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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान]]></title>
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      <description><![CDATA[<div>भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संसद है। यही वह सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है जहां राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य से जुड़े विषयों पर गंभीर विमर्श होता है, सरकार जवाबदेह बनती है, विपक्ष जनभावनाओं को स्वर देता है और कानूनों के माध्यम से देश के विकास की दिशा तय होती है। लेकिन अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज संसद संवाद और सहमति का मंच बनने के बजाय टकराव, आरोप-प्रत्यारोप, नारेबाजी और राजनीतिक हठधर्मिता का अखाड़ा बनती जा रही है। मानसून सत्र में जिस प्रकार लगातार गतिरोध बना हुआ है, उससे केवल संसदीय कार्यवाही ही बाधित नहीं हो रही, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा भी आहत हो रही है। संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजीजू और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बीच गतिरोध समाप्त करने के लिए हुई बातचीत भी किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी। यह स्थिति बताती है कि दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक आग्रहों में इतने उलझ गए हैं कि राष्ट्रहित पीछे छूट गया है। विपक्ष की ओर से यह शर्त रखी जा रही है कि जब तक कुछ विशेष मुद्दों पर सरकार सदन में बयान और चर्चा के लिए तैयार नहीं होती, तब तक संसद की कार्यवाही नहीं चलने दी जाएगी। दूसरी ओर सरकार भी अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने पर अडिग है। परिणाम यह है कि संसद का बहुमूल्य समय निरर्थक विवादों की भेंट चढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, किंतु असहमति को अराजकता में बदल देना लोकतांत्रिक संस्कृति नहीं है। विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं, बल्कि रचनात्मक सुझाव देना भी है। सरकार को कठघरे में खड़ा करना विपक्ष का अधिकार है, परंतु संसद को ठप कर देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। लोकतंत्र में विरोध की भी मर्यादा होती है। जब विरोध संसद को चलने ही न दे, तब वह लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक दायित्वों की उपेक्षा बन जाता है। पिछले कुछ वर्षों से यह चिंताजनक प्रवृत्ति लगातार बढ़ी है कि संसद सत्र प्रारंभ होने से पहले ऐसे मुद्दे राजनीतिक रूप से उछाले जाते हैं, जिनके आधार पर पूरे सत्र को बाधित किया जा सके। परिणामस्वरूप अनेक महत्वपूर्ण विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हो जाते हैं अथवा कई विधेयक लंबित रह जाते हैं। इससे सबसे अधिक नुकसान देश को होता है। संसद का प्रत्येक मिनट करोड़ों रुपये की सार्वजनिक धनराशि से संचालित होता है। यदि वह समय केवल शोर-शराबे और नारेबाजी में बीत जाए तो यह करदाताओं के धन और लोकतांत्रिक विश्वास-दोनों का अपमान है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-big-signal-the-delimitation-bill-will-be-passed-now-the-nda-has-the-full-numbers" target="_blank">PM Modi का बड़ा संकेत: Delimitation Bill अब आकर रहेगा! NDA के पास पूरा संख्या बल</a></h3><div>लोकतंत्र में संवाद ही समाधान का सबसे प्रभावी माध्यम है। महात्मा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक भारतीय राजनीति की श्रेष्ठ परंपरा संवाद, सहमति और संवेदनशीलता की रही है। आज आवश्यकता इस बात की है कि पक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने दुराग्रह छोड़कर संवाद की मेज पर बैठें। संसद की गरिमा इस बात में नहीं कि कौन किसे अधिक कठघरे में खड़ा करता है, बल्कि इस बात में है कि राष्ट्रहित के प्रश्नों पर कितनी गंभीरता से विचार किया जाता है। विशेष रूप से कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल आंदोलन और विरोध का नाम नहीं है। विपक्ष की भूमिका सरकार को गिराने की नहीं, बल्कि लोकतंत्र को संभालने की होती है। यदि प्रत्येक मुद्दे पर संसद को बाधित करने की रणनीति अपनाई जाएगी तो जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि विपक्ष के पास वैकल्पिक नीति और दृष्टि का अभाव है। लोकतंत्र में जनता केवल विरोध नहीं, समाधान भी चाहती है। यदि विपक्ष स्वयं संवाद से दूरी बनाएगा तो ‘संवाद से समाधान’ का आदर्श केवल नारा बनकर रह जाएगा।</div><div><br></div><div>सरकार की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। लोकतंत्र में बहुमत का अर्थ मनमानी नहीं होता। सरकार को भी विपक्ष की उचित मांगों को सुनना चाहिए और जहां संभव हो, सहमति का मार्ग निकालना चाहिए। संसद किसी एक दल की नहीं, पूरे राष्ट्र की संस्था है। इसलिए सरकार को भी संवेदनशीलता, धैर्य और व्यापक दृष्टिकोण का परिचय देना होगा। किंतु यदि संवाद का प्रत्येक प्रयास केवल राजनीतिक शर्तों और हठधर्मिता में उलझ जाए तो समाधान की संभावनाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं। आज सबसे बड़ी आवश्यकता राजनीतिक परिपक्वता की है। दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति में आग्रह, पूर्वाग्रह और दुराग्रह का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। हर मुद्दे को चुनावी लाभ-हानि के चश्मे से देखा जा रहा है। संसद में बहस कम और राजनीतिक संदेश अधिक दिए जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र को कमजोर करती है। संसद का उद्देश्य जनकल्याणकारी नीतियों पर विचार करना है, न कि चुनावी रणनीतियों का मंच बन जाना।</div><div><br></div><div>देश आज आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति, रोजगार, शिक्षा, कृषि, राष्ट्रीय सुरक्षा, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सामाजिक समरसता जैसी अनेक चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय संसद का प्रत्येक दिन अत्यंत मूल्यवान है। यदि यह समय केवल राजनीतिक टकराव में व्यतीत होगा तो विकास की गति अवश्य प्रभावित होगी। कानूनों में विलंब, नीतिगत निर्णयों की देरी और संसदीय अस्थिरता का सीधा प्रभाव आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। भारतीय लोकतंत्र की मजबूती इस बात में नहीं कि संसद में कितना शोर हुआ, बल्कि इस बात में है कि वहां कितने सार्थक विचार सामने आए। स्वस्थ लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष प्रतिद्वंद्वी अवश्य होते हैं, किंतु शत्रु नहीं। दोनों का अंतिम लक्ष्य राष्ट्रहित होना चाहिए। यदि राजनीतिक दल इस मूल भावना को भूल जाएंगे तो लोकतंत्र केवल संख्या का खेल बनकर रह जाएगा।</div><div><br></div><div>आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी राजनीतिक दल आत्ममंथन करें। विपक्ष अपने विरोध को रचनात्मक बनाए, सरकार अपने संवाद को व्यापक बनाए और दोनों मिलकर संसद की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करें। लोकतंत्र का भविष्य टकराव में नहीं, संवाद में सुरक्षित है। संसद की गरिमा नारेबाजी से नहीं, विचार-विमर्श से बढ़ती है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में यदि संसद ही गतिरोध का प्रतीक बन जाएगी तो जनता का विश्वास कमजोर होगा, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है। समय की पुकार है कि राजनीति चुनावों की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रनिर्माण की दिशा में आगे बढ़े। पक्ष और विपक्ष दोनों यह स्मरण रखें कि वे किसी दल के नहीं, पहले भारत के प्रतिनिधि हैं। संसद की प्रत्येक घड़ी राष्ट्र की अमूल्य धरोहर है। उसे हठ, अहंकार और राजनीतिक स्वार्थ की भेंट चढ़ाना भविष्य की पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा। यदि लोकतंत्र को सशक्त बनाना है, संसद की प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित करनी है और भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है, तो केवल एक ही मार्ग है-संवाद, सहमति और राष्ट्रहित। यही भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है और यही संसदीय मर्यादा का सर्वोच्च आदर्श।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 17:54:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/democracy-cannot-function-amidst-parliamentary-deadlock-dialogue-is-the-solution</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[FCRA Bill पर हल्ला मचा रहे विपक्षी दलों और ईसाई संगठनों को मार्को रुबियो का बयान सुनना चाहिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/modi-government-fcra-amendment-foreign-funding-ngos-india-marco-rubio]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक को लेकर देश में तो इस समय व्यापक बहस छिड़ी ही हुई है, साथ ही इसकी गूंज अमेरिका तक सुनाई दे रही है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो पहले स्वयं यह कह चुके हैं कि किसी भी देश में विदेशी फंड से संचालित संस्थाओं को वहां की संप्रभु सरकार के समानांतर व्यवस्था नहीं चलानी चाहिए और उन्हें मेजबान देश के कानूनों का सम्मान करना चाहिए। इसके बावजूद अमेरिकी सांसद राइली मूर भारत के प्रस्तावित कानून की आलोचना कर रहे हैं। दूसरी ओर, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने उन्हें आश्वस्त किया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू नहीं किया जाएगा। इन घटनाक्रमों के बीच मोदी सरकार का स्पष्ट संदेश है कि विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों के संचालन में पारदर्शिता, जवाबदेही और भारतीय कानूनों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में एफसीआरए के तहत पंजीकृत सक्रिय संगठनों की संख्या घटी है, लेकिन विदेशी चंदे का प्रवाह बना हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2024-25 में 16,200 संगठनों को लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस निरस्त या समाप्त भी किए गए हैं। सरकार का कहना है कि केवल वैध पंजीकरण रखने वाले संगठनों को ही विदेशी धन प्राप्त करने और उसका उपयोग करने का अधिकार होना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/parliament-clashes-between-ruling-and-opposition-parties-kiren-rijiju-sharply-attacks-kharge-claim" target="_blank">संसद में सत्ता-विपक्ष की टकरार! Kharge के दावे पर Kiren Rijiju का तीखा वार</a></h3><div>हम आपको बता दें कि सरकार द्वारा लाए गए संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है, रद्द हो जाता है, नवीनीकृत नहीं होता या संस्था स्वयं उसे छोड़ देती है, तो विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक "नामित प्राधिकरण" की व्यवस्था की जाएगी। यदि बाद में संस्था का पंजीकरण बहाल हो जाता है तो संबंधित संपत्तियां और अप्रयुक्त विदेशी योगदान वापस कर दिए जाएंगे। यदि ऐसा नहीं होता, तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। केंद्र सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था किसी नए अधिकार का सृजन नहीं, बल्कि पहले से मौजूद प्रावधानों को अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित बनाने का प्रयास है।</div><div><br></div><div>वहीं प्रस्तावित संशोधन को लेकर कुछ चर्च संगठनों ने आशंकाएं भी व्यक्त की हैं। उनका कहना है कि कानून की कुछ धाराएं अत्यधिक कठोर हैं और उन्हें संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से विभिन्न चर्च संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। वहीं मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमित शाह के साथ बैठक के बाद कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने स्पष्ट आश्वासन दिया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जाएगा।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं का विस्तार से जवाब भी दिया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून किसी विशेष धर्म, समुदाय या विचारधारा को निशाना नहीं बनाता। एफसीआरए के प्रावधान सभी विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले संगठनों पर समान रूप से लागू होते हैं। केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति का मामला आता है तो उसके धार्मिक स्वरूप को कानूनन सुरक्षित रखा जाएगा। साथ ही, नामित प्राधिकरण के आदेश अंतिम नहीं होंगे और उनके विरुद्ध न्यायालय में अपील का अधिकार भी उपलब्ध रहेगा।</div><div><br></div><div>उधर, इस पूरे विवाद का अंतरराष्ट्रीय पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने आरोप लगाया कि यह कानून चर्चों और ईसाई संस्थाओं के खिलाफ है। हालांकि स्वयं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पिछले वर्ष यह कहा था कि विदेशी सहायता कार्यक्रम मेजबान देशों की सरकारों के समानांतर नहीं चलने चाहिए और विदेशी वित्तपोषित संस्थाओं को संबंधित देश की नीतियों और कानूनों के अनुरूप काम करना चाहिए। यही कारण है कि भारत के संदर्भ में उठ रही आलोचना पर दोहरे मापदंड का प्रश्न भी सामने आया है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो लोकतंत्र में किसी भी कानून पर बहस और समीक्षा का अधिकार सभी को है, लेकिन भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। यदि कोई संगठन विदेशी चंदे के सहारे पूरी पारदर्शिता और भारतीय कानूनों का पालन करते हुए जनकल्याण का कार्य करता है, तो उसके लिए इस कानून से घबराने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, जिन संस्थाओं या तत्वों ने विदेशी धन का उपयोग नियमों से इतर गतिविधियों, अपारदर्शी वित्तीय लेन-देन या भारत में अस्थिरता और अशांति फैलाने के प्रयासों के लिए किया है, उनके लिए स्वाभाविक रूप से चिंता की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि प्रस्तावित संशोधन निगरानी, जवाबदेही और कानूनी अनुपालन को और मजबूत करने का प्रयास करता है। मोदी सरकार का कहना है कि यह कानून किसी धर्म या समुदाय को लक्षित नहीं करता, बल्कि विदेशी अंशदान के नियमन और पारदर्शिता के लिए समान रूप से लागू होगा। ऐसे में यदि विदेशी फंडिंग के नाम पर नियमों की अनदेखी करने वालों की मुश्किलें बढ़ती हैं, तो इसे कानून के दायरे में जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>बहरहाल, संसद में होने वाली चर्चा के बाद कानून का अंतिम स्वरूप तय होगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि विदेशी धन के उपयोग पर प्रभावी निगरानी और राष्ट्रीय हितों की रक्षा किसी भी संप्रभु राष्ट्र की वैध जिम्मेदारी है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 14:17:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/modi-government-fcra-amendment-foreign-funding-ngos-india-marco-rubio</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[राजेंद्र माथुर- विचारों की पत्रकारिता के नायक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/rajendra-mathur-a-champion-of-journalism-of-ideas]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजेंद्र माथुर की पूरी जीवन यात्रा एक साधारण आम आदमी की कथा है। वे इतने साधारण हैं कि असाधारण लगने लगते हैं। उन्होंने जो कुछ पाया, एकाएक नहीं पाया; संघर्ष से पाया, नियमित लेखन से पाया और अपनी रचनाशीलता से पाया। इसी संघर्ष की वृत्ति ने उन्हें असाधारण पत्रकार और संपादक बना दिया। राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात से तय होता है कि आखिर उनके लेखन में विचारों की गहराई कितनी है। अपने अखबार को ऊंचाइयों पर ले जाने का उनका संकल्प कितना गहरा है और हमारे समय के प्रश्नों के जवाब तलाशने तथा नए सवाल खड़े करने की कितनी प्रश्नाकुलता संबंधित व्यक्ति में है। राजेंद्र माथुर का संपादकीय और पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात की गवाही देता है कि वे असहज प्रश्नों से मुंह नहीं चुराते, बल्कि उनसे दो-दो हाथ करते हैं। वे सवालों से जूझते हैं और उनके सही एवं प्रासंगिक उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं।</div><div><br></div><div>वे सही मायने में पत्रकारिता में विचारों के एक ऐसे प्रतीक पुरुष बनकर सामने आए, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से एक बौद्धिक उत्तेजना का सृजन किया और हिंदी को एक ऐसी भाषा तथा विराट अनुभव-संसार दिया, जिसकी प्रतीक्षा में वह सालो से खड़ी थी। इस मायने में राजेंद्र माथुर की उपस्थिति अपने समय में एक कद्दावर पत्रकार-संपादक की मौजूदगी है। वरिष्ठ पत्रकार श्री सूर्यकांत बाली के मुताबिक,“माथुर साहब जैसा बोलते थे, वैसा ही लिखते थे। वे धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत बोलते थे, तो धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत लिखते भी थे।” ऐसे में कहा जा सकता है कि राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय एवं संपादकीय व्यक्तित्व में एक बौद्धिक आकर्षण दिखता है। उनके लेखन में भारत-जिज्ञासा, भारत-अनुराग और भारत-स्वप्न पूरी समग्रता में प्रकट होते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने लिखा है कि&nbsp; “राजेंद्र माथुर में बौद्धिकता और सच्चरित्रता का असाधारण संगम था, इसीलिए वे हिंदी पत्रकारिता में शिखर स्थान पा सके। वे असाधारण शैलीकार थे। अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक होने के बावजूद उनकी हिंदी लेखन शैली बिंब-प्रधान थी। उनके मुहावरे अपने होते थे। उनमें अभिव्यंजना की अद्भुत शक्ति थी। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में वे एक शैलीकार के रूप में याद किए जाएंगे।”</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/why-do-not-we-find-people-like-shivaji-chandrashekhar-azad-and-bhagat-singh-anymore" target="_blank">अब शिवाजी, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह जैसे लोग क्यों नहीं मिलते?</a></h3><div>राजेंद्र माथुर एक श्रेष्ठ संपादक थे। उनकी उपस्थिति ही 'नईदुनिया' और 'नवभारत टाइम्स' को एक ऐसा समाचार पत्र बनाने में सफल हुई, जिस पर हिंदी पत्रकारिता को नाज है। 'नवभारत टाइम्स' में श्री माथुर के सहयोगी रहे श्री विष्णु खरे ने लिखा है कि, “राजेंद्र माथुर महान संपादक होने का अभिनय करने की कोई जरूरत महसूस नहीं करते थे। दरअसल, लिबास से लेकर बोलचाल तक उनकी कोई बनावटी शैली या लहजा नहीं था; वे अपने मामूलीकरण में विश्वास करते थे, वैशिष्ट्य में नहीं। उनकी संपादकीय आदेशों या हुक्मों से नहीं, एक गुणात्मक तथा नैतिक विकिरण से चलती” राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व बेहद प्रेरक था। आज की पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में घुस आई तमाम बुराइयों से उनका व्यक्तित्व एकदम अलग था। संपादक की जैसी शास्त्रीय परिभाषाएं बताई गई हैं, श्री माथुर उन पर पूरी तरह फिट बैठते हैं।</div><div><br></div><div>उनके समकक्ष पत्रकारों की राय में, जिस समय वे दिल्ली में 'नवभारत टाइम्स' जैसे बड़े अखबार के संपादक थे, वे सत्ता के लाभ उठा सकते थे। आज की पत्रकारिता में जिस तरह पत्रकार एवं संपादक सत्ता से लाभ लेकर मंत्री से लेकर राज्यसभा की सीटें ले रहे हैं, श्री माथुर भी ऐसे प्रलोभनों के पास जा सकते थे। किंतु उन्होंने तमाम चर्चाओं के बीच इससे खुद को बचाया। पत्रकार विष्णु खरे अपने लेख में इस बात की पुष्टि भी करते हैं। सही मायने में राजेंद्र माथुर एक ऐसे संपादक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने अपने पत्रकारीय व्यक्तित्व को वह ऊंचाई दी जिसके लिए पीढ़ियां उन्हें याद कर रही हैं। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी हिंदी पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंताएं हैं। वे हिंदी पत्रकारिता के एक ऐसे संपादक थे, जो लगातार यह सोचते रहे कि हिंदी पत्रकारिता का विचार-दारिद्र्य कैसे दूर किया जाए और कैसे हिंदी में एक संपूर्ण अखबार निकले तथा उसे व्यापक लोकस्वीकृति भी मिल सके। 'नवभारत टाइम्स' के कार्यकारी संपादक रहे स्व. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने उनकी इन चिंताओं को निकटता से देखा था। वे लिखते हैं, “माथुर साहब का गहन इतिहास-बोध, शुद्ध श्रद्धा और उससे उत्पन्न गरिमामय अतीत की मरीचिका पर आधारित हिंदी पत्रकारिता की कमजोर आधारभूमि के बारे में उन्हें बार-बार सचेत करता रहता था। वे भूतकाल के वायवीय स्वर्णिम अतीत में जीने वाले नहीं थे। वे स्वप्नदर्शी थे और अपने सपनों की उदात्तता के साथ उन्होंने कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य उन्हें बार-बार विचलित तो कर देता था, लेकिन एक कुशल अभियात्री की तरह उन्होंने अपने जहाज की दिशा को क्षणिक प्रलोभनों के लिए किसी अन्य रास्ते पर डालने के बारे में क्षणिक विचार भी नहीं किया।”</div><div><br></div><div>उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की विशिष्टता यह भी है कि वे अंग्रेजी के प्राध्यापक और विद्वान होने के बावजूद अपने लेखन की भाषा के नाते हिंदी को चुनते हैं। हिंदी उनकी सांसों में बसती थी। हिंदी पत्रकारिता को नई जमीन तोड़ने के लिए प्रेरित करने और हिंदी लेखकों एवं पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी का निर्माण करने का काम श्री माथुर जीवन भर करते रहे। इंदौर से लेकर दिल्ली तक उनकी पूरी यात्रा में एक भारत-प्रेम, भारत-बोध और हिंदी-प्रेम साफ नजर आता है। शायद इसी के चलते वे देश की पत्रकारिता को एक नई और सही दिशा देने में सफल रहे। श्री मधुसूदन आनंद लिखते हैं, “माथुर साहब ने अंग्रेजी में एम.ए. किया था और अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ अंग्रेजी पत्रकारों को भी विस्मय में डालती थी। लेकिन उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को चुना, तो शायद इसलिए कि वे अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। अगर यह कहा जाए कि हिंदी पत्रकारों की एक पीढ़ी माथुर साहब को पढ़कर पली और बढ़ी है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। उनके असामयिक निधन के बाद 'नवभारत टाइम्स' को देश के दूर-दूर के इलाकों से हजारों पत्र प्राप्त हुए थे। ये वे पाठक थे, जो उनके उत्कट राष्ट्र-प्रेम, समाज के प्रति उनके सरोकारों, इतिहास की अतल गहराइयों से अनमोल तथ्य ढूंढ कर लाने के उनके सामर्थ्य और शालीन भाषा में राजनेताओं की खिंचाई करने के उनके साहस पर मुग्ध थे।”&nbsp;</div><div><br></div><div>उनके व्यक्तित्व की एक बड़ी विशेषता थी, जिसे उनके सहयोगी रहे सूर्यकांत बाली इन शब्दों में रेखांकित करते हैं,“हमारे प्रधान संपादक को कोई पांचवां काम आता है, इस पर तो मुझे पूरा शक है: बस सोचना, पढ़ना, बतियाना और लिखना, उनकी सारी दुनिया इन चार कामों में सिमट चुकी थी।” श्री माथुर के व्यक्तित्व पर यह एक मुकम्मल टिप्पणी है, जो बताती है कि वे किस तरह के पत्रकार-संपादक थे। उनका पत्रकारीय व्यक्तित्व इसीलिए एक अलग किस्म की आभा के साथ सामने आता है, जिसमें एक बौद्धिक तेज और आकर्षण निरंतर दिखता है। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक ऐसे लेखक-संपादक के तौर पर सामने आते हैं, जो पूर्णकालिक पत्रकार थे। वे किसी साहित्य की परंपरा से आने वाले संपादक नहीं थे। अतः उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को साहित्यकार-संपादकों द्वारा दी गई भाषा और उसके मुहावरों से अलग एक अनूठी पत्रकारीय भाषा का अनुभव दिया। हिंदी को संवाद, संचार और सूचना की भाषा बनाने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही मायने में वे एक ऐसे संपादक और लेखक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने बहुत से अनछुए विषयों को हिंदी के अनुभव का विषय बनाया, जिन पर पहले अंग्रेजी के पत्रकारों का एकाधिकार माना जाता था। उन्होंने भावनाओं से ऊपर विचार और बौद्धिकता को महत्व दिया। इसके चलते हिंदी को एक नई भाषा, एक नया अनुभव और अभिव्यक्ति का एक नया संबल मिला। उनकी बौद्धिकता ने हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी अखबारों के सामने सम्मान से खड़े होने लायक बनाया, जिससे हिंदी पत्रकारिता ने एक नया आत्मविश्वास और नई ऊर्जा हासिल की।&nbsp; आज हिंदी पत्रकारिता पर जिस तरह बाजारवादी ताकतों का दबाव गहरा रहा है, ऐसे समय में राजेंद्र माथुर के बहाने हिंदी पत्रकारिता की पड़ताल एक आवश्यक विमर्श बन गई है। शायद उनकी स्मृति के बहाने हम कुछ ऐसे रास्ते तलाश पाएं, जो हमें इस कठिन समय में अपने मूल्यों के साथ काम करने का हौसला दे सकें।</div><div><br></div><div>- प्रो.संजय द्विवेदी</div><div>(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 09:51:31 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/rajendra-mathur-a-champion-of-journalism-of-ideas</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[MP में कुशवाहा वोट बैंक की ताकत के आगे झुकी BJP, 'गुलाटी' बयान के लिए तोमर को मांगनी पड़ी माफी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/narendra-singh-tomar-apology-kushwaha-community-datia-bypoll-mp-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मध्य प्रदेश की राजनीति में दतिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने भारतीय जनता पार्टी को ऐसा राजनीतिक संदेश दिया है, जिसकी गूंज अब पूरे प्रदेश में सुनाई दे रही है। विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेंद्र सिंह तोमर के एक विवादित बयान से शुरू हुआ विवाद आखिरकार सार्वजनिक माफी तक पहुंच गया। भाजपा की आंतरिक समीक्षा में यह संकेत मिलने के बाद कि कुशवाहा समाज की नाराजगी पार्टी की हार का बड़ा कारण बनी, तोमर ने स्वयं आगे आकर अपने शब्द वापस लिए और कहा कि उन्होंने कभी सपने में भी इस समाज का अपमान करने की नहीं सोचा।</div><div><br></div><div>पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब 31 जुलाई को मुरैना में भाजपा के जिला अध्यक्ष कमलेश कुशवाहा के निवास पर आयोजित एक कार्यक्रम में नरेंद्र सिंह तोमर ने कुशवाहा समाज को संबोधित करते हुए कहा कि यह समाज बीच-बीच में "गुलाटी खाता रहा" और इसी कारण उसने अपनी "विश्वसनीयता को खंडित" किया। उन्होंने यह भी कहा कि एक समय ऐसा था जब कुशवाहा समाज भाजपा का मजबूत समर्थक माना जाता था और भाजपा ने उस दौर में भी समाज को सम्मान दिया, जब अन्य राजनीतिक दल उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की स्थिति में नहीं थे। उन्होंने पूर्व नेता कालीचरण कुशवाहा को टिकट दिए जाने का उदाहरण भी प्रस्तुत किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/pm-modi-slams-pakistan-on-article-370-anniversary-kashmir-development-pojk-hypocrisy" target="_blank">Article 370 पर बदजुबानी कर रहे थे जरदारी और शहबाज शरीफ, मोदी ने खुद आगे आकर दिया करारा जवाब</a></h3><div>हालांकि, कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही राजनीतिक भूचाल आ गया। कुशवाहा समाज के विभिन्न संगठनों और प्रतिनिधियों ने इस टिप्पणी को पूरे समाज की राजनीतिक निष्ठा पर सवाल बताकर तीखी आपत्ति जताई। कांग्रेस ने भी इसे तुरंत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इसे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का अपमान बताते हुए कहा कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की भाषा शोभा नहीं देती और उन्होंने नरेंद्र सिंह तोमर से सार्वजनिक माफी की मांग की।</div><div><br></div><div>इस बीच, दतिया विधानसभा उपचुनाव के परिणाम ने भाजपा की मुश्किलें और बढ़ा दीं। कांग्रेस उम्मीदवार कुंवर घनश्याम सिंह ने भाजपा प्रत्याशी आशीष तिवारी को 6,016 वोटों के अंतर से पराजित कर दिया। भाजपा की आंतरिक समीक्षा में यह बात सामने आई कि दतिया के लगभग 12 प्रतिशत मतदाता रहे कुशवाहा समाज का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस की ओर खिसक गया, जिसने चुनावी परिणाम को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। इसके बाद भाजपा संगठन ने हार की व्यापक समीक्षा शुरू की। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वरिष्ठ नेताओं और चुनाव प्रभारियों के साथ बैठक की, दतिया जिला इकाई को भंग किया गया, समीक्षा समितियां गठित की गईं और संगठनात्मक कमजोरियों के साथ-साथ संभावित अंदरूनी असंतोष की भी जांच शुरू हुई।</div><div><br></div><div>इसी राजनीतिक आत्ममंथन के बीच नरेंद्र सिंह तोमर ने कुशवाहा समाज के नाम हस्ताक्षरित पत्र जारी कर अपने बयान पर खेद व्यक्त किया। उन्होंने लिखा कि कमलेश कुशवाहा के घर आयोजित कार्यक्रम पारिवारिक वातावरण में था और उसी संदर्भ में बातचीत हुई थी। उन्होंने कहा कि उनका और कुशवाहा समाज का रिश्ता परस्पर पूरक है तथा उन्होंने जीवनभर इस समाज का सम्मान किया है और आगे भी करते रहेंगे। यदि उनके शब्दों से किसी की भावना आहत हुई है तो वह अपने शब्द वापस लेते हैं और इसके लिए खेद प्रकट करते हैं। उनका यह बयान भाजपा के भीतर बढ़ी राजनीतिक बेचैनी और सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।</div><div><br></div><div>दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम केवल एक बयान और माफी तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश की बदलती सामाजिक-राजनीतिक राजनीति का संकेत भी देता है। राज्य की कुल आबादी में अन्य पिछड़ा वर्ग लगभग आधी हिस्सेदारी रखता है और कुशवाहा समाज इस वर्ग का एक प्रभावशाली हिस्सा माना जाता है। ग्वालियर-चंबल अंचल के मुरैना, दतिया, भिंड और ग्वालियर जैसे जिलों से लेकर बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र तक इस समाज की उल्लेखनीय उपस्थिति है। कई विधानसभा सीटों पर यह समाज जीत-हार तय करने की क्षमता रखता है।</div><div><br></div><div>विशेष रूप से दतिया जैसी सीट पर, जहां कुशवाहा मतदाता लगभग 12 प्रतिशत हैं, किसी भी दल के लिए इस समाज की अनदेखी राजनीतिक जोखिम बन सकती है। यही कारण है कि भाजपा ने पिछले दो दशकों में ओबीसी सामाजिक समीकरणों के केंद्र में कुशवाहा समाज को महत्वपूर्ण स्थान दिया। दूसरी ओर कांग्रेस भी अब इस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही है। पार्टी ने सतना विधायक सिद्धार्थ कुशवाहा के नेतृत्व में बूथ स्तर तक व्यापक अभियान चलाया, जिसका असर दतिया उपचुनाव में दिखाई दिया।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुशवाहा समाज मध्य प्रदेश में केवल एक बड़ा वोट बैंक नहीं, बल्कि एक प्रभावी "स्विंग फैक्टर" भी है। यदि समाज को सम्मान, पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भागीदारी का संदेश मिलता है तो वह किसी भी दल के साथ मजबूती से खड़ा हो सकता है। लेकिन उपेक्षा या अपमान की भावना पैदा होने पर उसका रुख तेजी से बदलने की क्षमता भी रखता है। यही वजह है कि नरेंद्र सिंह तोमर के "गुलाटी" वाले बयान के बाद भाजपा को सार्वजनिक रूप से डैमेज कंट्रोल करना पड़ा।</div><div><br></div><div>बहरहाल, दतिया उपचुनाव ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि मध्य प्रदेश की आगामी राजनीतिक लड़ाई केवल नेताओं के भाषणों या चुनावी नारों से नहीं जीती जाएगी। सामाजिक सम्मान, प्रतिनिधित्व और ओबीसी वर्गों के साथ मजबूत संवाद आने वाले चुनावों की दिशा तय करेगा। नरेंद्र सिंह तोमर की सार्वजनिक माफी इस बात का प्रमाण है कि मध्य प्रदेश की राजनीति में कुशवाहा समाज अब केवल एक वोट बैंक नहीं, बल्कि सत्ता का समीकरण बदलने वाली निर्णायक राजनीतिक ताकत बन चुका है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

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      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 15:21:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अब शिवाजी, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह जैसे लोग क्यों नहीं मिलते?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/why-do-not-we-find-people-like-shivaji-chandrashekhar-azad-and-bhagat-singh-anymore]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज के एक-दूसरे पर निर्भर समाज में युवाओं, खासकर जेनरेशन जेड (जेन ज़ी) का व्यवहार समाज के लिए बहुत चिंता का विषय बनता जा रहा है। उन्हें अक्सर बेसब्री, बिना सोचे-समझे सोचने की आदत और कुछ मामलों में, बुरे बर्ताव वाला माना जाता है। यह सोच, हालांकि आम हो सकती है, और हर व्यक्ति में अलग-अलग भी हो सकती है। लेकिन यह इसके अंदरूनी कारणों और समाज की संभावित प्रतिक्रियाओं की एक ज़रूरी जांच को बढ़ावा देती है। इन उभरते हुए पैटर्न को समझने के लिए एक बहुआयामी नज़रिए की ज़रूरत है, जिसमें टेक्नोलॉजी में तरक्की, पढ़ाई के बदलते तरीकों, पेरेंटिंग स्टाइल में बदलाव और बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल के गहरे असर को माना जाए। यह आवश्यक है कि जेन ज़ी में इन आदतों के पीछे के संभावित कारणों पर गहराई से चर्चा हो, जिसमें डिजिटल इमर्शन, तुरंत मिलने वाले फ़ायदे का असर, जानकारी लेने का बदलता तरीका और उनके विकास को आकार देने वाले बदलते सामाजिक ढाँचों पर विचार किया जाए। तदनुसार, समाज ऐसे सुधार करें जिनसे इस पीढ़ी में ज़्यादा सब्र रखने, ज़्यादा तार्किक सोच विकसित करने और सम्मानजनक बातचीत को बढ़ावा मिलें।</div><div><br></div><h2>डिजिटल बाढ़ और बेसब्री की खेती</h2><div>जेन ज़ी को बनाने वाले सबसे बड़े और असरदार कारणों में से एक है, हाइपर-कनेक्टेड डिजिटल दुनिया में उनकी परवरिश। कम उम्र से ही, यह पीढ़ी ऐसे माहौल में रही है जहाँ जानकारी, मनोरंजन और बातचीत उनकी उंगलियों पर आसानी से मिल जाती है। स्मार्टफ़ोन, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और हाई-स्पीड इंटरनेट ने तुरंत मिलने वाले फ़ायदे का एक इकोसिस्टम बनाया है। अपडेट के साथ नोटिफ़िकेशन आते हैं, न्यूज़ साइकिल मिनटों में रिफ़्रेश हो जाती हैं, और मनोरंजन ऑन डिमांड उपलब्ध होता है। तुरंत फ़ीडबैक और आसानी से मिलने वाले कंटेंट की यह लगातार स्ट्रीम अनजाने में ही डेवलप हो रहे दिमाग को जल्दी नतीजे और तुरंत इनाम की उम्मीद करने के लिए ट्रेन कर सकती है। इसलिए, जिन हालात में सब्र की ज़रूरत होती है, जैसे जवाब का इंतज़ार करना, कोई लंबा काम पूरा करना, या धीरे-धीरे, सोच-समझकर सीखना, वे फ्रस्ट्रेटिंग और अनचाही लग सकती हैं। ऑनलाइन बातचीत का तेज़ नेचर, जहाँ छोटे मैसेज और थोड़ी देर का कंटेंट ज़्यादा होता है, लगातार ध्यान और गहरी बातचीत के लिए कम टॉलरेंस में भी योगदान दे सकता है, जिससे बेसब्री का कल्चर बढ़ता है। उदाहरण के लिए, मैसेजिंग ऐप पर तुरंत जवाब की उम्मीद या सोशल मीडिया फ़ीड पर तेज़ी से स्क्रॉल करने से लोग तुरंत संतुष्टि की उम्मीद करने लगते हैं, जिससे असल दुनिया की बातचीत की धीमी रफ़्तार मुश्किल लगने लगती है। नई चीज़ों और तेज़ी से जानकारी के इस लगातार संपर्क से बोरियत की क्षमता भी कम हो सकती है, एक ऐसी स्थिति जो अक्सर सोचने और क्रिएटिव प्रॉब्लम-सॉल्विंग स्किल्स के विकास को बढ़ावा देती है। जब डिजिटल ध्यान भटकाने वाली चीज़ों से बोरियत तुरंत दूर हो जाती है, तो सब्र और सेल्फ-रेगुलेशन विकसित करने के मौके कम हो जाते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/jharkhand-jpsc-protest-students-ready-for-talks-with-govt-set-condition-for-video-recording" target="_blank">Jharkhand JPSC Protest: सरकार से बातचीत को तैयार छात्र, Video Recording की रखी शर्त</a></h3><h2>इन्फॉर्मेशन ओवरलोड और लॉजिकल रीजनिंग का खत्म होना</h2><div>डिजिटल युग ने जानकारी को डेमोक्रेटाइज़ कर दिया है, जिससे यह पहले से कहीं ज़्यादा आसानी से मिलने वाली हो गई है। लेकिन, इस एक्सेसिबिलिटी के साथ एक बड़ी चुनौती आती है: उपलब्ध जानकारी की बहुत ज़्यादा मात्रा और अक्सर अनवेरिफाइड नेचर। जेन ज़ी, जो इस बहुतायत के साथ बड़ा हुआ है, अक्सर शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट, सोशल मीडिया फीड्स और वायरल ट्रेंड्स के ज़रिए जानकारी लेता है। इस्तेमाल का यह तरीका क्रिटिकल इवैल्यूएशन और लॉजिकल एनालिसिस के बजाय इमोशनल रेजोनेंस और तुरंत एंगेजमेंट को प्रायोरिटी दे सकता है। कई डिजिटल प्लेटफॉर्म को कंट्रोल करने वाले एल्गोरिदम यूज़र्स को एंगेज रखने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, अक्सर ऐसा कंटेंट दिखाकर जो उनके मौजूदा बायस से मेल खाता है या मज़बूत इमोशनल रिस्पॉन्स को उकसाता है। इससे इको चैंबर बन सकते हैं, जहाँ लोग मुख्य रूप से उन नज़रियों के संपर्क में आते हैं जो उनके अपने नज़रियों को कन्फर्म करती हैं, जिससे अलग-अलग नज़रियों से जुड़ने और बारीक समझ डेवलप करने की उनकी क्षमता में रुकावट आती है। नतीजतन, भरोसेमंद सोर्स और गलत जानकारी के बीच अंतर करना एक मुश्किल काम बन जाता है। "फेक न्यूज़" और सेंसेशनलाइज़्ड कंटेंट के फैलने से युवाओं के लिए मज़बूत क्रिटिकल थिंकिंग स्किल्स डेवलप करना मुश्किल हो सकता है। इसके अलावा, कम जानकारी के आधार पर जल्दी से राय बनाने का दबाव, जो अक्सर ऑनलाइन बहस और तेज़ी से की जाने वाली कमेंट्री से और बढ़ जाता है, बेतुके तर्कों को अपनाने या बिना सबूत वाले दावों को मानने की ओर ले जा सकता है। उदाहरण के लिए, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कॉन्सपिरेसी थ्योरी की लोकप्रियता, जिनमें अक्सर अनुभव के सबूत नहीं होते लेकिन वे भावनात्मक रूप से मज़बूत होती हैं, यह दिखाती है कि बिना वेरिफ़ाई की गई जानकारी कैसे लोगों का ध्यान खींच सकती है और तर्क पर असर डाल सकती है। उन्हें कैसे जांचा जाए, इस बारे में पूरी गाइडेंस के बिना विभिन्न नज़रिया के लगातार संपर्क में रहने से कन्फ्यूजन हो सकता है और सिस्टमैटिक, लॉजिकल तरीकों के बजाय ह्यूरिस्टिक्स या भावनात्मक अपील पर भरोसा हो सकता है।</div><div><br></div><h2>बदलते सोशल नॉर्म्स और बुरे मैनर्स की सोच</h2><div>"मैनर्स" की परिभाषा खुद एक जैसी नहीं है; यह सोशल नॉर्म्स और टेक्नोलॉजी में बदलाव के साथ बदलती रहती है। जेन ज़ी की बातचीत काफी हद तक डिजिटल कम्युनिकेशन पर निर्भर करती है। टेक्स्टिंग, डायरेक्ट मैसेजिंग और ऑनलाइन कमेंट्स में अक्सर बिना बोले इशारे, आवाज़ का टोन और सोशल कॉन्टेक्स्ट की कमी होती है जो आमने-सामने की बातचीत के लिए ज़रूरी हैं। उदाहरण के लिए, एक साफ-साफ टेक्स्ट मैसेज भेजने वाले के लिए एक अच्छी बातचीत हो सकती है, लेकिन पाने वाला इसे खारिज करने वाला या बदतमीज़ी समझ सकता है, खासकर अगर उसमें ग्रीटिंग या आखिर में बात करने जैसी आम तमीज़ न हो। इसके अलावा, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से मिलने वाली गुमनामी या दूरी से हिचकिचाहट कम हो सकती है, जिससे ज़्यादा गुस्सैल या बेपरवाह व्यवहार हो सकता है जो शायद सीधे, आमने-सामने की मुलाकातों में न हो। इसके अलावा, पेरेंटिंग स्टाइल में बदलाव, कुछ स्टडीज़ में ज़्यादा छूट देने वाली पेरेंटिंग का ट्रेंड बताया गया है, अनजाने में बच्चों के लिए ज़रूरी सोशल दक्षता, जैसे हमदर्दी, झगड़े सुलझाना, और अथॉरिटी वाले लोगों या अलग राय का सम्मान करने के मौके कम कर सकता है। जब बच्चों को नतीजों से बचाया जाता है या सही सोशल बिहेवियर के लिए लगातार गाइड नहीं किया जाता है, तो उन्हें तमीज़ से बातचीत के लिए ज़रूरी सेल्फ-डिसिप्लिन और दूसरों के लिए सोच-विचार डेवलप करने में मुश्किल हो सकती है।</div><div><br></div><h2>समाज के लिए सुधार के कदम</h2><div>आज शिवाजी, चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह जैसे लोग क्यों नहीं मिलते? क्योंकि जीजाबाई (शिवाजी की माँ) जैसी माँ नहीं हैं। एक बच्चे की अच्छी परवरिश उसे देशभक्त और भविष्य का नागरिक बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है। जेन ज़ी&nbsp; में कही जा रही अनुशासनहीनता को ठीक करने के लिए पूरे समाज को एक साथ और कई तरह के तरीके अपनाने की ज़रूरत है। सिर्फ़ बुराई करने से आगे बढ़कर ऐसे रचनात्मक दखल पर ध्यान देना ज़रूरी है जो सकारात्मक विकास को बढ़ावा दें।</div><div><br></div><h2>डिजिटल लिटरेसी और क्रिटिकल थिंकिंग को बढ़ावा देना</h2><div>इन चुनौतियों से निपटने का एक तरीका डिजिटल साक्षरता और क्रिटिकल सोचने-समझने के कौशल को बढ़ाना है। एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स को स्टूडेंट्स को डिजिटल दुनिया में ज़िम्मेदारी से संचालन करना सिखाने को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसमें गलत जानकारी की पहचान करने, एल्गोरिदमिक बायस को समझने और ऑनलाइन सोर्स की क्रेडिबिलिटी को एवैल्यूएट करने के बारे में साफ इंस्ट्रक्शन शामिल हैं। क्रिटिकल थिंकिंग स्किल्स को डेवलप करना सिर्फ़ एक एकेडमिक कोशिश नहीं है; इसके लिए अलग-अलग कॉन्टेक्स्ट में लगातार प्रैक्टिस की ज़रूरत होती है। डिबेट्स, रिसर्च प्रोजेक्ट्स जिनमें कई सोर्स से जानकारी को सिंथेसाइज़ करने की ज़रूरत होती है, और ऐसी डिस्कशन्स जिनमें कॉम्प्लेक्स एथिकल डिलेमाज़ को एक्सप्लोर किया जाता है, ये सभी ज़्यादा लॉजिकल रीज़निंग डेवलप करने में मदद कर सकते हैं। माता-पिता और शिक्षक खुलकर इस पर चर्चा करके क्रिटिकल थिंकिंग का मॉडल बना सकते हैं कि वे जानकारी को कैसे एवैल्यूएट करते हैं और राय कैसे बनाते हैं।</div><div><br></div><h2>पेशेंस और डिलेड ग्रैटिफिकेशन को कल्टिवेट करना</h2><div>पेशेंस को बढ़ावा देने के लिए ऐसा एनवायरनमेंट बनाने के लिए सोच-समझकर कोशिश करने की ज़रूरत होती है जो इसे बढ़ावा दे। यह घर और स्कूल दोनों जगह से शुरू हो सकता है। स्क्रीन टाइम कम करना और ऐसी एक्टिविटीज़ को बढ़ावा देना जिनमें लगातार फोकस की ज़रूरत होती है, जैसे किताबें पढ़ना, हॉबीज़ में शामिल होना, बोर्ड गेम खेलना, या स्ट्रक्चर्ड स्पोर्ट्स में हिस्सा लेना, देर से मिलने वाली खुशी को सहने की क्षमता बढ़ाने में मदद कर सकता है। स्कूल ऐसे असाइनमेंट डिज़ाइन कर सकते हैं जिनमें लंबे समय तक कमिटमेंट और लगन की ज़रूरत हो, जिससे स्टूडेंट्स को मेहनत की कीमत और लगातार काम करके लक्ष्य हासिल करने की संतुष्टि सिखाई जा सके। सिर्फ़ नतीजों को ही नहीं, बल्कि कोशिश और प्रोसेस को भी सेलिब्रेट करने से फोकस तुरंत नतीजों से हटकर सीखने और डेवलपमेंट की यात्रा पर जा सकता है। उदाहरण के लिए, किसी मुश्किल काम के लिए स्टूडेंट्स के डेडिकेशन को पहचानना और इनाम देना, चाहे तुरंत सफलता मिले या न मिले, लगन की अहमियत को और मज़बूत कर सकता है।</div><div><br></div><h2>एम्पैथी और सोशल-इमोशनल इंटेलिजेंस को बढ़ावा देना</h2><div>मैनर्स और आपसी व्यवहार को बेहतर बनाने के लिए सोशल-इमोशनल लर्निंग पर फोकस करना ज़रूरी है। स्कूलों और परिवारों को एक्टिवली एम्पैथी, सम्मान और असरदार कम्युनिकेशन सिखाना और उसका उदाहरण देना चाहिए। सोशल-इमोशनल लर्निंग प्रोग्राम को एजुकेशनल फ्रेमवर्क में शामिल किया जाना चाहिए, जिससे स्टूडेंट्स को अपनी भावनाओं को समझने और मैनेज करने, अच्छे रिश्ते बनाने और ज़िम्मेदार फ़ैसले लेने के लिए टूल्स मिलें। कम्युनिटी सर्विस या वॉलंटियर एक्टिविटीज़ में हिस्सा लेने के लिए बढ़ावा देने से युवाओं को अलग-अलग तरह के अनुभव मिल सकते हैं और उनमें ज़्यादा समझदारी बढ़ सकती है।</div><div><br></div><h2>सहानुभूति और सामाजिक ज़िम्मेदारी की भावना</h2><div>रोल-प्लेइंग (भूमिका निभाने वाले) सीन और ग्रुप डिस्कशन, जो सामाजिक स्थितियों और उनके नतीजों को समझते हैं, सही व्यवहार सिखाने और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने में बहुत असरदार हो सकते हैं। माता-पिता अपने बच्चों और दूसरों के साथ बातचीत में सम्मानजनक व्यवहार का उदाहरण पेश करके अहम भूमिका निभा सकते हैं। अनुशासनहीन व्यवहार के लिए सिर्फ़ सज़ा देने के बजाय, यह समझाना कि वह व्यवहार क्यों गलत है और उसे सुधारना, लंबे समय में व्यवहार बदलने में ज़्यादा असरदार हो सकता है।</div><div><br></div><h2>संतुलित डिजिटल जुड़ाव को बढ़ावा देना</h2><div>इसका मकसद टेक्नोलॉजी को बुरा बताना नहीं है, बल्कि इसके इस्तेमाल के लिए एक संतुलित और सोच-समझकर अपनाया जाने वाला नज़रिया विकसित करना है। इसमें स्क्रीन टाइम के लिए सही सीमाएँ तय करना, डिजिटल डिटॉक्स (कुछ समय के लिए डिजिटल डिवाइस से दूर रहना) को बढ़ावा देना और इस बात के प्रति जागरूकता पैदा करना शामिल है कि टेक्नोलॉजी किसी व्यक्ति की सोच और भावनाओं पर कैसे असर डालती है। माता-पिता अपने बच्चों के साथ मिलकर स्क्रीन टाइम की उचित सीमाएँ तय कर सकते हैं और घर में टेक्नोलॉजी-फ़्री ज़ोन या समय बना सकते हैं। ऑनलाइन अनुभवों के बारे में खुलकर बातचीत को बढ़ावा देना - जिसमें सोशल मीडिया से जुड़े दबाव और चुनौतियाँ भी शामिल हैं - युवाओं को अपनी डिजिटल ज़िंदगी के साथ ज़्यादा समझदारी भरा और जागरूक रिश्ता बनाने में मदद कर सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>निष्कर्ष</h2><div>जेन जी में देखी जाने वाली बेसब्री, तर्कहीन सोच और कभी-कभी अनुशासनहीनता&nbsp; भरा व्यवहार जटिल घटनाएँ हैं, जिनकी जड़ें डिजिटल युग के गहरे सामाजिक और तकनीकी बदलावों में हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यकता है -सही और लक्षित उपाय करके, समाज जेन जी को धैर्य रखने, तार्किक सोच को बेहतर बनाने और सम्मानजनक व सहानुभूति पूर्ण बातचीत को बढ़ावा देने में असरदार ढंग से मदद कर सकता है। शिक्षकों, माता-पिता, समुदायों और खुद युवाओं के सामूहिक प्रयासों से इन चुनौतियों का सामना करना और एक ऐसी पीढ़ी को तैयार करना संभव है जो न केवल टेक्नोलॉजी में माहिर हो, बल्कि उसमें सोच-समझकर काम करने, धैर्य रखने और दूसरों का ख्याल रखने जैसे ज़रूरी गुण भी हों, ताकि वे समाज में सकारात्मक योगदान दे सकें।</div><div><br></div><div>- प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडे</div><div>विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़,</div><div>एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय,</div><div>सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT,</div><div>पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 15:15:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/why-do-not-we-find-people-like-shivaji-chandrashekhar-azad-and-bhagat-singh-anymore</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[मिलावटखोरों के खिलाफ भी करना पड़ेगा देशव्यापी आंदोलन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/a-nationwide-movement-will-also-have-to-be-launched-against-adulterators]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>संसद भवन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध लगातार जारी है और वहीं देश के तीन राज्यों की तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों पर भी मीडिया में काफी चर्चा हो रही है। लेकिन इस बीच कई ऐसी खबरें भी लगातार निकल कर सामने आ रही है, जिसपर बड़े पैमाने पर चर्चा, वाद-संवाद और कार्रवाई की जरूरत है। लेकिन इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि देश के सभी लोगों के जीवन से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मसले पर चर्चा करने का समय किसी के पास नहीं है। सत्ता में बैठने वाली किसी भी सरकार ( चाहे वो किसी भी राजनीतिक दल की हो) के पास इसके समाधान का कोई स्थायी फॉर्मूला या विज़न नहीं है, विपक्ष के पास भी इस पर बात करने की फुर्सत नहीं है और सरकारी अधिकारी अपने में ही मस्त है।&nbsp;</div><div><br></div><div>मिलावटखोरी की समस्या अब हमारे देश की सबसे बड़ी भयावह समस्या बनती जा रही है, जिस पर रोक लगाने के लिए अब बड़े स्तर पर कदम उठाए बिना कोई बात नहीं बनेगी। देश में कानून भी है, नियम भी है, निगरानी के लिए विभाग भी है और अधिकारी भी है लेकिन फिर भी ऐसा लगता है कि मिलावटखोरों को किसी भी बात का कोई डर ही नहीं है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-first-prerequisite-for-a-thriving-childhood-healthy-food-healthy-future" target="_blank">उन्नत बचपन की पहली शर्त- स्वस्थ भोजन, स्वस्थ भविष्य</a></h3><div>हाल ही में देश के एक बड़े अखबार ने इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में जो दावा किया है, उसने सबकी नींदे उड़ा दी है। इस रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि उत्तर प्रदेश की कई आटा मिलों में गेंहू के आटे में सफेद पत्थर का चूरा यानी स्टोन पाउडर मिलाया जा रहा है। मुनाफाखोरी के लालच में ये मिलावटखोर हमें पत्थर वाले आटे से बनी रोटी खाने को मजबूर कर रहे हैं। जबकि ये भी जानते हैं कि इस मिलावटी आटे से बनी रोटी को खाने से लोगों के शरीर पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ेंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>आजकल लोगों के घरों से लेकर, फ़ास्ट फ़ूड, शादी-ब्याह और पार्टियों तक में सबसे ज्यादा पनीर का इस्तेमाल किया जाता है। कई एक्सपर्ट/ जिम ट्रेनर तो बॉडी को मजबूत बनाने के लिए भी पनीर खाने की सलाह देते हैं। लेकिन पनीर में मैदा या अरारोट मिलाना और स्किम्ड मिल्क पाउडर एवं वनस्पति तेल का इस्तेमाल कर सिंथेटिक या नकली पनीर बनाना तो आम बात हो गई है। बल्कि ऐसे गंभीर मामले भी कई बार सामने आए हैं, कि डिटर्जेंट या यूरिया से बने दूध का भी इस्तेमाल कर पनीर बनाया और बेचा जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>महाराष्ट्र सरकार ने कुछ दिन पहले ही, राज्य में एनालॉग पनीर यानी नॉन डेयरी पनीर के निर्माण, बिक्री, भंडारण, परिवहन और वितरण पर यह कहते हुए प्रतिबंध लगा दिया कि असली पनीर बताकर इसे बेचना उपभोक्ताओं को गुमराह करना है। महाराष्ट्र सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य का हवाला देते हुए अपने आदेश में सख्त शब्दों में कहा कि नियम तोड़ने&nbsp; वालों पर खाद्य सुरक्षा कानून के तहत कड़ी कार्रवाई होगी। अपराध की गंभीरता के आधार पर 6 महीने तक की जेल और एक लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। इससे पहले छत्तीसगढ़ सरकार भी एनालॉग पनीर यानी नॉन डेयरी पनीर को लेकर ऐसा ही फैसला कर चुकी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सबसे अधिक दुःखद और परेशानी में डालने वाला तथ्य तो यह है कि देश की नामी-गिरामी कंपनियां भी उपभोक्ताओं को धोखा देने का कोई मौका नहीं चूकती है। रोजमर्रा की जरूरत का कई सामान बेचने वाली एफएमसीजी कंपनी डाबर को लेकर भी चौंकाने वाली ख़बर सामने आई है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने डाबर द्वारा किए जा रहे ' 100% प्योर', '100% ऑर्गेनिक' और '100% नेचुरल' जैसे दावों को भ्रामक बताते हुए ऐसे प्रोडक्ट्स की बिक्री को तुरंत रोकने का आदेश दे दिया है। इन प्रोडक्ट्स में शहद, गाय का देसी घी, तिल का तेल और नारियल पानी जैसी कई चीजें शामिल हैं। डाबर को 15 दिनों के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट भी जमा करने को कहा गया है।</div><div><br></div><div>इससे पहले भी कई नामी-गिरामी और बड़ी कंपनियों के प्रोडक्ट्स पर गंभीर सवाल उठ चुके हैं। सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि यही कंपनियां जब विदेश खासकर अमेरिका या यूरोपीय देशों में कोई सामान बेचती है तो उसकी क्वालिटी का खास ध्यान रखती है लेकिन भारतीयों के लिए इनका एटीट्यूड 'सब चलता है टाइप' ही होता है।</div><div><br></div><div>लोग पैसे खर्च करने को तैयार हैं ताकि उन्हें शुद्ध आटा, दाल, चावल, मसाले, चीनी, दूध, घी, खाद्य तेल, सब्जियां, पनीर, शहद, पानी और अन्य सामान मिल सके। लेकिन ज्यादा खर्च के बाद भी उनके साथ न केवल ठगी की जा रही है बल्कि लोग गंभीर बीमारियों के भी शिकार होकर मरते भी जा रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>लेकिन क्या सिर्फ कानून बना देने से इस भयावह समस्या का समाधान हो जाएगा, कतई नहीं। इसके लिए युद्धस्तर पर एक मिशन के तहत कई मोर्चों पर एक साथ काम करना पड़ेगा। नकली सामानों को बनने के स्तर पर ही रोकना होगा, इसके लिए उत्तरदायी विभाग में मैन पावर बढ़ाने के साथ ही उनकी जिम्मेदारी भी तय करनी होगी। इससे जुड़े विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को हर महीने अपनी संपत्ति का ब्यौरा भी ऑनलाइन भरना चाहिए। ऐसे मामलों को निपटाने के लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर फैसले की समय सीमा भी तय करनी होगी। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर कई अन्य कदम भी उठाने होंगे। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है कि क्या हमारी सरकार, अधिकारी, अदालत और नेता..ये सब इसके लिए तैयार हैं?&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष कुमार पाठक</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 13:29:33 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/a-nationwide-movement-will-also-have-to-be-launched-against-adulterators</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Article 370 पर बदजुबानी कर रहे थे जरदारी और शहबाज शरीफ, मोदी ने खुद आगे आकर दिया करारा जवाब]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/pm-modi-slams-pakistan-on-article-370-anniversary-kashmir-development-pojk-hypocrisy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने की सातवीं वर्षगांठ पर पाकिस्तान ने एक बार फिर पुराना राग अलापने की कोशिश की, लेकिन उसकी इस बदजुबानी का करारा जवाब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ शब्दों में कहा कि 5 अगस्त 2019 का ऐतिहासिक फैसला जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए एक निर्णायक नए युग की शुरुआत था। उन्होंने दो टूक कहा कि बीते सात वर्षों में इन दोनों क्षेत्रों ने विकास, सुशासन और सामाजिक सशक्तिकरण के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया, जब पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व ने भारत के इस संवैधानिक फैसले को लेकर फिर से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विवाद खड़ा करने की कोशिश की।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर अपने संदेश में कहा कि सात वर्ष पहले आज ही के दिन अनुच्छेद 370 और 35ए इतिहास बन गए थे और इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख के विकास का नया अध्याय शुरू हुआ। उन्होंने कहा कि वर्षों तक अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित रहे महिलाओं, अनुसूचित वर्गों और अन्य वंचित समुदायों को अब भारतीय संविधान का पूरा संरक्षण और अधिकार मिला है। शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल, उद्यमिता और आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है और केंद्र सरकार इन क्षेत्रों को विकसित भारत की यात्रा का मजबूत भागीदार बनाने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-gene-z-mantra-for-bjp-mps-listen-to-youth-understand-them-and-spend-time-in-parliament" target="_blank">PM Modi का BJP सांसदों को Generation Z मंत्र: युवाओं की सुनो, समझो और संसद में बिताओ समय</a></h3><div>प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि इस वर्ष अनुच्छेद 370 हटाए जाने की वर्षगांठ इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के वर्ष में पड़ रही है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एकता के लिए डॉ. मुखर्जी ने जिस संकल्प का सपना देखा था, वह 5 अगस्त 2019 को साकार हुआ।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, पाकिस्तान ने एक बार फिर 5 अगस्त को तथाकथित 'यौम-ए-इस्तेहसाल' के रूप में मनाते हुए भारत के खिलाफ बयानबाजी की। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने दावा किया कि भारत ने 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को समाप्त कर अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का उल्लंघन किया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान कश्मीर के लोगों को अपना नैतिक, राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन जारी रखेगा तथा इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहेगा।</div><div><br></div><div>पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी इसी सुर में बयान देते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर विवाद का समाधान पाकिस्तान की विदेश नीति का प्रमुख आधार बना रहेगा। उन्होंने भारत पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की अपील की। वहीं उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने भी भारत के 5 अगस्त 2019 के फैसले को एकतरफा बताते हुए संयुक्त राष्ट्र से इस मामले में सक्रिय भूमिका निभाने की मांग दोहराई। कुल मिलाकर देखें तो पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व ने एक बार फिर वही पुराने आरोप लगाए, जिन्हें भारत लगातार खारिज करता रहा है।</div><div><br></div><div>हालांकि पाकिस्तान की यह बयानबाज़ी इसलिए भी खोखली और दोगली नजर आती है क्योंकि जो देश कश्मीरियों के अधिकारों की दुहाई देता है, वही पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में अपने ही कब्जे वाले इलाके के लोगों पर दमनचक्र चला रहा है। हाल ही में खुद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने पीओजेके में आंदोलन कर रहे स्थानीय लोगों को भारत की तरह पाकिस्तान का दुश्मन तक करार दिया। पीओजेके में असीम मुनीर के नेतृत्व वाली पाकिस्तानी सेना के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जिन्हें दबाने के लिए बल प्रयोग किया जा रहा है। कई इलाकों में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं, बिजली की आपूर्ति बाधित की गई, राशन और आवश्यक सुविधाओं पर भी असर पड़ा। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनकी आवाज को बलपूर्वक कुचला जा रहा है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जो पाकिस्तान अपने अवैध कब्जे वाले कश्मीर में रहने वाले लोगों के साथ न्याय नहीं कर पा रहा, वह जम्मू-कश्मीर के लोगों की चिंता जताने का नैतिक अधिकार कैसे रखता है? स्पष्ट है कि कश्मीर के नाम पर पाकिस्तान की राजनीति महज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रचार और दुष्प्रचार तक सीमित रह गई है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में विकास परियोजनाओं को तेज गति मिली है। श्रीनगर को यूनेस्को क्रिएटिव सिटी और वर्ल्ड क्राफ्ट सिटी जैसी वैश्विक पहचान मिली है। डल झील में संगीत फव्वारे पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बने हैं। वैष्णो देवी और अमरनाथ यात्रा में रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालुओं की भागीदारी ने क्षेत्र में बढ़े विश्वास और बेहतर सुरक्षा व्यवस्था की पुष्टि की है। सड़क, रेल और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ है, शिक्षा और उद्यमिता के नए अवसर पैदा हुए हैं तथा स्थानीय हस्तशिल्प और पर्यटन उद्योग को नई ऊर्जा मिली है। पत्थरबाजी खत्म हो गयी है, अलगाववादी टूट चुके हैं और आतंकवाद अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है और लाल चौक पर तिरंगा शान से लहरा रहा है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, सात वर्षों बाद तस्वीर बिल्कुल साफ है। एक ओर पाकिस्तान है, जो अपने अवैध कब्जे वाले कश्मीर में रहने वाले लोगों को ही दमन, इंटरनेट बंदी, बिजली कटौती और सैन्य कार्रवाई के साये में जीने को मजबूर कर रहा है, जबकि दूसरी ओर भारत का मुकुट जम्मू-कश्मीर है, जो विकास, निवेश, पर्यटन, रोजगार और सुशासन की नई पहचान बना रहा है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लिया गया 5 अगस्त 2019 का ऐतिहासिक निर्णय केवल एक संवैधानिक बदलाव नहीं था, बल्कि जम्मू-कश्मीर को अलगाववाद और पिछड़ेपन के दौर से निकालकर विकास और राष्ट्रीय एकीकरण की मुख्यधारा में लाने वाला निर्णायक मोड़ साबित हुआ। यही वजह है कि आज पाकिस्तान के आरोपों से अधिक प्रभावशाली वह बदली हुई तस्वीर है, जिसे जम्मू-कश्मीर की धरती पर विकास, शांति और जनविश्वास के रूप में पूरी दुनिया देख रही है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 14:26:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/pm-modi-slams-pakistan-on-article-370-anniversary-kashmir-development-pojk-hypocrisy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[उन्नत बचपन की पहली शर्त- स्वस्थ भोजन, स्वस्थ भविष्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-first-prerequisite-for-a-thriving-childhood-healthy-food-healthy-future]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>विकसित भारत का स्वप्न केवल आधुनिक इमारतों, तेज अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक और विश्वस्तरीय आधारभूत संरचनाओं से पूरा नहीं होगा। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके बच्चे होते हैं। यदि बचपन स्वस्थ, संस्कारित, ऊर्जावान और मानसिक रूप से सुदृढ़ है, तो राष्ट्र का भविष्य स्वतः सुरक्षित हो जाता है। यदि बचपन ही अस्वस्थ, मोटापे, मधुमेह, कुपोषण और गलत खान-पान की आदतों से घिर जाए, तो विकास की पूरी अवधारणा खोखली सिद्ध होने लगती है। इसलिए बच्चों का स्वास्थ्य केवल स्वास्थ्य मंत्रालय का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक उत्तरदायित्व का भी सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा राज्य के सभी स्कूलों और उनके आसपास जंक फूड की बिक्री, वितरण तथा प्रचार पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय इसी व्यापक दृष्टि का परिचायक है। यह केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के प्रति उत्तरदायित्व का गंभीर संदेश है। यह स्वीकार करने का साहसिक प्रयास है कि बच्चों की सेहत बाजार के मुनाफे से कहीं अधिक मूल्यवान है। यदि यह निर्णय प्रभावी ढंग से लागू होता है तो यह पूरे देश के लिए एक आदर्श मॉडल बन सकता है।</div><div><br></div><div>आज सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि बच्चे भोजन कम खा रहे हैं, बल्कि यह है कि वे पोषण कम और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ अधिक खा रहे हैं। रंग-बिरंगे पैकेट, आकर्षक विज्ञापन, कार्टून पात्रों की ब्रांडिंग, सोशल मीडिया का प्रभाव और हर गली-मोहल्ले में उपलब्ध फास्ट फूड ने बच्चों की स्वादेंद्रियों पर ऐसा कब्जा कर लिया है कि घर का पौष्टिक भोजन उन्हें फीका लगने लगा है। यह परिवर्तन केवल खान-पान की आदत का बदलाव नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे उनके शरीर, मस्तिष्क और व्यवहार को भी प्रभावित कर रहा है। वैज्ञानिक शोध लगातार यह बताते रहे हैं कि अधिक वसा, अधिक नमक और अधिक चीनी वाले खाद्य पदार्थ बच्चों में मोटापा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, हार्मोन असंतुलन तथा मानसिक एकाग्रता में कमी जैसी अनेक समस्याओं का कारण बन रहे हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि जो बीमारियां पहले चालीस-पचास वर्ष की आयु में दिखाई देती थीं, वे अब किशोरावस्था और बचपन में ही दस्तक देने लगी हैं। यह केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि आने वाले समय में देश की उत्पादक क्षमता और मानव संसाधन पर भी गहरा प्रभाव डालने वाला संकट है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/fssai-action-against-dabur-india-misleading-claims-of-being-100-percent-pure-organic-barred" target="_blank">FSSAI का Dabur India पर बड़ा एक्शन! '100% शुद्ध' और 'ऑर्गेनिक' के गुमराह करने वाले दावों पर लगी रोक, 15 दिनों में मांगी रिपोर्ट</a></h3><div>बचपन की सबसे बड़ी आवश्यकता स्वाद नहीं, पोषण है। शरीर के विकास के साथ-साथ मस्तिष्क का तीव्र विकास भी बचपन में ही होता है। यदि इस अवस्था में बच्चों को संतुलित भोजन, ताजे फल, हरी सब्जियां, दूध, दालें, मोटे अनाज और प्राकृतिक खाद्य पदार्थ पर्याप्त मात्रा में मिलें, तो उनका शारीरिक और मानसिक विकास कहीं अधिक प्रभावी होता है। इसके विपरीत जंक फूड क्षणिक स्वाद तो देता है, लेकिन शरीर को आवश्यक पोषक तत्व नहीं देता। परिणामस्वरूप बच्चा बाहर से स्वस्थ दिखाई देता है, किंतु भीतर से अनेक पोषण संबंधी कमियों का शिकार बनने लगता है। दुर्भाग्य यह है कि जंक फूड आज केवल भोजन नहीं रहा, बल्कि एक आक्रामक व्यावसायिक संस्कृति बन चुका है। विज्ञापनों के माध्यम से बच्चों के मन में यह धारणा बैठा दी गई है कि आधुनिकता का अर्थ पैकेटबंद भोजन है। लोकप्रिय खिलाड़ी, फिल्मी कलाकार और डिजिटल प्रभावक अनजाने में बच्चों को ऐसे उत्पादों की ओर आकर्षित करते हैं, जिनका अत्यधिक सेवन उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ऐसे में केवल परिवारों को दोष देना उचित नहीं होगा। सरकार, उद्योग, विद्यालय, अभिभावक और समाज-सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।</div><div><br></div><div>विद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि जीवनशैली का निर्माण करने वाली प्रयोगशाला भी हैं। यदि स्कूल परिसर में बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जाए, पोषण शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए, विद्यालयों में रसोई बाग विकसित किए जाएं, बच्चों को स्वयं पौधे लगाने और प्राकृतिक भोजन के महत्व से जोड़ा जाए, तो यह परिवर्तन अधिक स्थायी होगा। केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। स्वस्थ विकल्पों को स्वादिष्ट, आकर्षक और सुलभ बनाना भी उतना ही आवश्यक है। भारत की पारंपरिक भोजन संस्कृति विश्व की सबसे संतुलित और वैज्ञानिक भोजन प्रणालियों में मानी जाती है। बाजरा, ज्वार, रागी, दालें, छाछ, दही, अंकुरित अनाज, मौसमी फल, सब्जियां और घर का ताजा भोजन हमारे पूर्वजों की स्वस्थ जीवनशैली की पहचान रहे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता के नाम पर अपनी इस समृद्ध खाद्य संस्कृति को त्यागने के बजाय उसे नए स्वरूप में बच्चों तक पहुंचाएं। यदि विद्यालयों की कैंटीन में स्थानीय और पारंपरिक पौष्टिक व्यंजन उपलब्ध कराए जाएं, तो बच्चे धीरे-धीरे उसी स्वाद के अभ्यस्त हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>यह भी समझना होगा कि जंक फूड का प्रश्न केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अस्वस्थ बचपन का अर्थ है भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता खर्च, कार्यक्षमता में कमी, उत्पादकता का ह्रास और राष्ट्रीय आय पर प्रतिकूल प्रभाव। आज यदि बच्चों के पोषण पर निवेश किया जाता है तो वह आने वाले दशकों में स्वस्थ, सक्षम और नवाचारी नागरिकों के रूप में अनेक गुना लाभ देता है। इसलिए बच्चों के स्वास्थ्य पर खर्च को व्यय नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे लाभकारी निवेश माना जाना चाहिए। अभिभावकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि घर में ही पैकेटबंद स्नैक्स, शीतल पेय और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ नियमित रूप से उपलब्ध होंगे, तो बच्चे उनसे दूर नहीं रह पाएंगे। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं। यदि परिवार स्वयं संतुलित भोजन करेगा, साथ बैठकर भोजन करने की परंपरा विकसित करेगा और बच्चों को रसोई से जोड़कर भोजन बनाने की प्रक्रिया में सहभागी बनाएगा, तो उनमें स्वस्थ भोजन के प्रति स्वाभाविक रुचि विकसित होगी।</div><div><br></div><div>सरकारों को भी केवल स्कूलों तक सीमित न रहकर व्यापक नीति अपनानी होगी। बच्चों को लक्षित करने वाले भ्रामक खाद्य विज्ञापनों पर नियंत्रण, पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट चेतावनी, अत्यधिक चीनी और नमक वाले उत्पादों की पहचान को सरल बनाना, खेल मैदानों की संख्या बढ़ाना, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, पोषण जागरूकता अभियान तथा स्थानीय स्तर पर सामुदायिक भागीदारी जैसे कदम समान रूप से आवश्यक हैं। यदि स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग मिलकर साझा रणनीति बनाएं तो परिणाम कहीं अधिक प्रभावी होंगे। आज समय की मांग है कि जंक फूड के विरुद्ध संघर्ष को केवल प्रतिबंध तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे स्वस्थ जीवनशैली के राष्ट्रीय अभियान का स्वरूप दिया जाए। जिस प्रकार स्वच्छ भारत अभियान ने स्वच्छता को जन-आंदोलन बनाया, उसी प्रकार स्वस्थ भोजन और पोषण को भी राष्ट्रीय जन-जागरण का विषय बनाया जाना चाहिए। बच्चों को यह समझाना होगा कि वास्तविक ऊर्जा किसी पैकेट में नहीं, बल्कि प्रकृति के निकट रहने वाले भोजन में छिपी है।</div><div><br></div><div>महाराष्ट्र सरकार का निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने यह स्वीकार किया है कि बच्चों का स्वास्थ्य किसी भी राजनीतिक या आर्थिक हित से बड़ा है। अब आवश्यकता इस बात की है कि देश के सभी राज्य इस दिशा में समान साहस और दूरदर्शिता दिखाएं। विकसित भारत की आधारशिला स्मार्ट शहर नहीं, बल्कि स्वस्थ बच्चे हैं। यदि बचपन सुरक्षित रहेगा तो भविष्य सुरक्षित रहेगा। यदि बच्चों की थाली पौष्टिक होगी तो राष्ट्र की प्रगति भी संतुलित होगी। आने वाले भारत की पहचान केवल तकनीकी शक्ति से नहीं, बल्कि स्वस्थ, सशक्त, अनुशासित और जागरूक नई पीढ़ी से होगी। इसलिए आज का सबसे बड़ा राष्ट्रीय संकल्प यही होना चाहिए कि हर बच्चे को ऐसा वातावरण मिले, जहाँ स्वाद से पहले स्वास्थ्य, सुविधा से पहले पोषण और तात्कालिक आकर्षण से पहले दीर्घकालिक जीवन-सुरक्षा को महत्व दिया जाए। यही उन्नत बचपन का मार्ग है और यही विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 14:22:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-first-prerequisite-for-a-thriving-childhood-healthy-food-healthy-future</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Core Vote Bank पाला बदलने पर यूँ ही मजबूर नहीं होता, ये बात BJP को समझ आ गयी होगी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/bihar-bypoll-message-for-bjp-core-vote-bank-prashant-kishor-bankipur-analysis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजनीति में कोई भी दल जब किसी क्षेत्र को अपना अभेद्य किला और वहां के मतदाताओं को अपना स्थायी वोट बैंक मानकर निश्चिंत हो जाता है, तभी उसकी पराजय की पटकथा लिखनी शुरू हो जाती है। लोकतंत्र में जनता किसी की बंधक नहीं होती। वह सत्ता देती भी है और उसी सत्ता के अहंकार को ध्वस्त भी करती है। बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव ने इसी लोकतांत्रिक सच को एक बार फिर स्थापित कर दिया है। तीन दशक से अधिक समय तक भाजपा के सबसे सुरक्षित गढ़ माने जाने वाले बांकीपुर में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की जीत मात्र एक उम्मीदवार की जीत नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक मानसिकता की हार है जो यह मान बैठी थी कि कुछ सीटें और कुछ वोट हमेशा के लिए उसके नाम लिखे जा चुके हैं।</div><div><br></div><div>बांकीपुर का जनादेश इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी साधारण विधानसभा क्षेत्र का चुनाव नहीं था। यह वही इलाका है जहां मुख्यमंत्री आवास, राजभवन, विधानसभा, सचिवालय और सत्ता के तमाम केंद्र मौजूद हैं। भाजपा का प्रदेश मुख्यालय भी यहीं है। लंबे समय से यह सीट भाजपा के राजनीतिक वर्चस्व का प्रतीक रही है। ऐसे में यहां मिली हार सिर्फ सीट गंवाने की घटना नहीं, बल्कि सत्ता के आत्मविश्वास पर जनता का करारा प्रहार है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/prashant-kishor-jibe-at-bjp-a-30-year-old-fortress-crumbled-in-just-30-days" target="_blank">Prashant Kishor का BJP पर तंज: 30 साल का किला सिर्फ 30 दिनों में ढहा</a></h3><div>सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस परिणाम के बाद भाजपा के भीतर भी आत्ममंथन शुरू हो गया है। पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि इस चुनाव ने सबसे बड़ा संदेश यह दिया है कि कोर वोट बैंक भी अब स्थायी नहीं रहा। जिस मतदाता को वर्षों तक पार्टी का अटूट समर्थक माना जाता था, उसने इस बार अपना रुख बदलकर बता दिया कि लोकतंत्र में समर्थन किसी दल की जागीर नहीं होता। मतदाता अब काम, व्यवहार और नेतृत्व की शैली के आधार पर फैसला करेगा, न कि केवल पुराने राजनीतिक रिश्तों के आधार पर।</div><div><br></div><div>यह भी स्वीकार किया जा रहा है कि सत्ता का आत्मविश्वास कई बार अहंकार में बदल जाता है और यही चुनावी हार की सबसे बड़ी वजह बनता है। चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह कुछ नेताओं के बयान सामने आए, उन्होंने भी यह संदेश दिया कि पार्टी अपने गढ़ को लेकर अत्यधिक आश्वस्त थी। लेकिन जनता ने मतदान के जरिए यह बता दिया कि किसी भी मतदाता को हल्के में लेने की कीमत राजनीतिक दलों को चुकानी पड़ सकती है।</div><div><br></div><div>इस हार के पीछे केवल विपक्ष की रणनीति नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर की बेचैनी भी चर्चा का विषय बनी। उम्मीदवार चयन से लेकर संगठनात्मक बदलाव तक कई फैसलों को लेकर असंतोष की बातें सामने आईं। राज्य की सरकार में नेतृत्व परिवर्तन के बाद पार्टी के अंदर जिस तरह की खींचतान दिखाई दी, उसका असर भी चुनावी परिणामों में झलकता नजर आया। यह संदेश भी साफ है कि मजबूत संगठन होने का दावा तभी तक प्रभावी है, जब तक कार्यकर्ता और स्थानीय नेतृत्व स्वयं को सम्मानित महसूस करे।</div><div><br></div><div>मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनाव ने भी लगभग यही कहानी दोहराई। भाजपा के लिए यह हार केवल कांग्रेस की जीत नहीं थी, बल्कि उसके सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे राज्य के पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के राजनीतिक प्रभाव पर भी सवाल खड़े कर गई। स्थानीय स्तर पर लंबे समय से चली आ रही गुटबाजी, टिकट वितरण को लेकर नाराजगी और मिश्रा समर्थक संगठनात्मक ढांचे का पूरी तरह सक्रिय न हो पाना भाजपा पर भारी पड़ा। दूसरी ओर कांग्रेस ने स्थानीय असंतोष, बेरोजगारी, पलायन, खाद की कमी और कथित प्रशासनिक दबंगई जैसे मुद्दों को चुनाव का केंद्र बनाया। पार्टी ने चुनाव को सरकार के पक्ष या विपक्ष की लड़ाई बनाने के बजाय स्थानीय जनभावनाओं से जोड़ा और उसी का लाभ उठाया। साफ है कि मतदाताओं ने यहां भी यह संकेत दिया कि किसी एक नेता की राजनीतिक पकड़ या पुराने प्रभाव के भरोसे चुनाव नहीं जीते जा सकते।</div><div><br></div><div>वहीं बांकीपुर का संदेश केवल भाजपा तक सीमित नहीं है। यह उतनी ही बड़ी चेतावनी राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यू) और देश के अन्य राजनीतिक दलों के लिए भी है। वर्षों से बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों और परंपरागत वोट बैंकों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन इस उपचुनाव ने संकेत दिया है कि मतदाता अब नए विकल्पों को भी मौका देने के लिए तैयार है। यदि कोई दल यह मानकर चल रहा है कि कोई विशेष जाति, वर्ग या क्षेत्र हमेशा उसके साथ रहेगा, तो बांकीपुर का परिणाम उस भ्रम को तोड़ने के लिए पर्याप्त है।</div><div><br></div><div>बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत का महत्व भी केवल एक सीट जीतने तक सीमित नहीं है। इस परिणाम ने यह संकेत दिया है कि बिहार की राजनीति में वर्षों से हावी जातीय ध्रुवीकरण के बीच अब विकास, शिक्षा, रोजगार, भ्रष्टाचार और पलायन जैसे मुद्दों के लिए भी राजनीतिक जगह बन रही है। भाजपा के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले शहरी गढ़ में जीत हासिल कर प्रशांत किशोर ने यह साबित किया कि यदि कोई राजनीतिक दल पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति से आगे बढ़कर जनता के वास्तविक सरोकारों को लगातार उठाता है, तो वह स्थापित दलों के लिए चुनौती बन सकता है। यह जीत भाजपा के लिए सत्ता के अहंकार के खिलाफ चेतावनी है तो राजद के लिए भी संदेश है कि भाजपा विरोधी राजनीति पर उसका एकाधिकार अब निर्विवाद नहीं रहा। यानी यह परिणाम बिहार की राजनीति में एक नए राजनीतिक विकल्प के उभरने का संकेत भी देता है।</div><div><br></div><div>यही कारण है कि प्रशांत किशोर की जीत को केवल एक चुनावी सफलता के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसे बिहार की राजनीति में एक नए राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में भी देखा जा रहा है। पिछली बार उन्हें चुनावी सफलता भले नहीं मिली थी, लेकिन उन्होंने शिक्षा, रोजगार, भ्रष्टाचार और पलायन जैसे मुद्दों को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने का प्रयास किया था। अब बांकीपुर की जीत ने उन मुद्दों को राजनीतिक वैधता भी प्रदान कर दी है।</div><div><br></div><div>इस जीत का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक महत्व यही है कि यह भाजपा के सबसे मजबूत माने जाने वाले शहरी गढ़ में हासिल हुई। इससे यह संकेत भी मिला कि यदि कोई तीसरी राजनीतिक ताकत जनता के बीच विश्वसनीय विकल्प बनती है, तो बिहार की परंपरागत द्विध्रुवीय राजनीति का समीकरण बदल सकता है।</div><div><br></div><div>इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार इस समय नेतृत्व परिवर्तन और राजनीतिक पुनर्संरचना के दौर से गुजर रहा है। एक ओर पुराने राजनीतिक चेहरे अपने प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश में हैं, वहीं दूसरी ओर नई राजनीति की मांग भी लगातार मजबूत होती दिखाई दे रही है। ऐसे समय में बांकीपुर का परिणाम आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के लिए एक मनोवैज्ञानिक संकेत बन गया है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, भारतीय राजनीति लंबे समय तक "कोर वोट बैंक" की अवधारणा पर टिकी रही है। हर दल अपने कुछ सामाजिक समूहों और क्षेत्रों को अपनी स्थायी राजनीतिक पूंजी मानता रहा। लेकिन बदलते समय का मतदाता अब खुद को किसी दल की स्थायी संपत्ति मानने को तैयार नहीं है। वह सत्ता बदलने से भी नहीं हिचकता और नए चेहरे को मौका देने से भी नहीं डरता। बांकीपुर का जनादेश इसी बदलती राजनीतिक चेतना का सबसे सशक्त उदाहरण है। यह परिणाम बताता है कि लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक है। वह किसी भी दल को जितना ऊपर उठा सकती है, उतनी ही तेजी से उसे जमीन पर भी ला सकती है। एक सच्चाई सभी को समझनी होगी कि लोकतंत्र में कोई किला हमेशा के लिए अभेद्य नहीं होता और कोई वोट बैंक हमेशा के लिए किसी का नहीं होता।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 13:11:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/bihar-bypoll-message-for-bjp-core-vote-bank-prashant-kishor-bankipur-analysis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[पीओके की पुकार और दुनिया की जिम्मेदारी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-call-of-pok-and-the-world-responsibility]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में इन दिनों जो परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं, वे केवल एक चुनावी प्रक्रिया की कहानी नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र, मानवाधिकार और जनविश्वास के गहरे संकट की दास्तान हैं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक शक्ति निष्पक्ष चुनाव, नागरिक स्वतंत्रता और शासन की जवाबदेही में निहित होती है, लेकिन जब चुनाव भय, हिंसा, प्रशासनिक दबाव और धांधली के आरोपों से घिर जाएँ, तब लोकतंत्र का स्वरूप विकृत हो जाता है। आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की स्थिति इसी कठोर वास्तविकता की ओर संकेत करती है। वहाँ के लोगों का आक्रोश केवल चुनावी अनियमितताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्षों से चली आ रही आर्थिक उपेक्षा, राजनीतिक भेदभाव और नागरिक अधिकारों की अनदेखी के विरुद्ध भी है। यही कारण है कि वहाँ का असंतोष अब स्थानीय मुद्दा न रहकर अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बनता जा रहा है। लोकतंत्र केवल मतपेटियों तक सीमित नहीं होता। लोकतंत्र का अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक बिना किसी भय, दबाव या प्रलोभन के अपनी इच्छा व्यक्त कर सके और उसकी अभिव्यक्ति का सम्मान हो। यदि किसी क्षेत्र में चुनाव पहले से तय परिणामों का माध्यम बन जाएँ, यदि सत्ता का पूरा तंत्र एक दल विशेष के पक्ष में खड़ा दिखाई दे, यदि विरोध की आवाज को बलपूर्वक दबाया जाए और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों पर कठोर कार्रवाई हो, तो उसे लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में समय-समय पर ऐसे आरोप सामने आते रहे हैं कि चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सत्ता का प्रभाव प्रशासन और चुनावी व्यवस्था पर स्पष्ट दिखाई देता है। यदि जनता के मन में यह विश्वास ही समाप्त हो जाए कि उसका मत परिवर्तन ला सकता है, तो लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण आधार ही समाप्त हो जाता है।</div><div><br></div><div>पाकिस्तान स्वयं को लोकतांत्रिक राष्ट्र कहता है, लेकिन उसके व्यवहार में लोकतंत्र की मूल भावना बार-बार प्रश्नों के घेरे में आ जाती है। लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव करवा देना नहीं है, बल्कि असहमति का सम्मान करना, नागरिक अधिकारों की रक्षा करना और सत्ता की आलोचना को स्वीकार करना भी है। यदि विरोध करने वालों को राष्ट्रविरोधी या व्यवस्था विरोधी बताकर दबाने का प्रयास किया जाए, यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित कर दी जाए और यदि प्रशासन जनता के बजाय सत्ता के हितों की रक्षा करता दिखाई दे, तो लोकतांत्रिक मूल्यों की विश्वसनीयता स्वतः समाप्त होने लगती है। पाकिस्तान की यही दोहरी नीति आज उसके लोकतांत्रिक दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोगों की सबसे बड़ी पीड़ा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी है। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद वहाँ का सामान्य नागरिक मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। बिजली संकट, महँगाई, बेरोजगारी, आवश्यक वस्तुओं की कमी और विकास की धीमी गति ने जनजीवन को अत्यंत कठिन बना दिया है। यह विडंबना है कि जिन नदियों से ऊर्जा उत्पन्न होती है, उसी क्षेत्र के लोग लंबे समय तक बिजली कटौती झेलने को विवश हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनके संसाधनों का उपयोग तो किया जाता है, लेकिन उनके विकास के लिए अपेक्षित निवेश नहीं किया जाता। ऐसी स्थिति में जनता के भीतर असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/china-j-20-stealth-fighter-jets-and-pakistan-sh15-howitzer-guns-deployed-facing-india" target="_blank">China के J-20 Stealth Fighter Jets और Pakistan की SH-15 Howitzer Guns भारत की ओर तैनात, अब क्या करेंगे PM Modi?</a></h3><div>लोकतांत्रिक शासन की सबसे बड़ी कसौटी यह होती है कि वह संकट के समय जनता के साथ किस प्रकार खड़ा रहता है। यदि जनता की शिकायतों का समाधान संवाद से करने के बजाय दमन से किया जाए, तो यह शासन की कमजोरी का प्रमाण होता है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों और असंतोष के प्रति जिस प्रकार का रवैया अपनाए जाने के आरोप लगते रहे हैं, वे चिंता पैदा करते हैं। लोकतंत्र का उत्तर हिंसा नहीं, बल्कि संवाद होता है। दुर्भाग्य से जब शासन संवाद छोड़कर शक्ति प्रदर्शन का मार्ग अपनाता है, तब जनता और व्यवस्था के बीच विश्वास की खाई और गहरी हो जाती है। विश्व समुदाय के सामने भी यह एक गंभीर नैतिक प्रश्न है। यदि लोकतंत्र और मानवाधिकार वास्तव में सार्वभौमिक मूल्य हैं, तो उनका संरक्षण केवल कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित नहीं होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और महाशक्तियाँ अनेक अवसरों पर दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मानवाधिकारों और लोकतंत्र की रक्षा की बात करती हैं। यदि यही सिद्धांत सार्वभौमिक हैं, तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में उठ रहे प्रश्नों की भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। मानवाधिकारों का मूल्य भौगोलिक सीमाओं से निर्धारित नहीं होता। जहाँ भी नागरिकों की स्वतंत्रता और सम्मान प्रभावित होता है, वहाँ वैश्विक समुदाय की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह स्थिति पर गंभीरता से ध्यान दे।</div><div><br></div><div>भारत ने हाल की घटनाओं के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की स्थिति की ओर आकर्षित किया है और वहाँ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा तथा दमन रोकने की आवश्यकता पर बल दिया है। इस प्रकार की अपील को केवल कूटनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में चुनावी प्रक्रिया पर लगातार प्रश्न उठ रहे हों, यदि नागरिक असुरक्षा और अविश्वास के वातावरण में जी रहे हों और यदि उनके मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहे हों, तो विश्व समुदाय की निष्क्रियता भविष्य के लिए और भी गंभीर संकट उत्पन्न कर सकती है। पाकिस्तान की लोकतांत्रिक नीतियों का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि एक ओर वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लोकतंत्र, न्याय और जनाधिकारों की बात करता है, वहीं दूसरी ओर अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में उन्हीं मूल्यों को व्यवहार में उतारने में विफल दिखाई देता है। लोकतंत्र की विश्वसनीयता केवल भाषणों से नहीं, बल्कि शासन की कार्यशैली से सिद्ध होती है। यदि नागरिक स्वयं को उपेक्षित, असुरक्षित और असहाय महसूस करें, तो लोकतंत्र का दावा खोखला प्रतीत होने लगता है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ सत्ता परिवर्तन की संभावना, स्वतंत्र संस्थाएँ, निष्पक्ष प्रशासन और नागरिकों की गरिमा की रक्षा है। यदि ये तत्व अनुपस्थित हों, तो चुनाव केवल औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाते हैं।</div><div><br></div><div>आज आवश्यकता इस बात की है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चुनाव पूरी तरह शांतिपूर्ण, स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी वातावरण में संपन्न हों। मतदाता बिना किसी भय या दबाव के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें, राजनीतिक दल समान अवसर प्राप्त करें और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का विश्वास पुनर्स्थापित हो। यह केवल उस क्षेत्र के लोगों के हित में नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में स्थिरता और शांति के लिए भी आवश्यक है। विश्व की महाशक्तियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र की रक्षा केवल वक्तव्यों से नहीं होती। जहाँ लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर पड़ती हैं, वहाँ समय रहते निष्पक्ष निगरानी, संवाद और मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए रचनात्मक प्रयास आवश्यक होते हैं। यदि दुनिया ऐसे मामलों में मौन रहती है, तो लोकतंत्र के सार्वभौमिक मूल्यों की विश्वसनीयता भी कमजोर पड़ती है।</div><div>&nbsp;</div><div>पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की वर्तमान परिस्थितियाँ दुनिया के लिए एक चेतावनी हैं कि चुनाव केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा होते हैं। यदि यह विश्वास टूट जाता है, तो असंतोष, अस्थिरता और संघर्ष की परिस्थितियाँ जन्म लेती हैं। आज आवश्यकता किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन करने की नहीं, बल्कि लोकतंत्र, न्याय, पारदर्शिता और मानवाधिकारों की रक्षा करने की है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को निष्पक्ष दृष्टि से स्थिति का आकलन करते हुए यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि वहाँ के नागरिकों को वही अधिकार और सम्मान मिले, जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज के नागरिकों का स्वाभाविक अधिकार है। दुनिया की आँखें अब इस ओर खुलनी चाहिए, क्योंकि जहाँ लोकतंत्र कमजोर होता है, वहाँ अंततः पूरी मानवता की नैतिक शक्ति भी कमजोर पड़ती है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 13:02:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-call-of-pok-and-the-world-responsibility</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[India-China Relation क्या वाकई सुधर रहे हैं? चीन में रह रहे भारतीयों ने चौंकाने वाला सच उजागर किया है!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/indians-in-china-raise-concerns-over-anti-india-content-ahead-of-brics-summit]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ऐसे समय में जब भारत और चीन के रिश्तों में सुधार की बातें हो रही हैं, वर्षों बाद सीमा व्यापार फिर से शुरू हुआ है और दोनों देशों के बीच राजनीतिक संवाद भी तेज हुआ है, उसी बीच चीन में रह रहे भारतीयों ने ऐसी शिकायतें सामने रखी हैं, जिन्होंने सबको चौंका दिया है। भारतीयों का कहना है कि चीन के सोशल मीडिया पर भारत और भारतीयों के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री तेजी से बढ़ रही है, भारतीय पेशेवरों को नौकरी के वीज़ा मिलने में मुश्किलें आ रही हैं और उनके जीवनसाथियों के रोजगार पर भी कई तरह की पाबंदियां हैं। इतना ही नहीं, भारत में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले चीन ने नई दिल्ली से ऐसी मांग भी कर दी है, जिसने दोनों देशों के संबंधों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास ने हाल के वर्षों में पहली बार भारतीय समुदाय के साथ 'ओपन हाउस' कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम में भारत के राजदूत विक्रम दोरईस्वामी, काउंसलर (कॉन्सुलर, शिक्षा एवं सामुदायिक मामलों) नितिनजीत सिंह और काउंसलर (वीजा) रमेश सिंह ने विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे भारतीयों से सीधे संवाद किया। इस बातचीत में भारतीय समुदाय ने जिन मुद्दों को सबसे प्रमुखता से उठाया, वह भारत-चीन संबंधों के वास्तविक हालात की एक अलग तस्वीर पेश करते हैं।</div><div><br></div><div>भारतीयों ने शिकायत की कि चीन के सोशल मीडिया मंचों पर भारत, भारतीय संस्कृति और भारतीय खान-पान को लेकर अपमानजनक और भड़काऊ सामग्री तेजी से बढ़ रही है। उनका कहना था कि यह केवल ऑनलाइन ट्रोलिंग का मामला नहीं है, बल्कि इससे चीन में रह रहे भारतीयों के सामाजिक माहौल और सुरक्षा की भावना पर भी असर पड़ रहा है। इसके अलावा भारतीय पेशेवरों को नौकरी के लिए वर्क वीज़ा मिलने में लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। कई लोगों ने यह भी बताया कि उनके जीवनसाथियों को रोजगार की अनुमति नहीं मिलने से परिवारों के सामने गंभीर आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। कुछ लोगों ने दूतावास से जुड़ी काउंसलर सेवाओं में आने वाली व्यावहारिक परेशानियों का मुद्दा भी उठाया।</div><div><br></div><div>राजदूत विक्रम दोरईस्वामी ने इन चिंताओं को गंभीर बताते हुए कहा कि चीन सरकार स्वयं भी सोशल मीडिया पर बढ़ती भारत-विरोधी सामग्री को लेकर चिंतित है और इस दिशा में कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय दूतावास भी गलत सूचनाओं और दुष्प्रचार का मुकाबला तथ्य आधारित जानकारी साझा करके कर रहा है। इसके साथ ही दूतावास भारतीय संस्कृति, खान-पान और विविधता को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने के लिए वसंत मेला जैसे लोकप्रिय सांस्कृतिक आयोजनों का दायरा बढ़ाने की योजना बना रहा है ताकि चीन में भारत की सकारात्मक छवि और मजबूत हो सके।</div><div><br></div><div>दोरईस्वामी ने यह भी बताया कि भारतीय पेशेवरों को रोजगार संबंधी विवादों में कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए दूतावास वकीलों और कानूनी विशेषज्ञों का एक सहयोगी नेटवर्क तैयार कर रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि भारतीयों की समस्याओं के समाधान के लिए ऐसे 'ओपन हाउस' कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाएंगे। वहीं, चीन के नागरिकों के लिए भारतीय वीज़ा प्रक्रिया को भी और सरल बनाने की तैयारी की जा रही है ताकि दोनों देशों के बीच लोगों का आवागमन बढ़ सके।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, भारत में सितंबर में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले चीन की एक और पहल ने नई कूटनीतिक चर्चा को जन्म दे दिया है। जानकारी के अनुसार, चीनी दूतावास ने भारत सरकार के समक्ष यह चिंता जताई है कि फालुन गोंग और तिब्बती समुदाय से जुड़े मीडिया संगठनों को सम्मेलन के दौरान सीमित पहुंच दी जाए। चीन नहीं चाहता कि ऐसे मीडिया संस्थानों को उसके प्रतिनिधिमंडल से सवाल पूछने या सम्मेलन के मीडिया कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मिले।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि फालुन गोंग चीन में प्रतिबंधित आध्यात्मिक संगठन है और उससे जुड़े कई मीडिया संस्थान, जैसे 'द एपॉक टाइम्स', चीन की नीतियों के आलोचक रहे हैं। इसी तरह भारत में बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थी रहते हैं और धर्मशाला सहित कई स्थानों से तिब्बती समुदाय के अपने मीडिया संस्थान संचालित होते हैं। भारत अब तक इन संगठनों को देश के कानूनों के दायरे में स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति देता रहा है। ऐसे में चीन की यह मांग केवल मीडिया प्रबंधन का मुद्दा नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की कसौटी के रूप में भी देखी जा रही है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आने की संभावना जताई जा रही है। यदि यह यात्रा होती है तो जिनपिंग सात साल बाद भारत की धरती पर होंगे। उल्लेखनीय है कि 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गए थे, लेकिन अक्टूबर 2024 में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के विवादित क्षेत्रों से सैनिकों की वापसी पर सहमति बनने के बाद रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार शुरू हुआ। इसके बाद दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की कई मुलाकातें हुईं, भारत ने चीनी नागरिकों के लिए वीज़ा फिर से जारी करना शुरू किया और चीन ने कैलाश मानसरोवर यात्रा भी बहाल कर दी।</div><div><br></div><div>बहरहाल, चीन में रह रहे भारतीयों की शिकायतें और भारत में मीडिया की पहुंच को लेकर चीन की नई मांग यह संकेत देती है कि राजनीतिक स्तर पर संवाद बढ़ने के बावजूद जमीनी स्तर पर विश्वास की कमी अब भी पूरी तरह दूर नहीं हुई है। यही वजह है कि दोनों देशों के रिश्ते फिलहाल सहयोग और संदेह, इन दोनों के बीच संतुलन साधने की चुनौती से गुजर रहे हैं। आने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल आर्थिक और रणनीतिक सहयोग का मंच नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि भारत और चीन अपने रिश्तों को वास्तविक विश्वास और पारदर्शिता की दिशा में कितना आगे ले जा पाते हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div><div><br></div>

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      <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 16:46:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/indians-in-china-raise-concerns-over-anti-india-content-ahead-of-brics-summit</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[आखिर क्यों पूरा नहीं कर पाते शिक्षा मंत्री अपना कार्यकाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/why-exactly-are-education-ministers-unable-to-complete-their-tenure]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन ने भारत की शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और सरकार की प्राथमिकताओं पर एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ़ इस्तीफा देने वाले शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान पर नहीं, बल्कि मोदी सरकार के दौरान शिक्षा मंत्रालय की पूरी दिशा को लेकर भी उठ रहे हैं। साल 2014 से केंद्र में सत्ता में आने के बाद से अब तक मोदी सरकार में शिक्षा मंत्री रही स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल 'निशंक' और धर्मेंद्र प्रधान को अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किए बिना इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>पांचवा शिक्षा मंत्री प्रहलाद जोशी को बनाया गया है, हालांकि जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। मोदी सरकार को तय करना है कि जोशी ही पूर्णकालिक शिक्षा मंत्री रहेंगे या किसी नए चेहरे की तलाश करके उसको स्वतंत्र रूप से शिक्षा मंत्री के पद की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। जोशी भी विवादों में रहे हैं। साल 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो गैंग रेप और उनके परिवार के सदस्यों की हत्या के मामले में उम्र क़ैद की सज़ा काट रहे 11 दोषियों की समय से पहले रिहाई पर जब चौतरफ़ा सवाल उठ रहे थे, तब प्रल्हाद जोशी ने इसका बचाव किया था।</div><div><br></div><div>सवाल यही है कि आखिरकार कोई भी शिक्षा मंत्री अपना कार्यकाल क्यों नहीं पूरा कर पाया। मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में शिक्षा मंत्रालय ही ऐसा प्रमुख मंत्रालय रहा, जिसकी कमान पांच अलग-अलग मंत्रियों ने संभाली वहीं, गृह, विदेश, वित्त, रक्षा और स्वास्थ्य जैसे मंत्रालयों में अपेक्षाकृत स्थिरता बनी रही। शिक्षा, संस्कृति और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (आईएनबी) ऐसे कुछ चुनिंदा मंत्रालय हैं, जिन्हें सॉफ्ट पावर की तरह देखा जाता है और जो संघ की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए अहम रहे हैं।</div><div><br></div><div>यही कारण है कि यहां विवाद ज़्यादा हुए और अस्थिरता भी उतनी ही दिखती है। गौरतलब है कि आईएनबी में 12 साल के भीतर सात केंद्रीय मंत्री और संस्कृति मंत्रालय में पांच केंद्रीय मंत्री बने हैं। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में स्मृति ईरानी और प्रकाश जावड़ेकर ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय संभाला मोदी के दूसरे कार्यकाल में यह ज़िम्मेदारी रमेश पोखरियाल 'निशंक' को मिली। मगर 2021 में हुए कैबिनेट विस्तार के दौरान धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री बना दिया गया, जिनके इस्तीफ़े की मांग को लेकर एक महीने तक कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थक जंतर-मंतर पर बैठे रहे और आख़िरकार केंद्र सरकार दबाव में आई और प्रधान को इस्तीफा देने को मजबूर होना पड़ा।</div><div><br></div><div>नीट परीक्षा के लीक होने का मामला अलग कर दें, तो संघ से जुड़े उन सभी प्रमुख लक्ष्यों को धर्मेंद्र प्रधान बिना शोर-शराबा किए लागू करा पाने में सफल रहे हैं, जिनकी कोशिश उनके पूर्ववर्तियों ने ज़ोर लगाते हुए की और विवादों में फंसते गए। ग़ौरतलब है कि 2014 में बनी पहली मोदी कैबिनेट में धर्मेंद्र प्रधान को पेट्रोलियम मंत्री बनाया गया, फिर मोदी के दूसरे कार्यकाल में वे शिक्षा मंत्री बने और मोदी के तीसरे कार्यकाल में भी यह ज़िम्मेदारी जारी रही। प्रधान के शिक्षा मंत्री रहते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को बढ़ावा मिला। मातृभाषा और कई भाषाओं में शिक्षा को उन्होंने बढ़ावा दिया। मगर तीन-भाषा फ़ॉर्मूला पर तमिलनाडु राज्य सरकार के साथ लंबे समय तक वे विवाद के केंद्र में भी रहे। विरोधियों ने उन पर राजनीतिक हस्तक्षेप और हिंदी थोपने का आरोप लगाया, जिससे शिक्षा नीति केंद्र बनाम राज्य के विवाद का मुद्दा बन गई।</div><div><br></div><div>मोदी सरकार के कार्यकाल के चारों शिक्षा मंत्रियों में से एक भी अपना विज़न लागू करने के लिए स्वतंत्र नहीं था। रणनीतियां ऊपर से बनती थीं। ये ज़रूर है कि हर मंत्री का उसे लागू करने का तरीक़ा अलग हो सकता है जैसे, स्मृति ईरानी ज़्यादा मुख़र थीं, जावड़ेकर रणनीतिक चुप्पी वाले व्यक्ति थे। मोदी के शासन में शिक्षा विभाग में जो भी नीतियां अपनाई गईं, वे सभी वाम विचारधारा को हटाने के मक़सद से लागू हुईं। संघ का मक़सद भारत की शिक्षा व्यवस्था से वाम विचारधारा वाली शिक्षा-पद्धति को हटाना है, क्योंकि संघ मानता है कि वे मुग़लों के समर्थक रहे हैं। संघ की नज़र में, मुग़ल घुसपैठिए हैं और देश की मुस्लिम आबादी उनकी वंशज है। संघ पर आरोप लगते रहें कि इस एजेंडे को पूरा मोदी सरकार के जरिए कराया जा रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/smriti-irani-major-statement-on-the-neet-protest" target="_blank">NEET Protest पर Smriti Irani का बड़ा बयान, कहा- GenZ और PM Modi के बीच नहीं है कोई दूरी</a></h3><div>इसी लक्ष्य को साधने के लिए मोदी सरकार के चार शिक्षा मंत्रियों के चयन का पैमाना रहा है। "स्मृति ईरानी को छोड़ दें, तो नवनियुक्त शिक्षा मंत्री प्रहलाद जोशी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल 'निशंक' और धर्मेंद्र प्रधान संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं। वाजपेयी के ज़माने में भी संघ से आने वाले मुरली मनोहर जोशी को शिक्षा मंत्री बनाया गया था, जो दर्शाता है कि संघ इस मंत्रालय में अपना दख़ल हमेशा चाहता रहा है। स्मृति ईरानी के साथ उनके नाम पर डिग्री विवाद, जेएनयू विवाद और रोहित वेमुला की आत्महत्या जैसे विवाद जुड़ चुके थे।</div><div><br></div><div>स्मृति ईरानी संघ की पृष्ठभूमि से नहीं थीं। नई शिक्षा नीति तैयार करने और उसे लागू करने में देरी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्मृति से बहुत खुश नहीं था। संघ के संदेशों को समझना आसान नहीं है। संघ शोर-शराबा नहीं करता। यही कारण है कि फिलाहल संघ की पृष्ठभमि वाले प्रकाश जोशी को प्राथमिकता देते हुए शिक्षा मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया है। मंत्रालय में स्मृति ईरानी के कार्यकाल के दौरान नई शिक्षा नीति पर काम की शुरुआत हुई। मोदी के कार्यकाल के तीसरे शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' के समय इसे लागू किया गया।</div><div><br></div><div>शिक्षा मंत्री रहे "निशंक की पहचान संघ से आने वाले एक विद्वान की रही है, जो संघ के मक़सद को आगे ले जा सकते थे। हालांकि, अपने अवैज्ञानिक बयानों को लेकर भी वे विवादों में आए। उन्होंने यहां तक कहा कि चरक ऋषि ने अणु-परमाणु की खोज की थी। कोविड के समय जेईई-नीट की परीक्षा कराए जाने की घोषणा के बाद निशंक के ख़िलाफ़ काफ़ी ऑनलाइन विरोध हुआ था। विरोध में लोग कोर्ट भी गए, जहां सरकार के पक्ष में फ़ैसला आया। हालांकि, तब बड़ी संख्या में छात्र परीक्षा देने से रह गए, जिसे लेकर विवाद हुआ। उनके समय भी आरोप लगे कि नई शिक्षा नीति के ज़रिए केंद्र सरकार शिक्षा पर नियंत्रण अपने हाथों में लेने की कोशिश कर रही है, जिसे उन्होंने नकार दिया था।</div><div><br></div><div>शिक्षा मंत्रालय के जरिए मोदी सरकार का सारा जोर संघ को साधने में रहा है, किन्तु शिक्षा के उत्थान के लिए बजट को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। इसी कारण शिक्षा मंत्रालय में बजट घटता गया और विवाद बढ़ते गए। केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय की हिस्सेदारी पिछले 12 वर्षों में तेज़ी से घटी हैै यह हिस्सा 2013-14 में कांग्रेस-नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में 4.6% था, जो 2025-26 में घटकर 2.5% रह गया। शिक्षा का घटता बजट ही दर्शाता है कि मोदी सरकार शिक्षा में सुधार को लेकर गंभीर नहीं है। चारों शिक्षा मंत्रियों के समय में लगभग हर विश्वविद्यालय में बड़े स्तर पर फ़ैकल्टी के चयन में संघ की विचारधारा को प्राथमिकता दी गई है।</div><div><br></div><div>शिक्षा में सुधार के लिए आवश्यक रोजगारपरक, रचनात्मक, सकारात्मक और शोधपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित मुद्दे खास स्थान नहीं ले सके। पेपर लीक के केंद्र ही नहीं राज्यों की सरकारों ने कठोर कानून बनाए हैं, सजा और जुर्माने को बढ़ाया है, किन्तु देश में जब तक मौजूद सिस्टम ठीक नहीं होगा, तब तक चाहे कितने ही मंत्री बदल दिए जाएं, पेपर लीक की घटनाएं रुकने की कोई गारंटी नहीं है।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 11:40:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/why-exactly-are-education-ministers-unable-to-complete-their-tenure</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Nepal में भड़की साम्प्रदायिक हिंसा की चिंगारी क्या समूचे हिंदू समाज के लिए खतरे की घंटी है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/nepal-terai-communal-violence-kaptanganj-sunsari-janakpur-india-border]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>नेपाल की तराई इस समय किसी शांत पहाड़ी देश की तस्वीर नहीं, बल्कि ऐसी बारूद की ढेरी नजर आ रही है, जहां एक मामूली चिंगारी ने पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लिया। कांवड़ यात्रा की तैयारियों के दौरान डीजे की तेज आवाज को लेकर शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते हिंसक झड़पों में बदल गया। पत्थर चले, पुलिस ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस छोड़ी, चेतावनी के तौर पर फायरिंग हुई और आखिरकार गोलियां चलीं। तीन लोगों की मौत ने इस विवाद को स्थानीय घटना से उठाकर राष्ट्रीय संकट का रूप दे दिया।</div><div><br></div><div>हिंसा की शुरुआत सुनसरी जिले के देवानगंज क्षेत्र से हुई, लेकिन जल्द ही इसकी आग धनुषा, सिराहा, सप्तरी और जनकपुर सहित नेपाल के दक्षिणी तराई क्षेत्र में फैल गई। प्रशासन को कई जिलों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगाना पड़ा, जबकि पांच से अधिक लोगों के एकत्र होने, जुलूस, प्रदर्शन और सभाओं पर रोक लगा दी गई। नेपाल सेना तक को तैनात करना पड़ा, जिससे हालात की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/nepal-imposes-indefinite-curfew-in-saptari-district-after-violence" target="_blank">Nepal के Saptari में सांप्रदायिक हिंसा के बाद प्रशासन ने लगाया अनिश्चितकालीन Curfew</a></h3><div>नेपाल के जिस कप्तानगंज इलाके से इस हिंसा की शुरुआत हुई, वह भारत के बिहार से लगी खुली सीमा के बेहद करीब स्थित है। यह क्षेत्र सुनसरी जिले की देवानगंज ग्रामीण पालिका के अंतर्गत आता है, जहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय दशकों से एक-दूसरे के पड़ोसी के रूप में रहते आए हैं। स्थानीय बाजार, स्कूल और सामाजिक जीवन दोनों समुदायों के बीच साझा रहे हैं। यही नजदीकी सामान्य दिनों में सामाजिक सौहार्द का प्रतीक बनती है, लेकिन तनाव की स्थिति में यही भौगोलिक निकटता छोटी-सी कहासुनी को भी कुछ ही घंटों में बड़े सांप्रदायिक टकराव में बदल देने का खतरा पैदा कर देती है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि स्थिति कुछ सामान्य होने पर प्रशासन ने चुनिंदा इलाकों में कर्फ्यू में ढील देना शुरू किया है। हालांकि कई संवेदनशील क्षेत्रों में प्रतिबंध अभी भी जारी हैं। अस्पताल, एंबुलेंस, दवा, दूध, ईंधन और आवश्यक सेवाओं को छूट दी गई है। इसी के साथ विभिन्न जिलों में शांति रैलियां निकाली जा रही हैं, ताकि दोनों समुदायों के बीच विश्वास बहाल किया जा सके। जनकपुर में सर्वदलीय बैठक आयोजित कर राजनीतिक दलों, धार्मिक नेताओं और सामाजिक प्रतिनिधियों को एक मंच पर लाने का प्रयास भी किया गया।</div><div><br></div><div>उधर, इस मुद्दे पर लगातार आलोचना झेलने के बाद प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने पहली बार राष्ट्र को संबोधित किया। उन्होंने हिंसा की निष्पक्ष जांच के लिए समिति गठित करने की घोषणा करते हुए दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिलाया। उन्होंने नागरिकों से अफवाहों और नफरत फैलाने वाले संदेशों से बचने तथा केवल आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करने की अपील की। सरकार ने मृतकों के परिजनों को दस-दस लाख नेपाली रुपये का मुआवजा देने और उन्हें शहीद घोषित करने की प्रक्रिया शुरू करने का भी वादा किया है।</div><div><br></div><div>लेकिन सवाल केवल इतना नहीं है कि हिंसा कैसे भड़की। असली चिंता यह है कि नेपाल, जिसे लंबे समय तक धार्मिक सह-अस्तित्व का उदाहरण माना जाता था, वहां अब सामाजिक ध्रुवीकरण की घटनाएं अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देने लगी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि स्थानीय विवाद, सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहें, कमजोर प्रशासनिक प्रतिक्रिया, बेरोजगारी और समुदायों के बीच बढ़ता अविश्वास ऐसे हालात को और विस्फोटक बना रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि इस घटना को केवल हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि इसके पीछे राजनीतिक, सामाजिक और संस्थागत कारण भी मौजूद हैं।</div><br><div>दरअसल, नेपाल की तराई पहली बार बड़े पैमाने पर हिंसा का गवाह नहीं बनी है। वर्ष 2007 का गौर नरसंहार, कपिलवस्तु की जातीय हिंसा और 2015 की टीकापुर घटना इस क्षेत्र की संवेदनशील सामाजिक संरचना की याद दिलाती हैं। इन घटनाओं का स्वरूप धार्मिक नहीं था, बल्कि जातीय और राजनीतिक संघर्षों से जुड़ा था। लेकिन इन सभी घटनाओं में एक समानता स्पष्ट दिखती है कि बड़ी भीड़ रही, प्रशासन की देर से प्रतिक्रिया आई और स्थानीय तनाव ने तेजी से हिंसक रूप ले लिया। यही कारण है कि आज धार्मिक विवाद भी उसी संवेदनशील सामाजिक ढांचे में और अधिक विस्फोटक साबित हो रहे हैं।</div><div><br></div><div>इसी संदर्भ में नेपाल में बढ़ते धार्मिक ध्रुवीकरण पर भी बहस तेज हो गई है। कुछ राजनीतिक समूह नेपाल की बदलती जनसांख्यिकीय और धार्मिक राजनीति को लेकर चिंता जता रहे हैं तथा इसे बढ़ते इस्लामी प्रभाव या पहचान-आधारित राजनीति से जोड़ रहे हैं, जबकि अन्य विशेषज्ञ इसे सामाजिक अविश्वास, आर्थिक निराशा तथा राजनीतिक ध्रुवीकरण का संयुक्त परिणाम मानते हैं। देखा जाये तो नेपाल इस समय धार्मिक पहचान की राजनीति के बढ़ते प्रभाव का सामना कर रहा है, जिससे सभी समुदायों के बीच तनाव बढ़ने का जोखिम पैदा हुआ है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि नेपाल की 2021 की जनगणना के अनुसार मुस्लिम आबादी राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 5 प्रतिशत है, लेकिन मधेश और तराई के कई सीमावर्ती जिलों में उनकी हिस्सेदारी राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। सुनसरी, धनुषा, रौतहट, पर्सा और सराही जैसे जिले भारत की खुली सीमा से जुड़े हैं, जहां वर्षों पुराने पारिवारिक, वैवाहिक और व्यापारिक रिश्ते बिहार तथा उत्तर प्रदेश से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि सीमा के दोनों ओर पैदा होने वाले सामाजिक या सांप्रदायिक तनाव एक-दूसरे को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। भारत के लिए चुनौती केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि अफवाहों, कट्टरपंथी प्रचार, संगठित उकसावे और सोशल मीडिया के माध्यम से फैलने वाले दुष्प्रचार पर भी समान रूप से नजर रखना आवश्यक होगा।</div><div><br></div><div>भारत के लिए यह घटनाक्रम विशेष महत्व रखता है क्योंकि हिंसा प्रभावित अधिकांश जिले भारतीय सीमा से लगे हुए हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश से सटी खुली भारत-नेपाल सीमा दोनों देशों की सबसे बड़ी ताकत भी है और संवेदनशीलता भी। यदि नेपाल में सांप्रदायिक तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो उसका असर सीमा पार सामाजिक संबंधों, व्यापार, सुरक्षा और खुफिया चुनौतियों पर भी पड़ सकता है। भारत को नेपाल के साथ सुरक्षा समन्वय, सीमा पर सतर्क निगरानी, अफवाहों और कट्टरपंथी प्रचार पर नजर तथा स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर सूचना साझाकरण को और मजबूत करना होगा।</div><div><br></div><div>नेपाल फिलहाल हिंसा की आग को बुझाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वास्तविक चुनौती केवल कर्फ्यू हटाने की नहीं, बल्कि टूटते सामाजिक विश्वास को फिर से जोड़ने की है। यदि राजनीतिक नेतृत्व, प्रशासन और समाज मिलकर समय रहते इस संकट का स्थायी समाधान नहीं खोजते, तो यह घटना भविष्य में और बड़े सामाजिक टकरावों की चेतावनी साबित हो सकती है। नेपाल की शांति केवल नेपाल का विषय नहीं है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत की सुरक्षा और स्थिरता से भी गहराई से जुड़ी हुई है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 13:29:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/nepal-terai-communal-violence-kaptanganj-sunsari-janakpur-india-border</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[मध्य पूर्व में उथल-पुथल से भारत-खाड़ी संबंधों के लिए चुनौतियां]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/challenges-for-india-gulf-relations-arising-from-turmoil-in-the-middle-east]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) एक समूह के तौर पर, विकासशील भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जीसीसी के सदस्य देशों के भारत के साथ सांस्कृतिक, आर्थिक और सभ्यतागत संबंध बहुत पुराने हैं। हाल के वर्षों में, यह संबंध पारंपरिक खरीदार-विक्रेता रिश्ते से आगे बढ़कर एक रणनीतिक गठबंधन में बदल गया है, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, रक्षा सहयोग और वहां रहने वाले भारतीयों का कल्याण शामिल है। इस क्षेत्र में मौजूद तेल और गैस के बड़े भंडार भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद अहम हैं।</div><div><br></div><div>जीसीसी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो हर साल अरबों डॉलर भारत भेजते हैं। इससे भारत की अर्थव्यवस्था को काफी मजबूती मिलती है। साथ ही, खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी भारत के साथ व्यापार पर काफी हद तक निर्भर हैं। यह जीसीसी और भारत की संयुक्त कोशिश है, जिससे इस क्षेत्र की तरक्की और खुशहाली में मदद मिलेगी। कई संयुक्त परियोजनाओं के माध्यम से इसमें वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिरता और समृद्धि को बढ़ाने की क्षमता है। आपसी संबंधों को गहरा करने के लिए व्यापार, निवेश, बुनियादी ढांचे और लोगों के बीच आपसी संपर्क में सहयोग बढ़ाना कारगर साबित हुआ है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-rising-number-of-billionaires-is-an-indicator-of-a-dynamic-economy" target="_blank">बढ़ते अरबपति गतिशील इकोनोमी के परिचायक</a></h3><div>प्रवासी और रेमिटेंस (विदेश से भेजा गया पैसा): दक्षिण एशियाई व्यापार और व्यापक आर्थिक स्थिरता को प्रवासी कामगारों से काफी समर्थन मिलता है। जीसीसी देशों में लगभग 1 करोड़ (10 मिलियन) भारतीय रहते हैं। जीसीसी देशों ने इस क्षेत्र के विकास में भारतीय समुदाय की भूमिका को माना है। यह पश्चिमी एशिया (मुख्य रूप से जीसीसी) और दक्षिण एशिया के बीच व्यापार और रेमिटेंस की स्थिति है, जो हाल के आंकड़ों पर आधारित है। वित्त वर्ष 2024-25 में, भारत को दुनिया भर से रिकॉर्ड 135.46 अरब डॉलर का रेमिटेंस मिला। विश्व बैंक के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत को सबसे ज़्यादा रेमिटेंस मिला है। 2024 में मेक्सिको दूसरे स्थान पर रहा, जहां 68 अरब डॉलर आने का अनुमान है। तीसरे स्थान पर चीन रहा, जहां अनुमानित 48 अरब डॉलर आए।</div><div><br></div><div>भारत को मिलने वाले कुल रेमिटेंस में जीसीसी देशों की हिस्सेदारी लगभग 38% है, जो इस क्षेत्र में बड़ी आर्थिक आमद का जरिया है। भारत में रेमिटेंस पर निर्भरता कुछ खास इलाकों तक सीमित है; अकेले यूएई से भारत को कुल रेमिटेंस का लगभग 19.2% हिस्सा मिलता है। इसके बाद सऊदी अरब का स्थान है, जहां से 6.7% रेमिटेंस आता है। भारत में आने वाले कुल रेमिटेंस (हर साल लगभग $27–28 बिलियन) में महाराष्ट्र का हिस्सा करीब 20.5% है, और केरल का हिस्सा करीब 19.7% (लगभग $26–27 बिलियन) है। इसलिए, खाड़ी देशों (गल्फ) में मंदी का इन दोनों राज्यों पर बहुत ज़्यादा असर पड़ता है।</div><div><br></div><h2>भारत-जीसीसी व्यापार</h2><div>जीसीसी की कुल आबादी 6.15 करोड़ (61.5 मिलियन) है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) $2.3 ट्रिलियन है। कुल द्विपक्षीय व्यापार (वित्त वर्ष 2024-25) $178.56 बिलियन का है। सितंबर 2025 तक भारत में जीसीसी का कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) $31.14 बिलियन से ज़्यादा हो गया है। भारत इंजीनियरिंग का सामान, चावल, कपड़ा, मशीनरी, रत्न और आभूषण एक्सपोर्ट करता है; और कच्चा तेल, द्रवरूप प्राकृतिक गैस (एलएनजी) , पेट्रोकेमिकल्स और सोना जैसी कीमती धातुएं इंपोर्ट करता है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत-खाड़ी व्यापार रिकॉर्ड $178.56 बिलियन तक पहुँच गया, जो भारत के कुल ग्लोबल व्यापार का 15.42% है। इसमें $56.87 बिलियन का एक्सपोर्ट और $121.68 बिलियन का इंपोर्ट शामिल है — जिससे जीसीसी भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर ब्लॉक बन गया है, जो भारत के ग्लोबल व्यापार का 15.42% है। पाँच साल का ट्रेंड: द्विपक्षीय व्यापार सालाना औसतन 15.3% की दर से बढ़ा है। भारत और जीसीसी ने फरवरी 2026 में औपचारिक रूप से&nbsp; मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) बातचीत शुरू की। इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, 2030 तक इस कॉरिडोर में कुल व्यापार $250 बिलियन से ज़्यादा हो सकता है।</div><div><br></div><div>यूएई के साथ व्यापार $100 बिलियन से ज़्यादा (सीईपीए) के तहत वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग $101.25 बिलियन) रहा, जिसमें भारत का व्यापार घाटा $26.53 बिलियन था; भारत ने $37.36 बिलियन का एक्सपोर्ट किया और $63.89 बिलियन का इंपोर्ट किया। सऊदी अरब, कतर, ओमान, कुवैत और बहरीन के साथ व्यापार क्रमशः $41.87 बिलियन (भारत का दूसरा सबसे बड़ा जीसीसी पार्टनर), $14.14 बिलियन, $10.61 बिलियन, $1.64 बिलियन का रहा। भू-राजनीतिक चुनौतियों से निपटना अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति में तेज़ी से हो रहे बदलावों के कारण भारत-जीसीसी सहयोग के सामने चुनौतियां हैं। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच, सबसे बड़ी चुनौती जीसीसी देशों और भारत के लिए संतुलन बनाए रखने की है। पारंपरिक रूप से, भारत और खाड़ी देशों के बीच हाइड्रोकार्बन को लेकर आर्थिक निर्भरता रही है, लेकिन अब रिन्यूएबल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा) की ओर वैश्विक झुकाव के कारण यह संबंध खतरे में है। भारत एक मुश्किल कूटनीतिक स्थिति में है, जहाँ उसे ईरान, इज़राइल और सऊदी अरब जैसे क्षेत्रीय दुश्मनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित करना पड़ रहा है, खासकर तब जब खाड़ी देश पारंपरिक पश्चिमी सहयोगियों से आगे बढ़कर उभरते एशियाई देशों के साथ नए रणनीतिक गठबंधन बना रहे हैं। इस क्षेत्र का सुरक्षा ढांचा भी बदल रहा है।</div><div><br></div><h2>चुनौतियों से निपटने के उपाय</h2><div>इन भू-राजनीतिक बाधाओं के बावजूद, भारत-जीसीसी सहयोग को नया रूप देने और उसे बेहतर बनाने के लिए कई रणनीतिक कदम उठाए जा सकते हैं। आर्थिक एकीकरण को बढ़ाने और व्यापारिक जोखिमों को कम करने की दिशा में पहला कदम भारत-जीसीसी एफटीए को जल्द से जल्द पूरा करना है। दूसरा कदम यह है कि सहयोग केवल ऊर्जा तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए...इसमें रिन्यूएबल एनर्जी, रिन्यूएबल हाइड्रोजन, खाद्य सुरक्षा, अहम टेक्नोलॉजी और मिलिट्री मैन्युफैक्चरिंग जैसे भविष्य से जुड़े क्षेत्रों को शामिल किया जाना चाहिए। कई बुनियादी रणनीतियां द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत कर सकती हैं और उन्हें भू-राजनीतिक तनावों से बचा सकती हैं: द्विपक्षीय जुड़ाव के ढांचे को क्षेत्रीय से वैश्विक स्तर पर ले जाना: मध्य पूर्व की क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्थाओं की नाजुकता और बहु-ध्रुवीय प्रकृति के कारण, भारत एक व्यापक क्षेत्रीय नीति से हटकर अधिक लक्षित द्विपक्षीय जुड़ाव के दृष्टिकोण की ओर बढ़ रहा है। जीसीसी सदस्यों के साथ अलग-अलग बातचीत करके भारत भू-राजनीतिक तनाव वाले मुद्दों से बच सकता है। इससे उसे खाड़ी देशों के आपसी मुद्दों, जैसे राजनयिक संकट और ऐतिहासिक नाकेबंदी, को सुलझाने में मदद मिलेगी।</div><div><br></div><div>आर्थिक और गैर-तेल संबंधित विविधीकरण के लिए मजबूत गठबंधन: गैर-तेल आर्थिक विविधीकरण में एक दीर्घकालिक बाजार और सहयोगी के रूप में, भारत खाड़ी देशों को सऊदी अरब के 'विज़न 2030' जैसी तेल-बाद की आकांक्षाओं को पूरा करने में मदद कर सकता है। बाधाओं को दूर करने के लिए व्यापार समझौतों और व्यापक आर्थिक ढांचे पर तेजी से बातचीत होनी चाहिए। यदि भारत के निवेश-अनुकूल माहौल और नौकरशाही प्रक्रियाओं को आधुनिक बनाया जाए, तो खाड़ी देशों के समृद्ध सॉवरेन वेल्थ फंड भारत के बुनियादी ढांचे, परिवहन और टेक्नोलॉजी क्षेत्रों में भारी निवेश कर सकते हैं।</div><div><br></div><div>कामगारों की आवाजाही में सुधार और मानव पूंजी पर सहयोग: जीसीसी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीयों द्वारा समर्थित पारस्परिक रूप से लाभकारी श्रम संबंध को बदलती आर्थिक स्थितियों के अनुसार ढलना चाहिए। जानबूझकर उच्च-मूल्य वाली सेवाओं, तकनीकी शिक्षा और पेशेवर आदान-प्रदान की ओर बढ़ने से दोनों देशों को जीसीसी अर्थव्यवस्थाओं की बदलती अपेक्षाओं को पूरा करने में मदद मिल सकती है, जो पारंपरिक रूप से कम-कुशल निर्माण श्रमिकों का समर्थन करती रही हैं।</div><div><br></div><div>सप्लाई चेन कनेक्टिविटी और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना: भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा भारत-खाड़ी संबंधों के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। क्षेत्रीय व्यवधानों से महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों की रक्षा के लिए, भारत और जीसीसी समुद्री सुरक्षा सहयोग को मजबूत कर सकते हैं। भले ही भू-राजनीतिक मुद्दे 'भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे' (आईएमईसी) जैसी महत्वाकांक्षी कनेक्टिविटी परियोजनाओं में देरी कर रहे हों, लेकिन कच्चे तेल और चावल जैसे मुख्य खाद्य पदार्थों के लिए मजबूत और विविध सप्लाई चेन एक-दूसरे पर हमारी दीर्घकालिक निर्भरता को मजबूत करेंगी।</div><div><br></div><div>इस गठबंधन को बाहरी झटकों से बेहतर ढंग से बचाना चाहिए और पश्चिमी हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा पर सहयोग को गहरा करके तथा उच्च-स्तरीय रणनीतिक बैठकों के लिए अधिक नियमित समय-सारणी बनाकर बहु-ध्रुवीय दुनिया के लिए अपने हितों को फिर से व्यवस्थित करना चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div><h2>निष्कर्ष</h2><div>भू-राजनीतिक टकरावों के जटिल माहौल में भारत और जीसीसी के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए एक ऐसी बहुआयामी रणनीति की जरूरत है जो पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों से आगे बढ़कर बदलती क्षेत्रीय वास्तविकताओं के अनुकूल हो। दोनों ही क्षेत्र तेल संबंधित मुद्दों के कारण आर्थिक चुनौतियों से गुजर रहे हैं । साथ ही पाकिस्तान, इज़राइल और चीन जैसी प्रतिस्पर्धी क्षेत्रीय ताकतों के भारी दबाव का भी सामना कर रहे हैं। आवश्यक गहरी और मजबूत साझेदारी तभी बन सकती है जब खाड़ी देशों की ऊर्जा, श्रम और पूंजी की ताकत और भारत के संतुलन बनाने के प्रयासों के बीच अच्छा तालमेल हो।&nbsp;</div><div><br></div><div>- प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडे</div><div>विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़,</div><div>एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय,</div><div>सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT,</div><div>पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 13:18:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/challenges-for-india-gulf-relations-arising-from-turmoil-in-the-middle-east</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवालों पर मोदी सरकार के तर्कपूर्ण जवाब]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/supreme-court-election-commission-cec-appointment-law-hearing-cji-selection-panel-govt-response]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर ऐसी बहस छिड़ी, मानो लोकतंत्र की सबसे अहम संस्थाओं में से एक का भविष्य न्यायालय के कटघरे में खड़ा हो। एक ओर संविधान की आत्मा और निष्पक्ष चुनाव की कसौटी पर सवाल उठाते न्यायाधीश थे तो दूसरी ओर संसद की सर्वोच्चता और प्रधानमंत्री पद की गरिमा का पक्ष मजबूती से रखती केंद्र सरकार। सवालों और जवाबों का यह सिलसिला कई बार अदालत की बहस से आगे बढ़कर लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणाओं पर गहन विमर्श में बदल गया।</div><div><br></div><div>न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सुनवाई के दौरान सबसे पहले यही सवाल उछाला कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) का पद लोकतंत्र के लिए इतना महत्वपूर्ण है, तो फिर उनके चयन की प्रक्रिया ऐसी क्यों न हो, जिस पर किसी भी प्रकार का संदेह न रहे? अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चुनाव आयोग केवल स्वतंत्र होकर काम करे, इतना पर्याप्त नहीं है; उसे स्वतंत्र दिखाई भी देना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/can-the-government-withdraw-firs-against-cjp-protest-agitators-the-law-surprising-answer" target="_blank">क्या CJP प्रदर्शन के उपद्रवियों की FIR सरकार वापस ले सकती है? कानून का चौंकाने वाला जवाब!</a></h3><div>इसी संदर्भ में अदालत ने सरकार से सीधा प्रश्न किया कि संसद ने 2023 का कानून बनाते समय चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखने का निर्णय आखिर किस आधार पर लिया? पीठ ने याद दिलाया कि सीबीआई निदेशक और लोकपाल जैसे महत्वपूर्ण पदों के चयन में मुख्य न्यायाधीश की भूमिका स्वीकार की गई है, फिर चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान के मामले में यह व्यवस्था क्यों बदली गई?</div><div><br></div><div>केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस तर्क का जोरदार प्रतिवाद किया। उन्होंने अदालत से कहा कि बहस की शुरुआत इस धारणा से नहीं हो सकती कि प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत आचरण करेंगे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के पद की अपनी गरिमा और पवित्रता है तथा जनता को उनके निर्णयों पर विश्वास होना चाहिए। तुषार मेहता ने सवालिया अंदाज में कहा, "यदि प्रधानमंत्री के फैसलों पर भरोसा ही नहीं किया जाएगा, तो क्या फिर मंत्रिमंडल के गठन के समय भी किसी पूर्व न्यायाधीश या बाहरी व्यक्ति से सलाह लेना अनिवार्य कर दिया जाए?"</div><div><br></div><div>उन्होंने यह भी दलील दी कि केवल इसलिए कि कार्यपालिका के पास संख्यात्मक बहुमत है, यह मान लेना उचित नहीं कि वह संविधान विरोधी या दुर्भावनापूर्ण निर्णय लेगी। उन्होंने कहा कि राज्य के तीनों अंग यानि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका स्वतंत्र हैं और एक संस्था दूसरी की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।</div><div><br></div><div>लेकिन अदालत ने तुरंत स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य प्रधानमंत्री पर अविश्वास जताना नहीं है। पीठ ने कहा कि प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का है जो जनता के विश्वास की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए। न्यायाधीशों ने कहा, "हम यह नहीं कह रहे कि वर्तमान समिति ने निष्पक्षता नहीं बरती है। लेकिन जैसे न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए, उसी प्रकार चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में भी निष्पक्षता दिखाई देनी चाहिए।"</div><div><br></div><div>इसी दौरान अदालत ने सरकार से एक और तीखा सवाल पूछा। पीठ ने याद दिलाया कि पहले भी अदालत ने निर्वाचित सरकार पर भरोसा जताते हुए आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को मंत्री न बनाने की अपेक्षा की थी। ऐसे में आज सरकार में कितने मंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं? इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने संकेत दिया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल संवैधानिक प्रावधानों से नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास से भी तय होती है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि यह पूरा विवाद 2023 के उस कानून को लेकर है, जिसके तहत राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री वाली चयन समिति की सिफारिश पर करते हैं। इससे पहले मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अंतरिम व्यवस्था के रूप में निर्देश दिया था कि जब तक संसद कानून नहीं बना देती, तब तक चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे। बाद में संसद ने कानून बनाकर मुख्य न्यायाधीश की जगह केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया।</div><div><br></div><div>अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने भी अदालत से कहा कि संसद की विधायी बुद्धिमत्ता पर सवाल उठाना न्यायिक मर्यादा के अनुरूप नहीं होगा। उनका कहना था कि केवल इसलिए कि कोई दूसरा मॉडल बेहतर हो सकता है, संसद द्वारा चुनी गई व्यवस्था को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "संसद को इस प्रकार बाधित नहीं किया जा सकता।"</div><div><br></div><div>सरकार ने अपने हलफनामे में भी यही रुख दोहराया। केंद्र ने कहा कि यह आशंका पूरी तरह काल्पनिक है कि चयन प्रक्रिया में कार्यपालिका की प्रमुख भूमिका होने से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता स्वतः प्रभावित हो जाएगी। सरकार ने याद दिलाया कि सात दशक से अधिक समय तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पूरी तरह कार्यपालिका द्वारा होती रही, लेकिन इस दौरान देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कभी बाधित नहीं हुए। इसलिए केवल आशंकाओं के आधार पर कानून को दोषपूर्ण नहीं माना जा सकता।</div><div><br></div><div>सुनवाई के दौरान केंद्र ने यह आग्रह भी किया कि मामले में महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न जुड़े हैं, इसलिए इसे बड़ी संविधान पीठ को भेजा जाए। हालांकि वरिष्ठ अधिवक्ता डी. शेषाद्रि नायडू, गोपाल शंकरनारायणन, प्रशांत भूषण और संजय पारिख ने इसका कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि लगभग 20 दिन तक विस्तृत सुनवाई चलने के बाद अब इस आधार पर मामला बड़ी पीठ को भेजने की मांग करना केवल सुनवाई को टालने का प्रयास है।</div><div><br></div><div>दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें मामले को संविधान पीठ के पास भेजने की मांग की गई है। अब निगाहें अदालत के फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि यह निर्णय केवल चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, संसद की विधायी शक्ति और जनता के भरोसे के बीच संतुलन की नई संवैधानिक रेखा भी खींच सकता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 13:15:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/supreme-court-election-commission-cec-appointment-law-hearing-cji-selection-panel-govt-response</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[बढ़ते अरबपति गतिशील इकोनोमी के परिचायक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-rising-number-of-billionaires-is-an-indicator-of-a-dynamic-economy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एक बात तो साफ हो जानी चाहिए कि देश की इकोनोमी में तेजी से बदलाव देखा जा रहा है। केन्द्र सरकार द्वारा पिछले दिनों में संसद में प्रस्तुत आंकड़ों का ही विश्लेषण करें तो दो बातें साफ हो जाती है कि देश में अरबपतियों की संख्या में बेतहासा बढ़ोतरी हो रही है तो दूसरी और इंकमटैक्स रिटर्न भरने वालों की भी संख्या में इजाफा हो रहा है। संसद में पेश आंकड़ों के विश्लेषण से यह साफ हो रहा है कि आयकर रिटर्न में 100 करोड़ से अधिक की आय बताने वालों की संख्या 2021-22 की 142 से बढ़कर 576 हो गई है। आयकर रिटर्न के अनुसार पिछले सालों एक अरब से अधिक आय वालों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। इसे गतिशील अर्थ व्यवस्था का परिचायक माना जा सकता है। पिछले पांच साल के आंकड़ों का ही विश्लेषण किया जाएं तो देश में बेरोजगारी की दर में भी कमी आई है। हांलाकि सरकार इसके लिए अपनी लोककल्याणकारी नीतियों को श्रेय देती है। आयकर प्रक्रिया में सुधार, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से सीधा लाभ, खाद्य, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, परिवहन , पानी बिजली आदि आदि की जनहितकारी योजनाओं और निवेशोन्मुखी माहौल से देष में तेजी से सुधार का माहौल बना है। हांलाकि देश के कुल परिसंपत्तियों में 50 फीसदी से अधिक लोग केवल 2 प्रतिशत की ही हिस्सेदारी रखते हैं। अच्छी बात यह है कि आज की युवा पीढ़ी सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ रही है और युवकों के साथ ही महिलाओं की भागीदारी भी तेजी से बढ़ रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक प़क्ष यह है कि समन्वित प्रयासों से अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में नए क्षेत्रों को तेजी से व योजनाबद्ध तरीके से बढ़ावा दिया गया है। परंपरागत क्षेत्रों के साथ ही नए क्षेत्रों मेंं अवसर खुले हैं और इसका सबसे अधिक लाभ युवा पीढ़ी उठा रही है। एक आंकड़ें के अनुसार 425 करोड़ से अधिक की संपत्ति वाले 3040 में से 1696 ऐसे उद्यमी है जो नई पीढ़ी और पहली पीढ़ी के हैं। नई पीढ़ी से मतलब यह है कि यह वे नए लोग है जो पंरपरागत या धनकुबेरों के परिवारों से नहीं आते अपितु अपने स्तर पर इस मुकाम पर पहुंचने वाले हैं। यही अर्थव्यवस्था का सकारात्मक पक्ष हो जाता है। सरकारी नीतियों और युवाओं में नया करने की ईच्छा शक्ति का परिणाम है कि नए क्षेत्रों में स्टार्टअप या एमएसएमई के मध्यम से युवाओं ने पहल की और अर्थ व्यवस्था को गति देने के साथ ही निवेश, रोजगार के अवसर विकसित किये। सरकार ने भी उत्पादन आधारित प्रोत्साहन यानि की पीएलआई से युवाओं को जोड़कर कुछ नया करने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके परिणाम भी अच्छे प्राप्त हुए हैं। साल दर साल आयकर रिटर्न भरने वाले और आयकर देने वालों की संख्या में बढ़ोतरी इसका उदाहरण है। यह सब सरकार की सकारात्मक नीतियों से ही संभव हो सकता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/pakistan-paying-india-share-indus-waters-treaty-arbitration-bill" target="_blank">भारत से टकराने की जिद बड़ी भारी पड़ती है, 'हिंदुस्तान के हिस्से का बिल' भी भर रहा है पाकिस्तान!</a></h3><div>एक बात साफ हो जानी चाहिए कि सरकार की नीतियों का अर्थ व्यवस्था को गति देने में खास भूमिका होती है। आज दुनिया के देशों में ईज ऑफ डूइंग पर जोर दिया जा रहा है। देशों में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष और देशी विदेशी निवेश बहुत कुछ सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है। बुनियादी ढांचा विकास, उद्योगों को प्रोत्साहन, सेवा क्षेत्र में विस्तार, स्टार्टअप्स को बढ़ावा, जीएसटी एक देश एक कर की नीति, डिजिटल भुगतान और विनिर्माण क्षेत्र में विस्तार से औद्योगिक माहौल बनता है। एक बात और की एमएसएमई आर्थिक विकास की रीढ होती है। इसे ग्रोथ इंजन भी कहा जा सकता है क्योंकि इससे अर्थ व्यवस्था को गति मिलती है तो स्थानीय स्तर पर बड़ी मात्रा में रोजगार के अवसर भी एमएसएमई सेक्टर में ही विकसित होते हैं। यही कारण है प्रोडक्सन लिंक इंसेटिंव जैसी योजनाओं और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने से युवा रोजगार मांगने की जगह रोजगार प्रदाता बनने का सपना देखता है और इसमें कोई दे राय नहीं कि एमएसएमई सेक्टर में अधिक रोजगार के अवसर विकसित होते हैं। अर्थ व्यवस्था को गति मिलती है। हांलाकि बड़े उद्योगों का अपना महत्व हे और उससे इंकार नहीं किया जा सकता। एक और बात यह है कि देश में निवेशोन्मुखी माहौल बन रहा है। राज्यों द्वारा अब निवेशकों को आकर्षित और आमंत्रित करने के लिए अन्य राज्यों के साथ ही प्रोस्पेक्टिव विदेशों में रोड शो सहित विभिन्न आयोजन कर निवेश का माहौल बनाया जाता है। राज्यों द्वारा निवेश सम्मेलन और निवेशकों को आमंत्रित करने के लिए आयोजन आम होते जा रहे हैं। इसके परिणाम भी आने लगे हैं। यह भी साफ है कि उद्योग लगाने के लिए निवेश आयेगा तो रोजगार, कारोबार के साथ ही नई तकनीक और इसके साथ ही अन्य कई चीजें आयेगी और उसका लाभ देश और देश की अर्थ व्यवस्था को ही मिलेगा।</div><div><br></div><div>सवाल एक और उभरता है कि अमीर-गरीब की खाईं अधिक गहरी नहीं होनी चाहिए। सकारात्मक पक्ष यह है कि रोजगार और रोजगार के अवसर बढ़े हैं। नागरिकों की आय बढने लगी है और इसका समाज के समग्र विकास पर असर पड़ता है। आय बढ़ेगी या रोजगार उपलब्ध होगा तो रहन-सहन, जीवन यापन के स्तर में सुधार होगा। लोगों की आय बढ़ेगी और आय से बाजार में मांग आपूर्ति में बदलाव आयेगा और इससे इकोनोमी को गति मिलेगी। अरबपतियों की संख्या में बढ़ोतरी अच्छी बात है पर अमीर गरीब के बीच खाईं पाटने के प्रयास अभी नाखाफी ही लग रहे हैं।</div><div><br></div><div>डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 11:24:44 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-rising-number-of-billionaires-is-an-indicator-of-a-dynamic-economy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[समाज को कहां ले जाएगी असभ्यता को सही साबित करने की कोशिश]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/where-will-the-attempt-to-justify-incivility-lead-society]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>गाली इन दिनों राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में हैं। जंतर-मंतर पर प्रधानमंत्री मोदी को लेकर दी खुलेआम गंदी गालियां इसका बहाना बनीं हैं। हैरत की बात है कि इसमें कई प्रोफेसर और पत्रकार भी शामिल हो गए हैं और इन गालियों को उचित ठहराने की दौड़ का हिस्सा बन गए हैं। इसे लड़कियों की क्रांतिकारी अभिव्यक्ति बताया जा रहा है तो कई गालीबाजों को नई गालियां रचने का सुझाव दे रहा है। उनके हिसाब से सारी गालियां पुरूषों द्वारा रची गई हैं, लिहाजा लड़कियों को नई तरह की गाली पुराण रचना चाहिए। इसके खिलाफ का समाज का एक बड़ा तबका इस नई प्रवृत्ति की मुखालफत कर रहा है। उसका कहना है कि गालियां भले हीं समाज में सदा से चली आ रही हैं, लेकिन कम से कम उनकी सार्वजनिक स्वीकृति नहीं रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>गालियों के समर्थकों में सबसे बड़ी संख्या खुद को क्रांतिकारी मानने वाले वामपंथी हैं। प्रगतिशील लेखक संघ भारत में वामपंथी विचारधारा के लिहाज से गठित हुआ था। उसके पहले अध्यक्ष उपन्यास सम्राट प्रेमचंद थे। गाली विमर्श के संदर्भ में प्रेमचंद का लिखे एक लेख का अंश याद आ रहा है। उन्होंने लिखा है, '‘हर जाति का बोलचाल का ढ़ंग उसकी नैतिक स्थिति का पता देता है। अगर इस दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दुस्तान सारी दुनिया की तमाम जातियों में सबसे नीचे नजर आएगा। बोलचाल की गंभीरता और सुथरापन जाति की महानता और उसकी नैतिक पवित्रता को व्यक्त करती है और बदजवानी नैतिक अंधकार और जाति के पतन का पक्का प्रमाण है। जितने गन्दे शब्द हमारी जबान से निकलते हैं शायद ही किसी सभ्य जाति की ज़बान से निकलते हों।'’</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/cjp-celebrating-its-own-victory-while-leaving-its-comrades-to-starve-to-death" target="_blank">साथियों को भूखे मरता छोड़ खुद जीत का जश्न बनाती कॉकरोच जनता पार्टी</a></h3><div>इसमें दो राय नहीं कि हर सफल आंदोलन के बाद आंदोलनकारी नायक और विजेता के रूप में उभरते हैं। इस लिहाज से काकरोच जनता पार्टी के नेता जंतर-मंतर आंदोलन के फिलहाल के विजेता तो हैं हीं। इस तर्क से उनका साथ देने वाला वाला समूह भी उसी वर्ग का माना जाएगा। इतिहास हमेशा विजेताओं का ही गुणगान करता है, उसकी सफलता की बलैया लेता है। चूंकि काकरोच जनता पार्टी के नेता चूंकि हीरो हैं, इसलिए उनकी ओर से दी गई गालियों को उनके गुणों के रूप में देखने की कोशिश हो रही है। तर्क दिया जा रहा है कि भारतीय समाज में शादी-ब्याह और मुंडन-जनेऊ के मौके पर प्यार से गालियां दी जातीं हैं। लिहाजा से जंतर-मंतर की गालियां भी उन्हीं गालियों की तरह स्नेह की अभिव्यक्ति हैं। लेकिन क्या सचमुच ऐसा ही है ? गंभीरता से विचार करेंगे तो इसका जवाब ना में मिलता है। इस अश्लील अभिव्यक्ति का मकसद देश के संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए हिकारत और घृणा का प्रदर्शन है। मोदी देश के वामपंथी और कांग्रेसी इकोसिस्टम एवं संस्कृति और परंपराभंजकों के निशाने पर तब से हैं, जब आज के जेन जी के अधिसंख्य जन्मे भी नहीं होंगे। अतीत में मोदी के खिलाफ कठोर शब्दों का इस्तेमाल जरूर होता था, लेकिन उनमें गालियां नहीं थीं। जंतर-मंतर का हालिया आंदोलन इसी बुनियाद पर आगे की कड़ी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>बचाव में उतरे वामपंथियों का तर्क है कि ये गालियां नई नहीं हैं। कई तो खुद का उदाहरण देते हुए कहने से नहीं चूक रहे कि वे भी गाली देते हैं या फिर उनके दोस्तों के बीच गालियों का खूब आदान-प्रदान होता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वे ऐसी ही गालियां अपने ही बच्चों के मुख से अपने ही घरों में सुनना पसंद करेंगे। सवाल यह भी है कि क्या इन गालीबाजों को भविष्य में वे अपने परिवार का दामाद या बहू के रूप हिस्सा बनाना पसंद करेंगे। सवाल यह भी है कि क्या वे अपने ही बच्चों से स्नेह के तौर पर अपने ही माता-पिता को ऐसी गालियां दिलाना स्वीकार करेंगे। निश्चित तौर पर इन सवालों का जवाब ना में है।&nbsp;</div><div><br></div><div>हर समाज में गालियां किसी न किसी रूप में रही हैं। लेकिन वे कभी सार्वजनिक स्वीकार्यता और विमर्श का विषय नहीं रही हैं। गालियां संस्कार से जुड़ी हैं। भाषाशास्त्री शब्द शक्ति की बात करते हैं। शब्द शक्ति में श्लील और अश्लील को लेकर भाषा शास्त्री स्पष्ट विभाजन स्वीकार करते हैं। वे मानते हैं कि श्लील ही सार्वजनिक चर्चा और अभिव्यक्ति का माध्यम होता है। आधुनिक साहित्य में गालियों का प्रयोग वामपंथी विचारधारा के बढ़ते असर के साथ बढ़ा। लेकिन प्रेमचंद के किसी कहानी या उपन्यास में कहीं गाली या अश्लील शब्द का प्रयोग नहीं मिलता। सच तो यह है कि गालियां कभी यथार्थ नहीं होती। हिंदी साहित्य में यथार्थवाद की अभिव्यक्ति के लिए गालियों के प्रयोग की शुरूआत हुई। लेकिन आधुनिक यथार्थवादी चिंतन से पहले के साहित्य में कभी गालियों का प्रयोग नहीं होता दिखता।</div><div><br></div><div>तर्क दिया जा रहा है कि जेन जी की यही भाषा है। वह ऐसे ही खुद को अभिव्यक्त करता है। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या वह परीक्षा में भी वह गालियों को अपनी जवाब में शामिल करता है?और क्या वह स्वीकार्य होगा? उनके समर्थन में उतरे दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यापक कक्षाओं में गालियों के धाराप्रवाह प्रयोग को स्वीकार करेंगे। सवाल यह भी है कि जो पत्रकार इसका समर्थन कर रहे हैं, क्या वे अपने अखबारों और अपने स्टूडियो में उन गालियों के इस्तेमाल को तैयार होंगे? निश्चित तौर पर इन सभी सवालों का जवाब ना में है। फिर यह सवाल क्यों ना उठे कि गालियों का महिमा मंडन क्यों?&nbsp;</div><div><br></div><div>तर्क यह भी है कि जेन जी इसी तरह सोचता है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि समूचे देश का जेन जी एक जैसा नहीं है, उसकी एक मातृभाषाएं नहीं है। जरूरी नहीं कि दिल्ली और चंडीगढ़ के जेन जी की तरह मुंबई और बंगलुरू का जेन जी भी सोचता हो। जिस तरह हर इलाके के लिए लोगों का खान-पान, रहन-सहन और बोली-बानी अलग-अलग हैं, कुछ इसी तरह हर इलाके के जेन जी की सोच भी अलग है। कुछ हजार या लाख जेन जी भले ही गालियां देने में फख्र महसूस कर रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि अब भी देश के जेन जी का बड़ा हिस्सा संस्कारी है और उसे सार्वजनिक तौर पर गालियां बकने से परहेज है।</div><div><br></div><div>मार्क्सवादी हिंदी लेखक जगदीश्वर चतुर्वेदी ने एक जगह लिखा है कि गालियों को वैध ठहराने की कोशिश पुनरूत्थानवादी सोच की खूबी है। वह पुराने असभ्य रूपों,भाषिक प्रयोगों, आदतों और संस्कारों को बनाये रखता है। मार्क्सवादी राष्ट्रीय विचारधारा को पुनरूत्थानवादी ही मानते हैं। तो क्या मान लें कि गालियों को उचित ठहराने वाले मार्क्सवादी भी अब पुनरूत्थानवादी हो गए हैं? समूचे भारतीय इतिहास और साहित्य में कहीं क्या गाली दी जाती थी, इसका प्रयोग नहीं दिखता।&nbsp;</div><div><br></div><div>गालियां हमेशा से गलत और असभ्य मानी जाती रही हैं। महाभारत में शिशुपाल का प्रकरण आता है। जिसकी सौ गालियों को कृष्ण बर्दाश्त करते हैं, लेकिन शिशुपाल जब सौ की सीमा पार करता है तो उसका वध कर देते हैं। जाहिर है कि कृष्ण के दौर में गालियां असभ्यता की निशानी थी। उनका महिमा मंडन नहीं होता था। मध्यकाल में जरूर गालियों को प्रतिष्ठा मिलने के संकेत मिलते हैं। फिर भी उनकी सार्वजनिक स्वीकार्यता नहीं दिखती। ऐसे में प्रश्न यह है कि भारतीय समाज प्रधानमंत्री को सार्वजनिक तौर पर दी जाने वाली गालियों और असभ्यता को क्यों स्वीकार किया जाए? नई पीढ़ी को असभ्य बनाने की प्रक्रिया को बढ़ावा क्यों दिया जाए। सभ्यता के साथ भी कड़ी से कड़ी आलोचना करने और कठोर बातें बोलने के लिए उन्हें योग्य क्यों न बनाया जाए। उनके परिवारों को क्यों न चेताया जाए कि असभ्यता की ओर बढ़ रहे अपने बच्चों के कदम को रोकें और उन्हें जिम्मेदार नागरिक और परिवारी बनाने की दिशा में आगे बढ़ें।</div><div><br></div><div>- उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं..</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 18:19:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/where-will-the-attempt-to-justify-incivility-lead-society</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पंजाब चुनाव से पहले नया नैरेटिव गढ़ने का प्रयास, वारिस पंजाब दे के प्रदर्शन ने खड़े किए बड़े सवाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/waris-punjab-de-protest-amritpal-singh-release-punjab-election-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले राज्य की राजनीति में एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश तेज होती दिखाई दे रही है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक ऐसा माहौल बनाने का प्रयास हो रहा है कि कट्टरपंथी राजनीति को जनभावना का पर्याय बना दिया जाए। इसी कड़ी में एक दिन पहले चंडीगढ़ में हुए प्रदर्शन ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकतांत्रिक विरोध के नाम पर कानून व्यवस्था को चुनौती देना और युवाओं को उग्र राजनीति की ओर धकेलना पंजाब के भविष्य के लिए शुभ संकेत है? देखा जाये तो राज्य के लोगों को बेहद सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि चुनावी जमीन तैयार करने के लिए भावनात्मक मुद्दों को हथियार बनाया जा रहा है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि चंडीगढ़ में अकाली दल वारिस पंजाब दे के बैनर तले हुए प्रदर्शन के दौरान उस समय नाटकीय दृश्य देखने को मिला, जब पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे वाटर कैनन वाहन पर एक प्रदर्शनकारी चढ़ गया। हालात तब और तनावपूर्ण हो गए जब प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश की। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल किया, लेकिन पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत दिया कि विरोध प्रदर्शन अब केवल मांगों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन और टकराव की राजनीति का माध्यम बनते जा रहे हैं। कुछ रिपोर्टों में तो यह भी दावा किया गया कि प्रदर्शनकारियों ने कुछ समय के लिए पुलिस के वाटर कैनन वाहन पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/waris-punjab-de-supporters-clash-with-chandigarh-police-demanding-amritpal-singh-release" target="_blank">MP अमृतपाल सिंह और बंदी सिंहों की रिहाई की मांग पर प्रदर्शन, चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर पुलिस से झड़प</a></h3><div>हम आपको बता दें कि यह प्रदर्शन वारिस पंजाब दे के सांसद अमृतपाल सिंह और अन्य सिख नेताओं की रिहाई की मांग को लेकर आयोजित किया गया था। प्रदर्शनकारी पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया और मुख्यमंत्री भगवंत मान के आवास की ओर मार्च करना चाहते थे, लेकिन चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर भारी पुलिस बल और बैरिकेडिंग के कारण उन्हें रोक दिया गया। इसके बाद प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की स्थिति बन गई और माहौल लंबे समय तक तनावपूर्ण बना रहा।</div><div><br></div><div>हालांकि इस पूरे आंदोलन को केवल एक रिहाई अभियान के रूप में देखना बड़ी भूल होगी। इसके पीछे कहीं अधिक व्यापक राजनीतिक रणनीति दिखाई देती है। अमृतपाल सिंह 2024 के लोकसभा चुनाव में खडूर साहिब से निर्दलीय सांसद चुने गए थे और अब वारिस पंजाब दे ने उन्हें 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया है। ऐसे में लगातार हो रहे प्रदर्शन उनके राजनीतिक प्रभाव को जीवित रखने और उन्हें राज्य की राजनीति के केंद्र में बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखे जा रहे हैं।</div><div><br></div><div>वारिस पंजाब दे का दावा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत अमृतपाल सिंह की निरोधात्मक हिरासत समाप्त हो चुकी है, इसलिए उन्हें रिहा किया जाना चाहिए। लेकिन दूसरी ओर सरकार और अदालतों का कहना है कि 2023 के अजनाला पुलिस स्टेशन हमले समेत कई गंभीर आपराधिक मामलों के कारण उनकी हिरासत जारी है और उन्हें अस्थायी राहत देना राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है। यही वजह है कि उनकी रिहाई संबंधी याचिकाओं को लगातार खारिज किया गया है।</div><div><br></div><div>इस आंदोलन का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अमृतपाल सिंह की रिहाई की मांग को तथाकथित "बंदी सिंह" के मुद्दे से जोड़कर व्यापक धार्मिक और भावनात्मक समर्थन जुटाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे आंदोलन को केवल एक व्यक्ति तक सीमित रखने की बजाय उसे व्यापक पंथिक विमर्श का रूप देने की रणनीति अपनाई गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे संगठन पारंपरिक सिख राजनीति पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है।</div><div><br></div><div>यही वह बिंदु है जहां वारिस पंजाब दे की विचारधारा और उसकी कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। लोकतंत्र में किसी भी नागरिक या संगठन को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार है, लेकिन यदि आंदोलन का स्वरूप लगातार टकराव, उग्र नारों, कानून व्यवस्था को चुनौती देने और युवाओं में व्यवस्था-विरोधी मानसिकता को बढ़ावा देने वाला बन जाए, तो यह केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का विषय नहीं रह जाता। ऐसी राजनीति समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा सकती है और पंजाब जैसे संवेदनशील राज्य को फिर से वैचारिक अस्थिरता की ओर धकेलने का खतरा पैदा कर सकती है।</div><div><br></div><div>राजनीतिक दृष्टि से भी यह आंदोलन कई संदेश देता है। एक ओर यह आम आदमी पार्टी सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश है ताकि किसी भी सख्त कार्रवाई को "सिख विरोधी" करार दिया जा सके, वहीं दूसरी ओर यह शिरोमणि अकाली दल के पारंपरिक पंथिक वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति भी माना जा रहा है। लगातार सड़क पर उतरकर संगठन अपने समर्थकों को यह संदेश देना चाहता है कि वह स्वयं को पंजाब की नई राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित करने की तैयारी में है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, पंजाब के मतदाताओं के सामने आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे भावनात्मक नारों और उग्र राजनीति की बजाय राज्य के विकास, रोजगार, शिक्षा, नशे की समस्या और कानून व्यवस्था जैसे वास्तविक मुद्दों को प्राथमिकता दें। लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन यदि चुनावी लाभ के लिए कट्टरपंथी सोच और टकराव की राजनीति को सामान्य बनाने की कोशिश की जाती है, तो उसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ सकता है। इसलिए पंजाब के लोगों को हर राजनीतिक नैरेटिव का गंभीरता से मूल्यांकन करना होगा और ऐसे किसी भी प्रयास से सतर्क रहना होगा जो समाज को बांटने या युवाओं को उग्र विचारधारा की ओर मोड़ने का माध्यम बन सकता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 13:31:33 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/waris-punjab-de-protest-amritpal-singh-release-punjab-election-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बांग्लादेश से व्यापार के लिए पुतिन ने भारतीय रुपए पर लगाया दाँव, ट्रंप के दूत ढाका दौड़े उलटे पाँव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/russia-bangladesh-indian-rupee-trade-sergio-gor-dhaka-visit-india-strategic-analysis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>रूस ने बांग्लादेश के साथ भारतीय रुपये में व्यापार करने का प्रस्ताव देकर दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में नई हलचल पैदा की तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत में अपने राजदूत सर्जियो गोर को तुरंत ढाका जाने का निर्देश दे डाला। इन दोनों घटनाक्रमों को साथ जोड़कर देखें तो तस्वीर साफ नजर आती है। एक ओर रूस अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए भारत की वित्तीय ताकत का सहारा लेकर बांग्लादेश को अपने साथ जोड़ना चाहता है, वहीं दूसरी ओर चीन और रूस के साथ ढाका की बढ़ती नजदीकियों ने वॉशिंगटन की चिंता बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि इसी वजह से ट्रंप प्रशासन ने अपने शीर्ष राजनयिक को ढाका भेजने का फैसला किया है। भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें रुपया, क्षेत्रीय कूटनीति और हिंद-प्रशांत की बदलती रणनीतिक राजनीति एक साथ जुड़ते दिखाई दे रहे हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि रूस ने बांग्लादेश को प्रस्ताव दिया है कि दोनों देशों के बीच होने वाला व्यापार भारतीय रुपये में निपटाया जाए। इसके साथ ही मॉस्को एक विशेष भुगतान तंत्र विकसित करने, ढाका में रूसी बैंक की शाखा खोलने तथा प्रत्यक्ष बैंकिंग संपर्क स्थापित करने की भी पहल कर रहा है। यह प्रस्ताव रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों से उत्पन्न वित्तीय संकट का सीधा जवाब है। प्रतिबंधों के कारण रूसी बैंक वैश्विक भुगतान प्रणाली से काफी हद तक कट गए हैं और इसी वजह से मॉस्को चीन, तुर्किये और भारत जैसे देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की नीति पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/which-new-bill-has-the-us-passed-identifying-india-and-china-as-main-culprits" target="_blank">तेरे लिए ले लेंगे, सब से दुश्मनी...भारत-चीन को 'मेन कल्प्रिट' बता US ने कौन सा बिल किया पास, रूस से दोस्ती की भारी कीमत चुकाएगा हिंदुस्तान?</a></h3><div>इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि रूस ने चीनी युआन की बजाय भारतीय रुपये को प्राथमिकता दी है। इससे पहले रूपपुर परमाणु ऊर्जा परियोजना के ऋण भुगतान के लिए युआन का विकल्प सामने आया था, लेकिन चीन और बांग्लादेश के बैंक अमेरिकी प्रतिबंधों के जोखिम के कारण भुगतान प्रक्रिया का हिस्सा बनने से हिचक गए। परिणामस्वरूप अरबों डॉलर की ऋण किस्तें अभी भी सोनाली बैंक में रूस के नाम खोले गए खाते में फंसी हुई हैं। ऐसे में भारतीय रुपया रूस के लिए अपेक्षाकृत अधिक व्यावहारिक और विश्वसनीय विकल्प बनकर उभरा है। यह भारत की वित्तीय विश्वसनीयता और रुपये के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय महत्व का भी संकेत है।</div><div><br></div><div>बताया जा रहा है कि सितंबर या अक्टूबर में होने वाली बांग्लादेश-रूस अंतर-सरकारी आयोग की बैठक में इस प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा होगी। हम आपको बता दें कि रूस केवल भुगतान व्यवस्था तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि रूस-बांग्लादेश बिजनेस काउंसिल, वस्त्र निर्यातकों का पंजीकरण, विशेष आर्थिक क्षेत्रों में निवेश, लघु एवं मध्यम उद्योगों के सहयोग तथा कृषि और खाद्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ाने का भी प्रस्ताव लेकर आया है। मॉस्को ने बांग्लादेश को अंतरराष्ट्रीय बाजार से 10 डॉलर प्रति टन कम कीमत पर लगभग 2.8 लाख टन यूरिया उर्वरक उपलब्ध कराने की पेशकश भी की है। इसके अलावा सूरजमुखी तेल, दालों और अन्य आवश्यक वस्तुओं के निर्यात में भी रुचि दिखाई है। दूसरी ओर ढाका प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, नवाचार, कृषि, तकनीकी शिक्षा, कौशल विकास, कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में सहयोग को अपनी प्राथमिकता बना रहा है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो सामरिक दृष्टि से यह घटनाक्रम भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यदि रूस और बांग्लादेश के बीच व्यापार भारतीय रुपये में होता है, तो यह दक्षिण एशिया में रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को नई गति देगा। इससे डॉलर आधारित भुगतान प्रणाली पर निर्भरता कम होगी और भारत एक क्षेत्रीय वित्तीय सेतु के रूप में उभर सकता है। यह भारत की उस दीर्घकालिक रणनीति के भी अनुकूल है जिसके तहत वह रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण और वैकल्पिक वित्तीय तंत्र के निर्माण पर जोर दे रहा है।</div><div><br></div><div>इसी पृष्ठभूमि में सर्जियो गोर का 30 जुलाई का ढाका दौरा विशेष महत्व प्राप्त करता है। सर्जियो गोर, जो दक्षिण एवं मध्य एशिया के लिए अमेरिकी विशेष दूत होने के साथ भारत में अमेरिका के राजदूत भी हैं, वह बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान और विदेश मंत्री खलीलुर रहमान से मुलाकात कर रहे हैं। यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब प्रधानमंत्री तारिक रहमान हाल ही में चीन की यात्रा कर चुके हैं और बीजिंग के साथ व्यापार, आर्थिक गलियारे तथा रक्षा सहयोग को नई गति देने पर सहमति बनी है। विशेष रूप से बांग्लादेश-म्यांमार आर्थिक गलियारे के चीनी प्रस्ताव ने वॉशिंगटन की चिंता बढ़ा दी है।</div><div><br></div><div>यही वह बिंदु है जहां पूरी तस्वीर स्पष्ट होती है। रूस आर्थिक मोर्चे पर बांग्लादेश को अपने साथ जोड़ना चाहता है, चीन अवसंरचना और सामरिक संपर्क के माध्यम से अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है, जबकि अमेरिका इस बढ़ती रूस-चीन धुरी को संतुलित करने के लिए सक्रिय हो गया है। सर्जियो गोर का ढाका दौरा इसी रणनीतिक प्रतिक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है। ट्रंप प्रशासन यह समझता है कि यदि बांग्लादेश रूस और चीन के साथ गहरे आर्थिक एवं सामरिक रिश्ते विकसित करता है, तो बंगाल की खाड़ी से लेकर हिंद-प्रशांत तक शक्ति संतुलन बदल सकता है। इसलिए वॉशिंगटन अब ढाका की विदेश नीति की प्राथमिकताओं को प्रत्यक्ष रूप से समझना और उसे अपने प्रभाव क्षेत्र में बनाए रखना चाहता है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम अवसर इसलिए है कि रूस भारतीय रुपये को क्षेत्रीय भुगतान की धुरी बनाना चाहता है और बांग्लादेश पहले से ही भारत के साथ कुछ व्यापार रुपये में करता है। साथ ही भारत के लिए यह घटनाक्रम चुनौती भी है क्योंकि यदि चीन का आर्थिक गलियारा और रूस की वित्तीय व्यवस्था समानांतर रूप से मजबूत होती है, तो दक्षिण एशिया की भू-राजनीति पहले से कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएगी। भारत को ऐसे समय संतुलित कूटनीति, मजबूत आर्थिक संपर्क और क्षेत्रीय नेतृत्व के माध्यम से अपनी भूमिका को और सुदृढ़ करना होगा।</div><div><br></div><div>बहरहाल, स्पष्ट है कि यह केवल व्यापारिक प्रस्ताव या एक राजनयिक यात्रा की कहानी नहीं है। यह उस नए एशियाई शक्ति-संतुलन का संकेत है जिसमें डॉलर की जगह स्थानीय मुद्राएं, प्रतिबंधों की जगह वैकल्पिक वित्तीय तंत्र और पारंपरिक गठबंधनों की जगह बहुध्रुवीय समीकरण तेजी से आकार ले रहे हैं। बांग्लादेश इस नई भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता दिख रहा है और भारत उसकी धुरी बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 18:29:09 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/russia-bangladesh-indian-rupee-trade-sergio-gor-dhaka-visit-india-strategic-analysis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[धुंधलाती गुरु-गरिमा को पुनःस्थापित करने का महापर्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/a-grand-occasion-to-restore-the-waning-dignity-of-the-guru]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय संस्कृति का प्राण यदि किसी एक तत्व में समाहित है, तो वह है-गुरु। गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली चेतना है। वह मनुष्य के भीतर सोई हुई संभावनाओं को जगाता है, उसके व्यक्तित्व को संस्कारित करता है और उसे आत्मोन्नति के मार्ग पर अग्रसर करता है। इसीलिए भारतीय मनीषा ने गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना है। प्रसिद्ध वचन-‘गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः’-केवल स्तुति नहीं, बल्कि गुरु की उस महत्ता का उद्घोष है जिसके बिना जीवन का कोई भी आयाम पूर्ण नहीं हो सकता। आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाने वाला गुरु पूर्णिमा का पर्व केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, कृतज्ञता और जीवन-मूल्यों के पुनर्जागरण का अवसर है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि धन, पद या प्रसिद्धि नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन है। जिसने जीवन को सही दिशा दे दी, उसने सब कुछ दे दिया।</div><div><br></div><div>भारतीय परंपरा में इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा कहा जाता है। वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, महाभारत की रचना की और भारतीय ज्ञान-परंपरा को सुव्यवस्थित स्वरूप दिया। उन्होंने केवल ग्रंथ नहीं लिखे, बल्कि मानवता को विचारों की ऐसी ज्योति दी जो सहस्राब्दियों से विश्व का मार्गदर्शन कर रही है। इसीलिए गुरु पूर्णिमा ज्ञान और जीवन-दृष्टि के प्रति कृतज्ञता का पर्व है। गुरु का अर्थ केवल शिक्षक नहीं है। शिक्षक सूचना देता है, गुरु चेतना जगाता है। शिक्षक बुद्धि को विकसित करता है, गुरु व्यक्तित्व को प्रकाशित करता है। शिक्षक व्यवसाय हो सकता है, लेकिन गुरु सदैव तपस्या होता है। गुरु वह है जो मनुष्य के भीतर के अंधकार को हटाकर आत्मविश्वास, विवेक और करुणा का दीप प्रज्वलित करे। गुरु का स्पर्श केवल मस्तिष्क तक नहीं पहुँचता, वह आत्मा तक उतरता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/guru-purnima-the-saffron-flag-hindutva-and-the-unbroken-consciousness-of-nation-building" target="_blank">गुरु पूर्णिमा: भगवा ध्वज, हिंदुत्व और राष्ट्र निर्माण की अखंड चेतना</a></h3><div>मेरे जीवन में गुरु का स्वरूप केवल एक पूज्य व्यक्तित्व का नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक मोड़ पर प्रकाश-स्तंभ का रहा है। परम पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री तुलसी ने अपने प्रत्यक्ष सान्निध्य, प्रेरणाओं और जीवन-दृष्टि से मुझे बार-बार यह अनुभव कराया कि गुरु केवल ज्ञान देने वाले नहीं होते, वे जीवन के प्रत्येक अंधकार में दिशा दिखाने वाले दिव्य पथ-प्रदर्शक होते हैं। अनेक ऐसे अवसर आए, जब परिस्थितियां अत्यंत जटिल थीं, समाधान का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता था, लेकिन गुरु का स्मरण, उनकी वाणी और उनके द्वारा प्रदत्त संस्कारों ने सहज ही नई राह खोल दी। कई बार उनके प्रत्यक्ष मार्गदर्शन ने ऐसी समस्याओं का समाधान किया, जो मानवीय दृष्टि से असंभव प्रतीत होती थीं। मैंने अनुभव किया है कि गुरु केवल वर्तमान का संबल नहीं बनते, वे भविष्य का निर्माण भी करते हैं। वे केवल सांसारिक जीवन को सफल बनाने की प्रेरणा नहीं देते, बल्कि आत्मा की अनंत यात्रा को भी आलोकित करते हैं। मृत्यु के पार के कल्याण का मार्ग भी गुरु ही प्रशस्त करते हैं। ऐसे अनुभव शब्दों में पूर्णतः व्यक्त नहीं किए जा सकते, क्योंकि वे तर्क से अधिक श्रद्धा, समर्पण और आत्मानुभूति के विषय हैं। आचार्य श्री तुलसी के प्रति मेरी अटूट निष्ठा का आधार कोई चमत्कार नहीं, बल्कि उनके जीवन की तपश्चर्या, दूरदर्शिता, करुणा, आत्मीयता और वह दिव्य गुरु-शक्ति है, जिसने मेरे जीवन को बार-बार नई दिशा, नई चेतना और नई ऊँचाइयां प्रदान की हैं।</div><div><br></div><div>आज दुनिया अभूतपूर्व वैज्ञानिक उपलब्धियों के दौर से गुजर रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल क्रांति और तकनीकी विकास ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन क्या मनुष्य पहले से अधिक शांत, संतुलित और संवेदनशील हुआ है? उत्तर सहज नहीं है। ज्ञान बढ़ा है, परंतु विवेक घटा है। सूचना का विस्फोट हुआ है, लेकिन आत्मबोध का अभाव गहराया है। तकनीक ने गति दी है, पर दिशा देने वाला गुरु दुर्लभ होता जा रहा है। यही आधुनिक समय का सबसे बड़ा संकट है। आज शिक्षा संस्थान डिग्रियां दे रहे हैं, लेकिन जीवन जीने की कला नहीं सिखा पा रहे। प्रतियोगिता बढ़ रही है, पर सहयोग घट रहा है। सफलता की दौड़ तेज हुई है, पर संतोष पीछे छूट गया है। ऐसे समय में गुरु पूर्णिमा केवल परंपरा का निर्वाह नहीं, बल्कि जीवन की दिशा सुधारने का राष्ट्रीय और वैश्विक अभियान बनना चाहिए।</div><div><br></div><div>गुरु का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि वह केवल सफलता नहीं सिखाता, सार्थकता सिखाता है। वह केवल लक्ष्य तक पहुँचने की विधि नहीं बताता, बल्कि यह भी बताता है कि लक्ष्य कैसा होना चाहिए। गुरु मनुष्य को बाहर की दुनिया जीतने से पहले अपने भीतर की दुनिया को जीतना सिखाता है। आत्मसंयम, विनम्रता, सेवा, करुणा और सत्यनिष्ठा जैसे गुण गुरु के सान्निध्य में ही विकसित होते हैं। भारतीय इतिहास गुरु-शिष्य परंपरा के अनुपम उदाहरणों से भरा पड़ा है। श्रीराम ने वशिष्ठ और विश्वामित्र से मर्यादा सीखी। श्रीकृष्ण ने संदीपनि से शिक्षा ग्रहण की और स्वयं अर्जुन के जीवन में गुरु बनकर उसे कर्मयोग का संदेश दिया। भगवान महावीर के गणधर गौतम, भगवान बुद्ध के आनंद और गुरु नानक के उत्तराधिकारी गुरु अंगद इस बात के प्रमाण हैं कि सच्चा गुरु केवल ज्ञान नहीं देता, वह नया व्यक्तित्व गढ़ता है। लेकिन आज गुरु की गरिमा अनेक कारणों से धूमिल हुई है। कुछ कथित गुरुओं ने अध्यात्म को प्रदर्शन, चमत्कार और व्यापार का माध्यम बना दिया है। श्रद्धा का स्थान प्रचार ने ले लिया है। आध्यात्मिकता की जगह बाजारवाद ने प्रवेश कर लिया है। ऐसे वातावरण में विवेकपूर्वक गुरु का चयन अत्यंत आवश्यक है। संतों ने ठीक ही कहा है-‘पानी पीजै छान के, गुरु कीजै जान के।’ गुरु वह नहीं जो भीड़ जुटाए, बल्कि वह है जो व्यक्ति के भीतर चरित्र, साहस और आत्मविश्वास का निर्माण करे।</div><div><br></div><div>सच्चा गुरु कभी अपने व्यक्तित्व का प्रचार नहीं करता। उसका जीवन ही उसका संदेश होता है। वह अपने अनुयायियों को स्वयं पर आश्रित नहीं बनाता, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाता है। वह अंधभक्ति नहीं, आत्मजागरण सिखाता है। उसका मौन भी शिक्षा होता है और उसका आचरण सबसे बड़ा उपदेश। आज आवश्यकता केवल अच्छे गुरुओं की नहीं, बल्कि अच्छे शिष्यों की भी है। गुरु तभी प्रभावी होता है जब शिष्य में विनम्रता, जिज्ञासा और ग्रहणशीलता हो। अहंकार से भरा हुआ पात्र ज्ञान को धारण नहीं कर सकता। इसलिए गुरु पूर्णिमा हमें केवल गुरु का सम्मान करना नहीं सिखाती, बल्कि अपने भीतर योग्य शिष्य बनने की प्रेरणा भी देती है।</div><div><br></div><div>यदि हम विश्व को अधिक शांतिपूर्ण, मानवीय और संतुलित बनाना चाहते हैं, तो उसके लिए केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं होगा। नई विश्व-व्यवस्था का निर्माण आध्यात्मिक मूल्यों पर ही संभव है। विज्ञान हमें साधन दे सकता है, लेकिन उनका सदुपयोग कैसे हो, यह गुरु ही सिखा सकता है। राजनीति व्यवस्था बना सकती है, पर चरित्र का निर्माण गुरु ही करता है। कानून अपराध रोक सकता है, लेकिन अपराध की प्रवृत्ति को समाप्त करने का कार्य संस्कार ही कर सकते हैं और संस्कारों का सबसे बड़ा स्रोत गुरु है। इक्कीसवीं सदी में मानवता के सामने हिंसा, आतंकवाद, पर्यावरण संकट, मानसिक तनाव, पारिवारिक विघटन और नैतिक पतन जैसी अनेक चुनौतियां हैं। इन समस्याओं का समाधान केवल तकनीकी उपायों से संभव नहीं है। इनके मूल में मनुष्य की चेतना है, और चेतना का परिष्कार गुरु ही कर सकता है। इसलिए गुरु केवल व्यक्ति का निर्माता नहीं, बल्कि समाज और विश्व का भी निर्माता है। गुरु पूर्णिमा का वास्तविक संदेश यही है कि हम गुरु को केवल पूजें नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारें। उनके बताए मार्ग पर चलें। सेवा को जीवन का धर्म, संयम को शक्ति, सत्य को आधार और करुणा को व्यवहार बनाएं। यही सच्ची गुरु-भक्ति है। गुरु पूर्णिमा हमें यही संकल्प लेने की प्रेरणा देती है कि हम अपने जीवन में ऐसे गुरु-तत्त्व को स्थान देंगे जो हमें केवल सफल नहीं, बल्कि श्रेष्ठ मनुष्य बनाए। नई विश्व-संरचना का आधार यदि किसी एक शक्ति में निहित है, तो वह गुरु की चेतना, गुरु के संस्कार और गुरु के आदर्श हैं। जब गुरु की गरिमा पुनः शिखर पर प्रतिष्ठित होगी, तभी मानवता का भविष्य भी प्रकाशमय, संतुलित और आदर्श बन सकेगा।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 11:18:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/a-grand-occasion-to-restore-the-waning-dignity-of-the-guru</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[संदर्भ धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र- छात्रों से संवाद की ओर बढ़ते कदम  ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/dharmendra-pradhan-resignation-a-step-towards-dialogue-with-students]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश के प्रधानमत्री ने देश की अंदरूनी शान्ति के लिए या आगे किसी बड़े लक्ष्य को साधने के लिए ऐसी फॉरेन फंडेड, फॉरेन लेंग्वेज्ड, फॉरेन फीडेड, फॉरेन माइंडेड और निर्लज्ज शक्तियों के आगे समर्पण कर दिया है। स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं का निर्वहन करते हुए और समय की संवेदनशीलता को दृष्टिगत रखते हुए उनका यह कदम बड़प्पन से परिपूर्ण कदम तो है किंतु, दीर्घकालिक दृष्टि से है तो यह गलत ही। इसके परिणामों के प्रति देश को अभी से सचेत होना होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>छात्रशक्ति की बात रही तो सर संघचालक जी मोहन भागवत जी ने स्पष्ट परामर्श (स्वयंसेवक के लिए निर्देश) दिया है कि हमें बच्चों से संवाद बढ़ाना ही होगा। देश किशोरों, युवाओं, विद्यार्थियों से संवाद की यह प्रक्रिया अब बढ़ेगी भी और निश्चित ही सकारात्मक परिणाम भी देगी।&nbsp; नरेंद्र मोदी जी द्वारा कृषि कानून वापिस लेते समय मैंने एक आलेख में लिखा था जनमत के दबाव में देश के राजा द्वारा अपने निर्णय बदलना राजा के जीवंत, विवेक, मर्म व उत्तरदायित्व भाव का प्रमाण है। प्रधानमंत्री जी लोकभीरु (जनता से डरने वाले) हैं तो यह शुभ-लक्षण है।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>यह भी सही है कि धर्मेन्द्र प्रधान जी का त्यागपत्र कराना ही था तो UGC के समय ही करा लेना था। वह सही समय था। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का यह समय ठीक नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><div>आद. प्रधानमंत्री जी ने धर्मेंद्र जी प्रधान से त्यागपत्र लेकर किसी शेर की भांति एक कदम पीछे लिया है तो किसी दीर्घकालिक एजेंडे की रक्षा और पूर्ति के लिए ही किया होगा। निश्चित ही उन्होंने संघशक्ति की प्रेरणा से यह कदम राष्ट्रहित में ही उठाया होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>इंटरनेट पर यहाँ-वहाँ बिखरे पड़े इस आंदोलन के सैकड़ों वीडियो देखिए, फिर सोचिए। फिर अपने आसपास के छात्रों को अवश्य देखिए। अपने नगर के सैकड़ों छोटे-बड़े सभी कालेज के विद्यार्थियों का बारीकी से चुपचाप परीक्षण और अध्ययन कीजिए। इसके बाद सोचिए और बताइये कि इस वीडियो में जो हैं, क्या वे विद्यार्थी हैं? और यदि हैं भी तो क्या ऐसे विद्यार्थियों के दबाव में देश की सत्ता को आना चाहिए? मोदी जी हों या कोई किसी अन्य दल के कोई और प्रधानमंत्री हों, उसके विषय में ऐसी भाषा बोलकर जनता को भड़काना क्या उचित है? विशेषतः इन कथित छात्राओं को देखकर बताएँ आप।&nbsp;</div><div><br></div><div>ये भी कहता हूँ कि, हैं तो ये हमारी देशज संतान ही, किंतु हमारे बच्चों को किसने इतना भड़काया और बहकाया है? कौन है जो हमारी इस मासूम छात्रशक्ति की लज्जा-लिहाज पर डाका डाल गया है? इनके सारे संस्कार अपहृत हो गए और हमें पता भी न चला। जॉर्ज सोरोस की सोच से बढ़ा ये आंदोलन है या अश्लीलता और देश विभाजन के दुष्कृत्य का नंगा नाच है?&nbsp; &nbsp;</div><div>&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div>नरेंद्र मोदी जी का ये सरेंडर, आरएसएस और इसके प्रचारक मोदी के लिए कुछ भी चिंताजनक नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ये महाशय मोदी और ये संघ, अपना झोला उठाकर कहीं भी, कभी भी चल पड़ेंगे। सोचना तो हमें है कि हम और कोई और ऐसा प्रधानमंत्री और ऐसी संघशक्ति कहाँ से लायेंगे जो हमें बारह वर्षों तक तमाम दुर्लक्ष्यों जैसे अद्वितीय आर्थिक विकास, गगन-पाताल को भेदने वाला इन्फ़्रास्ट्रक्चर, मंगल मिशन, चंद्रमा मिशन, राममंदिर, अनुच्छेद 370, कश्मीर में शांति, असम-बंगाल के रास्ते बांग्लादेशी घुसपैठियों पर रोक, विदेशों में हमारा बड़ा सा बार्गेनिंग पॉवर, पाकिस्तान में भीतर तक घुसकर एयर स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर आदि को साधकर भी दंगामुक्त शासन दे पायेगी? संघ परिवार के अतिरिक्त कोई भी पार्टी इनमें से एक भी काम करती तो देश भर में दंगे होते। खून की नदियाँ बहती। ऐतिहासिक मार-काट होती। कदाचित् (शायद) गृहयुद्ध भी हो जाता। शाहीन बाग से लेकर ये जंतर-मंतर तक, ये सब भारत में गृहयुद्ध भड़काने की तैयारी ही तो है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>याद है न? इन्हीं लोगो के शब्द हैं - “धारा 370 को छू कर देख लो, खून की नदियाँ बह जाएँगी” और ये पाकिस्तानी भाषा भी याद होगी आपको - “पंद्रह मिनिट के लिए देश की फौज और पुलिस को रोक लेना हम इस देश में तख़्ता पलट देंगे” और यह भी कि “मंदिर.. तारीख नहीं बताएँगे”। ये सब इस संघशक्ति ने किया भी और खून की नदियाँ तो छोड़िए साहब; इन्होंने देश में परिंदे को पर भी न मारने दिए हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>संघशक्ति से मोदी ने स्वयं को परिश्रमपूर्वक सिद्ध किया है, इस देश की जनता के समक्ष। 75 की आयु में अट्ठारह घंटे काम कर रहा ये बिना भगवे का सन्यासी हमारी अंतर्राष्ट्रीय पूंजी है। इन्होंने इस देश से बाबर और औरंगजेब का नाम मिटाया है और अरब में जाकर मदिरों के शिलान्यास से लेकर प्राणप्रतिष्ठा तक के दसियों आयोजन करवा दिए हैं। अरेबियन मुस्लिम योग-ध्यान के पीछे पागल हुए हैं तो इसी भारत सरकार की कलाकारी से ही हुए हैं।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>ये आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के विरोध में या फूलफ़्रूफ नीट परीक्षाओं के लिए नहीं था। यदि होता तो परीक्षाओं पर विश्व का सर्वाधिक सटीक और प्रभावी कानून आने के बाद ये आंदोलनकारी शांति से अलग हो जाते। ये आंदोलन उस संघ शक्ति के विरोध में है जो इस देश को कॉमन सिविल कोड की देने की तैयारी में लगी है, जो हमें नागरिकता रजिस्टर जैसा बड़ा कवच (सिस्टम) देनें की तैयारी कर रही है, जो हमें कभी न कभी हमारा मुकुटमणि पाक आकूपाइड कश्मीर भी वापिस दिलवाने वाली है।&nbsp;</div><div><br></div><div>हमें यह भी सोचना चाहिए कि आखिर इन&nbsp; फॉरेन पॉवर सेंटर्स को नरेंद्र मोदी से क्या कष्ट है और क्यों है?&nbsp;</div><div><br></div><div>एक “शक्तिशाली भारत” के विरोध में खड़े है ये सब, और हमें लगता है कि ये प्रधानमंत्री का विरोध है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>फिर कहता हूँ, ये सब वीडियो देखना, इस जैसे सैकड़ों वीडियो इंटरनेट पर यहाँ-वहाँ घूम रहें हैं उन्हें भी देखना। दिल्ली छात्र आंदोलन के एआई जनरेटेड फोटो वीडियो आदि भी देखना। जनता को भड़काने और भुजाएँ फड़क जाएँ ऐसे फेक/नकली वीडियो/फोटो किस लक्ष्य से बने हैं? कौन है जो ऐसी पिशाच बुद्धि से ये सब करा रहा है?&nbsp; &nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/dharmendra-pradhan-hero-welcome-in-parliament-after-neet-paper-leak-resignation" target="_blank">धर्मेंद्र प्रधान की सिर्फ मंत्री पद की कुर्सी गयी, राजनीतिक कद बरकरार है</a></h3><div>सनद रहे मोदी तो बहाना है,&nbsp; इनका लक्ष्य समूचे देश को पटिए पर लाना है और देश में गृहयुद्ध फैलाना है।&nbsp;</div><div><br></div><div>धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र कोई कीमत नहीं है। इसकी एक बड़ी कीमत हमने चुका दी है और संभवतः आगे इससे भी बड़ी कीमतें हमें चुकानी पड़ेगी। समूचे देश को सावधान हो जाने का समय आ गया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के सही गलत का प्रश्न नहीं उठा रहा हूं। इस त्यागपत्र के समय, परिस्थिति, पृष्ठभूमि, निर्लज्ज प्रकार की हठधर्मिता पर प्रश्न है।&nbsp;</div><div><br></div><div>देश के मान. प्रधानमंत्री ने यदि देश की अंदरूनी शान्ति के लिए या आगे किसी बड़े लक्ष्य को साधने के लिए ऐसी फॉरेन फंडेड, फॉरेन लेंग्वेज्ड, फॉरेन फीडेड, फॉरेन माइंडेड और निर्लज्ज शक्तियों के आगे हथियार डाल दिए हैं। रही छात्रशक्ति की बात तो संघ प्रमुख ने स्पष्ट परामर्श (स्वयंसेवक के लिए निर्देश) दिया है कि हमें बच्चों से संवाद बढ़ाना ही होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>मोदी जी द्वारा कृषि क़ानून वापिस लेते समय मैंने एक आलेख में लिखा था जनमत के दबाव में देश के राजा द्वारा अपने निर्णय बदलना राजा के जीवंत, विवेक, मर्म व उत्तरदायित्व भाव का प्रमाण है। प्रधानमंत्री जी लोकभीरु (जनता से डरने वाले) हैं तो यह शुभ-लक्षण है। यह भी सही है कि धर्मेन्द्र प्रधान जी का त्यागपत्र कराना ही था तो UGC के समय ही करा लेना था। वह सही समय था। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का यह समय ठीक नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><div>आद. प्रधानमंत्री जी ने धर्मेंद्र जी प्रधान त्यागपत्र लेकर किसी शेर की भांति एक कदम पीछे लिया है तो किसी दीर्घकालिक एजेंडे की रक्षा और पूर्ति के लिए ही किया होगा। निश्चित ही उन्होंने संघशक्ति की प्रेरणा से यह कदम राष्ट्रहित में ही उठाया होगा।</div><div>&nbsp;</div><div>इस पोस्ट के वीडियो देखिये। इंटरनेट पर यहाँ-वहाँ बिखरे सैकड़ो वीडियो देखिये, फिर सोचिये।</div><div><br></div><div>फिर अपने आसपास के छात्रों को अवश्य देखिए। अपने नगर के सैकड़ों छोटे-बड़े सभी कालेज के विद्यार्थियों का बारीकी से चुपचाप परीक्षण और अध्ययन कीजिए। इसके बाद सोचिये और बताइये कि इस वीडियो में जो हैं क्या वे विद्यार्थी हैं? और यदि हैं भी तो क्या इन विद्यार्थियों के दबाव में देश की सत्ता को आना चाहिए? मोदी जी हों या कोई किसी अन्य दल के कोई और प्रधानमंत्री हों, उसके विषय में ऐसी भाषा बोलकर जानता को भड़काना क्या उचित है? विशेषतः इन कथित छात्राओं को देखकर बताएँ आप।&nbsp;</div><div><br></div><div>ये भी कहता हूँ कि, है तो ये हमारी देशज संतान ही, किंतु इन्हें किसने इतना भड़काया और बहकाया है? कौन है जो हमारी इस छात्रशक्ति की लज्जा-लिहाज पर डाका डाल गया है? जॉर्ज सोरोस की सोच से बढ़ा ये आंदोलन है या अश्लीलता का नंगा नाच है?</div><div>&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div>नरेंद्र मोदी जी का ये सरेंडर आरएसएस और इसके प्रचारक मोदी के लिए कुछ भी चिंताजनक नहीं है। ये महाशय मोदी और ये संघ, अपना झोला उठाकर कहीं भी, कभी भी चल पड़ेंगे। सोचना तो हमें है कि हम और कोई और ऐसा प्रधानमंत्री और ऐसी संघशक्ति कहाँ से लायेंगे जो हमें बारह वर्षों तक तमाम दुर्लक्ष्यों जैसे अद्वितीय आर्थिक विकास, गगन-पाताल को भेदने वाला इन्फ़्रास्ट्रक्चर, मंगल मिशन, चंद्रमा मिशन, राममंदिर, अनुच्छेद 370, कश्मीर में शांति, असम-बंगाल के रास्ते बांग्लादेशी घुसपैठियों पर रोक, विदेशों में हमारा बड़ा सा बार्गेनिंग पॉवर, पाकिस्तान में भीतर तक घुसकर एयर स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर आदि को साधकर भी दंगामुक्त शासन दे पायेगी? संघ परिवार के अतिरिक्त कोई भी पार्टी इनमें से एक भी काम करती तो देश भर में दंगे होते। खून की नदियाँ बहती। ऐतिहासिक मार-काट होती। कदाचित् (शायद) गृहयुद्ध भी हो जाता। #खयाल_आया कि शाहीन बाग से लेकर ये जंतर-मंतर तक, सब भारत में गृहयुद्ध भड़काने की तैयारी ही तो है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>याद है न? इन्हीं लोगो के शब्द हैं - “धारा 370 को छू कर देख लो, खून की नदियाँ बह जाएँगी” और ये पाकिस्तानी भाषा भी याद होगी आपको - “पंद्रह मिनिट के लिए देश की फौज और पुलिस को रोक लेना हम इस देश में तख़्ता पलट देंगे” और यह भी कि “मंदिर.. तारीख नहीं बताएँगे”। ये सब इस संघशक्ति ने किया भी और खून की नदियाँ तो छोड़िए साहब; इन्होंने देश में परिंदे को पर भी न मारने दिए हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>संघशक्ति से मोदी ने स्वयं को परिश्रमपूर्वक सिद्ध किया है, इस देश की जनता के समक्ष। 75 की आयु में अट्ठारह घंटे काम कर रहा ये बिना भगवे का सन्यासी हमारी अंतर्राष्ट्रीय पूंजी है। इसने इस देश से बाबर और औरंगजेब का नाम मिटाया है और अरब में जाकर मदिरों के शिलान्यास से लेकर प्राणप्रतिष्ठा तक के दसियों आयोजन करवा दिए हैं। अरेबियन मुस्लिम योग-ध्यान के पीछे पागल हुए हैं तो इसी भारत सरकार की कलाकारी से ही हुए हैं।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>ये आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के विरोध में या फूलफ़्रूफ नीट परीक्षाओं के लिए नहीं था। यदि होता तो नीट पर कानून आने के बाद ये शांति से अलग हो जाते। ये आंदोलन उस संघ शक्ति के विरोध में है जो इस देश को कॉमन सिविल कोड की देने की तैयारी में लगी है, जो हमें नागरिकता रजिस्टर जैसा बड़ा कवच (सिस्टम) देनें की तैयारी कर रही है, जो हमें कभी न कभी हमारा मुकुटमणि पाक आकूपाइड कश्मीर भी वापिस दिलवाने वाली है।&nbsp;</div><div><br></div><div>हमें यह भी सोचना चाहिए कि आखिर इन&nbsp; फॉरेन पॉवर सेंटर्स को नरेंद्र मोदी से क्या कष्ट है और क्यों है?&nbsp;</div><div><br></div><div>एक “शक्तिशाली भारत” के विरोध में खड़े है ये सब और हमें लगता है कि ये नरेंद्र मोदी का विरोध है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>फिर कहता हूँ, ये सब वीडियो देखना, इस जैसे सैकड़ों वीडियो इंटरनेट पर यहाँ-वहाँ घूम रहें हैं उन्हें भी देखना। दिल्ली छात्र आंदोलन के एआई जनरेटेड फोटो वीडियो आदि भी देखना। जनता को भड़काने और भुजाएँ फड़क जाएँ ऐसे फेक/नकली वीडियो/फोटो किस लक्ष्य से बने हैं? कौन है जो ऐसी पिशाच बुद्धि से ये सब करा रहा है?&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>#सनद_रहे मोदी तो बहाना है।&nbsp; इनका लक्ष्य समूचे देश को पटिए पर लाना है।</div><div><br></div><div>- डॉ. प्रवीण दाताराम&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 17:43:09 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/dharmendra-pradhan-resignation-a-step-towards-dialogue-with-students</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[परिवार परम्परा एवं बिखरते रिश्ते पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/supreme-court-concern-over-family-traditions-and-disintegrating-relationships]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>परिवार केवल एक छत के नीचे रहने वाले लोगों का समूह नहीं, बल्कि विश्वास, त्याग, धैर्य और संस्कारों का जीवंत विद्यालय है। जब इस विद्यालय की नींव कमजोर होने लगती है तो उसका प्रभाव केवल एक घर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा समाज उसकी कीमत चुकाता है। देश के बहुचर्चित सोनम रघुवंशी ‘हनीमून मर्डर’ प्रकरण की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की पीठ द्वारा व्यक्त की गई चिंता केवल एक अपराध पर की गई टिप्पणी नहीं थी, बल्कि भारतीय समाज के बदलते चरित्र का गहन सामाजिक विश्लेषण थी। न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले ने जिस पीड़ा के साथ कहा कि संयुक्त परिवार लोगों को धैर्य, संयम, सहनशीलता और समायोजन सिखाते थे, वहीं आज एकल परिवारों में अवसाद, असहिष्णुता और संबंधों का विघटन बढ़ रहा है, वह हमारे समय का कटु सत्य है।</div><div><br></div><div>माता-पिता और संतान, भाई-बहन, दादा-दादी और पोते-पोतियों के बीच भी भावनात्मक दूरी लगातार बढ़ रही है, यह परिवार परम्परा एवं रिश्तों में बढ़़ती दूरी अब पति-पत्नी के बीच भी बड़ी दरारें डालने लगी है। रिश्तों का खोखलापन इतना बढ़ गया है कि अपनी ही पत्नी या पति की हत्या करने में भी तनिक संकोच नहीं रहा। ऐसे घटनाएं बार-बार देखने को मिल रही है।&nbsp; घर बड़े हो गए हैं, लेकिन दिल छोटे होते जा रहे हैं। सुविधाएं बढ़ी हैं, परंतु संवेदनाएं सिकुड़ती जा रही हैं। संवाद कम हो गए हैं और स्क्रीन का समय बढ़ गया है। परिणामस्वरूप रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिकता में बदलते जा रहे हैं। हाल के वर्षों में विवाह से पहले अथवा विवाह के कुछ ही दिनों बाद हुई इन नृशंस हत्याओं ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के पतन का संकेत है। जिन परिवारों में धन, प्रतिष्ठा और भौतिक सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, वहीं जीवन का सबसे बड़ा अभाव विश्वास और संतोष का था। संत कबीर का यह वचन आज पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है- ‘जब आए संतोष धन, सब धन धूरि समान।’ भौतिक संपन्नता कभी भी मानसिक शांति और रिश्तों की ऊष्मा नहीं खरीद सकती।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/muslim-community-should-set-precedent-by-offering-bhojshala-gyanvapi-sites-as-gesture-of-goodwill" target="_blank">भोजशाला और ज्ञानवापी का नजराना देकर नजीर पेश करे मुस्लिम समाज</a></h3><div>भारतीय संस्कृति ने परिवार को केवल सामाजिक संस्था नहीं माना, बल्कि धर्म, संस्कृति और जीवन-मूल्यों का प्रथम विद्यालय माना है। संयुक्त परिवार में दादा-दादी केवल बुजुर्ग नहीं होते थे, वे अनुभवों के विश्वविद्यालय होते थे। नाना-नानी केवल रिश्तेदार नहीं, बल्कि संस्कारों के संरक्षक होते थे। बच्चों को कहानियों के माध्यम से धैर्य, करुणा, क्षमा, संयम और त्याग का पाठ पढ़ाया जाता था। घर का हर सदस्य दूसरे के दुःख का सहभागी होता था। इसलिए किसी एक व्यक्ति का तनाव पूरे परिवार की शक्ति से हल्का हो जाता था। आज यह सुरक्षा-कवच तेजी से टूट रहा है। महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ में पति-पत्नी दोनों कार्यस्थल पर व्यस्त हैं। बच्चों का बचपन मोबाइल, टैबलेट और घरेलू सहायिकाओं के भरोसे बीत रहा है। जब बच्चा रोता है तो उसे गोद नहीं, मोबाइल थमा दिया जाता है। यह सुविधा का समाधान नहीं, संवेदनाओं का विस्थापन है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि ‘भावनाओं का विकल्प गैजेट्स नहीं हो सकते’, हमारे समय की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक चेतावनी है।</div><div><br></div><div>डिजिटल क्रांति ने जीवन को सरल अवश्य बनाया है, लेकिन यदि तकनीक मनुष्य पर हावी हो जाए तो वह संबंधों की सबसे बड़ी शत्रु बन जाती है। आज परिवार एक ही कमरे में बैठकर भी अलग-अलग दुनिया में खोया रहता है। भोजन की मेज पर संवाद समाप्त हो गया है। आंखों में आंखें डालकर बातें करने की परंपरा लुप्त होती जा रही है। इससे भावनात्मक जुड़ाव कमजोर पड़ रहा है और अकेलापन बढ़ रहा है। इस पूरे संकट की जड़ केवल आधुनिकता नहीं है। समस्या आधुनिकता के असंतुलित और अंधानुकरण में है। पश्चिम से हमने तकनीक तो अपनाई, लेकिन उसकी सामाजिक चुनौतियों से सीख नहीं ली। अब पति और पत्नी के बीच तीसरा आना आम बात हो गयी है, और यही तीसरा समस्या की जड़ है। इस तरह के अवैध रिश्तों ने त्रासद घटनाओं को जन्म दिया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारतीय परिवार व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता थी-‘मैं’ से पहले ‘हम’ का भाव। आज ‘हम’ की जगह ‘मैं’ ने ले ली है। अधिकारों की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन कर्तव्यों का स्मरण बहुत कम होता है। रिश्तों में बढ़ता अहंकार भी विघटन का बड़ा कारण है। पति-पत्नी दोनों अपने-अपने तर्कों को अंतिम सत्य मानने लगे हैं। कोई झुकना नहीं चाहता। जबकि भारतीय परंपरा ने सिखाया था कि झुकना हार नहीं, बल्कि संबंधों को बचाने की सबसे बड़ी जीत है। क्षमा और संवाद हर टूटते रिश्ते की पहली दवा हैं, किंतु आज संवाद की जगह आरोप और क्षमा की जगह प्रतिशोध ने ले ली है। यह भी विचारणीय है कि आज विवाह को जीवनभर का संस्कार नहीं, बल्कि सुविधानुसार निभाया जाने वाला अनुबंध समझा जाने लगा है। यही कारण है कि छोटी-छोटी असहमतियां भी अदालतों तक पहुंच रही हैं। न्यायालय न्याय दे सकता है, लेकिन प्रेम नहीं लौटा सकता। कानून अधिकारों का संरक्षण कर सकता है, लेकिन आत्मीयता का निर्माण नहीं कर सकता। इसलिए पारिवारिक समस्याओं का स्थायी समाधान न्यायालयों में नहीं, परिवारों के भीतर ही खोजा जाना चाहिए।</div><br><div>भारत आज विश्वगुरु बनने का स्वप्न देख रहा है। आर्थिक प्रगति, वैज्ञानिक उपलब्धियां, डिजिटल नवाचार और वैश्विक नेतृत्व निश्चित रूप से गर्व के विषय हैं। लेकिन यदि हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक शक्ति ‘संयुक्त परिवार’ कमजोर हो जाएगी, तो यह प्रगति अधूरी रह जाएगी। विश्व भारत से केवल आर्थिक शक्ति की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि उन जीवन-मूल्यों की भी अपेक्षा करता है जिन्होंने हजारों वर्षों तक इस सभ्यता को जीवित रखा है। विश्वगुरु वही बन सकता है जो अपने परिवारों को भी मजबूत रख सके। जिस समाज में माता-पिता उपेक्षित हों, बुजुर्ग अकेले हों, बच्चे भावनात्मक रूप से असुरक्षित हों और पति-पत्नी विश्वास के संकट से जूझ रहे हों, वह केवल आर्थिक महाशक्ति बन सकता है, सांस्कृतिक महाशक्ति नहीं।</div><div><br></div><div>समय आ गया है कि परिवारों में पुनः संवाद की संस्कृति विकसित की जाए। सप्ताह में कुछ समय ऐसा हो जब पूरा परिवार बिना मोबाइल के साथ बैठे। बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा ही नहीं, अच्छे संस्कार भी मिलें। विद्यालयों में जीवन-मूल्य और भावनात्मक शिक्षा को महत्व दिया जाए। विवाह-पूर्व परामर्श, पारिवारिक परामर्श और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को सामाजिक आंदोलन का रूप दिया जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि परिवार में बुजुर्गों की भूमिका को पुनः सम्मानपूर्वक स्थापित किया जाए, क्योंकि वे केवल अतीत के प्रतीक नहीं, बल्कि भविष्य के मार्गदर्शक हैं। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी किसी न्यायिक टिप्पणी भर नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी का शंखनाद है। यदि हमने अभी भी अपने परिवारों को बचाने का प्रयास नहीं किया तो आने वाले वर्षों में केवल अदालतों में मुकदमे नहीं बढ़ेंगे, बल्कि समाज की संवेदनाएं भी समाप्त होती जाएंगी।</div><div><br></div><div>भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है- ‘वसुधैव कुटुम्बकम्।’ लेकिन जो समाज अपने ही परिवार को नहीं बचा पाएगा, वह पूरी दुनिया को परिवार कैसे मान सकेगा? आज आवश्यकता नई इमारतें बनाने की नहीं, बल्कि बिखरते घरों को जोड़ने की है। नई तकनीक विकसित करने की नहीं, बल्कि टूटते संवादों को पुनर्जीवित करने की है। नई पीढ़ी को केवल सफल बनाने की नहीं, बल्कि संवेदनशील बनाने की है। यदि भारत को सचमुच विश्वगुरु बनना है, तो उसकी शुरुआत संसद, न्यायालय या विश्वविद्यालयों से नहीं, बल्कि हर घर के आंगन से होगी। संयुक्त परिवार की आत्मा, रिश्तों की गरिमा, संवाद की संस्कृति और संस्कारों की विरासत को पुनर्जीवित करना ही इस युग की सबसे बड़ी राष्ट्रीय आवश्यकता है। यही सुप्रीम कोर्ट की चिंता का वास्तविक संदेश है और यही भारतीय सभ्यता के भविष्य की सबसे बड़ी आशा भी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 14:28:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/supreme-court-concern-over-family-traditions-and-disintegrating-relationships</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[धर्मेंद्र प्रधान की सिर्फ मंत्री पद की कुर्सी गयी, राजनीतिक कद बरकरार है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/dharmendra-pradhan-hero-welcome-in-parliament-after-neet-paper-leak-resignation]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय राजनीति में संदेश अक्सर शब्दों से नहीं, बल्कि प्रतीकों से दिए जाते हैं। संसद के मॉनसून सत्र में आज ऐसा ही एक प्रतीकात्मक दृश्य देखने को मिला। दो दिन पहले नीट पेपर लीक विवाद की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने वाले धर्मेंद्र प्रधान जब संसद पहुंचे तो बीजेपी और एनडीए सांसदों ने उनका स्वागत विजेता की तरह किया। "धर्मेंद्र प्रधान जिंदाबाद" के नारों से संसद परिसर गूंज उठा, पारंपरिक टोपी और शॉल पहनाकर उनका अभिनंदन किया गया और मुस्कुराते हुए प्रधान ने हाथ जोड़कर सभी का अभिवादन स्वीकार किया।</div><div><br></div><div>यहीं से सियासत का नया अध्याय शुरू हो गया। विपक्ष ने सवाल दागा कि क्या यह इस्तीफे का सम्मान था या जवाबदेही का मजाक? कांग्रेस ने इसे उस नेता का महिमामंडन बताया जिसे देश की सबसे बड़ी परीक्षा से जुड़े कथित घोटाले के बाद पद छोड़ना पड़ा। धर्मेंद्र प्रधान के स्वागत समारोह पर कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने तीखा हमला बोला। उन्होंने बिलकिस बानो मामले का हवाला देते हुए कहा कि यह उसी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है जिसमें विवादों से घिरे लोगों का भी सार्वजनिक सम्मान किया जाता है। वहीं कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि भाजपा सांसद प्रधान का स्वागत ऐसे किया जा रहा है कि मानो उन्होंने कोई बड़ी उपलब्धि हासिल की हो। उन्होंने आरोप लगाया कि देश ने पहले भी देखा है कि प्रधान ने अपने इस्तीफे में पेपर लीक के लिए माफी मांगने की बजाय छात्रों पर ही ‘‘गुमराह होने’’ का आरोप लगाया था। रमेश ने कहा कि इसके बाद सभी केंद्रीय मंत्रियों ने सोशल मीडिया पर प्रधान की ‘‘वाहवाही’’ की। कांग्रेस महासचिव ने कहा, ‘‘हमारा मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम अत्यंत शर्मनाक है और देश के युवाओं का घोर अपमान है।''</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/enduring-political-message-of-union-education-minister-dharmendra-pradhan-resignation" target="_blank">केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा का शाश्वत सियासी संदेश</a></h3><div>हालांकि बीजेपी के लिए धर्मेंद्र प्रधान केवल पूर्व शिक्षा मंत्री नहीं हैं। वह पार्टी के सबसे भरोसेमंद संगठनकर्ताओं में गिने जाते हैं। ओडिशा के एक राजनीतिक परिवार में जन्मे प्रधान ने छात्र राजनीति से शुरुआत की थी। एबीवीपी के कार्यकर्ता से लेकर भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, विधायक, सांसद और फिर केंद्रीय मंत्री बनने तक का उनका सफर संगठन की सीढ़ियां चढ़ते हुए तय हुआ। पेट्रोलियम मंत्री रहते हुए उज्ज्वला जैसी योजनाओं के विस्तार में उनकी अहम भूमिका रही, जबकि 2021 में उन्हें शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई।</div><div><br></div><div>ओडिशा में बीजेपी का संगठन खड़ा करने का श्रेय भी काफी हद तक धर्मेंद्र प्रधान को दिया जाता है। 2017 के पंचायत चुनावों से लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव और फिर 2024 में बीजेडी को सत्ता से बेदखल कर बीजेपी की ऐतिहासिक जीत तक, उनकी रणनीति निर्णायक मानी जाती है। अमित शाह के करीबी राजनीतिक प्रबंधकों में उनकी गिनती होती रही है। पार्टी के भीतर उन्हें करिश्माई वक्ता से ज्यादा भरोसेमंद रणनीतिकार और संकटमोचक के रूप में देखा जाता है।</div><div><br></div><div>लेकिन शिक्षा मंत्रालय का कार्यकाल उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन अध्याय साबित हुआ। नई शिक्षा नीति, मातृभाषा आधारित शिक्षा और पीएम-श्री स्कूल जैसी योजनाओं को आगे बढ़ाने के बावजूद उनका कार्यकाल लगातार विवादों में घिरा रहा। राष्ट्रीय परीक्षाओं में पेपर लीक के आरोप, एनटीए की कार्यप्रणाली पर सवाल, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप, तमिलनाडु के साथ तीन-भाषा फार्मूले पर टकराव, 'हिंदी थोपने' के आरोप और शिक्षा संस्थानों के कथित भगवाकरण को लेकर विपक्ष के हमले लगातार उनका पीछा करते रहे। अंततः नीट विवाद वही मोड़ बन गया जिसने उन्हें पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो संसद में धर्मेंद्र प्रधान को मिले सम्मान ने यह संकेत भी दे दिया कि भाजपा उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ने नहीं देना चाहती। माना जा रहा है कि उन्हें जल्द ही पार्टी संगठन में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष या महासचिव पद की जिम्मेदारी देने के अलावा उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी भी बनाया जा सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, सभी को यह समझना होगा कि भारतीय जनता पार्टी शायद उन पुराने कॉलेजों की तरह नहीं है, जहां लकड़ी की बेंचों पर सिर्फ लोकप्रिय नारे लिखे मिलते हैं। उसकी राजनीतिक शिक्षा सत्ता के कठिन संघर्षों से हुई है, जहां आज से ज्यादा कल की चिंता होती है। शायद इसी वजह से पार्टी ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को अंत नहीं, बल्कि अगले अध्याय की शुरुआत की तरह पेश किया है। अब असली सवाल यह है कि क्या संसद में गूंजे धर्मेंद्र प्रधान "जिंदाबाद" के नारे जनता के मन में उठे उन सवालों को भी दबा पाएंगे, जो लाखों छात्रों के भविष्य और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता से जुड़े हैं?</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 16:04:41 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/dharmendra-pradhan-hero-welcome-in-parliament-after-neet-paper-leak-resignation</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा का शाश्वत सियासी संदेश]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/enduring-political-message-of-union-education-minister-dharmendra-pradhan-resignation]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से कद्दावर ओबीसी नेता धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को केवल भाजपा के एक व्यक्ति का इस्तीफा मानना पर्याप्त नहीं होगा। ऐसा इसलिए कि वह केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के नवरत्नों में शुमार किये जाते थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विश्वास भी उन्हें हासिल था। बावजूद इसके भारी जनदबाव के बीच यदि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा तो इसे कई स्तरों पर भाजपा/आरएसएस के राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि लोकतांत्रिक राजनीति में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए जवाबदेही, पारदर्शिता और प्रभावी शासन सबसे महत्वपूर्ण पूंजी हैं।</div><div><br></div><div>देखा जाए तो जिस तरह से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनका इस्तीफा तुरंत स्वीकार कर शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार कर्नाटक मूल के भाजपा नेता प्रह्लाद जोशी को सौंप दिया है, उसके निहितार्थ को भी समझे जाने की जरूरत है। ऐसा इसलिए कि यह सबकुछ अनायास नहीं बल्कि सुनियोजित तरीके से संपन्न हुआ। थोड़ी नरमी सीजेपी के आंदोलनकारियों यथा- सोनम वांगचुक और अभिजीत दीपके ने दिखाई और थोड़ी भाजपा सरकार के जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह जैसे सिपहसालार ने।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pralhad-joshi-takes-charge-of-education-ministry-following-dharmendra-pradhan-resignation" target="_blank">Dharmendra Pradhan के इस्तीफे के बाद Pralhad Joshi ने संभाला शिक्षा मंत्रालय, कही यह बात</a></h3><div>वास्तव में, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भारतीय राजनीति में तीन बड़े संदेश देता है—जवाबदेही, जनदबाव की प्रभावशीलता और शिक्षा-युवा मुद्दों की बढ़ती राजनीतिक अहमियत। लेकिन इसके दीर्घकालिक राजनीतिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेंगे कि सरकार परीक्षा प्रणाली में कितने प्रभावी सुधार करती है और विपक्ष इस मुद्दे को कितनी देर तक राजनीतिक रूप से जीवित रख पाता है।</div><div><br></div><div>सच कहूं तो 12 वर्षों में पहली बार केंद्र सरकार धर्मसंकट में फंसी थी, इसलिए उसने इंद्रप्रस्थ के इतिहास से सबक लेते हुए धृतराष्ट्र हठ का परित्याग किया और राष्ट्रवादी सूझबूझ प्रदर्शित किया। क्योंकि छात्र आंदोलन और जनदबाव को शांत करना, संसद और विपक्ष के साथ टकराव कम करना, शिक्षा मंत्रालय में नई शुरुआत का संदेश देना और सरकार की व्यापक राजनीतिक छवि को होने वाले नुकसान को सीमित करना, उसका तात्कालिक कर्तव्य समझा गया। जो एक हदतक सही भी है।</div><div><br></div><div>जानकारों की मानें तो केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा छात्र आंदोलनों, विपक्ष के दबाव और परीक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवालों के बीच आया है। चूंकि अपने पत्र में धर्मेंद्र प्रधान ने स्पष्ट कहा कि वे छात्रों का भविष्य प्रभावित नहीं होने देना चाहते और स्थिति का दुरुपयोग न हो, इसलिए उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ा।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाक्रम के बारे में राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि किसी बड़े जनदबाव के बाद मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ है, तो यह अनायास नहीं है, बल्कि भाजपा की सोची, समझी व गुनी हुई राजनीति है। इससे भाजपा सहित सभी दलों और सभी सामाजिक समूहों के नेताओं के लिए कुछ स्थायी सीख निकलती है और इसे सभी को समय रहते ही समझना होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div># जहां तक इस इस्तीफे के राजनीतिक निहितार्थ और मुख्य सियासी संदेश की बात है तो वह निम्नलिखित हैं:-</div><div><br></div><div>पहला, सरकार की डैमेज कंट्रोल रणनीति: यदि सरकार को लगा कि विवाद पूरे शासन की छवि पर भारी पड़ रहा है, तो किसी एक मंत्री का इस्तीफा देकर व्यापक राजनीतिक नुकसान सीमित करने की कोशिश की जा सकती है। यह संसदीय और राजनीतिक दबाव कम करने की रणनीति भी हो सकती है। चूंकि जनता की अपेक्षाएँ किसी भी जातीय पहचान से बड़ी होती हैं। लिहाजा किसी नेता की जातीय पृष्ठभूमि से अधिक महत्व उसके कामकाज, जवाबदेही और परिणामों का होता है। इसलिए सरकार ने सही वक्त पर सटीक पोस्टमार्टम किया है और विभागीय कचरों तक की सफाई करवा डाली है।</div><div><br></div><div>दूसरा, जवाबदेही का संदेश: लगातार छात्र आंदोलनों और परीक्षा विवादों के बीच एक वरिष्ठ मंत्री का इस्तीफा यह संकेत देता है कि बड़े जनदबाव की स्थिति में सरकार राजनीतिक जवाबदेही दिखाने का विकल्प चुन सकती है। क्योंकि जवाबदेही स्वीकार करना कभी-कभी राजनीतिक नुकसान कम कर सकता है। वहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था में समय पर जिम्मेदारी लेना लंबे समय में पार्टी नेतृत्व का भरोसा बढ़ा सकता है।</div><div><br></div><div>तीसरा, युवाओं की राजनीतिक शक्ति का संकेत: छात्र आंदोलनों ने यह साफ संदेश दिया कि रोजगार, परीक्षा और शिक्षा जैसे मुद्दे अब राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इससे भविष्य में सरकारें इन विषयों पर अधिक सतर्क रह सकती हैं। चूंकि&nbsp; युवा मतदाता मुद्दा-आधारित राजनीति को महत्व देते हैं। इसलिए रोजगार, शिक्षा, परीक्षा की निष्पक्षता और अवसर जैसे विषय जातीय समीकरणों से ऊपर भी राजनीतिक प्रभाव डाल सकते हैं। युवा मतदाताओं को संदेश कि सरकार जल्द परीक्षा सुधार, पारदर्शिता और दोषियों पर कार्रवाई करती है। ऐसा करके उसने राजनीतिक नुकसान कम करने की पहल की है। क्योंकि केवल इस्तीफा पर्याप्त नहीं होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>चौथा, सरकार ने जनदबाव को स्वीकार किया: लंबे समय बाद किसी बड़े केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा सार्वजनिक दबाव के बाद हुआ है। इससे यह संदेश गया कि सरकार ने राजनीतिक नुकसान सीमित करने का रास्ता चुना। यदि विशेष रूप से भाजपा के ओबीसी नेताओं या सवर्ण नेताओं की बात करें, जो पार्टी की रीढ़ समझे जाते हैं, तो उन्हें यह समझाने का रणनीतिक प्रयत्न है कि किसी भी नेता को केवल अपनी सामाजिक पहचान पर नहीं, बल्कि सुशासन, संगठन क्षमता और जनविश्वास पर अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बनानी चाहिए। अन्यथा देर सबेर हुई सार्वजनिक लापरवाही की कीमत चुकानी पड़ेगी।</div><div><br></div><div>पांचवां, विपक्ष को मनोवैज्ञानिक बढ़त: विपक्ष इसे अपनी राजनीतिक जीत और जनदबाव की सफलता के रूप में प्रस्तुत करेगा, जबकि सत्तापक्ष इसे व्यवस्था सुधार और नैतिक जिम्मेदारी के रूप में पेश करने का प्रयास करेगा। वाकई यह विपक्ष के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त है, क्योंकि विपक्ष इसे अपनी जीत बताएगा और भविष्य के आंदोलनों में इसे उदाहरण के रूप में पेश करेगा। सवाल है कि क्या यह विपक्ष के सामने घुटने टेकने की शुरुआत है? तो ऐसा निष्कर्ष अभी निकालना उचित नहीं होगा, क्योंकि यह तभी कहा जा सकेगा जब सरकार भविष्य में भी हर बड़े आंदोलन पर इसी प्रकार झुके, या अन्य विवादों में भी लगातार इस्तीफे और नीतिगत बदलाव दबाव में करने पड़े।</div><div><br></div><div>छठा, भाजपा के लिए आंतरिक संदेश: चूंकि संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। इसलिए आसन्न संकट आने पर केवल राजनीतिक संदेश नहीं, बल्कि प्रशासनिक समाधान भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। लिहाजा यह संकेत भी माना जा सकता है कि संगठन और सरकार, दोनों स्तरों पर प्रदर्शन और सार्वजनिक धारणा का महत्व बढ़ गया है। वस्तुतः भाजपा इसे जवाबदेही के संदेश में बदलने की कोशिश करेगी। इसलिए सरकार यह तर्क दे सकती है कि व्यक्ति नहीं, व्यवस्था सर्वोपरि है और सुधारों के लिए जवाबदेही तय की गई है।</div><div><br></div><div># यक्ष प्रश्न: आखिर "किसके कहने पर संभव हुआ यह महत्वपूर्ण इस्तीफा"&nbsp;</div><div><br></div><div>यदि आप इस इस्तीफे की "इनसाइड स्टोरी" जानना चाहते हैं कि धर्मेंद्र प्रधान ने आखिर किसके कहने पर अपना इस्तीफा दिया, तो अभी तक सरकार, उसके शीर्ष रणनीतिकार कार्यालय (HMO), संतुलनकारी प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) या भाजपा और उसकी मार्गदर्शक आरएसएस की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक खुलासा नहीं किया गया है कि आखिर यह निर्णय किस व्यक्ति के निर्देश पर लिया गया। क्योंकि जिस तरह से यूजीसी बिल पर सवर्णों ने धर्मेंद्र प्रधान का सार्वजनिक विरोध किया था, वह भाजपा के भीतर उनकी उल्टी गिनती की शुरुआत समझी गई। स्वाभाविक है कि प्रधान के इस्तीफे से सवर्ण युवाओं में खुशी की लहर है।</div><div><br></div><div>उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर सिर्फ कुछ बातें ही कही जा सकती हैं। वह यह कि धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई (शनिवार) को अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजा और इसे सार्वजनिक भी किया। खास बात यह कि उनका यह कदम सरकार और आंदोलनकारी पक्ष के बीच तीसरे दौर की वार्ता से ठीक पहले आया। हालांकि यह कहना कि इस्तीफा किसी एक गुट के दबाव में हुआ, उपलब्ध सार्वजनिक साक्ष्यों से सिद्ध नहीं होता। स्वयं धर्मेंद्र प्रधान ने अपने इस्तीफे में कहा कि उनका उद्देश्य छात्रों का भविष्य सुरक्षित रखना, राष्ट्रीय एकता बनाए रखना और आंदोलन का राजनीतिक दुरुपयोग रोकना था।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसलिए राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका इस्तीफा स्वीकार जाना यह जताता है कि ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय सामान्यतः प्रधानमंत्री और भाजपा/संघ के शीर्ष नेतृत्व की सामूहिक राजनीतिक रणनीति के तहत होता है। लेकिन यह कहना कि किसी एक व्यक्ति—जैसे नितिन नवीन, अमित शाह, जे.पी. नड्डा या आरएसएस—के कहने पर ही इस्तीफा हुआ, इसका कोई सार्वजनिक प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है। सिर्फ कानाफूसी या अटकलों तक बातें चर्चा में है।</div><div><br></div><div>उल्लेखनीय यह भी है कि इस्तीफे से एक दिन पहले तक कई मीडिया रिपोर्टों में सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा था कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता। इससे संकेत मिलता है कि यदि निर्णय बदला, तो वह शीर्ष स्तर पर अंतिम समय में राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div># क्या यह इस्तीफा अस्थायी रणनीति हो सकती है?</div><div><br></div><div>यह संभावना भी मजबूत है, क्योंकि राजनीतिक रूप से सरकार अक्सर बड़े जनाक्रोश को शांत करने के लिए नेतृत्व परिवर्तन, मंत्रिमंडल फेरबदल या जवाबदेही तय करने जैसे कदम उठाती है, जबकि अपनी व्यापक राजनीतिक दिशा नहीं बदलती। यदि आने वाले दिनों में शिक्षा सुधारों की घोषणा, NTA में व्यापक बदलाव और नए शिक्षा मंत्री की स्थायी नियुक्ति होती है, तो इसे संकट-प्रबंधन की रणनीति माना जाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>निष्कर्षतः अभी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इसे "सरकार की स्थायी राजनीतिक पराजय" कहना जल्दबाज़ी होगी, बल्कि इसे अधिक संतुलित रूप से जनदबाव के बीच अपनाई गई संकट-प्रबंधन रणनीति कहा जा सकता है। लेकिन यदि यह कदम भी जनआक्रोश को शांत नहीं कर पाता और सरकार को लगातार इसी तरह पीछे हटना पड़ता है, तब इसे व्यापक राजनीतिक रुझान माना जा सकेगा।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 12:16:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/enduring-political-message-of-union-education-minister-dharmendra-pradhan-resignation</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[जल संकट का असंतुलित प्रबंधन: अस्तित्व पर मंडराता खतरा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/imbalanced-management-of-the-water-crisis-a-threat-looming-over-existence]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जल केवल प्रकृति का उपहार नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व का आधार है। पृथ्वी पर जीवन की कल्पना जल के बिना असंभव है, फिर भी विडंबना यह है कि जिस जल को हमारी संस्कृति ने देवत्व प्रदान किया, उसी जल के प्रति हमारा व्यवहार सबसे अधिक लापरवाह रहा है। आज देश और दुनिया की सबसे गंभीर चुनौतियों में जल संकट प्रमुख बन चुका है। बढ़ती आबादी, अनियोजित शहरीकरण, अंधाधुंध भूजल दोहन, जलवायु परिवर्तन और वर्षाजल के समुचित प्रबंधन के अभाव ने इस संकट को भयावह बना दिया है। यदि समय रहते चेतना नहीं जागी तो आने वाले वर्षों में पानी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि सामाजिक तनाव, आर्थिक अस्थिरता और मानवीय संघर्ष का सबसे बड़ा कारण बन सकता है। हाल के शोध इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गांधीनगर के अध्ययन के अनुसार पिछले दो दशकों में उत्तर भारत का भूजल भंडार लगभग 450 घन किलोमीटर घट चुका है। यह मात्रा देश के सबसे बड़े जलाशयों में से एक इंदिरा सागर बांध की कुल जल संग्रहण क्षमता से लगभग 37 गुना अधिक है। यह आंकड़ा केवल वैज्ञानिक तथ्य नहीं, बल्कि भविष्य के संकट का स्पष्ट संकेत है। इसका अर्थ है कि जिस भूजल पर करोड़ों किसानों की खेती और करोड़ों लोगों का जीवन निर्भर है, वह तेजी से समाप्त हो रहा है।</div><div><br></div><div>इस भयावह स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है। वर्ष 1951 से 2021 के बीच मानसूनी वर्षा में लगभग 8.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। दूसरी ओर, उत्तर भारत में सर्दियों का तापमान भी बढ़ा है। तापमान में यह मामूली प्रतीत होने वाली वृद्धि भी मिट्टी की नमी को तेजी से कम करती है। परिणामस्वरूप खेतों को पहले की अपेक्षा अधिक सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। जब वर्षा कम होती है और सिंचाई की मांग बढ़ती है, तब किसान भूजल पर अधिक निर्भर हो जाते हैं। यही कारण है कि भूजल का पुनर्भरण कम और दोहन अधिक हो रहा है। आज भारत के अनेक क्षेत्रों में भूजल का स्तर हर वर्ष नीचे जा रहा है। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और मध्य भारत के कई हिस्से इस संकट की चपेट में हैं। अनेक स्थानों पर सैकड़ों फीट गहराई तक बोरवेल खोदने के बाद भी पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा। कई गांवों में हैंडपंप सूख चुके हैं और शहरों में टैंकर संस्कृति तेजी से बढ़ रही है। यह स्थिति बताती है कि यदि हमने अपनी जल नीति नहीं बदली तो आने वाले समय में पानी का संकट भोजन के संकट में भी बदल सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/pakistan-paying-india-share-indus-waters-treaty-arbitration-bill" target="_blank">भारत से टकराने की जिद बड़ी भारी पड़ती है, 'हिंदुस्तान के हिस्से का बिल' भी भर रहा है पाकिस्तान!</a></h3><div>भारत की कृषि व्यवस्था आज भी लगभग 80 प्रतिशत मीठे जल का उपयोग करती है। दुर्भाग्य से धान, गन्ना जैसी अधिक पानी वाली फसलें उन क्षेत्रों में भी उगाई जा रही हैं जहां जल संसाधन सीमित हैं। मुफ्त बिजली और सस्ते पानी की नीतियों ने कई क्षेत्रों में अनियंत्रित भूजल दोहन को बढ़ावा दिया है। जल का मूल्य शून्य समझे जाने के कारण उसका संरक्षण भी नहीं हो पा रहा। आवश्यकता इस बात की है कि कृषि नीति को जल उपलब्धता के अनुरूप बनाया जाए। जिन क्षेत्रों में पानी कम है, वहां मोटे अनाज, दालें, तिलहन तथा कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जल संकट केवल खेती तक सीमित नहीं है। उद्योगों, महानगरों और बढ़ते शहरी विस्तार ने भी भूजल पर अत्यधिक दबाव डाला है। बड़े-बड़े भवनों, कॉलोनियों और औद्योगिक क्षेत्रों में वर्षाजल सीधे नालों में बह जाता है। यदि प्रत्येक भवन में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था अनिवार्य रूप से लागू हो जाए तो लाखों लीटर पानी हर वर्ष धरती के भीतर पहुंच सकता है। दुर्भाग्यवश अनेक राज्यों में कानून तो बने, लेकिन उनका प्रभावी पालन नहीं हो पाया।</div><div><br></div><div>जल संकट का एक और गंभीर पक्ष जल प्रदूषण है। देश की अधिकांश नदियां औद्योगिक अपशिष्ट, रासायनिक कचरे और सीवेज के कारण प्रदूषित हो चुकी हैं। जब नदियों और तालाबों का जल उपयोग योग्य नहीं रहता तो भूजल पर दबाव और बढ़ जाता है। इसलिए जल संरक्षण के साथ-साथ जल स्रोतों की स्वच्छता भी समान रूप से आवश्यक है। नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण पारिस्थितिकी की जीवनरेखा है। यदि नदियां स्वस्थ रहेंगी तो भूजल भी समृद्ध होगा। आज आवश्यकता केवल नई परियोजनाओं की नहीं, बल्कि जल संस्कृति के पुनर्जागरण की है। भारत में कभी तालाब, बावड़ियां, जोहड़, कुंड और पारंपरिक जल संरचनाएं गांवों की पहचान होती थीं। वे वर्षा के जल को रोककर भूजल को समृद्ध बनाती थीं। आधुनिक विकास की दौड़ में इन जल स्रोतों को या तो नष्ट कर दिया गया या अतिक्रमण का शिकार बना दिया गया। यदि इन पारंपरिक जल प्रणालियों का पुनर्जीवन किया जाए तो जल संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।</div><div><br></div><div>जल संरक्षण केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है। घरों में पानी की अनावश्यक बर्बादी रोकना, वर्षाजल संचयन अपनाना, रिसाव ठीक कराना, कम पानी वाले उपकरणों का उपयोग करना और बच्चों में जल संरक्षण के संस्कार विकसित करना अत्यंत आवश्यक है। यदि प्रत्येक परिवार प्रतिदिन कुछ लीटर पानी भी बचाए तो राष्ट्रीय स्तर पर करोड़ों लीटर जल की बचत संभव है। सरकार को भी जल प्रबंधन को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा। प्रत्येक जिले के लिए भूजल बजट तैयार किया जाए, भूजल दोहन पर वैज्ञानिक नियंत्रण हो, सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों-ड्रिप और स्प्रिंकलर-को व्यापक प्रोत्साहन मिले तथा ऐसे कृषि अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाए जो कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली किस्में विकसित करे। साथ ही जल शिक्षा को विद्यालयों के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ी जल के महत्व को केवल पुस्तकों में नहीं, व्यवहार में भी समझ सके।</div><div><br></div><div>भविष्य का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हमारे पास आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्याप्त जल बचेगा? यदि आज भी हमने जल को केवल उपभोग की वस्तु समझा तो आने वाले वर्षों में जल के लिए संघर्ष, पलायन और सामाजिक असंतोष बढ़ना स्वाभाविक होगा। खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा, महंगाई बढ़ेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा संकट आएगा। इसलिए जल संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक शांति का भी प्रश्न है। आज समय की पुकार है कि ‘जल बचाना ही भविष्य बचाना है।’ हमें बदलती जलवायु के अनुरूप अपनी नीतियों, कृषि प्रणाली और जीवनशैली में व्यापक परिवर्तन लाने होंगे। वर्षा की प्रत्येक बूंद को धरती में उतारना, जल का विवेकपूर्ण उपयोग करना और जल अनुशासन को जन-आंदोलन बनाना ही इस संकट का सबसे प्रभावी समाधान है। यदि सरकार, वैज्ञानिक, किसान, उद्योग, सामाजिक संगठन और आम नागरिक मिलकर इस दिशा में संकल्पबद्ध प्रयास करें तो जल संकट को अवसर में बदला जा सकता है। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष करना मानव सभ्यता की सबसे बड़ी विवशता बन जाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 18:21:31 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/imbalanced-management-of-the-water-crisis-a-threat-looming-over-existence</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बिट्टू की एंट्री से बदली पंजाब की चुनावी बिसात, नया समीकरण गढ़ने में भाजपा कामयाब]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/bjp-punjab-strategy-ravneet-bittu-akali-dal-2027-assembly-election]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>केंद्रीय मंत्री पद से रवनीत सिंह बिट्टू का इस्तीफा पंजाब की राजनीति में भाजपा के सबसे बड़े चुनावी दांव के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि बिट्टू विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं और पार्टी के चुनाव अभियान का प्रमुख चेहरा भी बन सकते हैं। उल्लेखनीय है कि रवनीत सिंह बिट्टू का राज्यसभा कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो चुका था। इसके बाद उन्होंने रेल तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया। बिट्टू ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताते हुए कहा कि उन्हें देश और विशेष रूप से पंजाब की सेवा करने का अवसर मिला तथा उनका सार्वजनिक जीवन राष्ट्रवाद, सेवा और विकसित भारत के संकल्प के साथ आगे भी जारी रहेगा।</div><div><br></div><div>पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पौत्र बिट्टू लंबे समय तक कांग्रेस में रहे। वर्ष 2009 में वह आनंदपुर साहिब से सांसद बने और बाद में दो बार लुधियाना का प्रतिनिधित्व किया। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा का दामन थामा, लेकिन लुधियाना से कांग्रेस के अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के खिलाफ चुनाव हार गए। इसके बाद उन्हें राजस्थान से राज्यसभा भेजा गया और केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/waris-punjab-de-members-arrested-nepal-border-bahraich" target="_blank">Prabhasakshi NewsRoom: India-Nepal Border पर Khalistani Network का पर्दाफाश, अमेरिकी नागरिक समेत 5 गिरफ्तार</a></h3><div>पंजाब की राजनीति में बिट्टू की वापसी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि वह पिछले कुछ समय से पंजाब में भाजपा के संगठन और चुनावी तैयारी में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। उन्होंने पहले ही सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि भाजपा का लक्ष्य पंजाब में "डबल इंजन सरकार" बनाना है और प्रधानमंत्री मोदी के विकास के विजन को हर विधानसभा क्षेत्र तक पहुंचाना है।</div><div><br></div><div>दरअसल, बिट्टू की वापसी भाजपा की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसके तहत पार्टी पंजाब में अपने पारंपरिक शहरी हिंदू वोट बैंक से आगे बढ़कर सिख, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग के बीच भी मजबूत आधार तैयार करना चाहती है। पंजाब में लगभग 58 प्रतिशत आबादी सिखों की है, जबकि करीब 39 प्रतिशत हिंदू हैं। इसके अलावा राज्य में लगभग 32 प्रतिशत दलित और लगभग 16 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग है। भाजपा की कोशिश इन चारों सामाजिक वर्गों में समानांतर स्वीकार्यता बढ़ाने की है।</div><div><br></div><div>भाजपा की इसी नई रणनीति की झलक हाल में आई 'सतलुज' फिल्म को लेकर हुए विवाद में भी देखने को मिली थी। रवनीत सिंह बिट्टू ने फिल्म का खुलकर विरोध करते हुए आरोप लगाया कि यह ऐसे संवेदनशील विषय को उभारने का प्रयास है, जिससे पंजाब का माहौल दोबारा तनावपूर्ण हो सकता है। उन्होंने इसे सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाली कोशिश बताते हुए फिल्म पर सवाल उठाए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिट्टू का यह रुख भाजपा की बदली हुई चुनावी रणनीति का संकेत था। पहले जहां पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दों पर अपेक्षाकृत आक्रामक भाषा का प्रयोग करती थी, वहीं अब वह सिख समुदाय की धार्मिक और ऐतिहासिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखते हुए अपनी राजनीतिक अभिव्यक्ति को अधिक संतुलित और संयमित बना रही है। माना जा रहा है कि भाजपा पंजाब में सिख मतदाताओं के बीच भरोसा बढ़ाने के लिए ऐसे मुद्दों पर सावधानीपूर्वक राजनीतिक संदेश देना चाहती है, ताकि हिंदू, सिख, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग, इन चारों प्रमुख सामाजिक समूहों में समानांतर स्वीकार्यता विकसित की जा सके।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद भाजपा ने स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनने की दिशा में लगातार काम किया है। इसका असर चुनावी आंकड़ों में भी दिखा, जहां 2022 विधानसभा चुनाव में लगभग 6.6 प्रतिशत मत पाने वाली भाजपा का वोट प्रतिशत 2024 के लोकसभा चुनाव में बढ़कर लगभग 19 प्रतिशत तक पहुंच गया। यही कारण है कि पार्टी अब पंजाब में अकेले दम पर सत्ता हासिल करने का सपना देख रही है।</div><div><br></div><div>हालांकि शिरोमणि अकाली दल के साथ भाजपा के रिश्तों को लेकर राजनीतिक अटकलें अब भी खत्म नहीं हुई हैं। इसका ताजा उदाहरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पंजाब यात्रा के दौरान देखने को मिला था। जालंधर की सभा में प्रधानमंत्री ने आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और 'अकाली दल' तीनों पर निशाना साधते हुए कहा कि अकाली दल भी आपसी स्वार्थों के कारण पंजाब की प्रभावी सेवा नहीं कर पाया। प्रधानमंत्री ने किसी विशेष अकाली गुट का नाम नहीं लिया, लेकिन शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने बाद में दावा किया कि यह टिप्पणी उनकी पार्टी पर नहीं, बल्कि अन्य अकाली धड़ों के लिए थी। इस बयान ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी, क्योंकि भाजपा और अकाली दल का लगभग 25 वर्षों पुराना गठबंधन 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर टूटने के बाद भी दोनों दलों के हर सार्वजनिक बयान को संभावित राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जाता है। हालांकि भाजपा नेतृत्व फिलहाल गठबंधन पुनर्जीवित करने की किसी संभावना से इंकार कर रहा है और अपने संगठन को स्वतंत्र रूप से मजबूत करने की बात कह रहा है, फिर भी राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब की राजनीति में भाजपा और अकाली दल के संबंध इतने महत्वपूर्ण रहे हैं कि दोनों दलों के बीच होने वाला हर संवाद भविष्य की संभावनाओं के नजरिए से परखा जाता है।</div><div><br></div><div>साथ ही भाजपा ने अपने राजनीतिक संदेश और भाषा में भी उल्लेखनीय बदलाव किया है। कभी ऑपरेशन ब्लू स्टार को लेकर बेहद आक्रामक रुख अपनाने वाली पार्टी अब सिख समाज की धार्मिक भावनाओं और ऐतिहासिक शिकायतों को अधिक संवेदनशीलता से संबोधित करती दिखाई दे रही है। पार्टी लगातार कांग्रेस को ऑपरेशन ब्लू स्टार, पंजाब में आतंकवाद के दौर और 1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराती है, जबकि स्वयं को सिख समाज की भावनाओं का सम्मान करने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो भाजपा की इस बदली हुई राजनीतिक रणनीति की पृष्ठभूमि को समझने के लिए उसके पुराने रुख पर भी नजर डालना जरूरी है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा 'माय कंट्री, माय लाइफ' में पंजाब में उग्रवाद के दौर के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि कांग्रेस ने अपने राजनीतिक हितों के लिए उग्रवाद को बढ़ावा दिया और हालात इतने बिगड़ने दिए कि अंततः ऑपरेशन ब्लू स्टार की नौबत आ गई। आडवाणी ने यह भी लिखा था कि भाजपा और अन्य दलों के देशव्यापी आंदोलनों के दबाव में तत्कालीन केंद्र सरकार को स्वर्ण मंदिर परिसर से उग्रवादियों को हटाने के लिए सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी थी। हालांकि अब पंजाब में चुनावी विस्तार की कोशिशों के बीच भाजपा की सार्वजनिक भाषा पहले की तुलना में कहीं अधिक संतुलित और संवेदनशील दिखाई देती है। पार्टी अब ऑपरेशन ब्लू स्टार को 'राष्ट्रीय त्रासदी' बताते हुए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराती है, लेकिन साथ ही सिख समाज की धार्मिक भावनाओं और ऐतिहासिक पीड़ा को भी प्रमुखता से स्वीकार करने का प्रयास कर रही है।</div><div><br></div><div>इसी बदलाव के तहत भाजपा ने हाल के वर्षों में कई प्रतीकात्मक और राजनीतिक कदम उठाए हैं। वीर बाल दिवस की घोषणा, करतारपुर साहिब गलियारे का उद्घाटन, अफगानिस्तान से गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूप भारत लाना, 1984 दंगों के मामलों की जांच में तेजी, हवाई अड्डों पर कृपाण ले जाने की अनुमति, स्वर्ण मंदिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लगातार दौरे तथा लंबे समय से जेल में बंद कुछ सिख कैदियों को मानवीय आधार पर राहत जैसे फैसलों को इसी व्यापक सिख पहुंच अभियान का हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा ने यह भी संकेत दिया है कि सत्ता में आने पर धर्मांतरण विरोधी कानून लाया जा सकता है।</div><div><br></div><div>हालांकि भाजपा इस पूरे अभियान के दौरान एक संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही है। पार्टी स्पष्ट करती है कि उसका आतंकवाद और खालिस्तानी हिंसा के प्रति रुख नहीं बदला है। पंजाब भाजपा के नेताओं का कहना है कि ऑपरेशन ब्लू स्टार को राष्ट्रीय त्रासदी मानने का अर्थ आतंकवाद का समर्थन नहीं है, बल्कि उस समय की परिस्थितियों के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराना है।</div><div><br></div><div>फिर भी भाजपा की इस नई राजनीतिक भाषा को लेकर संदेह भी कम नहीं है। कई राजनीतिक विश्लेषकों और सिख बुद्धिजीवियों का मानना है कि पार्टी का यह बदलाव मुख्य रूप से चुनावी गणित से प्रेरित है। उनका कहना है कि केवल हिंदू मतों के सहारे पंजाब में सरकार बनाना संभव नहीं है, इसलिए भाजपा सिख मतदाताओं के बीच स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए अपने राजनीतिक संदेश को नया स्वरूप दे रही है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा की सामाजिक समीकरणों पर आधारित नई रणनीति और सिख समाज तक पहुंच बनाने की कोशिश पंजाब के मतदाताओं को प्रभावित कर पाएगी या फिर राज्य की पारंपरिक राजनीतिक ध्रुवीकरण की राजनीति ही चुनाव परिणाम तय करेगी। अगले विधानसभा चुनाव इस सवाल का सबसे बड़ा जवाब साबित होंगे।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 13:15:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/bjp-punjab-strategy-ravneet-bittu-akali-dal-2027-assembly-election</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[संवाद से सशक्त होगा लोकतंत्र, हिंसा से नहीं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/democracy-will-be-strengthened-by-dialogue-not-by-violence]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली के जंतर-मंतर से संसद भवन तक हाल के आंदोलन के दौरान जो तनाव, टकराव और हिंसक घटनाएं देखने को मिलीं, वे केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं हैं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव, बैरिकेड तोड़ने के प्रयास, मेट्रो स्टेशन में जबरन प्रवेश की कोशिश, पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और आंसू गैस का प्रयोग-ये सभी दृश्य उस लोकतांत्रिक संस्कृति के अनुरूप नहीं कहे जा सकते, जिसकी आधारशिला अहिंसा, संवाद और संवैधानिक मर्यादाओं पर रखी गई है। भारत आज आजादी के शताब्दी वर्ष 2047 की ओर बढ़ रहा है। यह केवल आर्थिक महाशक्ति बनने का लक्ष्य नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता की कसौटी पर भी स्वयं को सिद्ध करने का अवसर है। यदि हम आज भी असहमति को हिंसा, टकराव और अराजकता के माध्यम से व्यक्त करेंगे, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होगी। लोकतंत्र की शक्ति सड़क पर शक्ति-प्रदर्शन में नहीं, बल्कि विचारों की शक्ति, संवाद की संस्कृति और संवैधानिक प्रक्रियाओं में निहित होती है।</div><div><br></div><div>राहुल गांधी द्वारा नीट पेपर लीक प्रकरण को लेकर चल रहे घरना-प्रदर्शन के दौरान अचानक अपने सहयोगी सांसदों के साथ प्रधानमंत्री आवास के निकट धरने पर बैठना और संसद की बजाय सड़क को राजनीतिक संघर्ष का मंच बनाना अनेक गंभीर प्रश्न खड़े करता है। जिस प्रकार इससे पहले कॉकरोच जनता पार्टी के तथाकथित छात्रों एवं कार्यकर्ताओं ने संसद चलो मार्च के दौरान तनावपूर्ण, अराजक एवं हिंसक माहौल बनाने की घटनाएं सामने आईं, उससे यह आशंका बलवती हुई कि कुछ राजनीतिक शक्तियां भारत में भी नेपाल जैसी अराजक परिस्थितियां पैदा करने को उजावले हैं। सरकार की सतर्कता और सुरक्षा एजेंसियों की समय रहते की गई कार्रवाई से, कुछ कमियों के बावजूद, इस बड़े संकट को टाल दिया गया, अन्यथा दिल्ली लंबे समय तक हिंसा और अशांति की चपेट में आ सकती थी। देश पहले भी नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध के दौरान शाहीन बाग में लगभग सौ दिनों तक एक प्रमुख सड़क के अवरुद्ध रहने और उससे आम नागरिकों को हुई भारी कठिनाइयों का अनुभव कर चुका है। लोकतंत्र में असहमति और विरोध का अधिकार निर्विवाद है, लेकिन उसका स्थान संसद, संवाद और संवैधानिक संस्थाएं हैं, न कि सड़क पर टकराव और अराजकता। विपक्ष यदि बार-बार ऐसे आंदोलनों को प्रोत्साहित करता है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि उसका उद्देश्य लोकतांत्रिक विमर्श को मजबूत करना है या राजनीतिक ध्रूवीकरण और अस्थिरता को बढ़ावा देना। जनता अपेक्षा करती है कि सभी दल संसद को सर्वाेच्च मंच मानते हुए वहीं जवाबदेही सुनिश्चित करें।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/some-politicians-politicized-the-students-peaceful-protest" target="_blank">छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन का कुछ राजनेताओं ने कर दिया राजनीतिकरण!</a></h3><div>भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा करने का अधिकार देता है। यह अधिकार लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है। किंतु प्रत्येक अधिकार के साथ कर्तव्य और मर्यादा भी जुड़ी होती है। प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, पुलिस से टकराव करना, हिंसा फैलाना अथवा आम नागरिकों के जीवन को बाधित करना किसी भी दृष्टि से लोकतांत्रिक आचरण नहीं कहा जा सकता। यदि आंदोलन अपनी नैतिक शक्ति खो देता है, तो उसकी मांगें भी समाज की सहानुभूति खो बैठती हैं। यह भी उतना ही सत्य है कि लोकतंत्र केवल जनता के लिए नहीं, बल्कि सरकार के लिए भी उत्तरदायित्व का नाम है। सरकार को भी आंदोलनों को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं देखना चाहिए। जब भी किसी वर्ग, विशेषकर युवाओं और छात्रों में असंतोष उत्पन्न हो, तो उसका समय रहते समाधान खोजने का प्रयास होना चाहिए। संवाद के दरवाजे जितनी जल्दी खुलेंगे, टकराव की संभावनाएं उतनी ही कम होंगी। लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी शक्ति उसका धैर्य, संवेदनशीलता और संवाद की इच्छा होती है।</div><div>इतिहास साक्षी है कि भारत के अधिकांश सफल जनआंदोलन अहिंसा और संवाद की शक्ति से ही सफल हुए हैं। महात्मा गांधी ने विश्व को यह संदेश दिया कि सत्य और अहिंसा सबसे बड़े अस्त्र हैं। वर्ष 2011 का अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी इसका उदाहरण है। लाखों लोग सड़कों पर उतरे, लेकिन आंदोलन का नैतिक बल उसकी शांति और अनुशासन में था। उसी कारण सरकार को संवाद का रास्ता अपनाना पड़ा और पूरे देश में एक सकारात्मक बहस प्रारंभ हुई। इसके विपरीत जहां-जहां आंदोलनों ने हिंसा का मार्ग अपनाया, वहां उनका मूल उद्देश्य पीछे छूट गया और चर्चा केवल हिंसा तक सीमित होकर रह गई। आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी कौन-सी शक्तियां हैं, जो सामान्य और भोली-भाली जनता एवं देश के युवाओं को हिंसा की ओर धकेल देती हैं? कौन-से तत्व आंदोलनों की दिशा बदलकर उन्हें अराजकता में परिवर्तित कर देते हैं? यह चिंता केवल सरकार की नहीं, पूरे समाज की होनी चाहिए। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन यदि असहमति के मंच पर राष्ट्रविरोधी, अराजक अथवा हिंसक तत्व सक्रिय हो जाएं, तो उन्हें नियंत्रित करना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य दायित्व बन जाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ अराजकता की स्वतंत्रता नहीं हो सकता।</div><div><br></div><div>संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर है। जंतर-मंतर लोकतांत्रिक विरोध का प्रतीक स्थल है। यदि इन दोनों के बीच हिंसा, तोड़फोड़ ण्चं अराजकता का दृश्य निर्मित होता है, तो यह केवल राजधानी की घटना नहीं रहती, बल्कि पूरे देश और विश्व के सामने भारतीय लोकतंत्र की छवि को प्रभावित करती है। लोकतंत्र की गरिमा इस बात में नहीं कि कौन अधिक आक्रामक है, बल्कि इस बात में है कि कौन अधिक संयमित और उत्तरदायी है। राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना होगा। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों लोकतंत्र के दो पहिए हैं। यदि दोनों के बीच संवाद समाप्त हो जाएगा, तो लोकतंत्र टकराव का अखाड़ा बन जाएगा। विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं, बल्कि रचनात्मक विकल्प प्रस्तुत करना भी है। उसी प्रकार सरकार का दायित्व केवल शक्ति प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि असहमति को सम्मानपूर्वक सुनना भी है। लोकतंत्र में किसी की पूर्ण विजय या पूर्ण पराजय नहीं होती, यहां अंततः संवाद, सहमति और समाधान ही सबसे बड़ी जीत होती है।</div><div><br></div><div>छात्रों और युवाओं की समस्याओं का समाधान भी अत्यंत आवश्यक है। युवा किसी भी राष्ट्र की ऊर्जा हैं। यदि उनकी आशाओं और अपेक्षाओं की उपेक्षा होगी, तो असंतोष स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह युवाओं से नियमित संवाद स्थापित करे, उनकी समस्याओं को समयबद्ध ढंग से सुने और समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए। वहीं युवाओं को भी यह समझना होगा कि हिंसा उनके आंदोलन की सबसे बड़ी शत्रु है। पत्थर और लाठी किसी समस्या का समाधान नहीं करते, वे केवल संवाद के पुलों को तोड़ते हैं। आज आवश्यकता लोकतंत्र को अधिक परिपक्व बनाने की है। हमें ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें विरोध हो, लेकिन वैमनस्य न हो। मतभेद हों, लेकिन मनभेद न हों। संघर्ष हो, लेकिन हिंसा न हो। लोकतंत्र में बहस जितनी प्रखर होगी, राष्ट्र उतना ही मजबूत होगा। किंतु बहस का स्थान यदि हिंसा ले लेगी, तो लोकतंत्र की आत्मा आहत होगी। जंतर-मंतर से संसद तक जो कुछ हुआ, उसे लोकतांत्रिक आदर्श नहीं कहा जा सकता। यह किसी परिपक्व राजनीतिक सोच का भी परिचायक नहीं है। राष्ट्र निर्माण का मार्ग टकराव नहीं, सहयोग है। हिंसा नहीं, सहमति है। उग्रता नहीं, उदारता है। इसलिए आवश्यक है कि सभी पक्ष अपने-अपने आग्रहों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें।</div><div><br></div><div>आज देश को ऐसे नेतृत्व और ऐसी जनचेतना की आवश्यकता है जो संवाद को संघर्ष से ऊपर रखे। सरकार उदारता और संवेदनशीलता दिखाए, आंदोलनकारी संयम और अनुशासन अपनाएं तथा राजनीतिक दल अल्पकालिक लाभ के बजाय लोकतंत्र की दीर्घकालिक मजबूती को प्राथमिकता दें। यही भारत की लोकतांत्रिक परंपरा की वास्तविक पहचान भी है और भविष्य की आवश्यकता भी। अंततः यही कामना की जानी चाहिए कि जिन शक्तियों के कारण आंदोलनों में हिंसा और टकराव का वातावरण बनता है, उन्हें सद्बुद्धि प्राप्त हो। सभी पक्ष संवाद की मेज पर बैठें, अपनी बात तर्क, तथ्यों और संवैधानिक मर्यादाओं के साथ रखें तथा समाधान का मार्ग खोजें। लोकतंत्र की सबसे बड़ी विजय किसी पक्ष की जीत नहीं होती, बल्कि वह क्षण होता है जब विरोधी पक्ष भी एक-दूसरे की बात सुनने और समझने के लिए तैयार हो जाते हैं। यही आदर्श लोकतंत्र की पहचान है और यही विकसित भारत की सबसे मजबूत बुनियाद भी है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 15:42:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/democracy-will-be-strengthened-by-dialogue-not-by-violence</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[शतकीय यात्रा पर भारतीय प्रसारण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/indian-broadcasting-towards-the-centennial-milestone]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><div>आज का दिन भारतीय प्रसारण के इतिहास में विशेष महत्व है। ठीक 99 साल पहले 23 जुलाई 1927 को मुंबई में भारत में पहले व्यवस्थित और संस्थानिक प्रसारण की शुरूआत हुई थी। इस लिहाज से भारतीय प्रसारण आज से अपनी शतकीय सोपान की ओर बढ़ रहा है। इस शतकीय यात्रा में रेडियो की तकनीक में बहुत बदलाव हुआ है। पारंपरिक मीडियम वेब से लेकर शॉर्ट वेब होते हुए रेडियो अब एफएम यानी फ्रीक्वेंसी मॉड्यूल के साथ ही डिजिटल दौर में प्रवेश कर गया है। मीडिया के चरित्र में भी सौ साल में बहुत बदलाव हो गया है, लेकिन रेडियो आज भी संवाद और मनोरंजन के सहज संचार माध्यम के रूप में जिंदा है। आसानी से हर जगह उपलब्धता और विशेष तकनीक की वजह से आपदा के क्षणों में संचार के दूसरे माध्यमों की तुलना में रेडियो अब भी सबसे ज्यादा प्रभावी माध्यम बना हुआ है। समुद्री तूफानों, सुनामी, कश्मीर घाटी की बाढ़ आदि मौकों पर संवाद के लिए रेडियो ने अपनी ताकत और उपादेयता को बार-बार साबित किया है। देश से माओवादी और नक्सली आतंक का खात्मा हो चुका है, लेकिन एक दौर में विशेषकर बस्तर के नक्सली इलाकों में नक्सलियों से संवाद के लिए रेडियो का ही इस्तेमाल किया जाता था।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसे संयोग ही कहेंगे कि जब रेडियो प्रसारण तकनीक का आविष्कार हुआ, उन दिनों देश गुलामी की जंजीरों से बंधा था। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत में भी प्रसारण की प्रेरणा ब्रिटेन से मिली। रेडियो प्रसारण तकनीक के विकास के साथ ही 1922 में बीबीसी का गठन हो चुका था। हालांकि ब्रिटेन में इसके पहले ही निजी और शौकिया प्रसारण की शुरूआत हो चुकी थी। इसका असर भारत पर भी पड़ा। भारत में भी 1920 से 1926 के बीच तत्कालीन बंबई और कलकत्ता में रेडियो क्लबों की शुरूआत हुई। उन क्लबों ने अपने तरीके से प्रसारण के किंचित सफल और ज्यादातर असफल प्रयास भी किये। उन दिनों भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड इर्विन थे। अखबारों की तुलना में रेडियो प्रसारण की अहमियत और प्रभाव को इर्विन समझते थे। शायद यही वजह रही कि भारत में 1926 में गठित इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी का गठन हुआ। कुछ रिकॉर्ड के मुताबिक बांबे प्रेसिडेंसी रेडियो क्लब ने जून 1923 में पहला रेडियो प्रसारण किया। इसके करीब पांच महीने बाद नवंबर 1923 में कलकत्ता रेडियो क्लब की स्थापना हुई। ऐसे ही प्रयास तत्कालीन मद्रास में भी हुए। लेकिन पहला व्यवस्थित और संस्थानिक रेडियो प्रसारण इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी ने 23 जुलाई 1927 को मुंबई से किया था। इसी वजह से भारत हर साल 23 जुलाई को प्रसारण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसके महीनेभर बाद 26 अगस्त 1927 को कलकत्ता से बांग्ला में प्रसारण शुरू हुआ।&nbsp;</div></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-role-of-tv-broadcasting-in-nation-building-is-crucial" target="_blank">टीवी प्रसारण की भूमिका राष्ट्र निर्माण में अहम</a></h3><div><div>इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी छह लाख की पूंजी से शुरू की गई थी। कंपनी ने रेडियो प्रसारण के लिए अंग्रेज सरकार से 13 सितंबर 1926 को करार हुआ, जिसके तहत उसने प्रसारण शुरू किया। कंपनी को पूंजी में से साढ़े चार लाख दोनों रेडियो केंद्रों की स्थापना में ही खर्च हो गए। तब आमदनी का स्रोत रेडियो लाइसेंस फीस थी, जो प्रति रेडियो दस रूपए थी। बहुत कोशिशों के बावजूद सिर्फ आठ हजार ही लाइसेंस दिए जा सके। तब प्रसारण डेढ़-डेढ़ किलोवाट के ट्रांसमीटरों से बमुश्किल तीस मील के ही दायरे में हो पा रहा था, लिहाजा रेडियो का प्रसार नहीं बढ़ा। कंपनी को रेडियो प्रसारण के लिए बड़ी रकम खर्च करनी पड़ रही थी। लिहाजा यह कंपनी 1930 में ही बंद हो गई। भारत में आधुनिक प्रसारण की ठोस बुनियाद रखने का श्रेय भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड लिनलिथगो और ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कंपनी के पूर्व प्रसारक लायनेड फील्डेन को जाता है। लिनलिथगो की पहल पर उद्योग और श्रम विभाग के अधीन अप्रैल 1930 में इंडियन स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस की शुरूआत हुई। इसे रेडियो प्रसारण को नया रूप देना था। इसके बाद अगस्त 1935 में लायनेड फील्डेन को इस सर्विस का कंट्रोलर नियुक्त किया गया। फील्डेन को यह नाम पसंद नहीं आ रहा था। फील्डेन ने अपनी पुस्तक ‘नेचुरल बेंट’ में लिखा है कि उन्होंने लिनलिथगो को सुझाया कि ब्रॉडकास्टिंग शब्द कठिन है, जो आसानी से भारतीयों की जुबान पर नहीं चढ़ पाएगा। फिर यह नाम भारत सरकार अधिनियम के अनुकूल नहीं है। लिहाजा उन्होंने इसे ‘ऑल इंडिया रेडियो’ करने का सुझाव दिया। जिसे लिनलिथगो ने स्वीकार कर लिया। इसी के बाद आठ जून 1936 को ऑल इंडिया रेडियो के नाम से दिल्ली के अलीपुर के छह कमरों के एक घर से रेडियो प्रसारण शुरू हुआ। कुछ महीने बाद यह दफ्तर दिल्ली के संसद मार्ग स्थित नए बने प्रसारण भवन में आया और तब से लेकर अब तक दिल्ली केंद्र का प्रसारण वहीं से हो रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीन मई 2023 से ऑल इंडिया रेडियो आकाशवाणी के नाम से जाना जा रहा है। वैसे ऑल इंडिया रेडियो को आकाशवाणी नाम गांधी जयंती के दिन 1957 में दिया गया, जिसे अगले दिन से लागू किया गया। आकाशवाणी का जिक्र हमारे पौराणिक ग्रंथों में आकाश से आने वाली आवाज या देववाणी के रूप में मिलता है। वैसे आकाशवाणी के नाम से मैसूर के विद्वान एमवी गोपालस्वामी ने 10 सितंबर 1935 से रेडियो प्रसारण शुरू किया था। यह प्रसारण केंद्र मैसूर राजमहल से कुछ सौ मीटर दूर स्थित है। आकाशवाणी का जिक्र 1938 में कलकत्ता में शॉर्ट वेब के प्रसारण की शुरूआत के वक्त भी हुआ। तब प्रसारण के लिए ऑल इंडिया रेडियो ने गुरूदेव रवींद्र नाथ टैगोर से एक कविता मांगी थी। टैगौर ने बांग्ला की जो कविता दी, उसमें रेडियो के लिए आकाशवाणी शब्द का प्रयोग हुआ है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसे संयोग ही कहेंगे कि जिस समय देश में रेडियो का विस्तार हो रहा था, उन्हीं दिनों स्वाधीनता आंदोलन चरम पर था। उसी दौरान 1942 में डॉक्टर राममनोहर लोहिया और ऊषा मेहता की अगुआई में मुंबई से कांग्रेस रेडियो और रंगून से सुभाष चंद्र बोस ने आजाद रेडियो का प्रसारण शुरू किया। बोस जहां अपने रेडियो के जरिए भारतीय जनता से संवाद कर रहे थे, वहीं कांग्रेस रेडियो भूमिगत ढंग से चलाया जा रहा था। जिसके जरिए कांग्रेस कार्यकर्ताओं और स्वतंत्रता आंदोलनकारियों को सूचनाएं दी जा रही थीं। उन्हीं दिनों अंग्रेज सरकार ने देश में नौ रेडियो प्रसारण केंद्र स्थापित किए। ये केंद्र दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, लखनऊ, त्रिचिरापल्ली, चेन्नई, ढाका, पेशावर और लाहौर में थे। बंटवारे के बाद भारत के हिस्से छह रेडियो स्टेशन आए, जबकि पाकिस्तान को ढाका, पेशावर और लाहौर स्टेशन मिले। आजादी के बाद देश के पहले सूचना और प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी सरदार पटेल को मिली। उन्हें रेडियो की महत्ता का भान था। इसीलिए उन्होंने रेडियो के तेज विकास की नींव रखी। आजादी के बाद पहला रेडियो स्टेशन 16 जुलाई 1948 को शुरू हुआ। जिसका उद्घाटन पटेल ने किया था। स्वाधीन भारत में रेडियो का चरित्र और लक्ष्य क्या होगा, इसका संकेत सरदार पटेल के उस उद्घाटन भाषण में दिखता है। सार्वजनिक प्रसारक के रूप में रेडियो के लक्ष्य को एक तरह से मद्रास प्रांत के तत्कालीन प्रीमियर सी राजगोपालाचारी ने 1938 में ही रख दिया था। 16 जून 1938 को मद्रास रेडियो स्टेशन का उद्घाटन करते हुए राजगोपालाचारी ने रेडियो को लोक जागरण का महत्वपूर्ण माध्यम बताया था। इसके साथ ही उन्होंने संचार के तेज माध्यम के रूप में रेडियो का शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि संबंधी जानकारी देने के लिए करने पर जोर दिया था। यहां यह बताना जरूरी नहीं है कि सार्वजनिक प्रसारक के रूप में रेडियो आज भी यह भूमिका बखूबी निभा रहा है।</div><div><br></div><div>भारतीय इतिहास में रेडियो कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है। तीन जून 1947 को भारत विभाजन की योजना की देश को जानकारी रेडियो के जरिए ही मिली। तब माउंट बेटन, नेहरू, जिन्ना और सरदार बलदेव सिंह ने रेडियो के ही माध्यम से अपने विचार रखे थे। 14-15 अगस्त 1947 की दरम्यानी रात को भारत की आजादी के बाद नेहरू के प्रसिद्ध भाषण ‘ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी’ को देश ने रेडियो के जरिए सुना था। गांधी जी जिंदगी में सिर्फ एक बार 12 नवंबर 1948 को दिल्ली केंद्र आए थे। यहां से उन्होंने रेडियो के जरिए कुरूक्षेत्र स्थित शरणार्थियों को संबोधित किया था। उसका सकारात्मक असर पड़ा। गांधी इसके बाद रेडियो के मुरीद हो गए थे। इस याद को आकाशवाणी ने 12 नवंबर के दिन को लोक प्रसारण दिवस के रूप में याद रखा है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>23 जुलाई 1927 को महज शौकिया प्रसारण से शुरू हुई आकाशाणी का प्रसारण आज विशाल वटवृक्ष के रूप फैल चुका है। आज 232 केंद्रों, 304 चैनलों और 756 ट्रांसमीटरों के विशाल नेटवर्क के साथ आकाशवाणी दुनिया का सबसे बड़ा प्रसारक है। इसकी पहुंच देश के करीब 92 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र और 99 प्रतिशत जनसंख्या तक है। जिनके लिए 23 भाषाओं और 183 बोलियों में लगातार प्रसारण जारी है। कह सकते हैं कि सौ साल में प्रसारण आज देश की धड़कन बन चुका है, जिसमें सूचनाएं हैं, संगीत है और लोकजागरण का संदेश&nbsp; भी।</div></div><div><br></div><div>उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 13:06:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/indian-broadcasting-towards-the-centennial-milestone</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[विक्रम-1: नए भारत की अंतरिक्ष उड़ान का स्वर्णिम अध्याय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/vikram-1-a-golden-chapter-in-new-india-space-journey]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि यदि संकल्प, वैज्ञानिक दृष्टि और नवाचार का संगम हो तो आकाश भी सीमा नहीं, बल्कि संभावनाओं का प्रारंभ बन जाता है। भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ का सफल प्रक्षेपण केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत, नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था और विज्ञान-प्रधान भविष्य की ओर बढ़ते राष्ट्र का एक नया घोषणापत्र है। श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से ‘मिशन आगमन’ के अंतर्गत हुई यह ऐतिहासिक उड़ान भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में एक ऐसे स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि अब अंतरिक्ष विज्ञान केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निजी उद्यम भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत का नेतृत्व करेंगे। निश्चित ही विक्रम-1 नए भारत की अंतरिक्ष उड़ान का स्वर्णिम अध्याय एवं निजी अंतरिक्ष क्रांति की आकाशीय सफलताओं की नई जमीन है।&nbsp;</div><div><br></div><div>विक्रम-1 की सफलता उस महान वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई के स्वप्न को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिन्होंने कभी कहा था कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए अंतरिक्ष विज्ञान विलासिता नहीं, बल्कि विकास का अनिवार्य साधन है। आज उसी विचार की आधुनिक अभिव्यक्ति स्काईरूट एयरोस्पेस के रूप में दिखाई देती है, जिसने अपने पहले ही प्रयास में इतिहास रच दिया। यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष है क्योंकि इस समय दुनिया में केवल कुछ ही देशों के निजी उपक्रम ऑर्बिटल रॉकेट विकसित कर पाए हैं। भारत अब उस विशिष्ट समूह में शामिल हो गया है, जहां नवाचार, वैज्ञानिक कौशल और उद्यमशीलता मिलकर नई संभावनाओं का निर्माण कर रहे हैं। अमेरिका के स्पेसएक्स ने जिस निजी अंतरिक्ष क्रांति की शुरुआत की थी, भारत ने अब उसका अपना स्वदेशी संस्करण प्रस्तुत कर दिया है।</div><div><br></div><div>विक्रम-1 की तकनीकी विशेषताएं भी इसे विशिष्ट बनाती हैं। पूरी तरह कार्बन कंपोजिट से निर्मित यह रॉकेट अपेक्षाकृत हल्का, अधिक मजबूत तथा कम लागत वाला है। थ्री-डी प्रिंटिंग जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के उपयोग ने इसके निर्माण खर्च को उल्लेखनीय रूप से कम किया है। इसका सीधा अर्थ है कि भविष्य में छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण का वैश्विक बाजार भारत के लिए नए आर्थिक अवसर लेकर आएगा। आज दुनिया में संचार, मौसम पूर्वानुमान, कृषि, रक्षा, आपदा प्रबंधन, इंटरनेट सेवाएं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों के लिए हजारों छोटे उपग्रहों की आवश्यकता बढ़ रही है। ऐसे में भारत कम लागत और उच्च विश्वसनीयता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकता है। ‘विक्रम-1’ को विकसित करने वाली निजी कंपनी ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ ने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर इस रॉकेट का नामकरण कर न सिर्फ उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है, बल्कि हमारे औद्योगिक घरानों को भी यह संदेश दिया है कि कारोबार करते हुए भी अपने देश की समृद्ध विरासत का सम्मान किया जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>गौर कीजिए, अप्रैल 1975 में जब भारत ने अपना पहला उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा था, तब उसका नामकरण महान खगोल वैज्ञानिक आर्यभट्ट के नाम पर किया गया था। यह सफलता केवल एक कंपनी की उपलब्धि नहीं है। यह उस नई नीति का परिणाम भी है जिसके अंतर्गत भारत सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी निवेश और स्टार्टअप के लिए खोलने का साहसिक निर्णय लिया। नई अंतरिक्ष नीति, इन-स्पेस जैसी संस्थाओं की स्थापना तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए उदार प्रावधानों ने भारतीय युवाओं के सामने नए अवसरों के द्वार खोल दिए हैं। आज देश में अनेक स्पेस स्टार्टअप उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण प्रणाली, अंतरिक्ष संचार और डेटा सेवाओं के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यह परिवर्तन भारत को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में मजबूत आधार प्रदान करेगा। किन्तु हर सफलता अपने साथ नई चुनौतियां भी लेकर आती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/vikram-1-launch-pm-modi-says-private-rocket-is-a-testament-to-the-strength-of-atmanirbhar-bharat" target="_blank">Vikram-1 Launch: PM Modi बोले, निजी रॉकेट आत्मनिर्भर भारत की ताकत का प्रमाण</a></h3><div>विक्रम-1 की पहली उड़ान सफल अवश्य रही है, परंतु अंतरिक्ष उद्योग में स्थायी सफलता केवल एक प्रक्षेपण से सुनिश्चित नहीं होती। स्काईरूट एयरोस्पेस को अब वैश्विक बाजार में स्पेसएक्स, रॉकेट लैब तथा चीन की अनेक निजी कंपनियों जैसी सशक्त प्रतिस्पर्धा का सामना करना होगा। नियमित ग्राहक, समय पर प्रक्षेपण, कम लागत, उच्च विश्वसनीयता तथा भविष्य में पुनः प्रयोज्य रॉकेट तकनीक विकसित करना उसकी अगली बड़ी परीक्षा होगी। अंतरिक्ष उद्योग में विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होता है और वह निरंतर सफल अभियानों से ही अर्जित किया जा सकता है। इस ऐतिहासिक सफलता के बीच एक गंभीर प्रश्न भी हमारे सामने खड़ा है-क्या इसरो अपनी वैज्ञानिक प्रतिभाओं को लंबे समय तक अपने साथ बनाए रख पाएगा? हाल के वर्षों में अनेक अनुभवी वैज्ञानिक निजी क्षेत्र की ओर आकर्षित हुए हैं। इसका कारण केवल अधिक वेतन नहीं, बल्कि बेहतर कार्य संस्कृति, अनुसंधान की स्वतंत्रता, त्वरित निर्णय प्रक्रिया और नवाचार के लिए अनुकूल वातावरण भी है।</div><div><br></div><div>इसरो ने भारत को चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य-एल1, गगनयान जैसी ऐतिहासिक उपलब्धियां दी हैं। सीमित संसाधनों में विश्वस्तरीय परिणाम देकर इसरो ने पूरी दुनिया का सम्मान अर्जित किया है। किंतु यदि प्रतिभाशाली वैज्ञानिक धीरे-धीरे संस्थान से बाहर जाते रहे तो दीर्घकाल में अनुसंधान और राष्ट्रीय अंतरिक्ष कार्यक्रम प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए इसरो के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल नए मिशन तैयार करना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रतिभाओं को प्रेरित, सम्मानित और संतुष्ट बनाए रखना भी है। सरकार को चाहिए कि इसरो के वैज्ञानिकों के लिए प्रतिस्पर्धी वेतन संरचना, अत्याधुनिक अनुसंधान सुविधाएं, निर्णय लेने की अधिक स्वतंत्रता तथा नवाचार को प्रोत्साहित करने वाली नीतियां विकसित करे। सरकारी संस्थानों और निजी कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सहयोग का वातावरण तैयार होना चाहिए। निजी क्षेत्र इसरो का विकल्प नहीं, बल्कि उसका सहयोगी बन सकता है। जिस प्रकार अमेरिका में नासा और स्पेसएक्स मिलकर अंतरिक्ष कार्यक्रमों को नई ऊंचाइयों तक ले जा रहे हैं, उसी प्रकार भारत में इसरो और निजी कंपनियों का समन्वय देश को वैश्विक नेतृत्व प्रदान कर सकता है।</div><div><br></div><div>आज आवश्यकता इस बात की भी है कि अंतरिक्ष विज्ञान को विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के स्तर तक पहुंचाया जाए। विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं का विषय न रहकर जन-आंदोलन बने। युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और नवाचारकर्ताओं को स्टार्टअप संस्कृति से जोड़ने के लिए विशेष प्रोत्साहन दिया जाए। यदि प्रत्येक राज्य में स्पेस टेक्नोलॉजी इनोवेशन सेंटर स्थापित किए जाएं, उद्योगों और विश्वविद्यालयों के बीच अनुसंधान साझेदारी विकसित की जाए तथा अंतरिक्ष तकनीक में निवेश को बढ़ावा दिया जाए तो भारत अगले दशक में विश्व का अग्रणी अंतरिक्ष नवाचार केंद्र बन सकता है। भविष्य की आकाशीय सफलताओं की नई जमीन तैयार करने के लिए कुछ रचनात्मक कदम अत्यंत आवश्यक हैं-इसरो और निजी कंपनियों के बीच संयुक्त अनुसंधान परियोजनाएं प्रारंभ हों; पुनः प्रयोज्य रॉकेट तकनीक और हरित प्रणोदन (ग्रीन प्रोपल्शन) पर विशेष निवेश किया जाए; अंतरिक्ष विनिर्माण के लिए स्वदेशी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत किया जाए; युवाओं के लिए अंतरिक्ष उद्यमिता को बढ़ावा देने वाले विशेष कोष बनाए जाएं; तथा अंतरिक्ष कानूनों को सरल, पारदर्शी और निवेश-अनुकूल बनाया जाए। साथ ही, अंतरिक्ष मलबे (स्पेस डेब्रिस) के प्रबंधन, पर्यावरणीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा, क्योंकि भविष्य का अंतरिक्ष विकास केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व का भी विषय है।</div><div><br></div><div>विक्रम-1 ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत अब केवल अंतरिक्ष में पहुंचने वाला देश नहीं, बल्कि अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने की क्षमता रखने वाला राष्ट्र बन चुका है। यह सफलता नए भारत के आत्मविश्वास, युवाओं की प्रतिभा और वैज्ञानिक सोच की विजय है। यह उस राष्ट्र की कहानी है जिसने कभी साइकिल और बैलगाड़ी पर रॉकेट के पुर्जे ढोए थे और आज निजी क्षेत्र के माध्यम से वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करा रहा है। वास्तव में, विक्रम-1 केवल एक रॉकेट नहीं, बल्कि भारत के वैज्ञानिक आत्मविश्वास का उड़ता हुआ प्रतीक है। यह सफलता हमें यह संदेश देती है कि यदि नीति, प्रतिभा, उद्योग और राष्ट्रीय संकल्प एक दिशा में आगे बढ़ें तो असंभव भी संभव बन जाता है। निजी क्षेत्र की यह सफलता विज्ञान में अभिरुचि रखने वाले भारतीयों के लिए एक आह्वान है- अंतरिक्ष सेनानिया करो प्रयाण, सारा आकाश तुम्हारा है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इस ऐतिहासिक उपलब्धि को एक शुरुआत मानते हुए भारत अंतरिक्ष विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार की ऐसी मजबूत नींव तैयार करे, जहां इसरो की गौरवशाली परंपरा और निजी क्षेत्र की नई ऊर्जा मिलकर विश्व को नई दिशा दें। तभी सच अर्थों में यह कहा जा सकेगा कि अब केवल धरती ही नहीं, बल्कि पूरा आकाश भी भारत की नई विकास-गाथा का विस्तार बन चुका है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 11:54:01 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/vikram-1-a-golden-chapter-in-new-india-space-journey</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च से सुलगते सवाल और राजनीतिक निहितार्थ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/burning-questions-and-political-implications-arising-from-the-cjp-march-to-parliament]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का "संसद चलो" आह्वान केवल एक विरोध मार्च नहीं, बल्कि केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की एक राजनीतिक रणनीति है। खासकर जिस तरह से इस आंदोलन को छात्र आंदोलन का स्वरूप दिलवाया जा चुका है, वह डीप स्टेट के इशारे पर बनी विपक्ष की शातिर सरकार घेरो रणनीति का कमाल भी करार दिया जा रहा है। देखा जाए तो संसद के मानसून सत्र के दौरान गत 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च करने के दौरान बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जुटे और कूच किया, वह बिल्कुल संगठित राजनीतिक आंदोलन के तर्ज पर हुआ।&nbsp;</p><p>मजे की बात तो यह कि संसद के निकट पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जो पूर्व प्रायोजित झड़प हुई और उसके बाद हालात नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया, इससे यह संसद मार्च राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियां बन गया। बड़े बड़े न्यूज़ चैनल्स और अखबारों के दफ्तरों में इससे जुड़े कई नीतिगत सवालों पर भी बहस होने लगी। सोशल मीडिया पर जहां सरकार विरोधी भड़काऊ वीडियो वायरल होने लगे, वहीं सत्ताधारी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी आंदोलनकारियों की कारगुजारियों के वीडियो साझा कर दिए, जिससे लोगों की सहानुभूति पुलिस और सरकार के साथ बनी रही।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/jp-nadda-suddenly-arrived-at-the-hospital-to-meet-those-injured-in-the-cjp-protests" target="_blank" rel="noopener">अचानक  CJP विरोध प्रदर्शन में घायल लोगों से मिलने अस्पताल पहुंच गए जेपी नड्डा, डॉक्टरों के साथ की हाई लेवल मीटिंग</a></p><p>यदि संसद मार्च के घटनाक्रमों पर संतुलित नजर डालें तो यही प्रतीत होता है कि जब बड़ी संख्या में सीजेपी (CJP) समर्थक "संसद चलो" मार्च के लिए जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़े, तो भले ही उनकी मुख्य मांगें शिक्षा सुधार, परीक्षा-पत्र लीक और जवाबदेही था, लेकिन इरादे तोड़फोड़ वाले और खतरनाक थे, अन्यथा पुलिस को बल प्रयोग नहीं करना पड़ता। चूंकि संसद के मानसून सत्र के दौरान माननीयों की सुरक्षा के दृष्टिगत दिल्ली पुलिस ने व्यापक बैरिकेडिंग की थी, इसलिए ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। पुलिस ने कुछ प्रदर्शनकारियों को रोका, हिरासत में लिया तथा कुछ स्थानों पर आंदोलनकारियों द्वारा उपद्रव करने के बाद आंसू गैस और बल प्रयोग की घटनाएं सामने आईं। इससे अफरातफरी मच गई।</p><p>देखा जाए तो इस आंदोलन की प्रमुख मांगों में नीट (NEET) पेपर लीक और भर्ती प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं पर कार्रवाई, बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार की जवाबदेही, कुछ नेताओं द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग, आंदोलन से जुड़े लोगों के साथ संवाद आदि हैं, लेकिन जो उत्पात दिखाई-सुनाई दिया, वह विपक्षी संस्कार नहीं तो क्या है? फिर भी, केंद्र सरकार ने आंदोलन के प्रतिनिधियों से बातचीत की पहल भी की, जो टकराव के बीच संवाद की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है। भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जे. पी. नड्डा ने सरकारी प्रतिनिधि के तौर पर CJP प्रतिनिधिमंडल से बातचीत की और मांगपत्र ग्रहण किया। बावजूद इसके आंदोलनकारी अपनी मांगों पर कायम हैं।&nbsp;</p><p>सवाल है कि संसद मार्च के क्रम में जो कुछ गड़बड़ हुआ, क्या वह लोकतांत्रिक है, सही था या गलत? तो जवाब होगा कि युवाओं का शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा की निष्पक्षता जैसे मुद्दों पर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज़ उठाना लोकतंत्र का वैध हिस्सा है। वहीं, सरकार द्वारा आंदोलनकारियों से बातचीत शुरू करना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप कदम है। फिर भी संसद मार्च के दौरान&nbsp; आंदोलनकारियों की ओर से कुछ कुछ गलत हुआ जो अनुचित लगा। यदि प्रदर्शनकारियों ने निषिद्ध क्षेत्र में जबरन प्रवेश करने या बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की, तो वह कानून-व्यवस्था की दृष्टि से उचित नहीं माना जाएगा।&nbsp;</p><p>वहीं, यदि पुलिस ने आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया या शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर अनावश्यक कार्रवाई हुई, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय होनी चाहिए। हालांकि, इस पर अलग-अलग पक्षों के अपने अपने दावे हैं और सभी तथ्यों के गोलमोल जवाब ही मिले हैं, जिनपर एतबार करना मुश्किल है क्योंकि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, जिसका अंतिम सत्यापन अभी होना बाकी है, कई अनकही कहानियां गढ़ रहे हैं। इससे सरकार सांसत में है और विपक्ष तरह-तरह के आरोप लगाकर सिस्टम की मुश्किलें बढ़ा रहा है। हालांकि इस बात में कोई दो राय नहीं कि लोकतांत्रिक समाधान का सर्वोत्तम रास्ता संवाद और कानून के दायरे में रहकर समस्या का समाधान है।</p><p>भले ही किसी भी लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अपनी मांगें रखना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन इस संसद मार्च के क्रम में देश की राजधानी नई दिल्ली के हृदय स्थल पर, जिस प्रकार की हिंसा, तोड़फोड़, सार्वजनिक व निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाना या सुरक्षा बलों से टकराव की जो प्रवृति दिखाई दी, वह विपक्षी दलों का परोक्ष कुचक्र नहीं तो क्या है? आखिर इस देशद्रोही प्रवृति को कदापि उचित नहीं ठहराया जा सकता है।&nbsp;</p><p>इसी प्रकार, यदि पुलिस बल का प्रयोग आवश्यकता से अधिक हुआ हो, तो उसकी भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। सवाल है कि क्या स्थानीय जिलाधिकारी और डीसीपी के पास छात्र समूह को काबू में रखने की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं थी? और यदि थी तो फिर इतना सबकुछ कैसे हुआ? वहीं कोई पुलिस कर्मी कैसे पिट गया और घायल हुआ? आखिर किसी दुकानदार को तोड़-फोड़ का सामना क्यों और कैसे करना पड़ा? जनपथ बाजार की सुरक्षा के व्यापक बंदोबस्त क्यों नहीं किए गए थे। वहीं, अनियंत्रित युवा भीड़ क्यों जुटने दी गई और उनको काबू में रखने के लिए व्यापक बंदोबस्त क्यों नहीं किये गए थे?</p><h2 class=""># कॉकरोच जनता पार्टी के "संसद चलो" आह्वान के राजनीतिक मायने&nbsp;</h2><p>कॉकरोच जनता पार्टी के "संसद चलो" आह्वान के राजनीतिक मायने केवल एक विरोध मार्च तक सीमित नहीं हैं,&nbsp; बल्कि यह भारतीय राजनीति में युवाओं के असंतोष, डिजिटल आंदोलन और पारंपरिक दलों के प्रति अविश्वास का प्रतीक बनकर उभरा है। हालांकि CJP स्वयं को व्यंग्यात्मक (satirical) आंदोलन बताता है, लेकिन इसके मुद्दे गंभीर राजनीतिक प्रश्न उठाते हैं।&nbsp;</p><p>यही वजह है कि राजनीतिक दृष्टि से इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं:- पहला, संसद के मानसून सत्र के पहले दिन दबाव की राजनीति। दूसरा, युवाओं और प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थियों के असंतोष को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का प्रयास। तीसरा, विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का अवसर और चौथा, सरकार के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए आंदोलनकारियों से संवाद की चुनौती आदि।&nbsp;</p><p>हालांकि, इसके प्रमुख राजनीतिक संकेत इस प्रकार हैं:</p><p>एक, युवा असंतोष का राजनीतिक रूपांतरण: बेरोज़गारी, परीक्षा-पत्र लीक, शिक्षा व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को लेकर नाराज़गी को संगठित करने का प्रयास दिखाई देता है। दो, डिजिटल से सड़क तक: सोशल मीडिया पर शुरू हुआ अभियान अब वास्तविक जन-प्रदर्शन में बदलता दिख रहा है, जो यह संकेत देता है कि ऑनलाइन असंतोष भी राजनीतिक दबाव का माध्यम बन सकता है।&nbsp;</p><p>तीन, सरकार पर दबाव: संसद के मानसून सत्र के पहले दिन मार्च का समय चुनना सरकार और संसद का ध्यान आकर्षित करने की रणनीति माना जा सकता है। सरकार और CJP प्रतिनिधियों के बीच बातचीत शुरू होने की खबर भी इसी दबाव का संकेत है। </p><p>चार, विपक्ष के लिए अवसर: यदि विपक्ष इस असंतोष को राजनीतिक समर्थन देता है, तो यह सरकार को घेरने का एक नया मुद्दा बन सकता है। वहीं यदि आंदोलन स्वतंत्र बना रहता है, तो यह पारंपरिक दलों से अलग एक नई राजनीतिक शैली का संकेत होगा।</p><p>पांच, प्रतीकों की राजनीति: "कॉकरोच" जैसे अपमानजनक शब्द को पहचान और प्रतिरोध के प्रतीक में बदलना राजनीतिक संचार की एक प्रभावी रणनीति है, जो विशेषकर युवाओं के बीच ध्यान आकर्षित करती है। छठा, CJP की कई मांगें और उसकी प्रस्तुति व्यंग्य एवं प्रतीकात्मक राजनीति का हिस्सा हैं। इसलिए यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि यह एक स्थायी राष्ट्रीय राजनीतिक शक्ति बन जाएगी। दरअसल उसकी वास्तविक राजनीतिक क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या वह सोशल मीडिया की लोकप्रियता को लंबे समय तक संगठित जनसमर्थन और ठोस राजनीतिक संगठन में बदल पाती है।&nbsp;</p><p>निष्कर्षत: यही कहना उपयुक्त होगा कि लोकतंत्र में न तो हिंसक टकराव समाधान है और न ही वैध असंतोष को केवल बल पूर्वक दबाना। लिहाजा सबसे उचित रास्ता यही है कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहे, कानून का सम्मान हो, और सरकार ठोस संवाद के माध्यम से शिक्षा सुधार तथा परीक्षा प्रणाली से जुड़े मुद्दों का विश्वसनीय समाधान प्रस्तुत करे। अन्यथा छात्र आंदोलन यदि राष्ट्रीय स्वरूप अख्तियार कर लेगा तो सनातनी सत्ता को लेने के देने पड़ जाएंगे।</p><p>- कमलेश पांडेय</p><p><span style="letter-spacing: 0px;">वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</span></p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 16:41:30 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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