिया, जब विधायक दल के नेतृत्व से जुड़े दस्तावेजों पर जाली हस्ताक्षर किए जाने के आरोप सामने आए। रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से इसकी औपचारिक शिकायत की। मामला पुलिस और सीआईडी जांच तक पहुंच गया। इसके साथ ही पार्टी के भीतर का असंतोष खुली राजनीतिक लड़ाई में बदल गया। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 30 मई को अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर में हमला हुआ। हालांकि सभी दलों ने इसकी निंदा की, लेकिन तृणमूल के भीतर अपेक्षित एकजुटता दिखाई नहीं दी। इससे साफ संकेत मिला कि नेतृत्व और विधायकों के एक हिस्से के बीच दूरी बढ़ चुकी है।</div><div><br></div><div>31 मई को ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट आवास पर बैठक बुलाई, लेकिन उसमें कम उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि पार्टी पर उनकी पकड़ कमजोर पड़ रही है। आखिरकार एक जून को पार्टी ने रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा को निष्कासित कर दिया। लेकिन यह कदम बगावत रोकने की बजाय उसे और तेज करने वाला साबित हुआ। बागी खेमे ने अपनी मुहिम को “ऑपरेशन क्राउन प्रिंस” नाम दिया, जिसे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ अभियान के रूप में देखा गया।</div><div><br></div><div>बुधवार को यह संकट निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया, जब 58 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर रिताब्रता बनर्जी को विधायक दल का नेता चुनने की जानकारी दी। विधानसभा अध्यक्ष ने इस दावे को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही बागी गुट को तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक विधायक दल के रूप में मान्यता मिल गई। यह ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन की अब तक की सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी उसका स्पष्ट वैचारिक आधार न होना रहा है। वाम विरोध की राजनीति ने पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया, लेकिन सत्ता मिलने के बाद संगठनात्मक एकता कमजोर पड़ती गई। अब जब चुनावी हार ने पार्टी की शक्ति कम कर दी है, तो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और उत्तराधिकार की लड़ाई खुलकर सामने आ गई है।</div><div><br></div><div>फिर भी ममता बनर्जी को राजनीति से बाहर मान लेना जल्दबाजी होगी। बंगाल की राजनीति में उनका संघर्ष, जनाधार और राजनीतिक अनुभव अभी भी उन्हें एक मजबूत नेता बनाता है। लेकिन यह भी सच है कि तृणमूल कांग्रेस अब अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है और आने वाले समय में यह तय होगा कि पार्टी इस संकट से उबर पाएगी या बंगाल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 14:35:09 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/is-mamata-banerjee-political-career-over-or-is-the-picture-still-to-come</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/4/mamata-banerjee_large_1435_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ताकि अलनीनो का कम पड़े दुष्प्रभाव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/so-that-the-adverse-effects-of-el-ni%C3%B1o-are-minimized]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>साल 2026 में प्रशांत महासागर में सक्रिय 'अल नीनो' का साया भारत के कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने अपने संशोधित पूर्वानुमान के अनुसार, इस वर्ष मानसून सामान्य से कम रहने की आशंका जताई है। नए पूर्वानुमान के अनुसार, इस साल औसत से करीब दस फ़ीसद कम बारिश होने की आशंका है। भारत में, जहाँ कृषि अभी- भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर है, उसके लिए मानसूनी बारिश की कमी और भीषण सूखा एक तरह से विपत्ति का ही द्योतक है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि सिंचाई का भी प्रबंधन किया जाए।</div><div><br></div><div>भारत की करीब साठ प्रतिशत अब भी सीधे तौर पर खेती-किसानी पर निर्भर है। सूखे की मार की वजह से इस बड़ी आबादी के सामने सहज तरीके से रोजी-रोटी का संकट उठ खड़ा होगा। इससे बचाव के लिए जरूरी होगा कि सिंचाई के ऐसे साधनों और तकनीक को अपनाया जाए, जिनके ज़रिए पानी को बचाया जा सके और तुलनात्मक रूप से ज़्यादा पैदावार ली जा सके। अल नीनो का दूसरा अर्थ है, कम वर्षा और भीषण सूखा। इस परिस्थिति में भारत में सिंचाई साधनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, जिनसे न केवल फसलों का बचाव हो सके, बल्कि खाद्य सुरक्षा को भी सुनिश्चित किया जा सके। जहाँ तक भारत में सिंचाई व्यवस्था की बात है, तो मुख्य रूप से यह भूजल और सतही जल यानी नहरों और तालाबों पर आधारित है। चूँकि इस साल अल नीनो के कारण कम बारिश होने की आशंका है, इसलिए इन साधनों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/india-air-defense-shield-strengthened-fourth-s-400-sudarshan-squadron-received-from-russia" target="_blank">India Russia S-400 Deal | भारत का हवाई रक्षा कवच हुआ मज़बूत! रूस से मिला चौथा S-400 'सुदर्शन' स्क्वाड्रन, जानें कैसे बढ़ेगी ताकत</a></h3><div>वर्षा की कमी के कारण भूजल का पुनर्भरण यानी रिचार्ज कम होता है, जिससे भूजल स्तर और नीचे चला जाता है। वैसे भी उत्तर भारत के कई हिस्सों में पहले से ही भूजल स्तर काफ़ी नीचे चला गया है। इसलिए सूखे की स्थिति विशेषकर उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के लिए बहुत खतरनाक है। अल नीनो के चलते इस साल वर्षों पहले बने बांधों और जलाशयों में पानी का भंडारण सामान्य से कम होने की आशंका है। इस पानी का इस्तेमाल ज्यादातर रबी फसलों के लिए होता है। जब पानी कम होगा तो रबी फसलों की सिंचाई के लिए&nbsp; कम उपलब्ध होगा। अल नीनो के कारण देश के ज्यादातर हिस्सों के सूखे की चपेट में आना स्वाभाविक है। इसकी वजह से पैदावार पर बुरा असर पड़ना तय है। इससे फसलों की बुवाई में देरी हो सकती है और फसलों की बुआई के लिए अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए भूजल की आवश्यकता होगी और उसे चूँकि ट्यूबवेल से निकाला जाएगा, लिहाजा बिजली की माँग बढ़ेगी।</div><div><br></div><div>इसके लिए सिंचाई के दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता है। इसके लिए जरूरी हो जाता है कि किसानों को कम पानी की जरूरत वाली फसलों, जैसे बाजरा, मूँग, अरहर, मक्का आदि को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसे कृषि और किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस उपाय को अपनाने की बात भी की है। सरकार की ओर से इस संबंध में किसानों को तैयार भी किया जा रहा है। इसके तहत मिट्टी की नमी बनाए रखने के लिए पौधों की जड़ों के आसपास सूखी पत्तियों या प्लास्टिक की शीट की परत बिछाने का सुझाव दिया जा रहा है।</div><div><br></div><div>कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, देशी पौधों को आमतौर पर बढ़ने के लिए कम पानी की आवश्यकता होती है या वे अन्य प्रकार की घासों, पेड़ों और झाड़ियों की तुलना में उपलब्ध पानी का बेहतर उपयोग कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि किसान और बागवानी करने वाले लोग अपने बगीचों या यहां तक कि अपने व्यवसायों के सामने भी पत्थरों या अन्य प्रकार के भू-आवरण का उपयोग करके रचनात्मक तरीके से पानी को बचा सकते हैं । कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार शुष्क बागवानी के मूल सिद्धांत हैं कि पौधों की आवश्यकता के अनुसार ही पानी का उपयोग किया जाए और ऐसी बागवानी डिजाइन और पौधों का चयन किया जाए जो उपलब्ध वर्षा जल का उपयोग कर सकें।</div><div>&nbsp;</div><div>इसके साथ ही ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई व्यवस्था को भी अपनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे पानी की खपत को कम किया जा सकता है। इसके साथ ही खेत के तालाबों और जल संचयन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो सूखे की हालत में सिंचाई की सुविधा प्रदान कर सकते हैं।</div><div><br></div><div>किसानों को जरूरत के हिसाब से खेत के उन क्षेत्रों में सिंचाई किया जाना होगा, जिसे पानी की जरूरत ज़्यादा हो। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के उपयोग वाली फसलों को पानी की ज़्यादा आवश्यकता होती है। ऐसी फसलों से बचना होगा और जैविक खाद एवं प्राकृतिक कीटनाशकों के इस्तेमाल किया जाना चाहिए होगा।</div><div><br></div><div>- उमेश चतुर्वेदी</div><div>वरिष्ठ पत्रकार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 14:32:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/so-that-the-adverse-effects-of-el-ni%C3%B1o-are-minimized</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/4/drought_large_1432_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बालेन्द्र शाह ने सीमा विवाद सुलझाने के लिए ब्रिटेन को निमंत्रित कर अपनी जगहँसाई करवा ली है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/nepal-pm-balendra-shah-faces-backlash-over-india-border-remarks]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लेकर चल रहा पुराना सीमा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार वजह कोई नया भू-राजनीतिक घटनाक्रम नहीं बल्कि नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की चौंकाने वाली और कई मायनों में अपरिपक्व बयानबाजी बनी है। संसद में उन्होंने ऐसा दावा कर दिया जिसने काठमांडू से लेकर नई दिल्ली तक हलचल मचा दी। हालात इतने असहज हो गए कि कुछ ही घंटों बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय को सफाई देने मैदान में उतरना पड़ा। और विडंबना देखिए, भारत को घेरने की कोशिश में दिया गया बयान नेपाल में ही प्रधानमंत्री के लिए भारी पड़ गया। विपक्ष, पूर्व विदेश मंत्री, पूर्व राजदूत और सीमा विशेषज्ञ तक उनके खिलाफ खड़े हो गए और उनसे सबूत, स्पष्टीकरण, यहां तक कि माफी की मांग होने लगी। सीमा विवाद पर राजनीतिक परिपक्वता दिखाने के बजाय बालेन्द्र शाह की टिप्पणियां ऐसी साबित हुईं जिन्होंने नेपाल की आधिकारिक स्थिति को ही कठघरे में खड़ा कर दिया।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि नेपाली संसद में बोलते हुए बालेन्द्र शाह ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद पता चला कि केवल भारत ने ही नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई स्थानों पर भारतीय भूमि पर अतिक्रमण किया है। उन्होंने दोनों देशों से तथ्यों का अध्ययन कर मित्रवत तरीके से विवाद सुलझाने की अपील की। उधर, नेपाल में विपक्षी दलों और पूर्व राजनयिकों ने बालेन्द्र शाह की टिप्पणियों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। नेपाली कांग्रेस की बसना थापा और अन्य नेताओं ने संसद के अभिलेखों से बयान हटाने की मांग की। पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने भी प्रधानमंत्री से माफी मांगने की बात कही। नेपाल के पूर्व राजदूत नीलाम्बर आचार्य और दीप कुमार उपाध्याय ने स्पष्ट कहा कि नेपाल द्वारा भारतीय भूमि पर अतिक्रमण का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। सीमा विशेषज्ञ बुद्धि नारायण श्रेष्ठ ने भी प्रधानमंत्री की बातों को तथ्यात्मक आधार से रहित बताया। इस प्रकार बालेन्द्र शाह का बयान भारत से अधिक नेपाल के भीतर ही विवाद का विषय बन गया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pm-balen-shah-statement-pertained-solely-to-the-no-man-land-and-illegal-encroachment" target="_blank">Nepal India Border Dispute | सीमा विवाद पर मचे बवाल के बीच नेपाल की सफाई! 'पीएम बालेंद्र शाह का बयान केवल 'नो-मैन्स लैंड' और अवैध कब्जे को लेकर था</a></h3><div>दरअसल, सीमा विवाद का केंद्र लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र हैं। नेपाल का दावा है कि सुगौली संधि के अनुसार काली नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है, इसलिए उसके पूर्व का पूरा क्षेत्र नेपाली भूभाग है। दूसरी ओर भारत का कहना है कि काली नदी का वास्तविक उद्गम लिपुलेख दर्रे के नीचे स्थित स्रोतों से होता है और ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार कालापानी क्षेत्र लंबे समय से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा रहा है। यही मूल विवाद दोनों देशों के दावों की जड़ में है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि विवाद को हाल में उस समय नया मोड़ मिला जब नेपाल ने लिपुलेख मार्ग से होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा पर आपत्ति जताते हुए भारत और चीन दोनों को कूटनीतिक नोट भेजा। भारत ने इस आपत्ति को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि लिपुलेख मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा 1954 से लगातार संचालित हो रही है और यह कोई नया घटनाक्रम नहीं है। भारत ने यह भी दोहराया कि एकतरफा तरीके से क्षेत्रीय दावों का विस्तार न तो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है और न ही स्वीकार्य है।</div><div><br></div><div>उधर, बालेन्द्र शाह के बयान पर विवाद खड़ा होने के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने सफाई देते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री का आशय यह नहीं था कि नेपाल ने आधिकारिक रूप से भारतीय भूमि पर कब्जा किया है। मंत्रालय के अनुसार सीमा के कुछ हिस्सों में सीमा स्तंभों की कमी, दशगजा क्षेत्र और सीमापार भूमि उपयोग जैसी व्यावहारिक समस्याओं के कारण ऐसी स्थितियां उत्पन्न हुई हैं जहां दोनों ओर के लोग एक-दूसरे की जमीन का उपयोग करते रहे हैं। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि दोनों देश कूटनीतिक बातचीत, तकनीकी सर्वेक्षण और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर समाधान खोजने के लिए प्रतिबद्ध हैं।</div><div><br></div><div>लेकिन सबसे अधिक हैरानी प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के उस सुझाव पर हुई जिसमें उन्होंने सीमा विवाद के समाधान में ब्रिटेन की भागीदारी की बात उठाई। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान सीमाओं की पृष्ठभूमि औपनिवेशिक काल से जुड़ी है, इसलिए ब्रिटेन को भी इस विषय में रुचि लेनी चाहिए। यह प्रस्ताव न केवल व्यावहारिक दृष्टि से कमजोर माना गया बल्कि नेपाल के भीतर भी इसे अपरिपक्व और अनावश्यक बताया गया। भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद हमेशा द्विपक्षीय ढांचे में चर्चा का विषय रहा है। ऐसे में तीसरे पक्ष को बीच में लाने की बात कूटनीतिक परंपराओं और स्थापित समझ से मेल नहीं खाती।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, सीमा विवाद जैसे संवेदनशील और पूर्णतः द्विपक्षीय विषय में ब्रिटेन को शामिल करने का सुझाव बालेन्द्र शाह की कूटनीतिक नासमझी का ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन था जिसने कई जानकारों को हैरान कर दिया। भारत दशकों से स्पष्ट करता आया है कि वह अपने किसी भी द्विपक्षीय विवाद में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता या दखल को स्वीकार नहीं करता, चाहे मामला पाकिस्तान का हो, चीन का हो या नेपाल का। ऐसे में ब्रिटेन को बातचीत की मेज पर बुलाने का प्रस्ताव शुरू से ही अव्यावहारिक और वास्तविकताओं से कटा हुआ नजर आया। जिस देश ने दो शताब्दियों पहले उपमहाद्वीप छोड़ दिया, उसे आज की सीमा वार्ताओं में घसीटने की कोशिश को कई पर्यवेक्षकों ने राजनीतिक अपरिपक्वता बताया। दिलचस्प यह है कि बालेन्द्र शाह की इस टिप्पणी पर केवल नेपाल में ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन के रणनीतिक और दक्षिण एशियाई मामलों पर नजर रखने वाले हलकों में भी हैरानी जताई गई और इसे अव्यावहारिक सोच का उदाहरण माना गया। कूटनीति की दुनिया में जहां गंभीरता, तैयारी और यथार्थवादी दृष्टिकोण की अपेक्षा की जाती है, वहां बालेन्द्र शाह का यह सुझाव कई लोगों को ऐसा लगा मानो किसी जटिल अंतरराष्ट्रीय विवाद के समाधान के लिए इतिहास की धूल झाड़कर ऐसे पात्रों को मंच पर बुलाने की कोशिश की जा रही हो जिनकी अब उस प्रक्रिया में कोई वास्तविक भूमिका ही नहीं बची है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो सामरिक दृष्टि से लिपुलेख क्षेत्र का महत्व अत्यंत गहरा है। यह भारत, नेपाल और चीन के त्रिसीमा क्षेत्र के निकट स्थित है। यह केवल धार्मिक यात्रा का मार्ग नहीं बल्कि हिमालयी क्षेत्र में संपर्क, निगरानी और रणनीतिक पहुंच का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। चीन की बढ़ती सक्रियता और हिमालयी क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच यह इलाका राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से और भी संवेदनशील हो गया है। इसलिए इस क्षेत्र से जुड़ा कोई भी राजनीतिक बयान केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहता बल्कि उसके व्यापक सामरिक प्रभाव भी होते हैं।</div><div><br></div><div>नेपाल के प्रधानमंत्री का बयान इसी कारण अधिक विवादास्पद बन गया। बिना पर्याप्त तैयारी और तथ्यों की मजबूत प्रस्तुति के ऐसे संवेदनशील विषयों पर टिप्पणी करना न केवल कूटनीतिक भ्रम पैदा करता है बल्कि अपने ही देश की आधिकारिक स्थिति को कमजोर भी कर सकता है। यही कारण है कि उनकी टिप्पणियों के तुरंत बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय को स्पष्टीकरण देना पड़ा और देश के अनेक राजनीतिक तथा कूटनीतिक विशेषज्ञों ने उनकी आलोचना की।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह पूरा प्रकरण एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। भारत और नेपाल के बीच सीमा से जुड़े मतभेद अवश्य हैं, लेकिन दोनों देशों ने बार-बार बातचीत और कूटनीति के माध्यम से समाधान की प्रतिबद्धता जताई है। ऐसे समय में भावनात्मक या बचकाने राजनीतिक बयान समाधान का रास्ता नहीं खोलते, बल्कि अनावश्यक भ्रम और विवाद को जन्म देते हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की हालिया टिप्पणियां इसी का उदाहरण बन गई हैं, जहां भारत पर निशाना साधने की कोशिश से अधिक नुकसान उन्हें अपने ही देश के राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में उठाना पड़ा है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 13:52:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/nepal-pm-balendra-shah-faces-backlash-over-india-border-remarks</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/1/balendra-shah_large_1352_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कमजोर मानसून तो महंगाई का लगेगा तड़का, अर्थव्यवस्था होगी प्रभावित]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/a-weak-monsoon-will-add-fuel-to-inflation-and-the-economy-will-be-impacted]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मौसम विभाग द्वारा 29 मई को जून से सितंबर मानसून के दौरान 10 प्रतिशत कम बरसात का पूर्वानुमान बेहद चिंताजनक का कारण बन गया है। इससे पहले जारी पूर्वानुमान में 8 प्रतिशत कम बरसात की संभावना व्यक्त की गई थी। लगभग दस साल बाद देश में कमजोर मानसून के हालात रहने की संभावना है। अर्थव्यवस्था के लिए यह इसलिए और भी अधिक चिंतनीय हो जाता है कि एक और अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच सीजफायर के आसार नहीं दिख रहे हैं और इसके कारण भारत सहित दुनिया के अधिकांश देश कच्चे तेल और गैस की समस्या से दो चार हो रहे हैं और इसका सीधा असर महंगाई बढ़ना हो रहा है। दूसरी और अब अलनीनों के प्रभाव से इस साल कमजोर मानसून के कारण 10 प्रतिशत कम बरसात होने से हालात और भी गंभीर होने की संभावना बनती जा रही है। करीब दस साल बाद ऐसे हालात बनने जा रहे हैं। खास बात यह है कि उत्तर पूर्व को छोड़कर समूचे देश में कम बरसात की संभावना व्यक्त की गई है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान को इसलिए भी नहीं नकारा जा सकता है कि पिछले सालों में भारतीय मौसम विभाग के पूर्वानुमान लगभग सटीक रहने लगे हैं। मजे की बात यह है कि इस साल गर्मी भी भीषण पड़ रही है और पिछले एक माह में ही जलाशयों में उपलब्ध पानी में तेजी से कमी आई है। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश के प्रमुख 166 जलाशयों में कुल भराव क्षमता का 24 प्रतिशत के आसपास ही पानी रह गया है और तेजी से पानी कम होता जा रहा है। दक्षिण भारत के हालात अधिक गंभीर है और वहां लगभग 17 प्रतिशत ही पानी रह गया है। उत्तरी भारत के जलाशयों में 26 तो पश्चिमी भारत के जलाशयों में 28 प्रतिशत के आसपास ही पानी रह गया है। मानसून भी तय समय से बिलंबित हो रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>एक बात साफ हो जानी चाहिए कि हमारी अर्थव्यवस्था मानसूनी बरसात पर बहुत कुछ निर्भर करती है। देश में मानसून सीजन में 87 सेमी बरसात होती है। पूर्वानुमानों को माने तो 2018 में 91 प्रतिशत बरसात हुई थी उसके बाद के सालों में मानसून लगभग अच्छा ही रहा है। पिछले सालों में मानसून की स्थिति देखें तो 2023 में मानसून अवश्य कमजोर रहा है अन्यथा देश में मानसूनी वर्षा 100 प्रतिशत के आसापास व इससे अधिक ही रही है। कमजोर मानसून के कारण भूजल स्तर में गिरावट, अधिक पानी पर निर्भर धान, तिलहन और दलहन की फसल प्रभावित होगी और इस कारण से खाद्य महंगाई बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता। इससे आम आदमी की थाली पर असर पड़ेगा और सब्जी, दाल और अनाज सभी के भाव बढ़ने का असर दिखाई देगा। इसी तरह से देश के अनेक हिस्सों में पीने के पानी की दिक्कत आम है। बांधों में तेजी से पानी की कमी और मानसून कमजोर रहने से पानी की कम आवक रहती है तो निश्चित रुप से सिंचाई व पेयजल दोनों के लिए पानी की दिक्कत होगी। जल विद्युत परियोजनाओं में विद्युत उत्पादन पर असर होगा तो कुल मिलाकर अर्थ व्यवस्था को प्रभावित होने से कोई नहीं रोक सकता।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/will-ai-cause-the-mass-extinction-of-humanity" target="_blank">क्या एआई मानवता के महाविनाश का कारण बनेगी?</a></h3><div>दरअसल देश में एक समय था जब सूखा आम होता था और व्यापक स्तर पर अकाल राहत कार्य संचालित होते थे। हांलाकि देश के हालातों में काफी सुधार हुआ है और अकाल को तो लगभग भूल ही चुके हैं। पर सवाल वहीं का वहीं है कि जल संचयन के जो प्रयास होने चाहिए थे और उनका जिस तरह का प्रभाव पड़ना चाहिए था वह अभी तक सामने नहीं आया है। सरकार के सामने कमजोर मानसून के हालात से निपटने की बड़ी चुनौती आने वाली है। सबसे अधिक तो जल संग्रहण की चुनौती होगी क्योंकि प्राकृतिक जल संग्रहण के रास्ते शहरीकरण की भेंट चढ़ चुके हैं। दीर्घकालीन सोच के साथ ठोस प्रयास नहीं होने से बरसात के पानी का सही तरीके से संग्रहण भी नहीं हो पा रहा है। जितने पानी की साल भर आवश्यकता होती है उससे अधिक बरसाती पानी तो बह जाता है। इसके अलावा पानी का उपयोग और दुरुपयोग दोनों ही बढ़ गए हैं। कम पानी से तैयार होने वाली फसलों की किस्में विकसित करने में हम अभी पूरी तरह से सफल नहीं हो पायें हैं। पांच नदियों के प्रदेश पंजाब तक में पानी का संकट होने लगा है। खेती ही नहीं घरेलू जरुरतों में भी पानी का उपयोग बहुत अधिक बढ़ गया है। टायलेट और कूलरों में पानी की खपत बहुत अधिक बढ़ गई है। जल बचाओ मात्र स्लोगन ही रह गया है और इसका असर दिखाई नहीं देता। इसी तरह से वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम तैयार तो बहुत किये गये हैं पर उनके निर्माण में जिस तरह की लापरवाही बरती गई है वह किसी से छिपी नहीं हैं। क्योंकि वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम कितना सफल रहा है वह सामने हैं। बाहरमासी नदी नालें तो अब कल्पना की बात हो गए हैं बल्कि बरसाती नदियां भी बरसात में एकाध बार ही पूरे वेग से बहती दिखती है। ऐसे में गंभीरता को तो समझा ही जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>एक बात साफ हो जानी चाहिए कि मानसून हमेशा सामान्य ही रहेगा यह सोचना अपने आप में गलत होगा। जिस तरह से वातावरण प्रदूषित हो रहा है, जंगल घटते जा रहे हैं, पेड़ पौधे कम हो रहे हैं वह किसी और की देन नहीं हमारे कारण ही हो रहा है। हालात यह हो गए हैं कि सर्दी में सर्दी नहीं और गर्मी में गर्मी को तरसने लगे हैं। यहां तक कि इस बार तो बसंत की प्रतीक्षा ही करते रह गए हैं। जनवरी फरवरी में सर्दी तो फिर मार्च अप्रेल में गर्मी का असर देखा गया। बसंत कब आया और कब गया पता ही नहीं चला। कहने का अर्थ है कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का परिणाम सामने हैं। प्राकृतिक विपदाएं अधिक होने लगी है। ग्लेसियरों में तेजी से बर्फ पिघल रही है, समयपर बर्फवारी कम होने लगी है। बेमौसम आंधी ओलावृष्टि आम होती जा रही है। खैर यह विषयांतर होगा पर कहीं ना कहीं मानसून को लेकर दीर्घकालीन रणनीति बनानी ही होगी ताकि कमजोर मानसून का जनजीवन और अर्थ व्यवस्था पर व्यापक असर नहीं पड़े। सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर इस दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे।</div><div>&nbsp;</div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 13:46:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/a-weak-monsoon-will-add-fuel-to-inflation-and-the-economy-will-be-impacted</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/1/indian-economy_large_1347_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[रील्समय सब जग जानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-whole-world-knows-it-to-be-fleeting]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सियाराम मय सब जग जानी...</div><div><br></div><div>तुलसी के लिए समूचा विश्व ही श्रीराम और सीता की तरह रहा। आज की पत्रकारिता पर जिधर भी नजर फिराएं, कुछ उसी तरह टीवी मय ही लगती है। लगता नहीं कि मीडिया की की दुनिया में अखबार भी हैं, पत्रिकाएं भी हैं, रेडियो भी है और सबसे अहम इंटरनेट भी है। दो सौ साल की हिंदी पत्रकारिता का इतिहास गरिमा के सोपानों से भरा हुआ है। नवजागरण को बढ़ावा देने, राष्ट्र निर्माण और सार्वजनिक जीवन मूल्यों की स्थापना में हिंदी पत्रकारिता ने महती भूमिका निभाई है। स्वाधीनता आंदोलन की कोख से उपजी हिंदी पत्रकारिता ने स्वाधीनता की लड़ाई भी लड़ी, हिंदी भाषा और साहित्य के उत्थान का माध्यम भी बनी, लेकिन दो सौ साल की यात्रा के उपरांत बाद के वर्षों के उसके इतिहास को देखते हैं तो वह सिर्फ टीवीमय नजर आती है, टीवी से भी आगे बढ़कर वह रीलमय नजर आती है। छापे से शुरू हिंदी पत्रकारिता का यह रूप छापे और रेडियो की उपस्थिति के बावजूद आज वह रील्स के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है। टेलीविजन तक तो स्थिति ठीक थी, लेकिन उसके बाद की जब तकनीक के सहारे टीवी की दुनिया में चुपके से रील्स ने दखल देनी शुरू की तो स्थितियां बदलने लगीं। हर नई तकनीक की अपनी कुछ खासियत होती है और इसके साथ ही वह अपना चरित्र भी विकसित करती है। रील्स का जो चरित्र विकसित हुआ है, उसमें उथलापन ज्यादा है, गंभीरता कम है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसे समझने के लिए छापा यानी प्रेस से मीडिया तक की यात्रा को गंभीरता से देखना और समझना होगा। रेडियो के आविष्कार और फिर टेलीविजन के विस्तार के पहले तक पत्रकारिता की बुनियाद में छापेखाने ही रहे। शुरूआती दौर में पत्रकारिता को प्रेस इसी वजह से कहा गया। जब तक उसकी पहचान के साथ प्रेस जुड़ा रहा, उसके प्रति विशिष्टताबोध बना रहा। टेलीविजन के विस्तार और बजरिए इंटरनेट माध्यमों की आवाजाही ने इस विशिष्टाबोध युक्त पहचान को मीडिया में रूपांतरित कर दिया है। इस यात्रा में मोटे तौर पर पत्रकारिता के दो रूप दिखते हैं। स्वाधीनता आंदोलन की कोख से जन्मे छापे की पत्रकारिता कोख में मिले संस्कारों को अब तक कमोबेश अपनाए रखा है। बाद में आए रेडियो और टीवी में तकनीक भले ही प्रधान रहा,लेकिन उनके मूल में भी छापे की ही पत्रकारिता रही। इसके बावजूद तकनीक प्रधान और अत्याधुनिक माध्यम टीवी छापे की बुनियादी मूल्यों से काफी दूर दिखता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-state-and-direction-of-hindi-journalism" target="_blank">Hindi Journalism Day: हिन्दी पत्रकारिता की दशा और दिशा</a></h3><div>उदंत मार्तंड के प्रकाशक और संपादक जुगल किशोर शुक्ल हों या बंगाल गजट निकालने वाले जेम्स ऑगस्टस हिक्की, उन्हें अखबार निकालने का गहरा युगबोध था। लेकिन उन्हें पता था कि वह जो कार्य करने जा रहे हैं, वह बेहद दुष्कर है। उनके सामने संसाधनों की ही चुनौतियां ही नहीं थी, पाठक जुटाना और अपने छापे की बात उन तक पहुंचाना भी आसान नहीं था। उन्हें आभास था कि उनकी खरी बातों को तत्कालीन विदेशी सत्ता स्वीकार नहीं करेगी। संसाधनों के अभाव और सरकारी सहयोग नहीं मिलने की वजह से ही उदंत मार्तंड असमय कालकवलित हो गया। उसे संसाधन या सरकारी सहयोग इसलिए नहीं मिले, क्योंकि उसका स्वर भारतोन्मुखी था, वह हिंदी समाज के हित के हेत निकल रहा था, उसे भारतीय मूल्यों की चिंता थी और भारतीय समाज के नवजागरण में वह भागीदार बनना चाहता था। यह कहानी उदंत मार्तंड तक ही सीमित नहीं रही। बाद के दिनों में भी हिंदी में तमाम समाचार पत्र निकले और बंद होते रहे। इस लिहाज से कह सकते हैं कि हिंदी पत्रकारिता का इतिहास नवजागरण का ही इतिहास नहीं है, अखबारों के निकलने और बंद बंद होने के सिलसिले का भी इतिहास है। लेकिन इस सिलसिले में भी समानता दिखती है, पत्रों का मूल उद्देश्य भारतीय मूल्यों, स्वाधीन सोच के लिए जागरण पैदा करना और राष्ट्र हित पर खुद को तिरोहित करना ज्यादातर पत्रों के प्रकाशन के मूल में दिखता है। कह सकते हैं कि हिंदी पत्रकारिता के जीन यानी गुणसूत्र में तिरोहित होने का ही भाव रहा है। यही वजह है कि हिंदी पत्र खतरा उठाते हुए भारतीयता की बात करना और सार्वजनिक हित का सवाल उठाना अपना पुनीत कर्तव्य मानते रहे।&nbsp;</div><div><br></div><div>बेशक आज के समाचार पत्र भी सवालों के घेरे में हैं, लेकिन सवालों में आना सिर्फ अखबारी संस्थानों और उनके कर्ताधर्ताओं की सोच का ही मसला नहीं है, बल्कि उदारीकरण के बाद बढ़ी अर्थप्रधानता और पूंजी के खेल से उपजी मजबूरी भी है। फिर भी जब तुलनात्मक रूप से देखते हैं कि स्वाधीनता आंदोलन के साथ जिन मूल्यों को भारतीय समाज ने स्वीकार किया और आत्मसात किया है, उन्हें अब भी अखबारों ने ही आत्मसात कर रखा है। इनकी तुलना में टीवी की पत्रकारिता कहीं ज्यादा चंचल और चलायमान नजर आती है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>पत्रकारिता के जब भी नए माध्यम सामने आए, पुराने माध्यम के खात्मे की आशंका जताई जाती रही। हालांकि नए माध्यम के किंचित गुणों के साथ प्रतियोगिता और साम्यता बरतते हुए पुराने माध्यम ने जहां खुद को ज्यादा प्रतियोगी बनाया। हर नए माध्यम के अवतार और विकास के मूल में नई तकनीक रही है। तकनीक की एक विशेषता है, हर नई तकनीक हमेशा पुरानी के मुकाबले ज्यादा प्रभावी होती है। इस लिहाज से छापे के बाद आए रेडियो ने लोगों को ज्यादा लुभाया। लेकिन रेडियो के साथ प्रतियोगिता में छापे ने हार नहीं मानी और उसके बरक्स खुद को भी पहले तुलना में ज्यादा गतिमान बनाया, अपने कंटेंट और प्रस्तुति में विविधता और नवीनता की खोज की। इसके बाद अखबारों का प्रसार बढ़ा, रेडियो को तो वैसे ही अपनी नई तकनीक के चलते आगे बढ़ना ही था।&nbsp;</div><div><br></div><div>जब टेलीविजन ने मीडिया की दुनिया में अगले चरण के रूप में कदम रखा, दोनों पुराने माध्यमों के खात्मे की आशंका जताई जाने लगी। हालांकि कोई खत्म नहीं हुआ, रेडियो ने खुद के लिए नई तकनीक यानी फ्रीक्वैंसी मॉड्युला यानी एफएम की ईजाद कर ली और अपने लिए जीवन की नई राह खोज ली तो अखबारों ने अपने पन्ने टेलीविजन के पर्दे की तरह चमकादार और दृश्यवान बनाने लगे। अखबारों पर विजुअल का प्रभाव फोटो और चित्रों के विस्तार के रूप में दिखा। इसके असर से अखबार अब भी बचे हुए हैं, रेडियो भी जिंदा है और टेलीविजन भी विस्तृत हो चुका है। लेकिन जिसे हम टेलीविजन कहते हैं, जिसमें एक पर्दा होता है, उसे चुनौती रील्स और ऐसे ही शॉर्ट वीडियो माध्यमों से मिल रही है। टेलीविजन को पहले इंटरनेट से चुनौती मिली, लेकिन बाद के दिनों इंटरनेट ने खुद में मीडिया के हर फॉर्मेट को समाहित कर लिया। इसी बीच रील्स और टिकटैक जैसे शॉर्ट फॉर्मेट आ गए और टेलीविजन को भी चुनौती मिलने लगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>मीडिया के शुरूआती दोनों माध्यम जहां मूल्यों और संघर्ष की कशमकश वाले दौर में पैदा हुए, पले और बढ़े, इसलिए उनके चरित्र पर मूल्यों और संघर्ष का असर दिखता है। लेकिन टेलीविजन का वैश्विक प्रसार आर्थिक उदारीकरण के दौर में हुआ है। इसलिए उसने उदारीकरण की विशेषताओं को भी आत्मसात कर लिया है। उदारीकरण की पहली शर्त चमक-दमक और शोशेबाजी है। भारतीय परिदृश्य में जब टेलीविजन माध्यम विकसित हो रहा था, तब हिंदी के गंभीर पत्रकारों ने इससे दूरी बनाए रखी। उन्होंने तब इसे दोयम दर्जे का माध्यम माना और उसकी उपेक्षा की। उन्हें ऐसा लगा कि यह गंभीर पत्रकारिता का माध्यम नहीं हो सकता।&nbsp;</div><div><br></div><div>विज्ञान में निर्वात का सिद्धांत है। यानी कोई भी जगह निर्वात नहीं रह सकती, उसकी जगह भरने के लिए नई हवा आ ही जाती है। यह सिद्धांत हर जगह लागू होता है। टीवी की दुनिया से गंभीर लोगों ने दूरी बनाई तो उनकी जगह भरने के लिए वे सारे लोग आ गए, जिन्हें मुख्यधारा की पत्रकारिता स्वीकार नहीं कर रही थी। इसका असर यह हुआ कि उन्होंने गंभीरता की बजाय दृश्यों के लिए माकूल नाटकीयता को अपनाया, उन्होंने पत्रकारिता के बुनियादी मूल्यों की बजाय पारसी नौटंकी शैली की संवाद अदायगी और नाटकीयता पर जोर दिया। आज यह नाटकीयता ही भारतीय टेलीविजन की मुख्यधारा है। हालांकि जिन देशों में टीवी भारत की तुलना में कहीं ज्यादा विकसित हुआ, जहां उसका आविष्कार हुआ, वहां टेलीविजन की पत्रकारिता पर छापे की पत्रकारिता जैसी गंभीरता दिखती है, वहां के खबरिया टीवी के पर्दे नाटकीयता से युक्त नहीं हैं। भारतीय परिदृश्य में एक और तथ्य को भी याद रखा जाना चाहिए। टीवी में बड़ी पूंजी लगती है, इसलिए इस पूंजी की वापसी की गारंटी भी चाहिए होती है, नाटकीयता इस वापसी की गारंटी देती प्रतीत होती है। इसलिए यह नाटकीयता बढ़ी हुई है। इस विकास के मूल में आर्थिक उदारीकरण के साथ आए जीवन मूल्य भी हैं। आर्थिक फायदे के चलते इस माध्यम ने सनसनी को भी हथियार बना लिया है। चूंकि यह दृश्य प्रधान माध्यम है, इसलिए यहां गंभीरता और गुणों पर नहीं, खूबसूरत और प्रभावी दृश्यों पर जोर है। रील्स ने इसे और बढ़ावा ही दिया है। जहां लटके-झटके भी हैं और हल्की सोच भी।&nbsp;</div><div><br></div><div>विजुअल छापे की तुलना में हमेशा ज्यादा प्रभावी होते हैं, अगर वे चलायमान हैं तो उनकी प्रभावोत्पादकता की गति भी बढ़ जाती है। इन गुणों के चलते इस माध्यम का प्रभाव ज्यादा है, उसमें त्वरा है, इसलिए सिनेमा से लेकर खेल और राजनीति तक की दुनिया इसकी ओर खिंची जा रही है। जब तक भारतीय राजनीति पर स्वाधीनता आंदोलन की कोख से निकली सियासी ताकतों का दबदबा था, उथलापन उसे अस्वीकार्य था। तब दिखावे के लिए ही सही, राजनीति को गंभीर, विचारवान और संजीदा कारक पसंद थे। राजनीति के लिए शोशेबाजी और नाटकीयता त्याज्य विषय थे। लेकिन उदारीकरण के बाद राजनीति ने भी नए मूल्यों को ग्रहण कर लिया है। इसका असर उसकी मीडिया समझ और उसके इस्तेमाल पर भी दिखता है। टेलीविजन की पत्रकारिता ने शब्दों का आडंबर रचने में महारत हासिल कर ली है, शोर-शराबा उसकी विशेषता बन चुकी है और इस शोर में मुद्दे कहीं खो चुके हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसीलिए आज राजनीति की भी पहली पसंद, शोशेबाज, नाटकीय और त्वरा वाला टेलीविजन माध्यम और उसका विस्तार रील्स बन चुका है। एक कहावत है, नाचे गावे तूरे ताने, वाके दुनिया राखे मान। तो इस दौर में इस तान छेड़ने वाले माध्यम का चहुंओर बोलबाला है। आज मीडिया का मतलब टीवी तक सिमट गया है। राजनीति इसे खूब बढ़ावा भी दे रही है। लेकिन यह भी सच है कि जब राजनीति को गंभीर बात कहनी होती है तो उसे अखबार ही याद आते हैं, विशेषकर उसके संपादकीय पृष्ठ। आजकल यह खूब दिख रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ मीडिया समीक्षक हैं..</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 30 May 2026 12:26:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-whole-world-knows-it-to-be-fleeting</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/5/30/hindi-journalism-day_large_1226_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[“फ्लेक्सिबल जियोपॉलिटिक्स” के अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक निहितार्थ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-international-diplomatic-implications-of-flexible-geopolitics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>"लचीली भूराजनीति” यानी फ्लेक्सिबल जियोपॉलिटिक्स का जन्मदाता भारत की देखा-देखी अब पूरी दुनिया में इसका प्रचलन बढ़ रहा है। इसे मोदी डॉक्ट्रिन कहना ज्यादा उचित होगा, जो गुटनिरपेक्षता का हाइब्रिड पालिसी संस्करण है। आम कहानी वाली भाषा में कहें तो “खुल जा सिमसिम और बंद हो जा सिमसिम” वाली वैश्विक कूटनीति ही अब लचीली भूराजनीतिक बन चुकी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दरअसल, फ्लेक्सिबल जियोपॉलिटिक्स यानी लचीली भूराजनीति का अर्थ ऐसी अवसरवादी विदेश नीति से है, जिसमें देश अपने हित के अनुसार कभी दोस्ती का दरवाज़ा खोलते हैं और कभी तुरंत बंद कर लेते हैं। आज की दुनिया में यही “फ्लेक्सिबल जियोपॉलिटिक्स” तेजी से बढ़ रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/secret-ib-report-4-border-visits-in-20-days-is-amit-shah-planning-something-big" target="_blank">IB की सीक्रेट रिपोर्ट, 20 दिन में 4 बार बॉर्डर Visit, अमित शाह कुछ बड़ा प्लान कर रहे हैं?</a></h3><div>जिसके सफल उपयोगकर्ता टीम पीएम मोदी हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ भारत जैसे उन देशों को होता है जो आर्थिक रूप से शक्तिशाली हों, तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर हों, सैन्य रूप से सक्षम हों, और बहुध्रुवीय दुनिया में संतुलन साधना जानते हों। यही वजह है कि भारत इसे अपनाकर दुनिया के शीर्षस्थ देशों की कतार में शामिल होने की दिशा में बढ़ता जा रहा है।</div><div><br></div><div>सवाल है कि आखिर इससे किसका भला होगा? तो इसके कई जवाब होंगे, जिनमें पहला है महाशक्तियों का सबसे अधिक लाभ: संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और आंशिक रूप से रूस-भारत जैसी शक्तियाँ इस नीति से सबसे अधिक फायदा उठाती हैं। पूर्वक सवाल है क्यों? तो सीधा सा जवाब है कि वे परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन बदल सकती हैं। आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य दबाव और तकनीकी नियंत्रण का इस्तेमाल कर सकती हैं। “मित्र” और “प्रतिद्वंद्वी” दोनों से व्यापार जारी रख सकती हैं। उदाहरण: अमेरिका, चीन से प्रतिस्पर्धा भी करता है और व्यापार भी। चीन रूस का साझेदार है लेकिन पश्चिमी बाजार भी नहीं छोड़ना चाहता। वहीं, रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद एशियाई देशों से संबंध मजबूत कर रहा है।</div><div><br></div><div>दूसरा, मध्यम शक्तियों का भी फायदा: भारत, तुर्किये, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देश “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति से लाभ उठा रहे हैं। भारत इसका बड़ा उदाहरण है, जो क्वाड (Quad) में भी है, ब्रिक्स (BRICS) में भी, रूस से रक्षा सहयोग भी रखता है, और अमेरिका से तकनीकी साझेदारी भी बढ़ाता है। इससे रणनीतिक स्वतंत्रता बनी रहती है, निवेश कई दिशाओं से आता है, और वैश्विक मंचों पर प्रभाव बढ़ता है।</div><div><br></div><div>तीसरा, कॉर्पोरेट और टेक कंपनियों को बड़ा लाभ: एप्पल (Apple), टेस्ला (Tesla), माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) जैसी वैश्विक कंपनियाँ देशों की प्रतिस्पर्धा का लाभ उठाती हैं। क्योंकि देश उन्हें निवेश आकर्षित करने के लिए टैक्स छूट देते हैं, सप्लाई चेन अपने यहाँ लाने की कोशिश करते हैं, और टेक्नोलॉजी कंपनियों को रणनीतिक साझेदार मानते हैं।</div><div><br></div><div># सवाल है कि ऐसी मतलबी कूटनीति से नुकसान किसका? तो जवाब होगा कि-&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, छोटे और कमजोर देशों का: अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और छोटे एशियाई देशों पर दबाव बढ़ता है कि वे किसी एक खेमे का समर्थन करें। वे कर्ज जाल, प्रतिबंध, राजनीतिक दबाव, और सामरिक प्रतिस्पर्धा के बीच फँस जाते हैं।</div><div><br></div><div>दूसरा, वैश्विक स्थिरता का: ऐसी कूटनीति में भरोसा कम होता है। देश स्थायी मित्र नहीं बल्कि “तात्कालिक हित” देखते हैं। इससे युद्धों की आशंका बढ़ती है, व्यापारिक तनाव बढ़ता है, और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ कमजोर पड़ती हैं।</div><div><br></div><div>भारत के लिए क्या संदेश?</div><div><br></div><div>वहीं, भारत के लिए यह दौर अवसर भी है और चुनौती भी। यदि भारत नवाचार, निर्माण, रक्षा आत्मनिर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा, और तकनीकी क्षमता को मजबूत करता है, तो वह इस बदलती दुनिया में “संतुलनकारी शक्ति” बन सकता है। लेकिन यदि आर्थिक और तकनीकी शक्ति पर्याप्त न हो, तो ऐसी “खुल जा सिमसिम” कूटनीति में बड़े देश छोटे देशों को केवल रणनीतिक मोहरे की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं।</div><div><br></div><div>निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि इस प्रकार की वैश्विक कूटनीति का सबसे बड़ा लाभ उन्हीं देशों और कंपनियों को मिलेगा जिनके पास शक्ति, पूँजी, तकनीक और विकल्प हैं। जबकि कमजोर देशों के लिए यह अनिश्चितता, दबाव और निर्भरता का नया युग भी बन सकता है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 29 May 2026 16:22:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-international-diplomatic-implications-of-flexible-geopolitics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/5/29/flexible-geopolitics_large_1623_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[दिल्ली जनजातीय सम्मेलन- अस्मिता, अधिकार का आधुनिक उलगुलान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/delhi-tribal-conference-a-modern-ulgulan-for-identity-and-rights]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भील और भारिया की दो कहावतें हैं - भील कहते हैं, "होने नी रेत, ने खोने नो डर” और भारिया कहते हैं&nbsp; "डोकरी मरिगे त कए घलो, बाकी राकस घर नई देखे।" इन दो जनजातीय कहावतों में लालकिले से जनजातीय संदेश का सार छिपा है। भील कहावत का अर्थ है - “जिसके पास सोने की रेत नहीं, उसे खोने का डर क्या?” जनजातीय समाज के लिए अब ये एक भुला-बिसरा चिंतन है। अब केवल भील नहीं अपितु देश के प्रत्येक जनजातीय, वनवासी, गिरिवासी समाज को पता है कि उसके पास खोने को एक स्वर्ण खदान से भी अधिक समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा है। इस जनजातीय सांस्कृतिक संपदा, उनकी वन संपदा, उनकी श्रम संपदा का अनैतिक दोहन बहुत हुआ!&nbsp; और भारिया कहावत का अर्थ है - “बुढ़िया मर गई तो कोई बात नहीं, लेकिन राक्षस को घर का रास्ता नहीं देखना चाहिए”। जनजातीय समाज ने संसद के समक्ष सीना ठोककर कहा - “हमारे समाज को तोड़ने के लिए विदेशी शक्तियों, ईसाईयत, इस्लाम और वामपंथी विचारकों रूपी 'राक्षस' ने जो लाल जाल बुना है, उसे अब हमने पहचान लिया गया है। अब हम उसे अपने घर की रह नहीं दिखायेंगे।&nbsp;&nbsp;</div><div>&nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div>लालकिले से यह जनजातीय उद्घोष है - “अब दोहन, शोषण और नहीं, अब मतांतरण और नहीं, अब सनातन की आलोचना सहन नहीं, अब हमारी भाषा, नृत्य, संगीत, पूजा पद्धति, का विरूपण सहन नहीं”।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/delhi-temperature-rose-fueled-by-the-flame-of-tribal-devotion" target="_blank">जनजातीय धर्मभक्ति की ज्वाला से बढ़ा दिल्ली का तापमान</a></h3><div>रविवार को दिल्ली के लालकिले पर संपन्न विशाल जनजातीय सम्मेलन केवल पारंपरिक वेशभूषा, मांदल, खजरी आदि की थाप पर नृत्य और सांस्कृतिक वैभव का प्रदर्शन मात्र नहीं था, बल्कि यह भारत के मूल समाज द्वारा अपनी पहचान, संस्कृति और अधिकारों की शंखध्वनि थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह सम्मेलन ऐसे समय में हुआ है सुदूर वनांचलों में रहने वाला हमारा जनजातीय समाज अपनी जल, जंगल और जमीन के साथ-साथ अपनी सनातन संस्कृति को बचाने के लिए चतुर्दिक संघर्ष कर रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संवैचारिक, वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा कई दशकों से उठाए जा रहे मुद्दे अब राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में हैं। सम्मेलन की गठी हुई भाषा और प्रखर स्वर ने यह साफ कर दिया कि जनजातीय समाज अब मूक दर्शक नहीं, बल्कि अपने भाग्य का विधाता स्वयं बनने को आतुर है।</div><div><br></div><div>लालकिले से वनवासी समाज ने प्रखरता, प्रचण्डता, प्रगल्भता और प्रबलता से&nbsp; 'डीलिस्टिंग' की अपनी पुरानी माँग का पुनरुद्घोष किया। आरएसएस सदा-सदा से यह कहता रहा है कि स्वधर्म छोड़कर ईसाइयत और इस्लाम को स्वीकारने वाले लोगों को अनुसूचित जाति, जनजाति से बाहर किया जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>ईसाई मिशनरियों ने व्यापक स्तर पर भोले-भाले जनजातीय समाज को बहला-फुसलाकर, आर्थिक लालच देकर, दबावपूर्वक; जैसे भी हो वैसे भी मतांतरण कराया है। देश में सतत चल रहे इस षड्यंत्रपूर्ण मतांतरण से झारखंड, छत्तीसगढ़ पूर्वोत्तर राज्य में ऐसे अनगिनत उदाहरण हो गए हैं जहां धर्मांतरित लोग दोहरे लाभ उठा रहे हैं। वे एक ओर अल्पसंख्यक होने के नाते सरकारी योजनाओं और विदेशों से आने वाले भारी-भरकम फंड (FCRA) का लाभ लेते हैं, वहीं दूसरी ओर जनजातीय कोटे से आईएएस, आईपीएस और अन्य ऊंचे पदों पर आसीन होकर विदेशी एजेंडे को लागू करते रहते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह कटु सत्य है कि अपनी मूल संस्कृति में रमे ठेठ वनवासी आज भी सुविधाओं से वंचित हैं। सम्मेलन में सीधे शब्दों में चेतावनी दी गई कि "जो अपनी संस्कृति और पुरखों के देवी-देवताओं को छोड़ चुका है, वह जनजातीय कहलाने का हकदार नहीं हो सकता।"</div><div><br></div><div>कुछ वर्षों से देश में कई प्रायोजित टूलकिट गिरोह सक्रिय हैं, जो जनजातीय समाज को बहका रही है कि "तुम हिंदू नहीं हो, इसलिए जनगणना के फॉर्म में खुद को हिंदू मत लिखाना।" लालकिले से&nbsp; जनजातीय समाज ने इस नैरेटिव का प्रखरता से खंडन किया है। यह षड्यंत्र मूलतः भारत की जड़ों को कमजोर करने का है। जनजातीय समाज प्रकृति पूजक है, और सनातन की आत्मा भी प्रकृति पूजा ही है। हम तुलसी, पीपल, सूर्य, नदी और गोवर्धन की पूजा करते हैं; और हमारे वनवासी भाई 'बूढ़ादेव', 'बड़ादेव' और जंगलों की पूजा करते हैं। शब्दों का अन्तर है, भाव हमारे एक हैं। भगवान राम के वनवास काल में निषादराज, शबरी और वानर-भालू (जो वनों के निवासी थे) उनके सहचर बने। भगवान शिव स्वयं 'किरात' (वनवासी) रूप धारण करते हैं। ऐसे में जनजातीय समाज को सनातन से अलग दिखाना एक गहरा जियोपालिटिकल षड्यंत्र है। यह भारत के भीतर 'सांस्कृतिक विभाजन' की नींव रखने का प्रयास है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दिल्ली के इस मंच से वक्ताओं ने झारखंड के संथाल परगना और छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए 'लव जिहाद' और 'लैंड जिहाद' के अत्यंत विषैले व घातक पैटर्न को उजागर किया।&nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div>&nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div>असम और झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों में बांग्लादेशी घुसपैठियों और एक विशेष समुदाय के लोगों द्वारा जनजातीय महिलाओं को बहला-फुसलाकर या जबरन निकाह करने के मामले तेजी से बढ़े हैं। यह प्रवृत्ति मप्र जैसे राज्यों में भी बड़ी तेजी से बढ़ी है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>चूंकि कानूनन कोई गैर-जनजातीय व्यक्ति जनजातीय की भूमि क्रय नहीं कर सकता, इसलिए इस कानून को धता बताने के लिए जनजातीय लड़कियों को मोहरा बनाया जाता है। निकाह के बाद जमीन उस महिला के नाम पर हस्तांतरित करा दी जाती है और परोक्ष रूप से उस भूमि पर नियंत्रण उस समुदाय का हो जाता है।</div><div><br></div><div>झारखंड की रुबिका पहाड़िन या अंकिता सिंह जैसी बेटियों के उदाहरण अभी ताज़ा हैं। यह केवल एक सामाजिक अपराध नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक जनसांख्यिकीय लड़ाई है जो आने वाले समय में देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।</div><div><br></div><div>वनवासी कल्याण आश्रम की प्रेरणा से ही मप्र में 'पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम' यानी पेसा कानून (PESA Act, 1996) का कार्य भली भाँति कार्य कर रहा है। पेसा कानून जनजातीय समाज को जल, जंगल और जमीन पर संप्रभुता का अधिकार देता है। लेकिन दुखद यह है कि कई राज्यों में नियम न बनने के कारण या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह कानून केवल कागजों तक सीमित रहा। सम्मेलन में मांग की गई कि वन खनिजों की नीलामी, उद्योगों के लिए भूमि अधिग्रहण और स्थानीय विवादों के निपटारे में ग्राम सभा की अनुमति को अनिवार्य और सर्वोपरि बनाया जाए। इसके साथ ही, सरकारी नौकरियों और शिक्षा में मिल रहे आरक्षण का लाभ सुदूर अंचलों में बैठे अंतिम व्यक्ति तक कैसे पहुंचे, इसके लिए नीतियों के सरलीकरण पर जोर दिया गया।</div><div><br></div><div>दिल्ली में हुआ यह जनजातीय सम्मेलन केवल माँग, शिकायत और आवेदनों का प्रकटीकरण नहीं था, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का घोषणापत्र था। भगवान बिरसा मुंडा, टंट्या भील, रानी दुर्गावती और जतरा भगत जैसी महान विभूतियों की विरासत को याद करते हुए इस बात पर संकल्प लिया गया कि अब जनजातीय समाज अपनी पहचान के साथ कोई समझौता नहीं करेगा।</div><div><br></div><div>अब समय आ गया है कि सरकारें, न्यायपालिका और नागरिक समाज इन चिंताओं को गंभीरता से लें। डीलिस्टिंग की मांग को ठंडे बस्ते में नहीं डाला जा सकता, और न ही लव जिहाद या मिशनरी षड्यंत्रों को 'धर्मनिरपेक्षता' के चश्मे से देखकर नजरअंदाज किया जा सकता है। अपनी जड़ों की ओर लौटता और सजग होता यह वनवासी समाज आज देश की मुख्यधारा को दिशा दिखाने की स्थिति में है। यदि आज हम उनके जल, जंगल, जमीन और सबसे बढ़कर उनकी 'अस्मिता' की रक्षा करने में विफल रहे, तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। यह सम्मेलन आधुनिक भारत में एक नए 'उलगुलान' (क्रांति) का शंखनाद है, जिसकी गूंज नीति-नियंताओं को लंबे समय तक सुननी होगी।</div><div><br></div><div>- डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 28 May 2026 17:29:33 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/delhi-tribal-conference-a-modern-ulgulan-for-identity-and-rights</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/5/28/amit-shah_large_1729_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Quad के वार से तिलमिलाये चीन-पाक ने J&K पर उगला जहर, भारत के जवाब ने दोनों की बोलती कर दी बंद]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/china-and-pakistan-stung-by-quad-attack-spewed-venom-on-jk-india-response-silenced-both]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली में हुई क्वॉड देशों की बैठक ने चीन और पाकिस्तान की बेचैनी बढ़ा दी है। भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका ने एक सुर में पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा करते हुए आतंकवाद पर करारा प्रहार किया तो पाकिस्तान तिलमिला उठा। दूसरी तरफ क्वॉड के मंच से चीन की विस्तारवादी चालों पर भी घेरा कस दिया गया। बस फिर क्या था, बौखलाए चीन और पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर को लेकर जहरीला बयान जारी कर अपनी कुंठा बाहर निकालनी शुरू कर दी। लेकिन नए भारत ने भी बिना देर किए ऐसा तगड़ा पलटवार किया कि बीजिंग और इस्लामाबाद दोनों की बोलती बंद हो गई।</div><div><br></div><div>भारत ने साफ और दो टूक शब्दों में कह दिया कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न अंग थे, हैं और हमेशा रहेंगे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने चीन और पाकिस्तान के साझा बयान को पूरी तरह अनावश्यक और अस्वीकार्य बताते हुए स्पष्ट कर दिया कि किसी दूसरे देश की इतनी औकात नहीं कि वह भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करे। नई दिल्ली ने यह भी जता दिया कि भारत अब हर उकसावे का जवाब उसी की भाषा में देना जानता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/a-grand-show-in-beijing-but-zero-results-even-putin-could-not-secure-a-deal" target="_blank">Beijing में ग्रैंड शो, पर नतीजे जीरो? Putin भी नहीं साध पाए डील, जानें China का असली पॉवर गेम</a></h3><div>दरअसल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की चीन यात्रा के दौरान जारी साझा बयान में चीन ने जम्मू-कश्मीर को तथाकथित इतिहास से जुड़ा विवाद बताने की कोशिश की। पाकिस्तान ने फिर वही पुराना राग अलापा और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों की आड़ लेकर भारत के खिलाफ दुष्प्रचार करने की कोशिश की। लेकिन भारत ने तुरंत उनकी इस साजिश की धज्जियां उड़ा दीं। नई दिल्ली ने दोहराया कि जम्मू-कश्मीर पर भारत की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट और अटल है। दुनिया की कोई ताकत भारत की संप्रभुता को चुनौती नहीं दे सकती।</div><div><br></div><div>भारत ने चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर भी बेहद कड़ा रुख अपनाया। विदेश मंत्रालय ने साफ कहा कि इस परियोजना का हिस्सा भारत की उस संप्रभु भूमि से गुजरता है जिस पर पाकिस्तान ने अवैध कब्जा कर रखा है। भारत ने दो टूक चेतावनी दी कि किसी भी देश को पाकिस्तान के इस गैरकानूनी कब्जे को वैधता देने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह सीधा संदेश चीन के लिए था, जो पाकिस्तान के कंधे पर बंदूक रखकर भारत के खिलाफ चालें चलता रहता है।</div><div><br></div><div>साथ ही नई दिल्ली ने चीन और पाकिस्तान के तथाकथित सीमा पार जल सहयोग के दावे की भी हवा निकाल दी। भारत ने तीखा सवाल पूछा कि जब चीन और पाकिस्तान की कोई साझा सीमा ही नहीं है तो फिर यह कथित सीमा पार जल सहयोग आखिर किस आधार पर हो रहा है। यह सवाल चीन की उस चालाक नीति पर जोरदार तमाचा है जिसके जरिये वह पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत को घेरने की नाकाम कोशिश करता रहता है।</div><div><br></div><div>उधर, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईद के मौके पर भी जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाकर अपनी हताशा जाहिर कर दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर तथाकथित भारतीय कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर का जिक्र किया। लेकिन सच यह है कि पाकिस्तान आज आर्थिक बर्बादी, आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय अलगाव से जूझ रहा है। दुनिया उसे आतंक फैलाने वाले देश के रूप में देखती है और अब वह चीन के सहारे भारत के खिलाफ बयानबाजी कर अपने लोगों को भरमाने की कोशिश कर रहा है।</div><div><br></div><div>साथ ही चीन की भूमिका भी पूरी तरह दोहरी और स्वार्थी नजर आई। एक तरफ वह भारत के साथ संबंध सुधारने की बात करता है, दूसरी तरफ पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत की अखंडता पर सवाल उठाने की कोशिश करता है। लेकिन चीन को अब यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि यह नया भारत है। अब भारत हर मंच पर आंख में आंख डालकर जवाब देता है और अपनी संप्रभुता पर किसी भी तरह की चोट बर्दाश्त नहीं करता।</div><div><br></div><div>सच्चाई यही है कि पूरा का पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का था, है और हमेशा रहेगा। पाकिस्तान ने जिस हिस्से पर अवैध कब्जा कर रखा है, वह भी भारत की ही भूमि है। चीन और पाकिस्तान दोनों को समझ लेना चाहिए कि भारत की अखंडता से खिलवाड़ करना बहुत भारी पड़ेगा। पाकिस्तान और चीन को यह भी समझना होगा कि आतंकवाद के सहारे और झूठे बयानों के दम पर इतिहास नहीं बदला जा सकता।</div><div><br></div><div>भारत ने जिस मजबूती के साथ चीन और पाकिस्तान के साझा बयान को खारिज किया है, उसने दुनिया को साफ संदेश दे दिया है कि अब भारत किसी दबाव में आने वाला नहीं। पाकिस्तान और चीन चाहे जितनी साजिशें रच लें, लेकिन जम्मू-कश्मीर भारत का मुकुट है और इस मुकुट पर किसी की बुरी नजर कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 13:29:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/china-and-pakistan-stung-by-quad-attack-spewed-venom-on-jk-india-response-silenced-both</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/5/27/jinping-randhir-jaiswal_large_1329_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्वाड विदेशी मंत्रियों की नई दिल्ली बैठक के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मायने]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/national-and-international-diplomatic-significance-of-the-quad-foreign-ministers-meeting]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत की राजधानी नई दिल्ली में हुई क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक सिर्फ एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक शक्ति-संतुलन की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरी है। इसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने इंडो-पैसिफिक, समुद्री सुरक्षा, सप्लाई चेन, ऊर्जा और चीन की बढ़ती आक्रामकता जैसे मुद्दों पर साझा रणनीति बनाई।&nbsp;</div><div><br></div><div>देखा जाए तो नई दिल्ली की यह बहुप्रतीक्षित क्वाड (Quad) बैठक यह बताती है कि आने वाले दशक में वैश्विक राजनीति का केंद्र यूरोप से हटकर इंडो-पैसिफिक बनने जा रहा है, और इस नई भू-राजनीतिक व्यवस्था में भारत केवल सहभागी नहीं, बल्कि निर्णायक शक्ति के रूप में उभर रहा है। इसका सारा श्रेय मोदी प्रशासन और आरएसएस के प्रति समर्पित बुद्धिजीवियों को जाता है, जिन्होंने अपनी सधी हुई रणनीति का वैश्विक कमाल दिखा दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/direct-challenge-to-china-from-delhi-quad-draws-new-strategic-line-in-indo-pacific" target="_blank">दिल्ली से चीन को मिली सीधी चुनौती, Quad ने हिंद प्रशांत में खींची नई रणनीतिक लकीर</a></h3><div>आइए सबसे पहले समझते हैं कि क्वाड क्या है? तो यह जान लीजिए कि Quadrilateral Security Dialogue यानी Quad चार लोकतांत्रिक देशों- भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया- का रणनीतिक समूह है, जिसका मुख्य उद्देश्य “फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक” को सुरक्षित रखना है।&nbsp;</div><div><br></div><h2># क्वाड देशों के विदेशमंत्रियों की नई दिल्ली बैठक से&nbsp; निकले राष्ट्रीय मायने निम्नलिखित हैं:-</h2><div><br></div><div>पहला, भारत की वैश्विक भूमिका मजबूत: दिल्ली में बैठक आयोजित होना यह दिखाता है कि India अब इंडो-पैसिफिक राजनीति का केंद्रीय खिलाड़ी बन चुका है।&nbsp; भारत, अमेरिका और पश्चिम के लिए संतुलित साझेदार है। वैश्विक दक्षिण (Global South) और पश्चिमी शक्तियों के बीच “सेतु” की भूमिका निभा रहा है। चीन के मुकाबले लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में उभर रहा है।</div><div><br></div><div>दूसरा, रक्षा और समुद्री सुरक्षा को लाभ: Quad की समुद्री निगरानी पहल भारत के लिए महत्वपूर्ण है। इससे हिंद महासागर में भारतीय निगरानी क्षमता बढ़ेगी। चीन की नौसैनिक गतिविधियों पर बेहतर नजर रखी जा सकेगी। भारतीय नौसेना को तकनीकी सहयोग मिलेगा।</div><div><br></div><div>तीसरा, आर्थिक और तकनीकी अवसर: क्रिटिकल मिनरल्स, सेमीकंडक्टर और ऊर्जा सहयोग से भारत को: नई निवेश संभावनाएँ, सप्लाई चेन हब बनने का मौका, मैन्युफैक्चरिंग विस्तार, और हाई-टेक उद्योगों में बढ़त मिल सकती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>चौथा, आतंकवाद पर भारत की चिंता को समर्थन: बैठक में आतंकवाद और सीमा पार आतंकवाद की निंदा की गई, जिसमें पहलगाम हमले का भी उल्लेख हुआ। यह भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक समर्थन है, विशेषकर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के मुद्दे पर, और वैश्विक मंचों पर भारत की सुरक्षा चिंताओं को वैधता देने में।</div><div><br></div><div>पांचवां, भारत-अमेरिका संबंधों में नई ऊर्जा: हाल के समय में टैरिफ और रणनीतिक मतभेदों के बावजूद बैठक ने दिखाया कि Quad ढांचा अभी भी मजबूत है। इससे संकेत मिलता है कि भारत और अमेरिका दोनों चीन को लेकर दीर्घकालिक सहयोग चाहते हैं। Quad व्यक्तिगत नेताओं से ऊपर उठकर संस्थागत रूप ले रहा है।</div><div><br></div><h2># वहीं, क्वाड देशों के विदेशमंत्रियों की हालिया हुई बैठक के अंतरराष्ट्रीय मायने निम्नलिखित हैं-</h2><div><br></div><div>पहला, चीन को सामरिक संदेश: बैठक का सबसे बड़ा संकेत चीन के लिए था। संयुक्त बयान में दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में “बलपूर्वक यथास्थिति बदलने” पर चिंता जताई गई। इसका अर्थ हुआ कि चीन की समुद्री सैन्य गतिविधियों पर निगरानी बढ़ेगी।इंडो-पैसिफिक में शक्ति संतुलन बनाने की कोशिश तेज होगी। Quad अब केवल “संवाद मंच” नहीं बल्कि “रणनीतिक समन्वय मंच” बनता दिख रहा है।</div><div><br></div><div>दूसरा, इंडो-पैसिफिक में नई भू-राजनीतिक धुरी: Quad देशों ने समुद्री निगरानी, पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा सुरक्षा पर नई पहलें शुरू कीं। फिजी में संयुक्त पोर्ट परियोजना इसकी मिसाल है। इससे प्रशांत द्वीपीय देशों में चीन का प्रभाव संतुलित करने की कोशिश होगी। हिंद महासागर से प्रशांत महासागर तक नई रणनीतिक कनेक्टिविटी बनेगी। छोटे देशों को “चीनी कर्ज कूटनीति” का विकल्प मिलेगा।</div><div><br></div><div>तीसरा, सप्लाई चेन और क्रिटिकल मिनरल्स की राजनीति Quad ने क्रिटिकल मिनरल्स और ऊर्जा सुरक्षा पर नया फ्रेमवर्क बनाया। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि: चीन रेयर अर्थ मिनरल्स में वैश्विक प्रभुत्व रखता है। सेमीकंडक्टर, रक्षा और AI उद्योग इन खनिजों पर निर्भर हैं। भारत, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका मिलकर चीन-निर्भरता कम करना चाहते हैं।</div><div><br></div><div>चौथा, पश्चिम एशिया संकट और समुद्री व्यापार: बैठक में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और रेड सी की सुरक्षा पर विशेष चर्चा हुई। इसके मायने ये हुए कि ईरान-इजरायल तनाव का असर वैश्विक व्यापार पर पड़ रहा है। क्वाड (Quad) वैश्विक समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा में बड़ी भूमिका निभाना चाहता है। ऊर्जा आपूर्ति और तेल कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश है।</div><div><br></div><div>पांचवां, “एशियाई नैटो" की बहस तेज: चीन लगातार क्वाड (Quad) को “ब्लॉक राजनीति” कहता रहा है। हालांकि क्वाड (Quad) खुद को नैटो (NATO) नहीं मानता, लेकिन सैन्य सहयोग बढ़ रहा है। समुद्री निगरानी और तकनीकी साझेदारी गहरी हो रही है। साझा सुरक्षा सोच विकसित हो रही है।</div><div><br></div><div>सच कहूं तो नई दिल्ली की यह क्वाड (Quad) बैठक बताती है कि आने वाले दशक में वैश्विक राजनीति का केंद्र यूरोप से हटकर इंडो-पैसिफिक बनने जा रहा है। और इस नई भू-राजनीतिक व्यवस्था में भारत केवल सहभागी नहीं, बल्कि निर्णायक शक्ति के रूप में उभर रहा है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 11:30:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/national-and-international-diplomatic-significance-of-the-quad-foreign-ministers-meeting</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/5/27/quad-foreign-ministers-meeting_large_1130_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[दिल्ली से चीन को मिली सीधी चुनौती, Quad ने हिंद प्रशांत में खींची नई रणनीतिक लकीर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/direct-challenge-to-china-from-delhi-quad-draws-new-strategic-line-in-indo-pacific]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली में आयोजित क्वॉड विदेश मंत्रियों की बैठक ने साफ कर दिया है कि हिंद महासागर से लेकर दक्षिण चीन सागर तक अब शक्ति संतुलन की नई लकीर खिंच चुकी है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने जिस आक्रामक रणनीतिक एकजुटता का प्रदर्शन किया है, वह चीन की विस्तारवादी चालों और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर उसके शिकंजे के खिलाफ खुला मोर्चा है। नई दिल्ली में हुई इस बैठक ने यह संदेश दे दिया कि हिंद प्रशांत क्षेत्र को अब दबाव, धमकी और आर्थिक ब्लैकमेल से नियंत्रित नहीं किया जा सकेगा।</div><div><br></div><div>क्वॉड की सबसे विस्फोटक घोषणा रही महत्वपूर्ण खनिज पहल ढांचा। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने मिलकर लगभग बीस अरब डॉलर के निवेश समर्थन के साथ ऐसी आपूर्ति शृंखला खड़ी करने का फैसला किया है जो किसी एक देश, विशेषकर चीन, पर निर्भर न रहे। दुर्लभ खनिज आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, विद्युत वाहन और आधुनिक हथियार प्रणाली की रीढ़ बन चुके हैं। चीन इन खनिजों की वैश्विक आपूर्ति पर वर्षों से दबदबा बनाए हुए है। ऐसे में क्वॉड का यह कदम सीधे तौर पर बीजिंग की आर्थिक और रणनीतिक ताकत को चुनौती देता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/quad-partners-pledge-to-mobilize-up-to-us-20-billion-to-strengthen-critical-minerals-supply-chains" target="_blank">Quad का Game Changer मूव: Critical Minerals सप्लाई चेन के लिए 20 अरब डॉलर का महा-संकल्प</a></h3><div>बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि खनन, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण तक पूरी शृंखला को सुरक्षित और विविध बनाया जाएगा। केवल निवेश ही नहीं, बल्कि निर्यात ऋण एजेंसियों, विकास वित्त संस्थानों, बीमा, अनुदान और निजी पूंजी को भी इस रणनीति में शामिल किया जाएगा। इसका अर्थ है कि क्वॉड अब केवल सुरक्षा मंच नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक शक्ति समूह के रूप में उभर रहा है।</div><div><br></div><div>समुद्री सुरक्षा के मोर्चे पर भी क्वॉड ने बड़ा दांव चला है। पहली बार हिंद प्रशांत समुद्री निगरानी सहयोग पहल शुरू की गई है, जिसके तहत चारों देश वास्तविक समय की सूचनाएं साझा करेंगे और समुद्री गतिविधियों पर संयुक्त निगरानी रखेंगे। इसका प्रारंभिक केंद्र हिंद महासागर क्षेत्र होगा। यह सीधे तौर पर चीन की समुद्री घुसपैठ, संदिग्ध जहाज गतिविधियों और दबाव की राजनीति को रोकने की तैयारी है।</div><div><br></div><div>दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर को लेकर संयुक्त बयान का स्वर असाधारण रूप से कठोर रहा। क्वॉड देशों ने साफ कहा कि बल प्रयोग, डराने धमकाने की नीति, जल तोपों का इस्तेमाल, जहाजों को टक्कर मारना और सैन्यीकरण क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा है। यह बिना नाम लिए चीन को सीधी चेतावनी थी। खास बात यह रही कि चारों देशों ने अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्री स्वतंत्रता की रक्षा को अपनी साझा प्रतिबद्धता बताया।</div><div><br></div><div>ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी क्वॉड ने बड़ा रणनीतिक मोर्चा खोला है। तेल, गैस, उर्वरक और ऊर्जा बाजार में वैश्विक अस्थिरता के बीच चारों देशों ने हिंद प्रशांत ऊर्जा सुरक्षा पहल की घोषणा की। इसका मकसद ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखना, समुद्री व्यापार मार्गों की रक्षा करना और आपातकालीन परिस्थितियों में सहयोग बढ़ाना है। यह पहल केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक महत्व भी रखती है क्योंकि पश्चिम एशिया से हिंद महासागर तक ऊर्जा मार्गों पर बढ़ते तनाव का सीधा असर एशिया की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है।</div><div><br></div><div>क्वॉड ने समुद्र के नीचे बिछी डिजिटल केबल प्रणाली की सुरक्षा को भी नई प्राथमिकता दी है। प्रशांत द्वीपीय देशों को सुरक्षित समुद्री केबल नेटवर्क से जोडने का लक्ष्य तय किया गया है। यह चीन की डिजिटल घेराबंदी और तकनीकी प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश मानी जा रही है। साथ ही पांचवीं और छठी पीढी की संचार प्रणाली, खुली नेटवर्क व्यवस्था और डिजिटल पहचान मानकों पर सहयोग का फैसला यह दर्शाता है कि भविष्य की तकनीकी जंग में भी क्वॉड साझा मोर्चा बना रहा है।</div><div><br></div><div>आतंकवाद के खिलाफ बयान भी बेहद स्पष्ट रहा। पहलगाम हमले का उल्लेख करते हुए क्वॉड देशों ने सीमा पार आतंकवाद की निंदा की और कहा कि आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता ही एकमात्र रास्ता है। यह भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता मानी जा रही है क्योंकि इससे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक समर्थन मजबूत होता दिखाई देता है।</div><div><br></div><div>भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बैठक के बाद साफ कहा कि हिंद प्रशांत आने वाले समय में वैश्विक व्यापार, ऊर्जा और समुद्री वाणिज्य का केंद्र बनने जा रहा है, इसलिए क्वॉड की जिम्मेदारियां भी तेजी से बढ़ेंगी। उनका संदेश साफ था कि अब यह मंच केवल विचार विमर्श तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जमीन पर असर दिखाने वाली ताकत बनेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>देखा जाये तो नई दिल्ली की इस बैठक ने यह स्थापित कर दिया है कि दुनिया अब दो स्पष्ट ध्रुवों की ओर बढ़ रही है। एक ओर वे ताकतें हैं जो नियम आधारित व्यवस्था, स्वतंत्र समुद्री व्यापार और संतुलित आर्थिक ढांचे की बात कर रही हैं, जबकि दूसरी ओर विस्तारवाद, दबाव और आर्थिक नियंत्रण की राजनीति है। क्वॉड ने अपने फैसलों से यह संकेत दिया है कि हिंद प्रशांत क्षेत्र में अब चीन की मनमानी को खुली चुनौती दी जाएगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>बहरहाल, दिल्ली में संपन्न क्वॉड बैठक केवल एक कूटनीतिक आयोजन नहीं थी, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर की आक्रामक और दूरदर्शी विदेश नीति का शक्तिशाली प्रदर्शन भी थी। जिस तरह भारत ने अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया को एक साझा रणनीतिक मंच पर मजबूती से संगठित किया, उसने यह साबित कर दिया कि नई दिल्ली अब वैश्विक शक्ति संतुलन की निर्णायक धुरी बन चुकी है। चीन की आर्थिक दबंगई, समुद्री विस्तारवाद और आपूर्ति शृंखलाओं पर उसके नियंत्रण को चुनौती देने के लिए दिल्ली में जो रणनीति तैयार हुई, वह आने वाले वर्षों में हिंद प्रशांत की दिशा तय करेगी। मोदी और जयशंकर की जोड़ी ने यह संदेश पूरी दुनिया को दे दिया है कि भारत वैश्विक समीकरण बदलने वाला नेतृत्वकर्ता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 26 May 2026 18:11:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/direct-challenge-to-china-from-delhi-quad-draws-new-strategic-line-in-indo-pacific</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/5/26/quad-foreign-ministers-meeting_large_1811_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[जनजातीय धर्मभक्ति की ज्वाला से बढ़ा दिल्ली का तापमान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/delhi-temperature-rose-fueled-by-the-flame-of-tribal-devotion]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>लाल किले के प्राचीर से भारत वर्ष के कोने कोने से आये लाखों जनजातीय समाज के लोगों ने अपने धर्म, संस्कृति की रक्षा, हेतु जो हुंकार भरी उसकी अनुगूंज वर्षों वर्षों तक कायम रहेगी। सर्वाधिक मंत्रमुग्ध करने वाला प्रभावशाली विचारोत्तेजक सम्बोधन था भारत के गृहमंत्री अमित शाह का जिन्होंने निर्भीक स्पष्टता से भारतीय जनजातीय समाज की धर्मरक्षा, संस्कृतिरक्षा की बात की। वह अभूतपूर्व और असाधारण बात थी और उन्होंने लाखों जनजातीय बंधुओं-बहनों को एक प्रकार से रोमांचित कर दिया। उनके यह शब्द वर्षों तक याद किए जाएंगे कि भगवान बिरसा मुंडा को तो मैंने नहीं देखा लेकिन आज जो यहाँ जनजातीय समाज का सागर उमड़ पड़ा है मैं उन में बिरसा मुंडा के दर्शन कर रहा हूँ और यह जनजातीय सांस्कृतिक समागम बिरसा मुंडा के उलगुलान (परिवर्तन हेतु जन क्रांति) के बाद का पहला समागम है। भारत के इतिहास में ऐसा पहले कभी भी कोई धर्मरक्षा संस्कृतिरक्षा का समागम नहीं हुआ।&nbsp;</div><div><br></div><div>इन शब्दों ने जो साहस दिया, जनजातियों का जो मनोबल बढ़ाया उसकी कोई तुलना नहीं है। यह समागम एक प्रकार से जनजातीय वहाँ महा कुंभ था जिसमें सात सौ से अधिक जनजातियों के लोग आए जो जैसलमेर से लेकर लद्दाख, तवांग अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम, त्रिपुरा से लेकर अंडमान निकोबार, बंगाल, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, तेलंगाना, केरल झारखंड से, छत्तीसगढ़- सब जगह से।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/india-is-becoming-naxal-free-eknath-shinde-praised-amit-shah-action" target="_blank">'भारत हो रहा नक्सल मुक्त', Eknath Shinde ने Amit Shah के Action की जमकर तारीफ की</a></h3><div>ऐसा देश ने कभी देखा नहीं और दिल्ली के सद्भावी नागरिकों ने अपने घर के दरवाजे खोल दिए और हर घर में इन जनजातीय भाई-बहनों को रुकवाया गया। उनकी सेवा की, उनको भोजन, पानी दिया उनको स्टेशन से लाए और छोड़ने गए। ऐसा दिल्ली ने कभी दृश्य देखा नहीं। दिल्ली का ह्दय कितना बड़ा है वह इस समागम के आतिथ्य से पता चला। दिल्ली के राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं ने इस जनजातीय बंधू बहनों का इतना सुंदर सत्कार किया कि उसको व्यक्त करना संभव नहीं है।</div><div><br></div><div>जो भी जनजातीय समाज छोड़कर ईसाई बनता है, कन्वर्टेड होता है उसको जनजातीय समाज की सूची यानी शेड्यूल ट्राइब सूची से बहार निकल कर मूल जनजातियों को बचाइए क्योंकि धर्मान्तरण करने वाला जनजातीय रह ही नहीं जाता है। जनजाति समाज के वरिष्ठ इंजीनीयर, पद्मश्री से अलंकृत अरुणाचल के प्रसिद्द वैचारिक अग्रणी तिची गुबिन ने कहा कि वहाँ अरुणाचल क्रिस्चियन फोरम है। उसके नेताओं ने&nbsp; खुले आम सोशल मीडिया पर धमकी दी है कि वे पूरे अरुणाचल को ईसाई लैंड बनाएंगे, क्रिस्चियन लैंड बनाएंगे। गुबिन ने मांग की है कि हमारे धर्म की रक्षा की जाए और जो भी हमारे समाज को छोड़कर ईसाई होता है उसको शिड्यूल ट्राइब की लिस्ट से डीलिस्ट किया जाए।</div><div><br></div><div>प्रसिद्द जनजातीय नेता, विचारक एंड राजनीति के धुरंधर गनेश राम भगत ने तो पूरे समागम को एक प्रकार से मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने कहा कि हमारे रक्त में भगवान राम का रक्त है, हम भगवान राम के वंशज हैं। भगवान राम के लिए हमने रावण का हनन किया था और उस&nbsp; को परास्त किया था। हम इस कनवर्जन के राक्षस से भी लड़ सकते हैं और इस राक्षस को हम समाप्त करेंगे।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के सहयोग से जनजाति सुरक्षा मंच के तत्वावधान में इस समागम का आयोजन हुआ। यह संगठन विश्व का सबसे बड़ा गैर ईसाई जनजातीय संगठन है। देश भर में वनवासी कल्याण आश्रम के सत्रह हज़ार से अधिक प्रकल्प चलते हैं, जिनमें छात्रावास, आरोग्य केंद्र, विद्यालय, धर्मजागरण मंच, खेलकूद केंद्र, शामिल हैं। इसके कार्यकर्ताओं में आईआईटी के स्नातक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, जे एनयू, दिल्ली विश्विद्यालय के प्राध्यापक, महिला अधिकार रक्षा संगठनों के प्रमुख, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, अनेक मंत्री, सांसद आदि सब सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इसके अध्यक्ष राजस्थान के भील जनजाति से सतेंद्र सिंह हैं, जिनका धाराप्रवाह सम्बोधन मुर्दों में भी जान फूंक देता है। इसी प्रकार संगठन के प्रमुख कार्यकर्ताओं पदाधिकारियों में अतुल जोग, भगवान सहाय, प्रमोद पेठकर, हर्ष चौहान, तेचि गुबिन जैसे अत्यंत श्रेष्ठ विद्वान हैं परन्तु वे कभी भी सामने आते नहीं, शांत निर्विकार भाव से अचीन्हे अनजान रहकर जनजाति रक्षा और विकास के कार्य में लगे रहते हैं। उन्ही की और इंगित करते होते अमित शाह ने अपने सम्बोधन में कहा कि जनजाति समाज का हमारे प्रति इतना विश्वास है कि हाल ही के बंगाल चुनावों में प्रदेश की सोलह में से सोलह जनजातीय सीटें भाजपा ने जीतीं हैं।</div><div><br></div><div>लाल किले के जनजातीय समागम में मणिपुर, अरुणाचल, नागालैंड और असम की बहनों ने इतना सुंदर वंदे भारतम गाया की सब चकित रह गए। इस समागम की गूंज आने वाले वर्षों तक केवल गूंजती हे नहीं रहेगी बल्कि इसका असर होगा और भारत सरकार को बाध्य होना पड़ेगा कि वह धर्मान्तरित होने वाले तमाम जनजातीय लोगों को डी लिस्ट करे शिड्यूल ट्राइब से बाहर निकाले।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस समागम ने जनजातीय समाज को शक्ति दी है, भक्ति दी है, युक्ति दी है, तत्त्वचिंतन दिया है और पराक्रम का एक भाव जागृत किया है कि हम जनजातीय हैं, हम भारत माता की संतान हैं, हम कभी परास्त नहीं होंगे राष्ट्र के शत्रुओं को, संस्कृति और धर्म के शत्रुओं को हम परास्त करेंगे।</div><div><br></div><div>- तरुण विजय</div><div>(लेखक पूर्व सांसद और वरिष्ठ पत्रकार हैं)&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 26 May 2026 15:14:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/delhi-temperature-rose-fueled-by-the-flame-of-tribal-devotion</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/5/26/amit-shah_large_1515_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[यह कैसा समाज है, जिसमें अदालतें समझाएं रिश्तों का धर्म ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/what-kind-of-society-is-this-in-which-courts-have-to-explain-the-duties-of-relationships]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>किसी भी सभ्यता की वास्तविक पहचान उसकी ऊँची इमारतों, चमकती सड़कों, आर्थिक प्रगति या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों, माता-पिता और निर्बल वर्ग के प्रति कितना संवेदनशील है। लेकिन आज का सबसे पीड़ादायक प्रश्न यही है कि जिस भारत ने “मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः” का उद्घोष किया, जिस धरती से “वसुधैव कुटुम्बकम्” का विचार पूरी दुनिया में पहुँचा, उसी भूमि पर आज माता-पिता को अपने ही घर में सम्मान और आश्रय पाने के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है। हाल के वर्षों में देश की अदालतों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ी है, जहाँ वृद्ध माता-पिता को अपने ही बच्चों से संरक्षण, भरण-पोषण, रहने की व्यवस्था और संपत्ति पर अधिकार के लिए न्यायिक हस्तक्षेप लेना पड़ा। कहीं बेटे को अदालत यह निर्देश दे रही है कि वह अपनी वृद्ध मां को घर में एक कमरा, अलग स्नानघर और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराए, तो कहीं दुर्व्यवहार करने वाली संतान को माता-पिता की संपत्ति से बेदखल करने के आदेश दिए जा रहे हैं। यह केवल कानूनी घटनाएँ नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और नैतिक पतन की वे चेतावनियाँ हैं जो भविष्य के भारत की तस्वीर पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रही हैं।</div><div><br></div><div>वास्तव में यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि जिस मां ने नौ महीने गर्भ में रखकर संतान को जीवन दिया, जिसने अपना रक्त, ममता और त्याग देकर उसे पाला, उसी मां को अपने ही घर में रहने के लिए न्यायालय की शरण लेनी पड़े। जिस पिता ने अपने पसीने और परिश्रम से घर बनाया, बच्चों का भविष्य संवारा, वृद्धावस्था में उसी घर में उसके अधिकार के लिए अदालत को हस्तक्षेप करना पड़े, यह स्थिति केवल व्यक्तिगत कृतघ्नता नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनाओं के क्षरण का प्रमाण है। यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज भारत विकसित भारत 2047 की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आर्थिक विकास, डिजिटल क्रांति, स्मार्ट शहर, वैश्विक नेतृत्व और आत्मनिर्भरता की बातें हो रही हैं। लेकिन यदि घर के किसी कोने में बैठे वृद्ध माता-पिता अकेलेपन, उपेक्षा और अपमान का जीवन जी रहे हों, तो क्या यह विकास पूर्ण माना जा सकता है? यदि हमारे बुजुर्ग अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए भी दूसरों पर निर्भर और उपेक्षित हो जाएँ, तो हमारी सारी उपलब्धियाँ खोखली प्रतीत होती हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/assam-uniform-civil-code-bill-tabled-in-assembly-polygamy-banned-registration" target="_blank">Assam में ऐतिहासिक कदम! विधानसभा में पेश हुआ Uniform Civil Code Bill, बहुविवाह पर रोक और लिव-इन का रजिस्ट्रेशन होगा अनिवार्य</a></h3><div>आज की सबसे बड़ी चुनौती केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक निर्धनता की है। नई पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग आत्मकेंद्रित होता जा रहा है। भौतिक उपलब्धियाँ, कैरियर, उपभोगवाद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अवधारणाएँ जीवन के केंद्र में आ गई हैं। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, रिश्तों की ऊष्मा कम हो रही है और संवाद का स्थान डिजिटल माध्यम ले रहे हैं। परिणामतः बुजुर्गों का जीवन अकेलेपन, अवसाद और असुरक्षा का पर्याय बनता जा रहा है। यह सच है कि महानगरीय जीवन की अपनी कठिनाइयाँ हैं। रोजगार, समयाभाव, आर्थिक दबाव और बदलती जीवनशैली ने नई पीढ़ी की चुनौतियाँ बढ़ाई हैं। लेकिन इन कठिनाइयों के बावजूद माता-पिता के प्रति दायित्व समाप्त नहीं हो सकते। भारतीय संस्कृति में माता-पिता की सेवा केवल सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य रही है। श्रवण कुमार का आदर्श केवल कथा नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का हिस्सा है।</div><div><br></div><div>दुर्भाग्य यह है कि आज संपत्ति और स्वार्थ ने अनेक संबंधों को प्रभावित किया है। अखबारों में आए दिन ऐसे समाचार दिखाई देते हैं जिनमें संपत्ति के लिए माता-पिता को प्रताड़ित किया जाता है, घर से निकाला जाता है, मानसिक यातना दी जाती है या उनकी उपेक्षा की जाती है। अनेक वृद्धाश्रम ऐसे माता-पिता से भरे पड़े हैं जिनकी सबसे बड़ी “गलती” केवल यह थी कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के लिए समर्पित कर दी। यदि यह प्रवृत्ति यूँ ही बढ़ती रही तो भारत भी उस दिशा में बढ़ सकता है जहाँ पश्चिमी देशों की तरह माता-पिता और संतान के संबंध केवल कानूनी और औपचारिक होकर रह जाएँ। पश्चिमी समाज में अनेक माता-पिता प्रारंभ से ही बच्चों को आत्मनिर्भर बना देते हैं क्योंकि वे भविष्य में उनसे देखभाल की अपेक्षा नहीं रखते। लेकिन भारतीय समाज का आधार इससे भिन्न रहा है। यहाँ परिवार केवल जैविक इकाई नहीं, बल्कि भावनात्मक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संस्था रहा है।</div><div><br></div><div>यह भी स्मरणीय है कि देश में वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 जैसे कानून बनाए गए हैं ताकि वृद्ध माता-पिता के अधिकारों की रक्षा हो सके। न्यायालयों ने अनेक अवसरों पर माता-पिता के संपत्ति अधिकारों को सुरक्षित रखा है और दुर्व्यवहार करने वाली संतानों के विरुद्ध कठोर टिप्पणियाँ भी की हैं। लेकिन कानून केवल सुरक्षा दे सकता है, संवेदना नहीं। अदालतें कमरे दिला सकती हैं, सम्मान नहीं, भरण-पोषण का आदेश दे सकती हैं, लेकिन ममता और अपनत्व नहीं लौटा सकतीं। यही कारण है कि समाधान केवल कानूनी नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक होना चाहिए। परिवारों में संस्कारों की पुनर्स्थापना आवश्यक है। बच्चों को केवल उच्च शिक्षा और आधुनिक सुविधाएँ देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उन्हें मानवीय मूल्य भी देना होंगे। विद्यालयों, धार्मिक संस्थाओं और सामाजिक संगठनों को परिवार, सेवा, कृतज्ञता और बुजुर्ग सम्मान जैसे विषयों पर गंभीर पहल करनी चाहिए।</div><div><br></div><div>आज आवश्यकता है कि विकसित भारत 2047 की अवधारणा में “वृद्ध सम्मान” को भी एक महत्वपूर्ण सूचक बनाया जाए। जिस देश में बुजुर्ग सुरक्षित, सम्मानित और संतुष्ट होंगे, वही वास्तव में विकसित कहा जा सकेगा। हमें ऐसी नीतियाँ बनानी होंगी जिनमें वृद्धजन कल्याण, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और भावनात्मक सहयोग को प्राथमिकता मिले। साथ ही परिवारों को यह समझना होगा कि माता-पिता केवल जिम्मेदारी नहीं, हमारी जड़ें हैं। जिस वृक्ष की जड़ें सूख जाएँ, उसकी शाखाएँ अधिक समय तक हरी नहीं रह सकतीं। माता-पिता की उपेक्षा केवल एक व्यक्ति की नहीं, पूरी पीढ़ी की नैतिक पराजय है। यह भी विचारणीय है कि जो संतान आज अपने माता-पिता के साथ व्यवहार कर रही है, वही व्यवहार भविष्य में उसके हिस्से भी आ सकता है। बच्चे केवल उपदेश से नहीं, व्यवहार से सीखते हैं। यदि वे अपने माता-पिता को बुजुर्गों की उपेक्षा करते देखेंगे तो वही संस्कार आगे बढ़ेंगे।</div><div><br></div><div>आज आवश्यकता अदालतों के आदेशों से अधिक अंतःकरण के जागरण की है। रिश्तों की मर्यादाएँ, गरिमा और दायित्व यदि न्यायालयों को समझाने पड़ें तो यह केवल कानूनी संकट नहीं, बल्कि सभ्यता का संकट है। यह समय आत्ममंथन का है कि क्या हम तकनीकी रूप से आधुनिक होते-होते मानवीय रूप से निर्धन होते जा रहे हैं? भारत की पहचान उसकी संवेदनशीलता रही है। यदि हम इस संवेदनशीलता को बचा सके, तभी विकसित भारत का स्वप्न सार्थक होगा। अन्यथा ऊँची उपलब्धियों और भव्य योजनाओं के बीच भी हमारे घरों के किसी कोने में बैठा एक उपेक्षित वृद्ध हमारी समस्त प्रगति पर मौन प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा रहेगा। अंततः याद रखना होगा-विरासत संपत्ति नहीं, संस्कार होते हैं, विकास इमारतों से नहीं, रिश्तों से मापा जाता है और वह समाज कभी महान नहीं कहलाता जहाँ माता-पिता को अपने अधिकार के लिए अदालतों में खड़ा होना पड़े।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक,पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 26 May 2026 15:01:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/what-kind-of-society-is-this-in-which-courts-have-to-explain-the-duties-of-relationships</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/5/26/relationships_large_1501_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कॉकरोच जनता पार्टी क्या सिर्फ एक छलावा मात्र है? ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/is-the-cockroach-janata-party-merely-a-sham]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सत्य कभी-कभी कल्पना से भी कहीं ज्यादा विचित्र होता है। आज से पहले शायद ही कभी किसी ने ऐसा सोचा भी होगा कि एक दौर ऐसा आएगा जब लोगों में अपने आपको कॉकरोच कहने की होड़ लग जाएगी। देश भर में 'मैं भी कॉकरोच' जैसा एक बड़ा अभियान शुरू हो जाएगा। लोग, खासतौर से लाखों युवा 'मैं भी कॉकरोच' जैसे मीम्स और बैनरों के जरिए न केवल अपने आपको कॉकरोच कहने में गर्व महसूस करेंगे बल्कि हैशटैग के जरिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इसे ज्यादा से ज्यादा लोकप्रिय बनाने की भी कोशिश करेंगे।लेकिन ऐसा हुआ और इतनी तेजी से हुआ कि किसी को भी सोचने-समझने का मौका तक नहीं मिला।&nbsp;</div><div><br></div><div>15 मई को एक मामले की सुनवाई के दौरान देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने जिस शब्दावली और तेवरों के साथ बेरोजगार युवाओं को कॉकरोच के साथ जोड़ा, उससे देश में एक नया ही तूफान खड़ा हो गया। हालांकि अगले ही दिन जस्टिस सूर्यकांत ने अपनी टिप्पणी पर सफाई भी दे दी। लेकिन उसके बाद भी विरोध के स्वर बंद नहीं हुए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/who-formed-the-cockroach-janata-party-five-lakh-people-including-mahua-and-kirti-azad" target="_blank">कॉकरोच जनता पार्टी किसने बना ली? महुआ-कीर्ति आजाद समेत 5 लाख लोग जुड़े! मैनिफेस्टो तो होश उड़ा देगा</a></h3><div>देशभर में सरकारी सिस्टम से नाराज लाखों युवा अलग-अलग अंदाज में लगातार अपना गुस्सा तो जाहिर कर ही रहे थे लेकिन देश की राजधानी दिल्ली से लगभग 11,500 किमी दूर बैठे एक भारतीय युवा अभिजीत दीपके ( जो महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले हैं) के दिमाग में एक आइडिया आया और उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तुरंत 'कॉकरोच जनता पार्टी' बना दी। इसके बाद देखते ही देखते भारत के लोकतंत्र में कुछ ऐसा होता हुआ नजर आया , जो इससे पहले किसी ने सोचा तक नहीं होगा।&nbsp;</div><div>देखते-देखते सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' के फॉलोअर्स की संख्या 2 करोड़ 30 लाख तक पहुंचने वाली है। यह दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल होने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी के इंस्टाग्राम पर फॉलोअर्स की कुल संख्या 93 लाख से लगभग ढाई गुणा ज्यादा है।</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>इस बीच पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके भी लगातार चर्चा में रहे। पार्टी के एक्स अकाउंट पर कभी रोक लगाई गई तो कभी वेबसाइट को डाउन करने का आरोप लगाया गया। जैसे ही लोगों ने इस पार्टी के इतिहास-भूगोल को खंगालना शुरू किया, सकते में आए अभिजीत दीपके ने तुरंत सफाई शुरू कर दी। इस बीच उन्होंने पार्टी के आधिकारिक इंस्टाग्राम पेज को हैक करने का दावा भी किया और जब यह ठीक हुआ तो विवाद पैदा करने वाले पार्टी के संस्थापक मेघनन्द को उनकी ही पार्टी फॉलो करना बंद कर चुकी थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>मतलब कहीं न कहीं, कुछ तो गड़बड़ है। कुछ तो ऐसा हो रहा है जो फिलहाल सामने से नजर नहीं आ रहा है लेकिन जिसका आभास तो हो ही रहा है। बीजेपी इस पार्टी को विदेशी धरती से चलने वाले विपक्षी दल का टूलकिट बता रही है तो वहीं कई वरिष्ठ पत्रकार और बौद्धिक जमात के लोग इसे बीजेपी की बी टीम के रूप में पेश कर रहे हैं। अभिजीत दीपके की भी कई हरकतें, संदेह पैदा कर रही है। अभिजीत द्वारा एक खास पार्टी के समर्थक माने जाने वाले पत्रकारों को ही इंटरव्यू देना, विवादित व्यक्ति को अनफॉलो कर पहले कुछ खास पत्रकारों को फॉलो करना और फिर उन्हें भी अनफॉलो कर देना। सोचिए जो व्यक्ति शुरुआत से ही इतना ज्यादा सेलेक्टिव हो,उसके पीछे कितनी बड़ी टीम या कितना बड़ा दिमाग काम कर रहा होगा जो भारत के लोकतांत्रिक आंदोलन के मिज़ाज, भारत की मेनस्ट्रीम और नई मीडिया( यूटूबर्स) की आदतों को कितनी अच्छी तरह से समझता है। आंदोलन के जरिए, देश में एक माहौल पैदा करने में बीजेपी और आम आदमी पार्टी दोनों को महारत हासिल है। दुर्भाग्यपूर्ण बात तो है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी जिसने देश पर सबसे ज्यादा राज किया है और जो वर्तमान में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है वो कांग्रेस बड़े स्तर पर आंदोलन चलाना और इसे लोकप्रिय बनाने के तौर-तरीके भूल चुकी है। यह भी गौर करने वाली बात है कि कॉकरोच जनता पार्टी को चंद बड़े पत्रकार अपने-अपने यूट्यूब चैनल पर जितना स्पेस दे रहे हैं उससे भी कहीं ज्यादा स्पेस मेनस्ट्रीम मीडिया दे रहा है। हाल के वर्षों में ऐसा कब हुआ था, याद करने की कोशिश कीजिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस लेख के लेखक ने अरविंद केजरीवाल के आंदोलन को बहुत ही शुरुआत से कवर किया था जिसकी सबसे खास बात यह थी कि प्रेस कांफ्रेंस के लिए आने वाले न्यौते में जिस केजरीवाल का नाम सबसे लास्ट में 'और अरविंद केजरीवाल' लिखा आता था,उस पार्टी में अब सिर्फ अरविंद केजरीवाल ही बचे रह गए हैं। याद कीजिएगा कि, उस दौर में भी अन्ना-अरविंद के आंदोलन पर सवाल उठाने वाले हर व्यक्ति को करप्ट व्यक्ति के तौर पर ही देखा जाने लगा था और आज भी अगर आप कॉकरोच जनता पार्टी से सवाल पूछते हैं तो एक खास इको-सिस्टम के लोग ( पत्रकार भी) तुरंत सामने आकर आपकी निष्ठा पर सवाल उठाते हुए पूछने लगते हैं कि आखिर कॉकरोच जनता पार्टी से किसी को क्या दिक्कत हो सकती है?&nbsp;</div><div><br></div><div>लेकिन ऐसा कहने वाले लोग पुरानी कहावत को भूल&nbsp; जाते हैं कि ' दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है'। वैसे भी लोकतंत्र की पहली शर्त तो यही होती है,' सवाल पूछने की आज़ादी' और सवालों से ऊपर कोई भी नहीं हो सकता है। जो भी नेता या संगठन अपने आपको सवालों से ऊपर उठाने की कोशिश करता है,उसका एक ही संदेश निकलता है कि उसकी नियत साफ नहीं है।</div><div>&nbsp;</div><div>यह बात बिल्कुल सही है कि सरकार के कामकाज को लेकर लोगों में खासकर युवाओं में बहुत गुस्सा है। लेकिन यह देश इससे पहले भी ऐसे अनुभवों से गुजर चुका है जब देश के युवाओं के गुस्से का इस्तेमाल कुछ खास लोगों ने अपने-अपने राजनीतिक हित को साधने के लिए किया। ऐसे लोगों ने युवाओं को सुनहरे भविष्य के सपने दिखाए, ऐसे-ऐसे झूठे और लुभावने वादे किए जिन्हें पूरा कर पाना आसान नहीं था। इसलिए इस बार भारत के लोगों खासकर युवाओं को सावधान रहने की जरूरत है। देश में बदलाव लाने का कोई भी अभियान देश की धरती से ही चलना चाहिए और किसी भी तरह के नए व्यक्ति या संगठन पर भरोसा करने से पहले लोगों को आंख बंद करके अपने आप से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि उस नए संगठन, आंदोलन या व्यक्ति के अभियान से सबसे ज्यादा फायदा किस राजनीतिक दल अथवा नेता को होगा?&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष कुमार पाठक</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 19:04:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/is-the-cockroach-janata-party-merely-a-sham</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/5/25/cockroach-janata-party_large_1904_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ट्रंप को समझ आ गया कि चीन का मुकाबला अकेले नहीं, भारत के साथ मिलकर किया जा सकता है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/marco-rubio-india-visit-and-indo-us-relations-analysis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका को अब इस बात का भलीभांति एहसास हो चुका है कि चीन जैसी उभरती महाशक्ति को रोक पाना उसके अकेले बूते की बात नहीं रह गई है। यही कारण है कि चीन से लगभग खाली हाथ लौटे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अब उम्मीद की सबसे मजबूत किरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दरबार में दिखाई दे रही है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का भारत दौरा दरअसल इसी बदली हुई वैश्विक मजबूरी और रणनीति का संकेत है। ट्रंप ने जिस तरह भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर से बातचीत के दौरान सार्वजनिक तौर पर कहा कि “मुझे प्रधानमंत्री मोदी बहुत पसंद हैं। मोदी महान हैं और वो मेरे दोस्त हैं।” ट्रंप ने यह तक कहा कि “हम भारत के इतने करीब पहले कभी नहीं थे और भारत मुझ पर तथा अमेरिका पर सौ फीसदी भरोसा कर सकता है।” यह बयान सिर्फ दोस्ती का प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस बदले हुए अमेरिकी रुख का संकेत है जिसमें वॉशिंगटन अब भारत को एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखने वाले सबसे अहम स्तंभ के रूप में देख रहा है। दिलचस्प बात यह भी रही कि मार्को रुबियो ने अपने भारत दौरे में ताजमहल के दीदार का कार्यक्रम भी रखा। कूटनीतिक गलियारों में इसे केवल पर्यटन नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक संदेश माना जा रहा है, मानो अमेरिका भारत को यह भरोसा दिलाना चाहता हो कि वह इस बार दबाव नहीं, बल्कि मोहब्बत और साझेदारी का पैगाम लेकर आया है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका की विदेश नीति में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। ट्रंप प्रशासन के दौरान “अमेरिका फर्स्ट” की नीति ने सहयोगी देशों में असहजता पैदा की। कई देशों को लगा कि वॉशिंगटन अब भरोसेमंद साथी नहीं रहा। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। चीन की आर्थिक और सैन्य ताकत जिस तेजी से बढ़ी है, उसने अमेरिका को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि एशिया में उसका प्रभाव बनाए रखने के लिए भारत जैसी लोकतांत्रिक और उभरती शक्ति के साथ मजबूत रिश्ते जरूरी हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/marco-rubio-met-modi-amid-the-possibility-of-a-resumption-of-the-iran-war" target="_blank">Iran War फिर शुरू होने की संभावना के बीच Modi से मिले Marco Rubio, PM को दिया Trump का खास संदेश</a></h3><div>दरअसल, चीन केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धी नहीं रहा। वह अब वैश्विक सप्लाई चेन, तकनीक, रक्षा उत्पादन और सामरिक निवेश के जरिए दुनिया पर अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। दक्षिण चीन सागर से लेकर ताइवान तक, बीजिंग का आक्रामक रवैया अमेरिका के लिए चुनौती बन चुका है। ऐसे में भारत अमेरिका के लिए एक स्वाभाविक विकल्प बनकर उभरा है। भारत एक ऐसा देश है जिसकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, जिसके पास विशाल बाजार है और जो लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करता है।</div><div><br></div><div>अमेरिका यह भी समझ चुका है कि केवल सैन्य शक्ति से चीन को रोका नहीं जा सकता। इसके लिए आर्थिक नेटवर्क, तकनीकी साझेदारी और भरोसेमंद औद्योगिक ढांचा जरूरी है। यही कारण है कि सेमीकंडक्टर, रक्षा निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्रिटिकल मिनरल्स और डिजिटल टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भारत के साथ साझेदारी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।</div><div><br></div><div>उधर, भारत के लिए भी यह अवसर कम महत्वपूर्ण नहीं है। लंबे समय तक भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दी। लेकिन अब नई दिल्ली समझ रही है कि वैश्विक शक्ति संतुलन में सक्रिय भूमिका निभाए बिना अपने हित सुरक्षित नहीं रखे जा सकते। यही वजह है कि भारत क्वॉड जैसे मंचों में सक्रिय है और अमेरिका, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग बढ़ा रहा है। हालांकि, भारत की चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ नजदीकी बढ़ाते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति भी बनाए रखे। रूस के साथ रक्षा संबंध हों या पश्चिम एशिया में संतुलन, भारत किसी एक खेमे में पूरी तरह शामिल होने से बचता रहा है। यही उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत भी है।</div><div><br></div><div>एक चीज और उभर कर आ रही है कि अमेरिका को अब भारत के साथ संबंधों में सिर्फ रणनीतिक भाषा नहीं, बल्कि व्यावहारिक निवेश की भी जरूरत है। अगर वॉशिंगटन वास्तव में चीन का प्रभाव कम करना चाहता है, तो उसे भारत में निर्माण, तकनीक और औद्योगिक ढांचे को मजबूत करने में गंभीर निवेश करना होगा। केवल भाषणों और समझौतों से बात नहीं बनेगी। देखा जाये तो भारत के भीतर कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां अमेरिकी निवेश बड़ा बदलाव ला सकता है। उच्च तकनीक, रक्षा उपकरण निर्माण, डिजिटल डेटा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला के क्षेत्र में भारत तेजी से आगे बढ़ सकता है। इससे दोनों देशों को फायदा होगा। एक तो अमेरिका को चीन पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी दूसरा भारत को वैश्विक उत्पादन केंद्र बनने का मौका मिलेगा।</div><div><br></div><div>लेकिन इस साझेदारी की असली परीक्षा भरोसे पर होगी। अमेरिका का पिछला रिकॉर्ड कई बार अस्थिर रहा है। अफगानिस्तान से अचानक वापसी और बदलती नीतियों ने उसके सहयोगियों को सतर्क किया है। भारत इसलिए हर कदम सोच-समझकर उठा रहा है। वैसे भी आज की दुनिया में गठबंधन केवल युद्ध लड़ने के लिए नहीं बनते, बल्कि तकनीक, व्यापार, डेटा और सप्लाई चेन पर नियंत्रण के लिए भी बनते हैं। अमेरिका और भारत के रिश्ते अब इसी नए दौर में प्रवेश कर चुके हैं। यह संबंध केवल दो देशों के बीच साझेदारी नहीं, बल्कि एशिया और दुनिया की नई शक्ति संरचना का आधार बन सकता है। मार्को रुबियो की यात्रा इसी बदलती भू-राजनीति का संदेश है। संकेत साफ है कि अमेरिका को अब भारत की जरूरत महसूस हो रही है। और भारत भी यह समझ चुका है कि वैश्विक राजनीति में अब निर्णायक खिलाड़ी बनकर उतरने का समय आ गया है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, हाल के घटनाक्रमों ने यह भी साफ़ कर दिया है कि अमेरिका की चीन नीति उतनी सफल नहीं रही, जितनी ट्रंप प्रशासन उम्मीद कर रहा था। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हाल ही में चीन दौरे पर गए थे, लेकिन वहां उन्हें कोई बड़ी रणनीतिक सफलता हासिल नहीं हुई। व्यापार, तकनीक और भू-राजनीतिक तनाव जैसे मुद्दों पर बीजिंग ने अमेरिकी दबाव के सामने झुकने के संकेत नहीं दिए। विश्लेषकों का मानना है कि इसी के बाद वॉशिंगटन को दोबारा यह एहसास हुआ कि एशिया में चीन का संतुलन केवल भारत के सहयोग से ही संभव है। यही वजह है कि ट्रंप के सुर अब बदले-बदले नजर आ रहे हैं। ट्रंप की चीन यात्रा के तुरंत बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत पहुंचे और उन्होंने भारत को “नेचुरल पार्टनर” बताते हुए रिश्तों को नई दिशा देने की बात कही। माना जा रहा है कि ट्रंप ने अपने बेहद करीबी सहयोगियों में गिने जाने वाले भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और विदेश मंत्री मार्को रुबियो को भारत के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करने की जिम्मेदारी दी है। खुद सर्जियो गोर ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ट्रंप भारत और प्रधानमंत्री मोदी के साथ संबंधों को बेहद अहम मानते हैं। दरअसल, अमेरिका अब समझ चुका है कि चीन के साथ “प्रतिस्पर्धा और सहयोग” की उसकी रणनीति सीमित परिणाम दे रही है, जबकि भारत के साथ मजबूत साझेदारी इंडो-पैसिफिक में उसे कहीं अधिक स्थिर और भरोसेमंद आधार दे सकती है।</div><div><br></div><div>संभवतः यह भी एक कारण है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अपने दौरे के दौरान साफ शब्दों में कहा कि भारत अब अमेरिका के “सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगियों” में शामिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बैठकों के बाद रुबियो ने संकेत दिए कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से लंबित व्यापार समझौता अब अंतिम चरण में पहुंच चुका है और आने वाले कुछ हफ्तों में इस पर सहमति बन सकती है। रुबियो ने यह भी स्पष्ट किया कि यह साझेदारी केवल टैरिफ या व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य टेक्नोलॉजी, निवेश, सप्लाई चेन और सामरिक सुरक्षा में गहरा सहयोग स्थापित करना है। क्वॉड को लेकर भी अमेरिका अब केवल औपचारिक बैठकों से आगे बढ़कर उसे वास्तविक आर्थिक और सामरिक गठबंधन के रूप में विकसित करना चाहता है, जिसमें समुद्री सुरक्षा, क्रिटिकल मिनरल्स और चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला प्रमुख एजेंडा होंगे। रुबियो के बयानों से यह साफ झलकता है कि वाशिंगटन अब भारत को केवल दक्षिण एशिया की शक्ति नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक रणनीति के केंद्रीय स्तंभ के रूप में देख रहा है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह पूरा घटनाक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संतुलित और दूरदर्शी कूटनीति की बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। पिछले लगभग एक वर्ष से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत के खिलाफ तीखे बयान, व्यापारिक दबाव और कई असहज संकेत लगातार सामने आते रहे, लेकिन नई दिल्ली ने कभी भी भावनात्मक प्रतिक्रिया या सार्वजनिक बयानबाजी का रास्ता नहीं चुना। मोदी सरकार ने संयम, धैर्य और रणनीतिक चुप्पी बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी। भारत न तो अमेरिकी दबाव के आगे झुका और न ही संबंधों को टकराव की दिशा में जाने दिया। इसकी बजाय सही समय का इंतजार करते हुए भारत ने अपनी आर्थिक ताकत, वैश्विक प्रतिष्ठा और रणनीतिक महत्व को और मजबूत किया। आज स्थिति यह है कि वही अमेरिका, जो कभी भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा था, अब रिश्तों को सुधारने और भारत को अपना सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बताने पर मजबूर है। यह केवल कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि उस आत्मविश्वासी भारत की तस्वीर है जिसने दुनिया को दिखा दिया कि मजबूत राष्ट्र शोर से नहीं, बल्कि धैर्य, संतुलन और सही रणनीति से अपनी जगह बनाते हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 15:38:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/marco-rubio-india-visit-and-indo-us-relations-analysis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/5/25/marco-rubio-india-visit_large_1538_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भारत और साइप्रस के बीच हुई रणनीतिक साझेदारी- समझौतों के कूटनीतिक, सामरिक और आर्थिक मायने]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-strategic-partnership-between-india-and-cyprus]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत और साइप्रस के बीच हाल में हुई रणनीतिक साझेदारी और विभिन्न समझौतों के कई बड़े कूटनीतिक, सामरिक और आर्थिक मायने हैं। देखा जाए तो यह केवल द्विपक्षीय संबंधों का विस्तार नहीं, बल्कि यूरोप, भूमध्यसागर, पश्चिम एशिया और वैश्विक शक्ति-संतुलन से भी जुड़ा कदम माना जा रहा है। चूंकि तुर्की और साइप्रस के बीच गहरी दुश्मनी है, इसलिए भारत उसे तुर्किये के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है, क्योंकि तुर्किये भारत के चिर शत्रु पाकिस्तान का मित्र है। इस प्रकार भारत के रणनीतिकारों ने एक तीर से कई शिकार किये हैं।</div><div><br></div><div>उल्लेखनीय है कि साइप्रस एक द्वीप है, इसलिए उसकी लैंड बॉर्डर तुर्की के साथ नहीं लगती है। लेकिन समुद्री मार्ग से साइप्रस और तुर्की के बीच की दूरी महज 65 से 70 किलोमीटर है। यही नहीं, साइप्रस तुर्की से 85 गुना छोटा देश है। इसलिए तुर्की ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर अवैध कब्जा कर रखा है। चूंकि तुर्की तो साइप्रस को एक देश भी नहीं मानता। लिहाजा दोनों देशों के बीच टकराव हमेशा बना रहता है। गत दिनों उसी देश साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स दिल्ली के दौरे पर आए। इस दौरान भारत और साइप्रस के बीच 14 मुद्दों पर ऐतिहासिक डील फाइनल हो गई।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cyprus-becomes-india-new-european-strategic-partner" target="_blank">Cyprus बना India का नया यूरोपीय रणनीतिक साथी, भूमध्यसागर में भारत की एंट्री होते ही Turkey की बढ़ी टेंशन</a></h3><div>आइए अब हम आपको इन 14 डील्स के बारे में विस्तार से बताते हैं, लेकिन उससे पहले यह समझिए आखिर में ये प्रमुख डील और समझौते क्या हैं? तो यह जान लीजिए कि&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">भारत और साइप्रस ने संबंधों को "स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप" (Strategic Partnership) तक उन्नत किया है। जिससे दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग रोडमैप, आतंकवाद-रोधी संयुक्त कार्यसमूह, साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, निवेश, शिक्षा, संस्कृति और व्यापार से जुड़े कई समझौते हुए हैं।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div>लिहाजा, इनके कूटनीतिक मायने बेहद अहम हैं:-</div><div><br></div><div>पहला, यूरोप में भारत की रणनीतिक पकड़ मजबूत हुई है, क्योंकि साइप्रस यूरोपीय संघ (EU) का सदस्य है। ऐसे में भारत को यूरोप के भीतर एक भरोसेमंद सहयोगी मिल रहा है। साइप्रस ने भारत-ईयू फ्री ट्रेड अग्रीमेंट (India-EU Free Trade Agreement) को आगे बढ़ाने का समर्थन भी किया है। इसका अर्थ है कि भारत की यूरोप तक आर्थिक पहुँच मजबूत होगी। इससे भारतीय कंपनियों के लिए यूरोपीय बाज़ार के दरवाजे और खुल सकते हैं। वहीं&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">भारत की कूटनीतिक आवाज़ ईयू (EU) मंचों पर अधिक प्रभावी हो सकती है।</span></div><div><br></div><div>दूसरा, तुर्किये-पाकिस्तान समीकरण का संतुलन तोड़ने में अब भारत को मिलेगी सहूलियत, क्योंकि साइप्रस और तुर्किये के बीच लंबे समय से तनाव है। दूसरी ओर तुर्किये कई बार पाकिस्तान के पक्ष में कश्मीर मुद्दे पर बोलता रहा है। ऐसे में भारत-साइप्रस निकटता को एक भू-राजनीतिक संतुलन के रूप में देखा जा रहा है। यही वजह है कि भारत ने साइप्रस की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन दोहराया, जबकि साइप्रस भारत के आतंकवाद विरोधी रुख के करीब दिखा।</div><div><br></div><div>तीसरा, चीन के बढ़ते प्रभाव का जवाब भी माना जा रहा है, क्योंकि भारत, साइप्रस और यूरोप के बीच बढ़ती साझेदारी को चीन की Belt and Road रणनीति के विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है। विशेषकर समुद्री व्यापार, सप्लाई चेन और इंफ्रास्ट्रक्चर सहयोग के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>चौथा, आईएमईसी (IMEC) कॉरिडोर को मजबूती मिलेगी, क्योंकि भारत-मध्यपूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) भारत की बड़ी रणनीतिक परियोजनाओं में से एक है। खास बात यह कि साइप्रस पूर्वी भूमध्यसागर में स्थित होने के कारण इस कॉरिडोर का महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक और समुद्री केंद्र बन सकता है। इससे भारत का यूरोप तक व्यापार तेज हो सकता है, स्वेज नहर पर निर्भरता कुछ हद तक घट सकती है, और चीन समर्थित समुद्री नेटवर्क का विकल्प तैयार हो सकता है।</div><div><br></div><div>पांचवां, समुद्री और रक्षा सहयोग बढ़ेगा, क्योंकि दोनों देशों ने रक्षा रोडमैप और समुद्री सुरक्षा सहयोग पर जोर दिया है। इसके मायने हिंद महासागर से लेकर भूमध्यसागर तक भारत की रणनीतिक उपस्थिति बढ़ सकती है। इससे साइबर सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी नेटवर्क मजबूत होंगे, जिससे भारतीय नौसैनिक पहुँच को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है।</div><div><br></div><div>छठा, भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति को मजबूती&nbsp; मिलेगी। चूंकि भारत अब केवल एक ध्रुव पर निर्भर नहीं रहना चाहता। इसलिए रूस, अमेरिका, यूरोप, खाड़ी देशों और भूमध्यसागरीय देशों के साथ समानांतर संबंध बनाकर भारत वैश्विक शक्ति-संतुलन में अपनी स्वतंत्र स्थिति मजबूत कर रहा है। साइप्रस के साथ समझौते इसी नीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसके आर्थिक मायने महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि निवेश दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं, शिपिंग, फिनटेक, पर्यटन और स्टार्टअप सेक्टर में सहयोग बढ़ सकता है। साइप्रस भारतीय निवेश के लिए यूरोप का “गेटवे” बन सकता है।&nbsp;&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">यह डील भारत के लिए बड़ा संदेश भी है, क्योंकि यह डील दिखाती है कि भारत अब केवल दक्षिण एशिया तक सीमित शक्ति नहीं रहना चाहता, बल्कि यूरोप, भूमध्यसागर, पश्चिम एशिया, और वैश्विक व्यापार मार्गों में भी अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक भूमिका बढ़ा रहा है।</span></div><div><br></div><div>निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि भारत-साइप्रस समझौते केवल छोटे देश के साथ सामान्य द्विपक्षीय संबंध नहीं हैं, बल्कि यूरोप में रणनीतिक प्रवेश, तुर्किये-पाकिस्तान-चीन समीकरण का संतुलन, IMEC कॉरिडोर की मजबूती, और वैश्विक शक्ति राजनीति में भारत की बढ़ती सक्रियता का संकेत हैं।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 13:19:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-strategic-partnership-between-india-and-cyprus</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/5/25/india-cyprus-relations_large_1319_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट क्या है? यह सीमा रक्षा के लिए क्यों और कहाँ कहाँ जरूरी है? विस्तार से जानिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/what-is-the-smart-border-project-why-is-it-necessary-for-border-defense-and-where-is-it-required]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट भारत की सीमाओं को पारंपरिक तारबंदी और मानव गश्त से आगे बढ़ाकर तकनीक आधारित “इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा कवच” में बदलने की योजना है। इसे मुख्यतः कम्प्रिहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम (CIBMS- Comprehensive Integrated Border Management System) के तहत विकसित किया गया है। हाल में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमा पर बड़े स्तर पर "स्मार्ट&nbsp; &nbsp;बॉर्डर प्रोजेक्ट" लागू किया है।</div><div><br></div><h2># जानिए स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट क्या है?</h2><div><br></div><div>स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट एक ऐसा सिस्टम है जिसमें सीमा पर केवल बाड़ (Fence) नहीं होती, बल्कि एआई (AI) आधारित निगरानी, सेंसर नेटवर्क, ड्रोन और रडार, थर्मल कैमरे, भूमिगत सेंसर, सैटेलाइट और फाइबर नेटवर्क, रियल टाइम कमांड सेंटर आदि सभी को परस्पर जोड़कर “इंटेलिजेंट बॉर्डर” बनाया जाता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/amit-shah-is-preparing-for-major-action-on-pakistan-and-bangladesh-border" target="_blank">Pakistan और Bangladesh Border पर बड़े एक्शन की तैयारी में Amit Shah, ला रहे हैं Smart Border Project, घुसपैठ पर लगेगा फुल स्टॉप</a></h3><h2># स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट में अनुप्रयुक्त तकनीकों के बारे में जानिए</h2><div><br></div><div>सवाल है कि आखिर स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट में कौन-कौन सी तकनीकें अनुप्रयुक्त होती हैं? तो यह जान लीजिए कि स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट में नअनुप्रयुक्त तकनीकें निम्नलिखित हैं:- पहला, थर्मल इमेजर और नाइट विजन का उपयोग किया जाता है जो रात, कोहरा, बारिश या धूलभरी आंधी में भी गतिविधि पकड़ लेते हैं। दूसरा, लेजर और इन्फ्रारेड अलार्म का उपयोग किया जाता है जिससे कोई व्यक्ति सीमा पार करे तो तुरंत अलर्ट मिलता है।&nbsp; तीसरा, ग्राउंड सेंसर की खासियत यह है कि ये भूमिगत सुरंग (Tunnel) या कंपन तक पहचान सकते हैं। चौथा, ड्रोन और एरोस्टेट के अनुप्रयोग से ऊपर से लगातार निगरानी होती रहती है और बड़े क्षेत्रों में तेजी से ट्रैकिंग सम्भव हो पाता है। पांचवां, रडार और सोनार के उपयोग से नदी या दलदली क्षेत्रों में नावों और गतिविधियों पर निगरानी सम्भव हो जाती है। छठा, कमांड और कंट्रोल सेंटर (Command &amp; Control Centr) से सभी सेंसरों की जानकारी एक ही कंट्रोल रूम में पहुंचती है, जहाँ BSF/ITBP तुरंत प्रतिक्रिया दे सकते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2># आखिर भारत को इसकी जरूरत क्यों है?</h2><div><br></div><div>सवाल है कि आखिर भारत को इसकी जरूरत क्यों है? तो यह जान लीजिए कि निम्नलिखित वजहों से भारत को इसकी जरूरत है:- पहला, आतंकवाद और घुसपैठ रोकने के लिए क्योंकि विशेषकर पाकिस्तान सीमा पर आतंकियों की घुसपैठ बड़ी चुनौती रही है। दूसरा, अवैध प्रवासन रोकने के लिए, क्योंकि बांग्लादेश सीमा पर अवैध घुसपैठ, मानव तस्करी और तस्करी लंबे समय से समस्या रही है। तीसरा, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण भारत को इसकी सख्त जरूरत है, क्योंकि भारत की सीमाएँ- रेगिस्तान, पहाड़, घने जंगल, नदी क्षेत्र, दलदली इलाके से होकर गुजरती हैं, जहाँ सामान्य फेंसिंग कारगर नहीं होती। चतुर्थ,जवानों की सुरक्षा के दृष्टिगत, क्योंकि लगातार गश्त में सैनिकों की जान का जोखिम रहता है। स्मार्ट निगरानी से यह दबाव कम होगा। पांचवां, निरंतर 24×7 निगरानी हेतु, क्योंकि मानव गश्त सीमित होती है, लेकिन सेंसर और एआई (AI) चौबीसों घंटे काम कर सकते हैं।</div><div><br></div><h2># आखिर भारत की किन सीमाओं पर यह सबसे ज्यादा जरूरी है?</h2><div><br></div><div>सवाल है कि भारत की किन किन सीमाओं पर यह सबसे ज्यादा जरूरी है? तो यह जान लीजिए कि पहला, पाकिस्तान सीमा पर क्यों जरूरी है? यहां पर आतंकवादी घुसपैठ, ड्रोन से हथियार/नशा भेजना, सीमा पार फायरिंग, सुरंगों का उपयोग किया जाता है। सवाल है कि कहाँ कहाँ विशेष जरूरत है? तो यह समझ लीजिए कि जम्मू सेक्टर, पंजाब सीमा, राजस्थान का रेगिस्तानी क्षेत्र में इसकी सख्त जरूरत है। यही वजह है कि 2018 में जम्मू क्षेत्र में भारत का पहला स्मार्ट फेंस पायलट शुरू किया गया था।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरा, बांग्लादेश सीमा पर क्यों जरूरी है? तो यह समझ लीजिए कि अवैध घुसपैठ, मानव तस्करी, पशु तस्करी, नदी क्षेत्रों से प्रवेश रोकने हेतु इसकी जरूरत है। यहां से जुड़े सबसे संवेदनशील क्षेत्र में असम का धुबरी क्षेत्र, पश्चिम बंगाल सीमा, त्रिपुरा और मेघालय प्रमुख हैं, जहां की नदी और दलदली इलाकों में "प्रोजेक्ट बोल्ड किट" (Project BOLD-QIT) लागू किया गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा, चीन सीमा पर क्यों जरूरी? बताया जाता है कि एलएसी (LAC) पर तनाव, कठिन हिमालयी इलाके, अचानक सैनिक गतिविधियाँ, मौसम संबंधी चुनौतियाँ के दृष्टिगत इसकी जरूरत समझी जाती है। जहां तक कहाँ जरूरत? जैसे सवाल की बात है तो लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम के समीप&nbsp; एआई (AI), ड्रोन, सैटेलाइट और हाई-एल्टीट्यूड सेंसर सबसे महत्वपूर्ण होंगे।</div><div><br></div><div>चौथा, आखिर म्यांमार सीमा पर क्यों जरूरी है? तो बताया जाता है कि उग्रवाद, हथियार और ड्रग्स तस्करी, अवैध आवाजाही के चलते भारत ने म्यांमार सीमा पर भी स्मार्ट फेंसिंग की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2># स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट के बड़े फायदे</h2><div><br></div><div>जहां तक स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट के बड़े फायदे की बात है तो इसके सामरिक फायदे हैं- घुसपैठ में कमी, आतंकवाद पर नियंत्रण और तेज प्रतिक्रिया क्षमता। वहीं आर्थिक फायदे के तौर पर लंबी अवधि में गश्त की लागत कम होगी, तस्करी से होने वाले नुकसान में कमी आएगी। वहीं सामाजिक फायदे के तौर पर सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा भावना, जनसंख्या असंतुलन संबंधी चिंताओं पर नियंत्रण होगा। जबकि तकनीकी फायदे के रूप में मेक इन इंडिया (Make in India) रक्षा तकनीक को बढ़ावा मिलेगा तथा एआई (AI) और ड्रोन उद्योग का विकास होगा।</div><div><br></div><div>जहां तक चुनौतियों की बात है तो निम्नलिखित चुनौतियाँ इस राह में हैं? पहला, बहुत अधिक लागत: पूरी सीमा पर हाई-टेक सिस्टम लगाना बेहद महंगा है। दूसरा, कठिन मौसम: हिमालय, रेगिस्तान और बाढ़ वाले क्षेत्रों में तकनीक टिकाऊ बनाना चुनौती है। तीसरा, साइबर सुरक्षा: यदि सिस्टम हैक हुआ तो सुरक्षा खतरा बढ़ सकता है। चौथा, स्थानीय सहयोग: सीमावर्ती गाँवों का सहयोग जरूरी है।</div><div><br></div><div>सवाल है कि इसे अपनाकर भविष्य में भारत क्या कर सकता है? तो यह जान लीजिए कि एआई (AI) आधारित “Predictive Border Security”, स्वचालित ड्रोन पेट्रोलिंग, सैटेलाइट आधारित लाइव मॉनिटरिंग, रोबोटिक बॉर्डर पोस्ट और Integrated Defence Grid को अपनाकर भारत अपनी सीमा को और अधिक सुरक्षित बना सकता है।</div><div><br></div><div>निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट केवल “फेंसिंग” नहीं बल्कि भारत की सीमा सुरक्षा सोच में बड़ा बदलाव है। यह पारंपरिक चौकियों से आगे बढ़कर डेटा, AI, सेंसर और रियल टाइम निगरानी आधारित सुरक्षा मॉडल की ओर कदम है। पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमा पर इसकी तत्काल आवश्यकता है, जबकि चीन और म्यांमार सीमा पर यह भविष्य की सामरिक जरूरत बनता जा रहा है। यदि सही तरीके से लागू हुआ, तो यह भारत की सीमा सुरक्षा को 21वीं सदी के स्तर पर ले जा सकता है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 23 May 2026 18:35:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/what-is-the-smart-border-project-why-is-it-necessary-for-border-defense-and-where-is-it-required</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/5/23/smart-border-project_large_1835_23.jpeg" />
    </item>
  </channel>
</rss>