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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट क्या है? यह सीमा रक्षा के लिए क्यों और कहाँ कहाँ जरूरी है? विस्तार से जानिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/what-is-the-smart-border-project-why-is-it-necessary-for-border-defense-and-where-is-it-required]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट भारत की सीमाओं को पारंपरिक तारबंदी और मानव गश्त से आगे बढ़ाकर तकनीक आधारित “इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा कवच” में बदलने की योजना है। इसे मुख्यतः कम्प्रिहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम (CIBMS- Comprehensive Integrated Border Management System) के तहत विकसित किया गया है। हाल में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमा पर बड़े स्तर पर "स्मार्ट&nbsp; &nbsp;बॉर्डर प्रोजेक्ट" लागू किया है।</div><div><br></div><h2># जानिए स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट क्या है?</h2><div><br></div><div>स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट एक ऐसा सिस्टम है जिसमें सीमा पर केवल बाड़ (Fence) नहीं होती, बल्कि एआई (AI) आधारित निगरानी, सेंसर नेटवर्क, ड्रोन और रडार, थर्मल कैमरे, भूमिगत सेंसर, सैटेलाइट और फाइबर नेटवर्क, रियल टाइम कमांड सेंटर आदि सभी को परस्पर जोड़कर “इंटेलिजेंट बॉर्डर” बनाया जाता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/amit-shah-is-preparing-for-major-action-on-pakistan-and-bangladesh-border" target="_blank">Pakistan और Bangladesh Border पर बड़े एक्शन की तैयारी में Amit Shah, ला रहे हैं Smart Border Project, घुसपैठ पर लगेगा फुल स्टॉप</a></h3><h2># स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट में अनुप्रयुक्त तकनीकों के बारे में जानिए</h2><div><br></div><div>सवाल है कि आखिर स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट में कौन-कौन सी तकनीकें अनुप्रयुक्त होती हैं? तो यह जान लीजिए कि स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट में नअनुप्रयुक्त तकनीकें निम्नलिखित हैं:- पहला, थर्मल इमेजर और नाइट विजन का उपयोग किया जाता है जो रात, कोहरा, बारिश या धूलभरी आंधी में भी गतिविधि पकड़ लेते हैं। दूसरा, लेजर और इन्फ्रारेड अलार्म का उपयोग किया जाता है जिससे कोई व्यक्ति सीमा पार करे तो तुरंत अलर्ट मिलता है।&nbsp; तीसरा, ग्राउंड सेंसर की खासियत यह है कि ये भूमिगत सुरंग (Tunnel) या कंपन तक पहचान सकते हैं। चौथा, ड्रोन और एरोस्टेट के अनुप्रयोग से ऊपर से लगातार निगरानी होती रहती है और बड़े क्षेत्रों में तेजी से ट्रैकिंग सम्भव हो पाता है। पांचवां, रडार और सोनार के उपयोग से नदी या दलदली क्षेत्रों में नावों और गतिविधियों पर निगरानी सम्भव हो जाती है। छठा, कमांड और कंट्रोल सेंटर (Command &amp; Control Centr) से सभी सेंसरों की जानकारी एक ही कंट्रोल रूम में पहुंचती है, जहाँ BSF/ITBP तुरंत प्रतिक्रिया दे सकते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2># आखिर भारत को इसकी जरूरत क्यों है?</h2><div><br></div><div>सवाल है कि आखिर भारत को इसकी जरूरत क्यों है? तो यह जान लीजिए कि निम्नलिखित वजहों से भारत को इसकी जरूरत है:- पहला, आतंकवाद और घुसपैठ रोकने के लिए क्योंकि विशेषकर पाकिस्तान सीमा पर आतंकियों की घुसपैठ बड़ी चुनौती रही है। दूसरा, अवैध प्रवासन रोकने के लिए, क्योंकि बांग्लादेश सीमा पर अवैध घुसपैठ, मानव तस्करी और तस्करी लंबे समय से समस्या रही है। तीसरा, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण भारत को इसकी सख्त जरूरत है, क्योंकि भारत की सीमाएँ- रेगिस्तान, पहाड़, घने जंगल, नदी क्षेत्र, दलदली इलाके से होकर गुजरती हैं, जहाँ सामान्य फेंसिंग कारगर नहीं होती। चतुर्थ,जवानों की सुरक्षा के दृष्टिगत, क्योंकि लगातार गश्त में सैनिकों की जान का जोखिम रहता है। स्मार्ट निगरानी से यह दबाव कम होगा। पांचवां, निरंतर 24×7 निगरानी हेतु, क्योंकि मानव गश्त सीमित होती है, लेकिन सेंसर और एआई (AI) चौबीसों घंटे काम कर सकते हैं।</div><div><br></div><h2># आखिर भारत की किन सीमाओं पर यह सबसे ज्यादा जरूरी है?</h2><div><br></div><div>सवाल है कि भारत की किन किन सीमाओं पर यह सबसे ज्यादा जरूरी है? तो यह जान लीजिए कि पहला, पाकिस्तान सीमा पर क्यों जरूरी है? यहां पर आतंकवादी घुसपैठ, ड्रोन से हथियार/नशा भेजना, सीमा पार फायरिंग, सुरंगों का उपयोग किया जाता है। सवाल है कि कहाँ कहाँ विशेष जरूरत है? तो यह समझ लीजिए कि जम्मू सेक्टर, पंजाब सीमा, राजस्थान का रेगिस्तानी क्षेत्र में इसकी सख्त जरूरत है। यही वजह है कि 2018 में जम्मू क्षेत्र में भारत का पहला स्मार्ट फेंस पायलट शुरू किया गया था।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरा, बांग्लादेश सीमा पर क्यों जरूरी है? तो यह समझ लीजिए कि अवैध घुसपैठ, मानव तस्करी, पशु तस्करी, नदी क्षेत्रों से प्रवेश रोकने हेतु इसकी जरूरत है। यहां से जुड़े सबसे संवेदनशील क्षेत्र में असम का धुबरी क्षेत्र, पश्चिम बंगाल सीमा, त्रिपुरा और मेघालय प्रमुख हैं, जहां की नदी और दलदली इलाकों में "प्रोजेक्ट बोल्ड किट" (Project BOLD-QIT) लागू किया गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा, चीन सीमा पर क्यों जरूरी? बताया जाता है कि एलएसी (LAC) पर तनाव, कठिन हिमालयी इलाके, अचानक सैनिक गतिविधियाँ, मौसम संबंधी चुनौतियाँ के दृष्टिगत इसकी जरूरत समझी जाती है। जहां तक कहाँ जरूरत? जैसे सवाल की बात है तो लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम के समीप&nbsp; एआई (AI), ड्रोन, सैटेलाइट और हाई-एल्टीट्यूड सेंसर सबसे महत्वपूर्ण होंगे।</div><div><br></div><div>चौथा, आखिर म्यांमार सीमा पर क्यों जरूरी है? तो बताया जाता है कि उग्रवाद, हथियार और ड्रग्स तस्करी, अवैध आवाजाही के चलते भारत ने म्यांमार सीमा पर भी स्मार्ट फेंसिंग की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2># स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट के बड़े फायदे</h2><div><br></div><div>जहां तक स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट के बड़े फायदे की बात है तो इसके सामरिक फायदे हैं- घुसपैठ में कमी, आतंकवाद पर नियंत्रण और तेज प्रतिक्रिया क्षमता। वहीं आर्थिक फायदे के तौर पर लंबी अवधि में गश्त की लागत कम होगी, तस्करी से होने वाले नुकसान में कमी आएगी। वहीं सामाजिक फायदे के तौर पर सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा भावना, जनसंख्या असंतुलन संबंधी चिंताओं पर नियंत्रण होगा। जबकि तकनीकी फायदे के रूप में मेक इन इंडिया (Make in India) रक्षा तकनीक को बढ़ावा मिलेगा तथा एआई (AI) और ड्रोन उद्योग का विकास होगा।</div><div><br></div><div>जहां तक चुनौतियों की बात है तो निम्नलिखित चुनौतियाँ इस राह में हैं? पहला, बहुत अधिक लागत: पूरी सीमा पर हाई-टेक सिस्टम लगाना बेहद महंगा है। दूसरा, कठिन मौसम: हिमालय, रेगिस्तान और बाढ़ वाले क्षेत्रों में तकनीक टिकाऊ बनाना चुनौती है। तीसरा, साइबर सुरक्षा: यदि सिस्टम हैक हुआ तो सुरक्षा खतरा बढ़ सकता है। चौथा, स्थानीय सहयोग: सीमावर्ती गाँवों का सहयोग जरूरी है।</div><div><br></div><div>सवाल है कि इसे अपनाकर भविष्य में भारत क्या कर सकता है? तो यह जान लीजिए कि एआई (AI) आधारित “Predictive Border Security”, स्वचालित ड्रोन पेट्रोलिंग, सैटेलाइट आधारित लाइव मॉनिटरिंग, रोबोटिक बॉर्डर पोस्ट और Integrated Defence Grid को अपनाकर भारत अपनी सीमा को और अधिक सुरक्षित बना सकता है।</div><div><br></div><div>निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट केवल “फेंसिंग” नहीं बल्कि भारत की सीमा सुरक्षा सोच में बड़ा बदलाव है। यह पारंपरिक चौकियों से आगे बढ़कर डेटा, AI, सेंसर और रियल टाइम निगरानी आधारित सुरक्षा मॉडल की ओर कदम है। पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमा पर इसकी तत्काल आवश्यकता है, जबकि चीन और म्यांमार सीमा पर यह भविष्य की सामरिक जरूरत बनता जा रहा है। यदि सही तरीके से लागू हुआ, तो यह भारत की सीमा सुरक्षा को 21वीं सदी के स्तर पर ले जा सकता है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 23 May 2026 18:35:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/what-is-the-smart-border-project-why-is-it-necessary-for-border-defense-and-where-is-it-required</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[देश की वैश्विक पहचान बनाने और जड़ों से जोड़ने में मिली है कामयाबी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/success-has-been-achieved-in-establishing-country-global-identity-and-connecting-it-to-its-roots]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इन दिनों भारत की मीडिया में बंदिशों और लोकतंत्र के सिकुड़ते जाने की कथाएं हवा में तैर रही हैं। लोकतंत्र बचाने में वे सब आगे हैं जिनके शासन की कथाएं उन्हें खुद मुंह चिढ़ा रही हैं। मीडिया को दबाने, नियंत्रित करने की कहानियां आज की नहीं हैं। लेकिन मीडिया की हिम्मत भी आज की नहीं है। हमारे देश में पत्रकारिता की शुरुआत ही जेम्स आगस्टस हिकी की क्रांतिकारी लेखनी से प्रारंभ होती है, जिसने अंग्रेज लाट साहबों की बैंड बजा दी। अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध फूंककर उसने अंग्रेज होकर भी जेलें झेलीं, जुर्माने चुकाए और खामोश मौत पाई। किंतु हिकी यह बता गया कि पत्रकारिता क्यों और कैसे करनी है। इसके बाद आजादी के आंदोलन में यही पत्रकारिता ‘खबर’ की जगह ‘पैगाम’ देने वाली बन गयी। जिसके कारण शायर को कहना पड़ा कि जब तोप मुकाबिल तो अखबार निकालो।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><h2>सुनने और देखने का समय-</h2><div>हमारे देश के हर क्रांतिकारी और आजादी के नायकों ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पत्रकारिता को एक अस्त्र की तरह इस्तेमाल किया। लोकमान्य तिलक, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय, सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, माधवराव सप्रे, गणेशशंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी सबने पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्र को जागृत किया। पत्रकारिता की भावभूमि आजादी के आंदोलन ने तय कर दी। वह थी जनपक्षधरता, न्याय के लिए संघर्ष और सत्यान्वेषण। आजादी के बाद देश के नवनिर्माण का काम हो या आपातकाल विरोधी संघर्ष हमारे पत्रकारों ने हर जगह अपने उजले पदचिन्ह छोड़े। आज मीडिया का स्वरूप बहुत व्यापक हो गया है। वह अनेक मंचों से की जा रही है। प्रिंट, टीवी, रेडियो से अलग मोबाइल पर हो रही पत्रकारिता गजब कर रही है। कहा जा रहा कि डिजिटल का सूरज कभी नहीं डूबता। इसलिए आप देखें तो पाएंगे मीडिया की पहुंच मोबाइल के माध्यम से ज्यादातर लोगों तक हो रही है। मीडिया कन्वर्जेंस का माध्यम मोबाइल बने हैं। ऐसे में ज्यादातर चीजें सुनी और देखी जा रही हैं। पठनीयता के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। फिर भी इतना बड़ा देश अगर कुछ प्रतिशत में भी पढ़ता है तो भी संख्या आसानी से करोड़ों में होती है। दुनिया के तमाम देश एक भाषा में सोचते, पढ़ते और बोलते हैं। हिंदुस्तान 22 बड़ी भाषाओं और तमाम बोलियों में सुनता, पढ़ता और देखता है। इसलिए भारत के मीडिया का आकार बहुत व्यापक है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/ultimately-to-what-extent-is-the-tendency-to-attack-the-system-justified-or-unjustified" target="_blank">आखिर सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति कितनी जायज या नाजायज है? चिंतन कीजिए</a></h3><h2>वैश्विक पटल पर उभरा भारत-</h2><div>डिजिटल मीडिया ने हमारे माध्यमों को वैश्विक किया है। भारतीय भाषाओं को वैश्विक किया है। कभी फिल्में हमारे भारतीय समाज का वैश्विक चेहरा बनाती थीं। अब मीडिया इसके केंद्र में है। यू-ट्यूब,सोशल मीडिया, वेब माध्यमों , ई-पेपर और ई-बुक्स से एक नई दुनिया बन रही है, जिसने भारत की वैश्विक छवि बनाने का काम किया है। आज भारत और उसकी भाषाओं के साथ अंग्रेजी भाषा में भी भारतीयों की खास उपस्थिति है। वे जो लिख, कह और कर रहे हैं उसने देश को दुनिया में व्यक्त किया है। हिंदुस्तानी जहां-जहां गए अपनी भाषा और संस्कृति के साथ गए और वहां एक लघु भारत खड़ा किया। यह लघु भारत आज मीडिया और संचार माध्यमों से शक्ति पाता है। अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ महसूस करता है। एक समय में अपनी भाषा के प्रकाशनों, पत्र-पत्रिकाओं, किताबों और मनोरंजन को प्राप्त करना मुश्किल था, किंतु डिजिटल माध्यमों ने इसे संभव किया है। दूरियां, भूगोल और भाषा सबके अंतर को पाटकर भारत आपके घर पहुंच जाता है। इससे भारत की शक्ति बन रही है। साफ्टपावर क्या कर सकती है, इसे हम सब महसूस कर रहे हैं।</div><div><br></div><h2>नया भारत बनाने में खास भूमिका-</h2><div>एक नया भारत बनाने और उसके एकीकरण में भारतीय मीडिया की भूमिका को स्वीकार करना चाहिए। अपने प्रारंभ से ही उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम भारतीय पत्रकारिता और साहित्य का स्वर एक रहा है। सबने भारत बोध को स्वर दिया है। एकत्व को स्थापित किया है। जगदगुरु शंकराचार्य के बाद भारत के एकीकरण का काम पत्रकारिता और साहित्य ने ही किया है। अपने राष्ट्रीय विचारों के समाचार पत्र से तमिलनाडु के सुब्रम्यण्यम भारती जो कर रहे थे, वही काम हिंदी में माखनलाल चतुर्वेदी कर रहे थे। उनके साहित्य और पत्रकारिता दोनों में भारत बोलता है। इस तरह हम देखते हैं कि समाचार माध्यमों ने न सिर्फ सूचनाओं का आदान प्रदान किया बल्कि एक देश में एक भाव भी भरा। यही हमारी पत्रकारिता की मूल शक्ति है। पत्रकारिता के नायक लोकमान्य तिलक का वाक्य स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, देश की वाणी बन गया। देश ने आजादी के सपने देखने प्रारंभ किए। उनकी प्रेरणा से अनेक लोग पत्रकारिता में आए और उसी भाव को लेकर आगे बढ़े। इनमें हिंदी के माधवराव सप्रे का उदाहरण सबसे खास है, जिन्होंने तिलक जी के मराठी अखबार ‘केसरी’ से प्रेरणा लेकर ‘हिंदी केसरी’ प्रारंभ किया। ऐसे अनेक नायक देश को जोड़ने के सूत्र खोजकर पत्रकारिता के माध्यम से सामने आते रहे। समस्त भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ संपादकों ने इस दौर में जो भाव जागरण किया&nbsp; है, वह अप्रतिम है।</div><div><br></div><h2>सांस्कृतिक प्रवाह है एकत्व का कारण-</h2><div>इतनी सारी भाषाओं, बोलियों, खानपान, स्थानीय प्रतीकों को लेकर चलता हुआ देश अगर एक है तो इसका कारण है, उसके सांस्कृतिक प्रवाह का एक होना। लंबी गुलामी, वैचारिक दासता से घिरे बुद्धिजीवियों द्वारा किए लंबे अनर्थ चिंतन के बाद भी इस देश की प्रज्ञा अगर सो नहीं गयी तो इसका कारण इस देश की गहरी सांस्कृतिक जड़ें हैं। समय-समय पर नायक आते रहे हैं। जो हमें याद दिलाते हैं कि सब कुछ कभी खत्म नहीं हो सकता। भारतेंदु हरिश्चंद्र उनमें एक हैं, गांधी हैं, बाद के दिनों में दीनदयाल उपाध्याय, डा. राममनोहर लोहिया, अटलबिहारी वाजपेयी हैं। इनमें से सब पत्रकारिता को अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र बनाते हैं। मीडिया के माध्यम से समाज को उसके बोध से जोड़ते हैं। उसी समय समाज को राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त याद दिलाते हैं –</div><div><br></div><div><b>*हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी</b></div><div><b>आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी।*</b></div><div><br></div><div>जाहिर है हमारी चुनौतियां अभी समाप्त नहीं हुई हैं। हमें नित अपने राष्ट्र के समक्ष उपस्थित संकटों के ठोस और वाजिब हल तलाशने हैं। पत्रकारिता, साहित्य और प्रदर्शन कलाओं में यह सामर्थ्य है कि वे समाज को संबल देते हुए उन्हें एकजुट कर सकते हैं। उनको रास्ता दिखा सकते हैं। भारतीय पत्रकारिता कमोबेश अपनी इस भूमिका पर आज भी कायम है। अपनी इस भूमिका को और प्रखर करते हुए पत्रकारिता जगत को वह सब करना ही होगा, जो अपेक्षित है। इसकी कसौटी भी तय है- जनपक्ष और सत्यान्वेषण। इसी में भारतीय पत्रकारिता की मुक्ति है, इसी में उसका गौरव है।</div><div><br></div><div>प्रो. संजय द्विवेदी</div><div>(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 23 May 2026 18:15:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/success-has-been-achieved-in-establishing-country-global-identity-and-connecting-it-to-its-roots</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[राजनीति सनातन विरोध की बजाय आममुद्दों पर केंद्रित हो]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/politics-should-focus-on-common-issues-rather-than-opposition-to-sanatan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में एक ऐसा विमर्श लगातार उभर रहा है, जिसने राजनीतिक बहस को विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक न्याय जैसे मूल प्रश्नों से हटाकर धार्मिक पहचान और आस्था के इर्द-गिर्द खड़ा कर दिया है। यह विमर्श है-सनातन समर्थन बनाम सनातन विरोध। आज देश में एक ओर सनातन संस्कृति को भारतीय जीवन का शाश्वत आधार मानने वाली शक्तियां हैं, तो दूसरी ओर कुछ राजनीतिक वक्तव्य और प्रवृत्तियां ऐसी दिखती हैं जिन्हें जनमानस सनातन विरोध के रूप में देखता है। प्रश्न यह नहीं कि किसी विचारधारा से सहमति या असहमति क्यों है, बल्कि प्रश्न यह है कि क्या राजनीति का केंद्र धर्म होना चाहिए या जनजीवन के वास्तविक मुद्दे? भारत का लोकतंत्र धर्मनिरपेक्ष संविधान पर आधारित है, जहां राज्य का कार्य किसी धर्म का पक्ष या विरोध नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। राजनीतिक दलों का दायित्व भी यही होना चाहिए कि वे जनता की समस्याओं, विकास और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता दें। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक विमर्श राजनीति का बड़ा केंद्र बन गया है।</div><div><br></div><div>सनातन केवल एक धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की सांस्कृतिक चेतना, जीवन-दर्शन और मूल्य परंपरा का प्रतीक है। “सत्यं वद, धर्मं चर”, “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे सूत्र इसी सनातन दृष्टि के अंग हैं। इसलिए जब कोई राजनीतिक वक्तव्य सनातन को लेकर अपमानजनक या आक्रामक भाषा का उपयोग करता है, तो उसका प्रभाव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक स्तर पर भी पड़ता है। तमिलनाडु में द्रमुक नेता उदयनिधि स्टालिन द्वारा सनातन धर्म की तुलना बीमारी से करने वाला वक्तव्य इसी कारण व्यापक विवाद का कारण बना। विपक्ष के अनेक दलों ने उससे दूरी बनाने का प्रयास किया, क्योंकि यह स्पष्ट था कि भारत जैसे देश में करोड़ों लोगों की आस्था को आहत करने वाला कथन राजनीतिक रूप से भी असहज स्थिति उत्पन्न करेगा। यहां यह समझना आवश्यक है कि द्रविड़ आंदोलन की अपनी ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि रही है। उसका मूल संघर्ष सामाजिक विषमताओं और जातीय वर्चस्व के विरुद्ध था। लेकिन जब सामाजिक सुधार का विमर्श पूरे धर्म या संस्कृति के विरोध जैसा प्रतीत होने लगे, तब वह जनस्वीकृति खो देता है।</div><div><br></div><div>यह भी सत्य है कि अनेक विपक्षी दल स्वयं को सनातन विरोधी नहीं, बल्कि सामाजिक कुरीतियों, जातिवाद और भेदभाव के विरोधी बताते हैं। उनका तर्क है कि वे सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों की बात करते हैं। यह दृष्टि लोकतंत्र में स्वीकार्य है, क्योंकि हर परंपरा में आत्मसमीक्षा और सुधार की आवश्यकता होती है। स्वयं भारतीय दर्शन में भी संवाद, बहस और आत्मचिंतन की परंपरा रही है। बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, दयानंद और गांधी-सभी ने समाज की विसंगतियों पर प्रश्न उठाए, लेकिन उन्होंने समाज को तोड़ने नहीं, सुधारने का मार्ग चुना। समस्या तब उत्पन्न होती है जब राजनीतिक भाषा संतुलन खो देती है। जब आलोचना सुधार की जगह अस्वीकार की भाषा बन जाती है, तब वह समाज में ध्रुवीकरण को जन्म देती है। भारत जैसे बहुलतावादी देश में यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं कही जा सकती।</div><div>&nbsp;</div><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का विमर्श अधिक प्रभावी होकर उभरा है। राम मंदिर निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल लोक, सांस्कृतिक धरोहरों के पुनरुत्थान जैसे विषयों ने एक बड़े वर्ग में सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूत किया है। इससे भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक लाभ भी मिला। दूसरी ओर विपक्षी दल इस बदलते राजनीतिक मानस को समझने में कई बार असहज दिखाई दिए। कहीं उन्होंने धर्मनिरपेक्षता और आस्था के बीच संतुलन बनाने में चूक की, तो कहीं उनके कुछ नेताओं के बयान उन्हें कठिन स्थिति में ले आए। उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक चुनावी राजनीति में यह देखा गया कि केवल जातीय समीकरण या पारंपरिक वोट बैंक अब पर्याप्त नहीं हैं। जनता सांस्कृतिक पहचान, विकास और राष्ट्रीय विमर्श को भी महत्व देने लगी है। ऐसे में यदि कोई दल हिंदू आस्था के प्रति असंवेदनशील दिखता है, तो उसका राजनीतिक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। लेकिन इस पूरे विमर्श का दूसरा पक्ष भी है। क्या राजनीति का उद्देश्य केवल धार्मिक पहचान के आधार पर समर्थन जुटाना होना चाहिए? क्या देश के सामने मौजूद बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, कृषि संकट, आर्थिक असमानता और सामाजिक विघटन जैसे प्रश्न पीछे छूट जाने चाहिए? यह चिंता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/raja-bhaiya-said-on-sanatan-dharma---all-muslims-were-hindus-cowards-changed-their-religion" target="_blank">Sanatan Dharma पर बोले Raja Bhaiya- 'सभी मुसलमान हिंदू थे, डरपोक लोगों ने बदला धर्म'</a></h3><div>भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान धर्म, विशेषकर सनातन और हिंदू आस्था को लेकर कांग्रेस, सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस, द्रमूक आदि विपक्षी दलों एवं उनके कुछ नेताओं द्वारा दिए गए बयानों को व्यापक जनसमुदाय ने सनातन पर आक्षेप या हिंदू भावनाओं के प्रति असंवेदनशीलता के रूप में देखा, जिसके राजनीतिक प्रभाव भी दिखाई दिए। किंतु इस विषय को केवल “हिंदू विरोध” बनाम “राजनीतिक विरोध” के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। भारत एक लोकतांत्रिक और बहुलतावादी राष्ट्र है, जहां किसी भी राजनीतिक दल को सरकार, नीतियों या नेतृत्व का विरोध करने का अधिकार है, लेकिन यदि वह विरोध आस्था, संस्कृति और बहुसंख्यक समाज की भावनाओं से टकराता हुआ प्रतीत हो, तो उसका राजनीतिक मूल्य चुकाना पड़ सकता है। यही कारण है कि कई दलों के लिए यह धारणा चुनौती बनी कि वे सत्ता-विरोध की राजनीति करते-करते सांस्कृतिक और धार्मिक संवेदनाओं से दूर हो गए हैं। भारत में सनातन केवल धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन, परंपरा, संस्कृति, सहिष्णुता और सभ्यता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए उसके प्रति असावधान भाषा या नकारात्मक संकेत जनमानस में प्रतिकूल प्रतिक्रिया उत्पन्न करते रहे हैं। दूसरी ओर लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा यह भी अपेक्षा करती है कि राजनीतिक विमर्श व्यक्तियों, नीतियों और शासन के मुद्दों पर केंद्रित रहे, न कि धार्मिक ध्रूवीकरण पर। राजनीतिक दलों के लिए यह आवश्यक है कि वे मतभेद रखें, आलोचना करें, लेकिन भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना, धार्मिक संवेदनशीलता और आस्था के सम्मान का संतुलन बनाए रखें, क्योंकि जनता अंततः उसी नेतृत्व को स्वीकार करती है जो उसकी भावनाओं, परंपराओं और राष्ट्रीय मानस को समझने का प्रयास करता है।</div><div><br></div><div>भारत की राजनीति को “धर्म बनाम धर्म” की लड़ाई से ऊपर उठकर “जन बनाम जनसमस्या” के विमर्श की ओर बढ़ना होगा। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि जनता मंदिर भी चाहती है और रोजगार भी, आस्था भी चाहती है और अवसर भी, संस्कृति भी चाहती है और आधुनिकता भी। केवल धार्मिक धु्रवीकरण किसी राष्ट्र की स्थायी प्रगति का आधार नहीं बन सकता। आज आवश्यकता है कि राजनीतिक दल सनातन विरोध या हिंदू विरोध जैसे आरोप-प्रत्यारोपों की राजनीति से बाहर निकलें। यदि किसी परंपरा में सुधार की बात करनी है, तो वह सम्मानजनक भाषा और रचनात्मक दृष्टि से हो। सामाजिक न्याय का अर्थ सांस्कृतिक अस्वीकार नहीं होना चाहिए और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अर्थ अन्य दृष्टियों का निषेध भी नहीं होना चाहिए। भारतीय सभ्यता की शक्ति उसकी विविधता और सहिष्णुता रही है। यहां शंकराचार्य भी हैं, बुद्ध भी हैं, महावीर भी हैं, कबीर भी हैं, वेद भी हैं और संविधान भी। भारत ने सदैव संवाद को संघर्ष से ऊपर रखा है। इसलिए राजनीति का भी दायित्व है कि वह समाज को जोड़ने वाली भाषा बोले। आज जब विश्व संघर्षों, सांस्कृतिक तनावों और पहचान की राजनीति से जूझ रहा है, तब भारत के पास “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश है। यही सनातन का वास्तविक स्वरूप भी है-समावेश, करुणा और सहअस्तित्व।</div><div><br></div><div>राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करना होगा कि वे जनता को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं-धार्मिक टकराव की ओर या राष्ट्रीय निर्माण की ओर? यदि राजनीति केवल आस्था के विवादों में उलझी रही, तो जनजीवन के वास्तविक प्रश्न पीछे छूट जाएंगे। लेकिन यदि राजनीति संस्कृति का सम्मान करते हुए विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक समरसता को केंद्र बनाएगी, तो भारत एक संतुलित और सशक्त राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ेगा। सनातन का अर्थ शाश्वत है, और शाश्वत वही होता है जो सबको साथ लेकर चले। इसलिए किसी भी प्रकार का अंध-विरोध या अंध-समर्थन समाधान नहीं हो सकता। आवश्यकता है विवेकपूर्ण दृष्टि, संतुलित राजनीति और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की। भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि वह आस्था का सम्मान करे, लेकिन राजनीति को जनहित का माध्यम बनाए। तभी लोकतंत्र भी मजबूत होगा और समाज भी समरस बनेगा।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक,पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 22 May 2026 18:04:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/politics-should-focus-on-common-issues-rather-than-opposition-to-sanatan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[अपराधमुक्त राजनीति से ही संभव है नया भारत-विकसित भारत ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/a-new-india-a-developed-india-is-possible-only-through-crime-free-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत आज एक ऐतिहासिक संक्रमण काल से गुजर रहा है। एक ओर देश विकसित भारत-2047 के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, वैश्विक मंचों पर भारत की प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ रही है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत विश्व राजनीति और कूटनीति के केंद्र में उभर रहा है, वहीं दूसरी ओर भारतीय राजनीति में अपराध, धनबल और बाहुबल की बढ़ती पैठ लोकतंत्र की आत्मा को आहत कर रही है। यह विडंबना ही है कि जिस भारत को विश्वगुरु बनने का स्वप्न दिखाया जा रहा है, उसकी राजनीति अभी भी अपराधमुक्त नहीं हो सकी है। हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद सामने आए आंकड़ों ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है। समाचार पत्रों में प्रकाशित एडीआर (ऐसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिपोर्ट) की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल विधानसभा के लगभग 65 प्रतिशत विधायक आपराधिक मामलों वाले हैं, जबकि 61 प्रतिशत विधायक करोड़पति हैं। रिपोर्ट के अनुसार 294 विधायकों में से 190 विधायकों ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले घोषित किए हैं तथा लगभग 142 विधायकों पर गंभीर आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं। इनमें हत्या, हत्या के प्रयास, महिलाओं के विरुद्ध अपराध और अन्य गंभीर मामले भी शामिल हैं।</div><div><br></div><div>यह केवल पश्चिम बंगाल की स्थिति नहीं है। संसद और देश की अनेक विधानसभाओं की स्थिति भी इससे बहुत अलग नहीं है। पिछले कुछ वर्षों के चुनावी विश्लेषण बताते हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना सहित अनेक राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे जनप्रतिनिधि चुनकर आए हैं जिन पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं। लोकतंत्र के मंदिरों में अपराध और दागी छवि वाले लोगों की बढ़ती उपस्थिति आज राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है। राजनीति मूलतः लोकसेवा, नैतिक नेतृत्व और राष्ट्रनिर्माण का माध्यम मानी गई थी। महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, लाल बहादुर शास्त्री, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने राजनीति को मूल्य आधारित दिशा दी। लेकिन समय के साथ राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता का स्थान धीरे-धीरे चुनावी गणित, धनबल और प्रभावशाली समूहों ने लेना शुरू कर दिया। आज कई राजनीतिक दल उम्मीदवार चयन में योग्यता, चरित्र और जनसेवा की बजाय “जीतने की क्षमता” को प्राथमिकता देते दिखाई देते हैं। यही कारण है कि दागी छवि वाले व्यक्तियों को भी टिकट देने में संकोच नहीं किया जाता।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/amidst-the-rise-of-cockroach-janata-party-axis-my-india-ceo-pradeep-gupta-made-a-big-prediction" target="_blank">Cockroach Janata Party के तेजी से उभार के बीच Axis My India के CEO Pradeep Gupta ने BJP को लेकर कर दी बड़ी भविष्यवाणी</a></h3><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र की राजनीति में आने के बाद अनेक मंचों से राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने संसद में और सार्वजनिक मंचों पर कई बार कहा कि राजनीति को अपराधमुक्त बनाना लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है। उन्होंने जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों के शीघ्र निपटान के लिए विशेष अदालतों की आवश्यकता पर बल दिया। किंतु चिंता का विषय यह है कि आज भी लगभग सभी राजनीतिक दलों की स्थिति समान दिखाई देती है। चुनाव जीतने की मजबूरी और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण दल अपराधी और दागी उम्मीदवारों को टिकट देने से परहेज नहीं कर पा रहे हैं। इस स्थिति के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण है चुनावों का अत्यधिक खर्चीला होना। आज चुनाव लड़ना सामान्य व्यक्ति की क्षमता से बाहर होता जा रहा है। बड़े संसाधनों वाले और आर्थिक रूप से प्रभावशाली लोग चुनावी प्रक्रिया में अधिक सक्रिय हो रहे हैं। दूसरा कारण है बाहुबल और प्रभाव का उपयोग। कई क्षेत्रों में आज भी राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने के लिए शक्ति प्रदर्शन को महत्वपूर्ण माना जाता है। तीसरा कारण है न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति। गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों के वर्षों तक लंबित रहने के कारण आरोपी चुनाव लड़ते रहते हैं और जनप्रतिनिधि बन जाते हैं।</div><div><br></div><div>राजनीति में अपराधीकरण का दूसरा बड़ा पक्ष है धनबल। पश्चिम बंगाल विधानसभा के आंकड़े बताते हैं कि 61 प्रतिशत विधायक करोड़पति हैं। यह प्रवृत्ति पूरे देश में दिखाई देती है। संसद और विधानसभाओं में करोड़पति जनप्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र धीरे-धीरे सामान्य नागरिक की पहुंच से दूर होता जा रहा है? यदि राजनीति केवल धनवान और प्रभावशाली वर्गों तक सीमित हो जाएगी तो लोकतंत्र की समावेशी भावना कमजोर होगी। इन परिस्थितियों में नागरिक समाज और लोकतांत्रिक संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारतीय मतदाता संगठन इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास कर रहा है। इसके संस्थापक रिखबचंद जैन के नेतृत्व में लंबे समय से राजनीति को स्वच्छ और अपराधमुक्त बनाने की दिशा में जनजागरण अभियान चलाए जा रहे हैं। संगठन मतदाता जागरूकता, नैतिक मतदान, स्वच्छ राजनीति और जिम्मेदार नागरिकता को बढ़ावा देने के लिए कार्य कर रहा है। लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मूल्य आधारित व्यवस्था मानते हुए यह संगठन समाज को जागरूक करने का प्रयास कर रहा है कि मतदाता केवल जाति, धर्म, क्षेत्र या दलगत निष्ठा के आधार पर नहीं, बल्कि उम्मीदवार के चरित्र और सार्वजनिक जीवन को देखकर मतदान करें। इसी प्रकार एडीआर (ऐसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिपोर्ट) जैसे संगठन भी चुनावी पारदर्शिता और जनप्रतिनिधियों की पृष्ठभूमि सार्वजनिक करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। इन संगठनों के कारण आज मतदाताओं को उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों, संपत्ति और शिक्षा संबंधी जानकारी उपलब्ध हो रही है। यह लोकतंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।&nbsp;</div><div><br></div><div>राष्ट्रीय चुनाव आयोग भी इस दिशा में लगातार प्रयासरत है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करने के निर्देश दिए गए हैं। उम्मीदवारों को शपथपत्र में अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि, संपत्ति और देनदारियों की जानकारी देना अनिवार्य किया गया है। चुनाव आयोग लगातार मतदाता जागरूकता अभियान चला रहा है। किंतु केवल औपचारिक प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। इन प्रयासों को अधिक तीव्र, व्यापक और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। आज आवश्यकता है कि राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आंदोलन खड़ा किया जाए। इसके लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं- पहला, जिन उम्मीदवारों पर हत्या, बलात्कार, अपहरण, भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप न्यायालय द्वारा तय हो चुके हों, उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने पर गंभीर विचार होना चाहिए। दूसरा, जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों के त्वरित निपटान हेतु विशेष न्यायालयों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि वर्षों तक मुकदमे लंबित न रहें। तीसरा, राजनीतिक दलों को दागी उम्मीदवारों को टिकट देने पर जवाबदेह बनाया जाए। उन्हें सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवार उपलब्ध होने के बावजूद दागी व्यक्ति को क्यों चुना गया। चौथा, चुनावी खर्च पर कठोर नियंत्रण और पारदर्शिता लाई जाए ताकि सामान्य और योग्य नागरिक भी राजनीति में प्रवेश कर सकें। पांचवां, मतदाता जागरूकता को जनांदोलन बनाया जाए। जब तक मतदाता स्वयं दागी उम्मीदवारों को अस्वीकार नहीं करेंगे, तब तक सुधार अधूरा रहेगा।</div><div><br></div><div>भारत आज जिस दिशा में बढ़ रहा है, वहां राजनीति की शुचिता और नैतिकता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। यदि हम 2047 तक विकसित भारत बनना चाहते हैं, यदि हमें विश्वगुरु बनना है, यदि भारत को वैश्विक नेतृत्व करना है, तो राजनीति को अपराध और धनबल के प्रभाव से मुक्त करना ही होगा। आर्थिक शक्ति, तकनीकी प्रगति और वैश्विक प्रतिष्ठा तभी सार्थक होगी जब लोकतंत्र की आत्मा सुरक्षित रहेगी। राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्ति नहीं, समाज निर्माण होना चाहिए। लोकतंत्र केवल वोटों का गणित नहीं, बल्कि विश्वास, नैतिकता और जनप्रतिनिधित्व की पवित्र व्यवस्था है। यदि राजनीति अपराधमुक्त होगी तो शासन अधिक पारदर्शी होगा, जनता का विश्वास बढ़ेगा और राष्ट्रनिर्माण की गति भी तेज होगी।</div><div><br></div><div>आज आवश्यकता केवल सरकारों या चुनाव आयोग के प्रयासों की नहीं है, बल्कि समाज, मतदाता संगठनों, नागरिक संस्थाओं, मीडिया और जागरूक नागरिकों के संयुक्त अभियान की है। भारतीय मतदाता संगठन जैसे प्रयास इसी दिशा में आशा की किरण हैं। इन प्रयासों को राष्ट्रीय स्वरूप देने की जरूरत है। भारत के विकसित भविष्य की आधारशिला केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि स्वच्छ राजनीति भी है। क्योंकि अपराधमुक्त राजनीति ही विकसित भारत, समृद्ध भारत और विश्वगुरु भारत की वास्तविक पहचान बन सकती है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक,पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 21 May 2026 19:28:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/a-new-india-a-developed-india-is-possible-only-through-crime-free-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[घुसपैठियों और अतिक्रमणकारियों के पास अचानक इतने पत्थर कहां से आ जाते हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/analysis-of-western-railway-bandra-garib-nagar-demolition-drive]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मुंबई के लिए मुसीबत बने बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को पुलिस और प्रशासन ने करारा सबक सिखाकर देश की आर्थिक राजधानी को बड़ी राहत दिलाई है। बांद्रा रेलवे स्टेशन के पास गरीब नगर इलाके में पश्चिम रेलवे द्वारा चलाया जा रहा अब तक का सबसे बड़ा अतिक्रमण विरोधी अभियान न केवल रेलवे भूमि को मुक्त कराने की दिशा में अहम कदम साबित हुआ, बल्कि इस कार्रवाई ने यह भी उजागर कर दिया कि किस तरह अवैध कब्जाधारी कानून व्यवस्था को चुनौती देने से भी पीछे नहीं हटते। कार्रवाई के दौरान पुलिस और रेलवे अधिकारियों पर जमकर पत्थरबाजी की गई, जिससे एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया कि देश के किसी भी हिस्से में अतिक्रमण हटाने या अवैध कब्जों के खिलाफ अभियान चलते ही इन घुसपैठियों और अतिक्रमणकारियों के पास अचानक इतने पत्थर कहां से आ जाते हैं?</div><div><br></div><div>उल्लेखनीय है कि पश्चिम रेलवे ने बांद्रा रेलवे स्टेशन के निकट गरीब नगर में फैले अवैध कब्जों को हटाने के लिए व्यापक अभियान शुरू किया है। यह मुंबई में रेलवे की अब तक की सबसे बड़ी अतिक्रमण हटाओ कार्रवाई मानी जा रही है। रेलवे के अनुसार लगभग पांच हजार दो सौ वर्ग मीटर भूमि को खाली कराया जा रहा है, जिसकी कीमत करीब छह सौ करोड़ रुपये आंकी गई है। यह इलाका हार्बर लाइन की पटरियों और बिजली व्यवस्था के बेहद करीब पहुंच चुका था, जिससे रेल संचालन और यात्रियों की सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cji-advice-in-navi-mumbai-airport-case-protest-peacefully" target="_blank">Navi Mumbai Airport केस में CJI की नसीहत- Peaceful Protest करें, पर सड़क पर समस्या न बनें'</a></h3><div>रेलवे अधिकारियों के मुताबिक यहां कई बहुमंजिला झुग्गियां फुटओवर पुलों की ऊंचाई से भी ऊपर तक बना दी गई थीं। इससे भविष्य की रेलवे परियोजनाओं और ट्रेनों की आवाजाही में बाधा उत्पन्न हो रही थी। रेलवे लंबे समय से इस भूमि को खाली कराना चाहता था, क्योंकि बांद्रा स्टेशन और बांद्रा कुर्ला परिसर के पास स्थित यह इलाका रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।</div><div><br></div><div>इस मामले में कानूनी प्रक्रिया वर्ष 2017 से पहले शुरू हो चुकी थी। सार्वजनिक परिसर अधिनियम के तहत कार्रवाई करते हुए 27 नवंबर 2017 को बेदखली आदेश जारी किए गए थे। इसके बाद मामला बंबई उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा। इस वर्ष 29 अप्रैल को उच्च न्यायालय ने अवैध अतिक्रमण हटाने की अनुमति दी थी। बाद में उच्चतम न्यायालय ने भी इस आदेश पर रोक नहीं लगाई। इसके बाद प्रशासन ने कार्रवाई तेज कर दी।</div><div><br></div><div>पश्चिम रेलवे ने करीब पांच सौ झुग्गियों को हटाने के लिए चिन्हित किया, जबकि संयुक्त सर्वेक्षण में पात्र पाए गए लगभग एक सौ ढांचों को फिलहाल नहीं छुआ गया। रेलवे का कहना है कि भविष्य में इस जमीन का उपयोग उपनगरीय और लंबी दूरी की रेल सेवाओं के विस्तार के लिए किया जाएगा। कार्रवाई को सफल बनाने के लिए भारी सुरक्षा व्यवस्था की गई। करीब चार सौ पुलिसकर्मी, चार सौ रेलवे सुरक्षा बल और सरकारी रेलवे पुलिस के जवान तथा लगभग दो सौ रेलवे अधिकारी और कर्मचारी तैनात किए गए। बांद्रा स्टेशन और बांद्रा टर्मिनस के आसपास कई रास्तों को बंद कर दिया गया, जिससे भारी यातायात जाम लग गया और यात्रियों को सामान लेकर पैदल चलना पड़ा।</div><div><br></div><div>शुरुआत में कार्रवाई शांतिपूर्ण ढंग से चल रही थी, लेकिन दूसरे दिन दोपहर बाद माहौल अचानक तनावपूर्ण हो गया। अधिकारियों ने जब एक अवैध मस्जिद और वहां लगाए गए निजी दूरसंचार टावर को हटाने की कोशिश की तो भीड़ उग्र हो गई। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस और प्रशासनिक टीमों पर पत्थर, बर्तन और अन्य सामान फेंकना शुरू कर दिया। इसके बाद पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा।</div><div><br></div><div>इस हिंसा में सात पुलिसकर्मी और छह प्रदर्शनकारी घायल हुए। पुलिस ने दस लोगों को हिरासत में लिया और निर्मल नगर पुलिस थाने में गैरकानूनी जमावड़ा, दंगा और सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया। घायलों का उपचार भाभा अस्पताल और वीएन देसाई अस्पताल में कराया गया। एक पुलिसकर्मी और एक प्रदर्शनकारी को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा, हालांकि दोनों की हालत स्थिर बताई गई है। अतिरिक्त पुलिस आयुक्त अभिनव देशमुख ने चेतावनी दी है कि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर कुछ निवासियों ने दावा किया कि वह कई दशकों से यहां रह रहे थे और उनके पास हाउस टैक्स, वाटर टैक्स तथा बिजली कनेक्शन से जुड़े दस्तावेज भी हैं। कई परिवारों ने आरोप लगाया कि उन्हें घर खाली करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया और पुनर्वास की समुचित व्यवस्था भी नहीं की गई। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि ईद से ठीक पहले की गई कार्रवाई ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं।</div><div><br></div><div>हालांकि इन दावों और मानवीय पक्ष के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अवैध कब्जों के खिलाफ हर कार्रवाई के दौरान पत्थरबाजी की घटनाएं क्यों सामने आती हैं? चाहे देश का कोई भी राज्य हो, अतिक्रमण हटाने पहुंची पुलिस और प्रशासन पर हमला करना अब एक तयशुदा रणनीति जैसा दिखाई देता है। इससे साफ है कि कुछ तत्व कानून व्यवस्था को बिगाड़कर सरकारी कार्रवाई को रोकना चाहते हैं। मुंबई जैसे संवेदनशील और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण शहर में इस तरह की हिंसा न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और शहरी व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चुनौती भी है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

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      <pubDate>Thu, 21 May 2026 11:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/analysis-of-western-railway-bandra-garib-nagar-demolition-drive</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[शुभेन्दु के सत्ता में आते ही बिलों में जा छिपे TMC के गुंडे! ट्रक चालकों से लिया जाने वाला Bhaipo Tax खत्म]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/as-soon-as-shubhendu-came-to-power-tmc-goons-hid-in-bills]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>शुभेन्दु अधिकारी के पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री का पद संभालते ही राज्य में तृणमूल कांग्रेस के गुंडाराज पर लगाम लगती दिखाई देने लगी है। इसका सबसे बड़ा फायदा झारखंड समेत सीमावर्ती राज्यों और पश्चिम बंगाल के बीच सफर करने वाले ट्रक चालकों को होता दिख रहा है। वर्षों से जिन मार्गों पर ‘भाइपो टैक्स’ और ‘डंडा टैक्स’ के नाम पर टीएमसी समर्थित गुंडों द्वारा अवैध वसूली की जाती थी, वहां अब माहौल तेजी से बदल रहा है। ट्रक चालकों का कहना है कि जो लोग पहले बांस की बैरिकेडिंग लगाकर जबरन उगाही करते थे, वह अब कार्रवाई के डर से अपने बिलों में छिप गए हैं। सीमा पार करते समय नकद वसूली, धमकी, घंटों रोककर उत्पीड़न और वाहन को क्षति पहुँचाने जैसी घटनाओं में अचानक कमी आई है, जिससे लंबे समय बाद ट्रांसपोर्ट कारोबार से जुड़े लोगों ने राहत की सांस ली है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल और झारखंड की सीमा से गुजरने वाले वाणिज्यिक वाहनों के चालकों के लिए पिछले कई दशकों से सफर केवल लंबी दूरी तय करने का मामला नहीं था, बल्कि रास्ते भर अवैध वसूली, धमकियों और देरी का सामना करने की मजबूरी भी थी। सीमा पार करते ही कई ट्रक चालकों को गिरोहों द्वारा लगाए गए अवैध नाकों, बांस की बैरिकेडिंग और डंडों से लैस लोगों का सामना करना पड़ता था। इन स्थानों पर नकद वसूली आम बात थी और विरोध करने पर चालकों को घंटों रोके रखना, गालियां देना, गाड़ी के शीशे तोड़ देना या टायर पंचर कर देना जैसी घटनाएं भी सामने आती थीं। अब हालात में अचानक बदलाव दिखाई दे रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/abhishek-banerjee-has-43-properties-in-kolkata-bjp-releases-list-tmc-says-it-all-fake" target="_blank">Kolkata में Abhishek Banerjee की 43 संपत्तियां? BJP ने जारी की List, TMC बोली- सब Fake है</a></h3><div>पश्चिम बंगाल में नौ मई को भाजपा सरकार बनने के बाद प्रशासन ने टीएमसी के उगाही केंद्रों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आदेश जारी किया। राज्य सरकार ने जिला अधिकारियों को निर्देश दिया कि सभी अवैध वसूली नाके तुरंत हटाए जाएं और यह सुनिश्चित किया जाए कि वे दोबारा सक्रिय नहीं हो सकें। इसके बाद राष्ट्रीय राजमार्ग दो और उससे जुड़ी राज्य सड़कों पर पहले की तुलना में यातायात काफी सुचारु हो गया है।</div><div><br></div><div>झारखंड, पश्चिम बंगाल, पूर्वोत्तर राज्यों और बांग्लादेश के बीच माल ढुलाई करने वाले ट्रक चालकों का कहना है कि पिछले दो सप्ताह में उत्पीड़न और अवैध वसूली की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है। गौरतलब है कि प्रतिदिन लगभग पचास हजार ट्रक पश्चिम बंगाल से होकर गुजरते हैं। पूर्वी भारत, पूर्वोत्तर क्षेत्र और बांग्लादेश के पांच प्रमुख पारगमन मार्गों को जोड़ने वाला यह राज्य देश की परिवहन व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में सड़क परिवहन में आने वाली बाधाओं का असर व्यापार, आपूर्ति और समयबद्ध वितरण पर सीधा पड़ता था।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल ट्रक ऑपरेटर्स एसोसिएशन महासंघ के महासचिव सजल घोष ने बताया कि यहां दो तरह की अनौपचारिक वसूली आम थी, जिन्हें स्थानीय लोग ‘भाइपो टैक्स’ और ‘डंडा टैक्स’ के नाम से जानते थे। उन्होंने कहा कि ‘भाइपो टैक्स’ यानि भतीजा लगभग समाप्त हो गया है, लेकिन अब जरूरत इस बात की है कि ‘डंडा टैक्स’ भी पूरी तरह खत्म किया जाए। उल्लेखनीय है कि ‘भाइपो टैक्स’ शब्द का इस्तेमाल तृणमूल कांग्रेस सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी की ओर संकेत करते हुए किया जाता रहा है।</div><div><br></div><div>वहीं, मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, झारखंड के मिहिजाम सीमा क्षेत्र के पास रुपनारायणपुर इलाके में ट्रक चालकों और स्थानीय लोगों ने बताया कि पहले सड़क किनारे कई स्थानों पर अवैध वसूली होती थी, लेकिन अब वहां यातायात बिना किसी रुकावट के चल रहा है। एक स्थानीय ई-रिक्शा चालक ने मीडिया से कहा कि चार मई के बाद से अधिकांश अवैध वसूली केंद्र बंद हो गए हैं। चालकों का कहना है कि पश्चिम बर्धमान और पुरुलिया जिलों में अनेक जगहों पर पैसे देने के लिए रोका जाता था। यदि कोई चालक भुगतान से इंकार करता था तो उसे घंटों परेशान किया जाता था।</div><div><br></div><div>एक ट्रक चालक ने मीडिया को बताया कि पहले हर कुछ किलोमीटर पर बांस की बैरिकेडिंग लगी रहती थी और सड़क पर खड़े लोग जबरन पैसे मांगते थे। यदि कोई चालक रसीद मांगता था तो माहौल तुरंत तनावपूर्ण हो जाता था। भुगतान से इंकार करने पर वाहन के शीशे तोड़ दिए जाते थे या टायर पंचर कर दिए जाते थे। कई चालकों ने आरोप लगाया कि इन गतिविधियों के पीछे संगठित गिरोह सक्रिय थे, जो लंबे समय से हाईवे पर प्रभाव बनाए हुए थे।</div><div><br></div><div>सबसे अधिक परेशानी जल्दी खराब होने वाले सामान ढोने वाले वाहन चालकों को उठानी पड़ती थी। सब्जियां, मछली और अन्य नाशवान वस्तुओं को समय पर बाजार तक पहुंचाना बेहद जरूरी होता है। अखिल झारखंड ड्राइवर ट्रेड यूनियन के अध्यक्ष मोहम्मद आकिल सोनू ने कहा कि हर घंटे की देरी से नुकसान बढ़ता था, लेकिन वसूली करने वाले गिरोहों को इससे कोई मतलब नहीं था कि माल खराब हो रहा है या व्यापारियों को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ रही है।</div><div><br></div><div>ट्रक चालकों का कहना है कि मौजूदा कार्रवाई से उन्हें काफी राहत मिली है। अब कई मार्गों पर बिना अनावश्यक रुकावट के आवाजाही हो रही है और माल समय पर पहुंचने लगा है। हालांकि चालक और परिवहन संगठन यह भी मानते हैं कि केवल अस्थायी कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। यदि प्रशासन लगातार निगरानी नहीं रखता तो भविष्य में ऐसे अवैध नाके दोबारा सक्रिय हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>बहरहाल, राज्य में कानून व्यवस्था को मजबूत करने और गुंडाराज पर सख्ती से अंकुश लगाने की दिशा में मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी द्वारा उठाए गए कदमों की आम लोगों और परिवहन क्षेत्र से जुड़े संगठनों के बीच व्यापक सराहना हो रही है। ट्रक चालकों, व्यापारियों और स्थानीय निवासियों का कहना है कि लंबे समय बाद उन्हें सड़कों पर भयमुक्त माहौल महसूस हो रहा है। लोगों का मानना है कि यदि इसी तरह प्रशासनिक सख्ती जारी रही तो पश्चिम बंगाल में व्यापार, परिवहन और निवेश का माहौल और बेहतर होगा तथा आम नागरिकों का शासन व्यवस्था पर भरोसा भी मजबूत होगा।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 18:55:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/as-soon-as-shubhendu-came-to-power-tmc-goons-hid-in-bills</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आवारा कुत्तों की भयावह समस्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला- लेकिन जिम्मेदारी तय किए बिना कैसे बनेगी बात?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/supreme-courts-verdict-on-the-alarming-stray-dog-menace]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश की सर्वोच्च अदालत ने आवारा कुत्तों की नसबंदी और दूसरी जगह भेजने के अपने पहले के आदेश को वापस लेने के लिए दायर की गई सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने डॉग लवर्स की याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि यह अदालत देश भर में कुत्ता काटने की घटनाओं की अनदेखी नहीं कर सकती है। इसका सबसे ज्यादा शिकार बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त शब्दों में अपने पहले के आदेश की फिर से याद दिलाते हुए कहा कि सड़क के कुत्तों पर 7 नवंबर, 2025 को दिया गया उनका आदेश ही लागू होगा। इन आदेशों को लागू करने वाले अधिकारियों को कानूनी सुरक्षा दी जाए और जो अधिकारी इनका पालन न करे, उन पर विभागीय और अवमानना की कार्यवाही की जा सकती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>लेकिन क्या इससे देश के आम नागरिकों को खुश होना चाहिए? क्या इससे देश में आवारा कुत्तों से परेशान लोगों - खासकर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को राहत मिल पाएगी? यह इतना भी आसान नहीं है। जब तक किसी खास अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं की जाएगी तब तक इस समस्या का निदान नहीं हो सकता है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद व्यवहारिक स्थिति तो यही है कि ज्यादातर राज्य सरकारें और जिला प्रशासन इसे गंभीरता से लेती नज़र नहीं आ रही है। इसलिए इस आदेश को लागू करने के लिए हर जिले में जिलाधिकारी यानी सीधे DM को ही जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के नवंबर में दिए गए आदेश के 6 महीने बीत जाने के बावजूद हालत यह है कि देश की राजधानी दिल्ली का नगर निगम - MCD कुत्तों को रखने के लिए एक डॉग सेंटर तक तैयार नहीं कर पाई है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की सरकार ने यह आदेश जारी कर दिया है कि जो कुत्ता एक से अधिक बार लोगों को काट चुका हो, उसे सार्वजनिक स्थानों पर नहीं छोड़ा जाएगा लेकिन दिल्ली से सटे गाजियाबाद समेत राज्य के कई जिलों में भी अभी भी जरूरी डॉग सेंटर का निर्माण फाइल्स में ही अटका पड़ा है। क्या इस तरह की लापरवाही और लेट-लतीफी के लिए जिलों के DM को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/maneka-gandhi-enraged-by-the-supreme-courts-order-on-stray-dogs" target="_blank">Stray Dogs पर Supreme Court के आदेश से भड़कीं Maneka Gandhi, कहा- कोर्ट ने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा</a></h3><div>समय आ गया है कि हर जिले, हर राज्य और सबसे ऊपर सीधे सुप्रीम कोर्ट को अपनी निगरानी में एक टोल फ्री नंबर जारी करना चाहिए जिस पर कॉल करने वाले हर व्यक्ति को तुरंत उनकी शिकायत का एक नंबर भी अलॉट कर देना चाहिए। अगर सुप्रीम कोर्ट चाहे तो टोल फ्री नंबर पर बैठने वाले अदालत के स्टॉफ का खर्चा भी लोगों से ले सकता है और इसके लिए प्रति कॉल 3 से 5 रुपए की राशि भी फिक्स की जा सकती है लेकिन हर कॉल का उचित फॉलोअप सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है। इस काम को युद्धस्तर पर करने की जरूरत है क्योंकि भारत में आवारा कुत्तों के काटने की समस्या दिन-प्रतिदिन भयावह होती जा रही है। वैसे तो देश में कुत्तों द्वारा काटने के सारे आंकड़े दर्ज नहीं करवाए जाते हैं लेकिन जो भी आंकड़े दर्ज होते हैं, उसके मुताबिक वर्ष 2024 में हर मिनट पर डॉग बाइट के 7, हर घंटे में 430, रोजाना 10,321 , हर महीने 3,09,643 और वर्ष भर में 37,15,713&nbsp; मामले दर्ज किए गए हैं। यानी सरकार भी यह मान रही है कि एक साल में 37 लाख से भी ज्यादा लोग कुत्तों के काटने का शिकार बनते हैं। वहीं वर्ष 2025 में कुत्तों के काटने की संख्या 47 लाख से भी ज्यादा बताई जा रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सरकारी रिपोर्ट की माने तो, भारत में हर साल रेबीज के कारण 300 लोगों की मौत होती है। लेकिन WHO के अनुसार भारत में हर साल रेबीज के कारण 18 से 20 हज़ार लोगों की मौत हो जाती है। यहां इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी है कि इस तरह के ज्यादातर मामले आंकड़ों में दर्ज ही नहीं किए जाते हैं। वर्ष 2019 में हुई पशु जनगणना में, देश में आवारा कुत्तों की संख्या 1.53 करोड़ बताई गई थी। लेकिन एक मोटे अनुमान के तौर पर यह माना जाता है कि देश में वर्तमान में आवारा कुत्तों की संख्या 6 से 7 करोड़ के लगभग हो गई है।</div><div><br></div><div>यह समस्या हर गुजरते दिन के साथ भयावह होती जा रही है। मोहल्लों, कॉलोनियों, सोसायटियों यहां तक कि पार्कों में भी इन आवारा कुत्तों ने कब्जा जमा रखा है। लगभग हर मोहल्ले/कॉलोनी और सोसायटी में आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जो इन्हें अपने घर ले जाकर खाना नहीं खिलाएंगे, बल्कि उनकी जिद होगी कि वो इन्हें बाहर ही खाना खिलाएंगे। रही-सही कसर देश के टीवी चैनलों पर आने वाले तथाकथित ज्योतिषियों ने पूरी कर दी है, जो खास रंग के कुत्तों को खाना खिलाने पर किस्मत बदल जाने यानी अच्छे दिन आने का सपना दिखाकर इस समस्या को और ज्यादा भयावह बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों,अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों जैसे सार्वजनिक स्थानों को आवारा कुत्तों से मुक्त करने की बात को दोहराते हुए पहली बार रेबीज से संक्रमित, लाइलाज बीमारी से ग्रस्त या खतरनाक आवारा कुत्तों की इच्छामृत्यु की भी अनुमति दे दी है। मानव जीवन पर बढ़ते खतरे पर चिंता जाहिर करते हुए अदालत ने कहा कि जिन इलाकों में आवारा कुत्तों की संख्या खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है और जहां बार-बार काटने या हमले&nbsp; की घटनाएं हो रही है वहां स्थानीय प्रशासन इच्छामृत्यु का सहारा ले सकती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>जब देश के करोड़ों लोगों- खासकर बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं का दिन कुत्तों के डर से शुरू होता है , तब देश की सर्वोच्च अदालत का सामने आकर सख्त फैसला देना थोड़ा सकून तो देता है। लेकिन ग्राउंड ज़ीरो पर इस फैसले को लागू करने के लिए जब तक किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा तब तक इस भयावह समस्या का अंत होने की कोई उम्मीद दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती है। लेकिन क्या ऐसे माहौल में डॉग लवर्स/ पशु प्रेमियों को भी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझनी चाहिए क्योंकि बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग तो उनके परिवार में भी होंगे ही।</div><div><br></div><div>- संतोष कुमार पाठक</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 18:45:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/supreme-courts-verdict-on-the-alarming-stray-dog-menace</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[फिर कैसे मिले सुर मेरा-तुम्हारा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/then-how-could-our-tunes-ever-harmonize]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>विधानसभा चुनावों में बड़े विपक्षी चेहरों की बड़ी नाकामी से विपक्षी खेमे में खलबली मच गई है। बंगाल की शेरनी कही जाने वाली ममता बनर्जी की हार ने विपक्षी खेमे के उन दलों के माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई हैं, जो इन चुनावों से बेपरवाह थे। केरल की गठबंधन सरकार में वापसी की वजह से कांग्रेस थोड़ी राहत में भले ही हो, लेकिन ज्यादातर क्षेत्रीय दलों को अपने अस्तित्व पर खतरा नजर आने लगा है। तमिलनाडु में सत्ता की चाहत में विपक्षी गठबंधन टूट भी चुका है। कांग्रेस के हाथ ने डीएमके का बरसों पुराना साथ छोड़ नवेली टीवीके का दामन थाम लिया है। दूसरी तरफ धांधली का आरोप लगाने के साथ ही ममता बनर्जी को विपक्षी एकता, खासकर इंडिया ब्लॉक की याद आने लगी है। अब उन्हें विपक्षी एकता मजबूत करने की याद भी आने लगी हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>दिलचस्प यह है कि अतीत में इंडिया ब्लॉक की एकता से बेपरवाह रहीं ममता को अब उसी की बहुत याद आने लगी है। वैसे विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस की ओर से भी कम गलतियां नहीं हुई हैं। राहुल गांधी का पश्चिम बंगाल में बीजेपी की बढ़त के लिए ममता को खुलेआम जिम्मेदार ठहराना एक तरह से तृणमूल की ताबूत का कील ही साबित हुआ। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि विपक्षी एकता का विचार सिरे से परवान चढ़ सकता है ? अतीत में एकता को लेकर जिस तरह विपक्षी खेमे में एक-दूसरे को शह और मात देने का खेल चला है, उससे क्या मुकम्मल एकता की उम्मीद बचती है? 2024 के आम चुनावों के पहले विपक्षी राजनीति को एक मंच पर लाने और भाजपा विरोधी मोर्चा बनाने की कोशिश तो हुई, लेकिन आपसी टकराव और वर्चस्व के चलते यह हकीकत नहीं बन पाया। 23 जून 2023 को पटना में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुआई में विपक्षी क्षत्रपों की बैठक में इंडिया ब्लॉक बनाने का फैसला तो हुआ,लेकिन नेतृत्व के मुद्दे पर एक राय नहीं बन पाई। नीतीश कुमार ने खुलकर भले ही कभी नहीं कहा, लेकिन उनकी चाहत थी कि विपक्षी गठबंधन का संयोजक उन्हें बनाया जाय। लेकिन कांग्रेसी आलाकमान की वजह से ऐसा नहीं हो पाया। दरअसल कांग्रेस विपक्षी राजनीति की लगाम खुद के हाथ में ही रखना चाहती है। नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और एमके स्टालिन का साथ तो उसे चाहिए, लेकिन इनमें से किसी का भी नेतृत्व उसे गवारा नहीं। अपने पहले परिवार की पूरी स्वीकार्यता भले ही ना हो, लेकिन अगुआई कांग्रेस को ही चाहिए। यही&nbsp; वजह है कि विपक्षी राजनीति के सबसे ज्यादा स्वीकार्य चेहरा रहे नीतीश कुमार ने निराशा में उसी मोदी का हाथ थाम लिया, जिनसे वे दूर हो चुके थे। इसके बाद का इतिहास सबको पता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/split-in-opposition-sharad-pawar-praised-pm-modi-saying-he-is-raising-indias-prestige-abroad" target="_blank">विपक्ष में दो फाड़? PM Modi की तारीफ कर Sharad Pawar बोले- विदेशों में बढ़ा रहे भारत का मान</a></h3><div>ममता को राजनीति में पहला बड़ा ब्रेक बेशक राजीव गांधी ने दिया, लेकिन वाममोर्चा के साथ राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेसी सहयोग ने उन्हें बाद के दिनों में गांधी-नेहरू परिवार से दूर कर दिया। हालिया हार के बावजूद अपनी संघर्षशीलता के चलते ममता विपक्षी राजनीति का अब भी बड़ा चेहरा हैं। उनकी अपनी छवि अक्सर राहुल गांधी पर भी भारी पड़ती है। इंडिया ब्लॉक के विचार के वक्त पूर्व कांग्रेसी होने के नाते ममता को पता था कि कांग्रेस अपने हाथ में नेतृत्व बनाए रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेगी, इसीलिए उन्होंने ही नीतीश कुमार और लालू यादव को पहली बैठक पटना में कराने का सुझाव दिया था। बाद के दिनों में कांग्रेस ने जैसी चाल चली, उससे विपक्षी एकता का राग बेसुरा हो गया। जिसका&nbsp; नतीजा लोकसभा चुनाव नतीजों में दिखा भी। विपक्ष को उसी वक्त चेतना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। असर यह हुआ कि हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने बाजी मार ली। बाकी कसर बीते विधानसभा चुनावों ने पूरी कर दी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>गौर करने की बात है कि जब भी सत्ता पक्ष के उफान में विपक्ष बह जाता है, उसकी एकता&nbsp; की छटपटाहट बढ़ जाती है। ज्यादातर यह अस्त्तित्व संकट टालने का यह फौरी उपाय होता है। तब वह हार के बाद वोटों के गुणा-गणित में जुट जाता है। फिर उसे इलहाम होता है कि अगर वह एक रहता तो वह भारी पड़ता। 1962 के आम चुनावों में नेहरू को फूलपुर की सीट पर सीधी चुनौती में हार मिलने के बाद लोहिया को भी कुछ ऐसा ही लगा। तब भारी उत्सुकता और उत्साह के बावजूद लोहिया हार गए थे। इसके बाद उन्होंने गैर कांग्रेसवाद का विचार दिया। तब कांग्रेस को 44 प्रतिशत से कुछ ज्यादा वोट मिले थे। लोहिया को लगा कि विरोध में पड़े 56 प्रतिशत वोटों को अगर एक किया जाता तो नतीजे कुछ और होते। गैर कांग्रेसवाद के बैनर के तले उन्होंने 1963 के उपचुनावों और 1967 के आम चुनावों में इसे आजमाया। इसका असर यह हुआ कि आठ राज्यों से कांग्रेस की विदाई हो गई। तब से सत्ता में आने वाली पार्टी के खिलाफ बाकी विपक्ष की एकता के सुर उठने की परंपरा बन गई है। कभी यह कांग्रेस के खिलाफ होता था, जिसमें वाममोर्चा और जनसंघ- बीजेपी भी शामिल रहते थे, अब यह भाजपा के खिलाफ हो रहा है।</div><div>&nbsp;</div><div>प. बगाल के बीते विधानसभा चुनाव में ममता को जहां करीब 42 प्रतिशत वोट मिला है, वहीं बीजेपी को करीब 46 प्रतिशत। कांग्रेस को 2.97 और वाममोर्चे को 4.45 प्रतिशत वोट मिले हैं। गैर बीजेपी वोटों को मिला दें तो यह आंकड़ा 49 प्रतिशत से ज्यादा हो जाता है। चुनावी राजनीति में सात प्रतिशत का अंतर बड़ा होता है। अब विपक्षी खेमे को लग रहा है कि अगर वे एक होते तो बीजेपी को ऐसी जीत नहीं मिलती। वैसे चुनावी गणित सामान्य गणित की तरह नहीं होता। 2018 के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में कांग्रेस से बीजेपी को पांच लाख से ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन सीटों के मामले में वह पिछड़ गई थी। चुनावी मैदान में जब सिर्फ दो खेमे होते हैं, तब मतदाताओं के बीच लंबवत ध्रुवीकरण हो जाता है। तब बिखराव वाले आंकड़े भी बदल जाते हैं। 2014 के संसदीय चुनाव में उत्तर प्रदेश में ऐसा&nbsp; साफ दिखा, जब बीजेपी सब पर भारी रही।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>संसदीय चुनाव में सफलता के लिहाज से देखें तो कांग्रेस की 99 सीटों के बाद 37 सीटों के साथ समाजवादी पार्टी विपक्ष का दूसरा बड़ा दल है। तीसरे नंबर पर 29 सीटों के साथ ममता ही हैं। इंडिया ब्लॉक की पहली बैठक के पीछे ममता का भी विचार था, फिर भी ना तो लोकसभा और ना ही विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस या ब्लॉक के दूसरे दलों को तवज्जो दिया। तमिलनाडु में डीएमके के साथ कांग्रेस की खींचतान जारी रही। विपक्ष के किसी भी दल ने एकता की कीमत पर त्याग स्वीकार नहीं किया। विपक्षी खेमे का संकट यह है कि वह अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में सहयोगियों से हिस्सेदारी बांटना ही नहीं चाहता।&nbsp;</div><div><br></div><div>मजबूत एकता के लिए विपक्ष के पास राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य साफ छवि वाला चेहरा होना जरूरी है। लेकिन विपक्ष के पास ऐसा चेहरा है भी नहीं। ममता बड़ी नेता तो हैं, लेकिन उनकी तुनकमिजाजी उन्हें सर्वमान्य चेहरा मानने के राह की बड़ी बाधा है। राहुल मोदी-शाह की जोड़ी को चाहे जिस अंदाज में चुनौती दें, मोदी विरोधी बौद्धिकों को उनका यह अंदाज चाहे जितना भी पसंद हो, लेकिन आमजन को उनमें कई बार बचकानापन नजर आता है तो कई मर्तबा प्रहसन। स्टालिन चाहे जितनी अच्छी तमिल बोलें, लेकिन राष्ट्रीय स्तर स्वीकार्यता के लिए वे अयोग्य हैं। इसी तरह केजरीवाल के पास बड़ा आधार नहीं है। रही बात अखिलेश यादव की तो, वे भी जमीनी राजनीति के बजाय बयानों के गुब्बारे उड़ाने के उस्ताद होते गए हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>आपसी अहं के टकराव के चलते नीतीश विपक्षी खेमा छोड़ चुके हैं। दूसरी बड़ी नेता ममता को चुनावी मैदान में करारी शिकस्त मिल गई है। अखिलेश को भी अगले साल उत्तर प्रदेश के सियासी मैदान में बीजेपी से दो-दो हाथ करना है। बीजेपी की कोशिश उन्हें तीसरी बार शिकस्त देने की होगी। अगर वह ऐसा करने में कामयाब रही तो उसके सामने दूर-दूर तक कोई चुनौती नहीं होगी। ऐसे में विपक्षी खेमे का संकट बड़ा है। अतीत के विपक्षी व्यवहार से नहीं लगता कि शायद ही भविष्य में कोई मजबूत मोर्चा बन सके। खुलकर विपक्षी खेमा भले ही ना कहे, लेकिन अंदर ही अंदर वह जरूर गुनगुना रहा है, कैसे मिले सुर हमारा-तुम्हारा....</div><div><br></div><div>-उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 12:40:44 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/then-how-could-our-tunes-ever-harmonize</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[चीन-अमेरिका की निकटता से भारत के सामने वैश्विक चुनौतियाँ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/global-challenges-facing-india-arising-from-china-us-rapprochement]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया एक बार फिर ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहाँ दो महाशक्तियों-अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते संवाद, आपसी मुलाकातों और कूटनीतिक समीकरणों को केवल द्विपक्षीय संबंधों के रूप में नहीं देखा जा सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संवाद और संभावित समझौतों को लेकर पूरी दुनिया में चर्चाओं का दौर चल रहा है। एक वर्ग इसे विश्व अर्थव्यवस्था के लिए राहतकारी कदम मान रहा है, क्योंकि इससे बढ़ती महंगाई, व्यापारिक अवरोधों और युद्धजन्य संकटों में कमी आने की उम्मीद व्यक्त की जा रही है, वहीं दूसरी ओर अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि यह निकटता भविष्य में एक ऐसे विश्व संरचना को जन्म दे सकती है जहाँ दुनिया की दिशा पुनः कुछ महाशक्तियों के हाथों में सिमट जाए और विकासशील तथा अर्धविकसित देशों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो जाएँ। भारत जैसे देशों के लिए यह परिस्थिति अवसर और चुनौती दोनों लेकर आई है।</div><div><br></div><div>आज अमेरिका और चीन मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगभग 44 प्रतिशत हिस्से को प्रभावित करते हैं। विश्व व्यापार, तकनीकी विकास, ऊर्जा बाजार, वैश्विक निवेश, वित्तीय संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक निर्णयों पर इन दोनों देशों का गहरा प्रभाव है। ऐसे में इनके संबंधों में किसी भी प्रकार का बदलाव पूरी दुनिया की दिशा बदलने की क्षमता रखता है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध, टैरिफ विवाद, तकनीकी प्रतिबंध और ताइवान से जुड़े तनावों ने विश्व अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाला। कोरोना महामारी के बाद वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ टूट गईं, रूस-यूक्रेन युद्ध ने ऊर्जा संकट बढ़ाया और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेला। इन परिस्थितियों में यदि अमेरिका और चीन संवाद और सहयोग की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो इससे वैश्विक आर्थिक स्थिरता को बल मिल सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/how-to-understand-the-strategic-side-effects-of-the-intensifying-dialogue-between-us-and-china" target="_blank">अमेरिका और चीन की बढ़ती संवाद-प्रक्रिया के रणनीतिक साइड इफेक्ट्स को यूँ समझिए</a></h3><div>विश्व अर्थव्यवस्था के संदर्भ में देखा जाए तो अमेरिका और चीन के बीच तनाव कम होने से सबसे पहले वैश्विक बाजारों को राहत मिलेगी। निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा, आपूर्ति श्रृंखलाओं में सुधार होगा और इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा, तकनीक तथा विनिर्माण क्षेत्रों में लागत घट सकती है। इससे महंगाई पर भी नियंत्रण संभव है। किंतु यह केवल तस्वीर का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह है कि यदि दोनों महाशक्तियाँ वैश्विक व्यापारिक नियमों और आर्थिक नीतियों को अपने हितों के अनुसार तय करने लगें तो छोटे देशों की आर्थिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। दुनिया पहले भी उपनिवेशवाद और आर्थिक नियंत्रण की राजनीति देख चुकी है, अब आशंका यह है कि कहीं आर्थिक वैश्वीकरण का नया स्वरूप महाशक्तियों के संयुक्त वर्चस्व में परिवर्तित न हो जाए। इसी संदर्भ में “जी-2” यानी अमेरिका और चीन केंद्रित विश्व व्यवस्था की चर्चा तेज हुई है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विश्व धीरे-धीरे बहुधू्रवीय व्यवस्था से हटकर दो महाशक्तियों के प्रभाव वाले ढाँचे की ओर बढ़ सकता है। यदि ऐसा हुआ तो वैश्विक नीतियों, व्यापारिक समझौतों और सुरक्षा संबंधी निर्णयों में छोटे देशों की भूमिका सीमित हो सकती है। यह स्थिति भारत जैसे देशों के लिए विशेष चिंता का विषय है क्योंकि भारत हमेशा से बहुधू्रवीय विश्व व्यवस्था और सामूहिक वैश्विक नेतृत्व का समर्थक रहा है।</div><div><br></div><div>भारत की स्थिति यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत न तो पूरी तरह अमेरिकी खेमे में है और न ही चीन के प्रभाव क्षेत्र में। भारत ने लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाई है। अमेरिका के साथ भारत के रक्षा, तकनीकी और आर्थिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। क्वाड जैसे मंचों में भारत की सक्रिय भूमिका है। दूसरी ओर चीन भारत का पड़ोसी देश है और दोनों देशों के बीच सीमा विवादों के बावजूद व्यापारिक संबंध व्यापक हैं। यही कारण है कि अमेरिका और चीन की बढ़ती निकटता भारत के लिए केवल बाहरी घटना नहीं बल्कि रणनीतिक पुनर्मूल्यांकन का विषय है। भारत और चीन की तुलना करें तो चीन ने पिछले तीन दशकों में विनिर्माण, निर्यात, आधारभूत संरचना और तकनीकी उत्पादन के माध्यम से स्वयं को वैश्विक उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित किया। चीन की आर्थिक नीति केंद्रीकृत और तीव्र निर्णय क्षमता वाली रही है। इसके विपरीत भारत का विकास लोकतांत्रिक व्यवस्था, विविधता और संस्थागत संतुलन पर आधारित रहा है। भारत की शक्ति उसकी युवा आबादी, लोकतंत्र, सेवा क्षेत्र और डिजिटल क्षमता में निहित है, जबकि चीन की शक्ति विनिर्माण, निर्यात और पूंजी निवेश में रही है। अमेरिका के साथ चीन के संबंधों में सुधार होने की स्थिति में भारत के सामने यह चुनौती होगी कि वह अपनी आर्थिक और रणनीतिक उपयोगिता को और अधिक प्रभावशाली बनाए।</div><div><br></div><div>भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर “चाइना प्लस वन” रणनीति में निहित है। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने पिछले वर्षों में चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में प्रयास किए हैं। अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ चीन के विकल्प के रूप में भारत, वियतनाम और अन्य देशों की ओर बढ़ी हैं। भारत यदि अपनी औद्योगिक नीतियों, आधारभूत संरचना, श्रम सुधार और तकनीकी क्षमता को मजबूत करता है तो वह वैश्विक निवेश का प्रमुख केंद्र बन सकता है। किंतु यदि भारत आवश्यक गति से सुधार नहीं कर पाया तो यह अवसर अन्य देशों के पास चला जाएगा। तकनीकी क्षेत्र में भी अमेरिका-चीन संबंधों का भारत पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा और रेयर अर्थ मिनरल्स नई शक्ति राजनीति के केंद्र बन चुके हैं। अमेरिका तकनीकी श्रेष्ठता बनाए रखना चाहता है जबकि चीन तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। भारत इन दोनों के बीच एक तीसरे विकल्प के रूप में उभर सकता है, लेकिन इसके लिए अनुसंधान, नवाचार और शिक्षा में बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। भारत के पास प्रतिभा है, लेकिन प्रतिभा को वैश्विक नेतृत्व में बदलने के लिए दीर्घकालिक दृष्टि चाहिए।</div><div><br></div><div>भू-राजनीतिक दृष्टि से भी यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है। ताइवान, दक्षिण चीन सागर, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संकटों पर अमेरिका और चीन की भूमिका निर्णायक है। यदि दोनों देशों के बीच समझ बढ़ती है तो सैन्य टकरावों की आशंका कम हो सकती है। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार स्थिर होंगे और तेल की कीमतों में राहत मिल सकती है। भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश के लिए यह अत्यंत लाभकारी स्थिति होगी। लेकिन यदि दोनों महाशक्तियाँ अपने प्रभाव विस्तार के लिए संकटों का उपयोग करती हैं तो विश्व अस्थिरता और बढ़ सकती है। भारत की विदेश नीति के लिए यह समय अत्यंत निर्णायक है। भारत को अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखते हुए चीन के साथ व्यावहारिक संबंधों का संतुलन बनाना होगा। साथ ही उसे वैश्विक दक्षिण यानी विकासशील देशों के नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी भूमिका और मजबूत करनी होगी। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने जिस “वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर” की अवधारणा प्रस्तुत की थी, वह भविष्य की विश्व व्यवस्था का वैकल्पिक मॉडल बन सकती है। तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो अमेरिका और चीन जहाँ शक्ति संतुलन की राजनीति में उलझे हुए हैं, वहीं भारत सहअस्तित्व, संवाद और बहुपक्षीय सहयोग की नीति पर चल रहा है। अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा शक्ति प्रदर्शन पर आधारित है जबकि भारत का दृष्टिकोण विकास, मानवीय मूल्यों और वैश्विक साझेदारी पर केंद्रित रहा है। यही भारत की विशिष्टता और शक्ति है।</div><div><br></div><div>आज दुनिया में यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि क्या अमेरिका और चीन मिलकर दुनिया को पुनः अपने प्रभाव क्षेत्र में बाँटने का प्रयास करेंगे? क्या छोटे देशों की भूमिका सीमित हो जाएगी? क्या फिर वही स्थिति बनेगी जब महाशक्तियाँ विश्व राजनीति को अपनी उँगलियों पर नचाती थीं? इन प्रश्नों के उत्तर भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन इतना निश्चित है कि आज की दुनिया शीत युद्ध काल की दुनिया नहीं है। भारत, जापान, यूरोपीय संघ, ब्राजील, आसियान और अफ्रीकी देशों का बढ़ता प्रभाव विश्व व्यवस्था को बहुधू्रवीय बनाए रखने में सक्षम है। भारत को इस बदलती परिस्थिति में अपने संकल्पों को सुदृढ़ करना होगा, विकास के नए मानक गढ़ने होंगे और अपनी रणनीतिक क्षमता को विस्तार देना होगा। क्योंकि बदलती दुनिया में प्रश्न यह नहीं है कि अमेरिका और चीन क्या करेंगे, बल्कि यह है कि भारत स्वयं को किस ऊँचाई पर स्थापित करेगा।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक,पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 19 May 2026 18:43:24 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/global-challenges-facing-india-arising-from-china-us-rapprochement</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच देशों की विदेश यात्रा के कूटनीतिक निहितार्थ भारत के लिए महत्वपूर्ण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/diplomatic-implications-of-pm-modi-five-nation-foreign-tour-are-significant-for-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच देशों के हालिया विदेश दौरे के कई बड़े कूटनीतिक, आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक मायने हैं। क्योंकि मई 2026 में उनका यूएई, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब दुनिया ऊर्जा संकट, ईरान युद्ध, सप्लाई चेन अस्थिरता और नए वैश्विक ध्रुवीकरण से गुजर रही है। लिहाजा, पीएम मोदी का यह विदेश दौरा केवल औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक शक्ति संतुलन, निवेश आकर्षण, तकनीकी साझेदारी, और भारत की उभरती महाशक्ति छवि को मजबूत करने की बहुस्तरीय रणनीतिक कवायद माना जा रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ा लक्ष्य है, क्योंकि भारत दुनिया का बड़ा तेल आयातक देश है। ईरान संकट और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण तेल कीमतें बढ़ रही हैं। ऐसे समय में यूएई दौरा भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने का प्रयास माना जा रहा है। लिहाजा भारत और यूएई के बीच रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण, एलपीजी (LPG) सप्लाई, ऊर्जा निवेश, समुद्री सुरक्षा जैसे अहम समझौते हुए हैं। इससे संकेत मिलता है कि भारत भविष्य के किसी बड़े वैश्विक ऊर्जा संकट के लिए खुद को सुरक्षित करना चाहता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/first-made-in-india-military-aircraft-c-295-ready-to-fly" target="_blank">भारत रचने जा रहा है नया इतिहास! पहला Made in India Military Aircraft C-295 उड़ान भरने के लिए तैयार</a></h3><div>दूसरा, पश्चिम एशिया में भारत की रणनीतिक पकड़ बढ़ रही है, क्योंकि यूएई ने पीएम मोदी का असाधारण स्वागत किया- एफ-16 एस्कॉर्ट और राष्ट्रपति स्तर की अगवानी- यह दिखाता है कि भारत अब केवल “तेल खरीदने वाला देश” नहीं बल्कि एक रणनीतिक साझेदार बन चुका है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>इसके मायने ये निकलते हैं कि पाकिस्तान की पारंपरिक खाड़ी पकड़ कमजोर होगी और भारत की अरब देशों में&nbsp; स्वीकार्यता बढ़ती जाएगी। इससे रक्षा और टेक्नोलॉजी सहयोग का विस्तार भी होगा।</div><div><br></div><div>तीसरा, यूरोप के साथ नई तकनीकी साझेदारी विकसित होगी, क्योंकि नीदरलैंड, स्वीडन और नॉर्वे का चयन बहुत रणनीतिक माना जा रहा है। चूंकि इन देशों से भारत सेमीकंडक्टर तकनीक, हरित ऊर्जा, जल प्रबंधन, एआई (AI) और रक्षा तकनीक और आर्कटिक एवं समुद्री सहयोग</div><div>को मजबूत करना चाहता है। विशेषकर सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत चीन पर निर्भरता कम करना चाहता है। इसलिए इस पहल के अपने रणनीतिक मायने हैं।</div><div><br></div><div>चौथा, चीन और अमेरिका दोनों को संतुलित संदेश देने के लिए पीएम मोदी का यह दौरा “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति का हिस्सा भी है, इससे अमेरिका के साथ साझेदारी, रूस से संबंध, अरब देशों से सामरिक निकटता, यूरोप के साथ तकनीकी सहयोग, चीन के प्रभाव का संतुलन बढ़ेगा। चूंकि भारत यह संदेश देना चाहता है कि वह किसी एक गुट का हिस्सा नहीं बल्कि स्वतंत्र वैश्विक शक्ति है।</div><div><br></div><div>पांचवां, भारत को निवेश हब बनाने की कोशिश यूएई द्वारा भारत में 5 अरब डॉलर निवेश की घोषणा महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर, बैंकिंग, लॉजिस्टिक्स, बंदरगाह, ऊर्जा क्षेत्र में निवेश बढ़ सकता है। यह “मेक इन इंडिया” और “भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब” बनाने की रणनीति से जुड़ा है।</div><div><br></div><div>छठा, घरेलू राजनीति के संकेत के नजरिए से दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ पीएम मोदी जनता से ईंधन बचाने, विदेशी यात्राएं कम करने और विदेशी मुद्रा बचाने की अपील कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ खुद बड़े वैश्विक दौरे कर रहे हैं। इसका राजनीतिक संदेश यह जाएगा कि कठिन वैश्विक समय में सक्रिय नेतृत्व पीएम दे रहे हैं और भारत संकट में भी वैश्विक केंद्र बना हुआ है। इससे पीएम मोदी की व्यक्तिगत कूटनीतिक छवि मजबूत होकर चमकेगी।</div><div><br></div><div>सातवां, भारत की वैश्विक छवि निर्माण के&nbsp; दृष्टिकोण से यह दौरा यह दिखाने का प्रयास भी है कि भारत केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि ऊर्जा, तकनीक, व्यापार और सुरक्षा में निर्णायक वैश्विक खिलाड़ी बन रहा है। विशेषकर G20 के बाद भारत अपनी “विश्व नेतृत्व” छवि को स्थायी बनाना चाहता है। इसके संभावित दीर्घकालिक प्रभाव भारत के लिए अहम साबित हो सकते हैं, क्योंकि इससे जहां ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, वहीं विदेशी निवेश बढ़ने की संभावना रहेगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>साथ ही&nbsp; रक्षा-तकनीकी सहयोग विस्तार से वैश्विक प्रभाव में वृद्धि होगी। भारत की यह नई चाल चीन के लिए यूरोप और खाड़ी में भारत की सक्रियता चीन के प्रभाव को चुनौती दे सकती है। जबकि पाकिस्तान के लिए खाड़ी देशों में भारत की बढ़ती स्वीकार्यता रणनीतिक दबाव बढ़ा सकती है। वहीं, यूरोप के लिए चीन के विकल्प के रूप में भारत की अहमियत बढ़ेगी। जबकि अमेरिका के लिए भारत एक आवश्यक रणनीतिक साझेदार बना रहेगा, भले ही वह पूरी तरह अमेरिकी धड़े में न जाए।</div><div><br></div><div>निष्कर्ष यह निकलता है कि पीएम मोदी का यह विदेश दौरा केवल औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक शक्ति संतुलन, निवेश आकर्षण, तकनीकी साझेदारी, और भारत की उभरती महाशक्ति छवि को मजबूत करने की बहुस्तरीय रणनीतिक कवायद माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 18 May 2026 12:25:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/diplomatic-implications-of-pm-modi-five-nation-foreign-tour-are-significant-for-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कब तक होगा परीक्षार्थियों के भविष्य से खिलवाड़?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/how-long-will-the-future-of-examinees-continue-to-be-trifled-with]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>‘नीट प्रश्नपत्र लीक’ मामले में गिरफ्तारियों की धरपकड़ जारी है। पड़ताल का जिम्मा सीबीआई को सौंपा गया है। राजस्थान से कुछ आरोपी गिरफ्तार हुए हैं। लेकिन जो आरोपी पकड़े गए हैं वह सियासत से संबंध रखते हैं। पुलिस अभिरक्षा में उनका सार्वजनिक रूप से मीडिया के कैमरों पर बोलना कि वह तो मौेहरे मात्र हैं। खिलाड़ी तो कोई और ही हैं वह बडे़-बड़े स्तर के? आरोपियों के मुख से निकले ये शब्द निश्चित रूप से निष्पक्ष जांच की उम्मीदों पर ग्रहण लगाने के लिए प्याप्त हैं। यहीं से मुकम्मल जांच की उम्मीदें टूटती दिखाई पड़ती हैं। साढ़े 22 लाख परीक्षार्थियों के भविष्य के साथ हुआ इतना बड़ा खिलवाड़ भी क्या एक कहानी बनकर सरकारी फाइलों में सिमट जाएगा?&nbsp;</div><div><br></div><div>करोड़ों लोग नीट परीक्षा लीक कांड की जांच को अब धूमिल होते देख रहे हैं। तसल्ली उन अभिभावकों को भी कर लेनी चाहिए,जो न्याय की उम्मीद लिए बैठे हैं। निष्पिक्ष जांच-पड़ताल की आस अब इसलिए भी नहीं की जा सकती। क्योंकि पूरा सिस्टम जांच छोड़कर, बड़ी मछलियों को बचाने में ही जुटेगा। ऐसा इस बार नहीं, पिछले तकरीबन सभी पेपर लीक कांड़ों में हुआ। नीट दाखिला परीक्षा है, भर्ती की पूरी की पूरी परीक्षा भारत में लीक होने लगी हैं। बावजूद इसके केंद्रीय हुकूमत कोई ऐसा उपाय नहीं कर पा रही जिससे परीक्षार्थियों के भविष्य के साथ किया जाने वाला खिलवाड़ रूक सके।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/why-is-the-china-model-being-discussed-so-extensively-amidst-the-neet-paper-leak-controversy" target="_blank">जेल में प्रिटिंग, आर्मी कैंप में प्रश्नपत्र तैयार, करेंसी से ज्यादा सिक्योरिटी, NEET पेपर लीक के बीच चीन मॉडल की क्यों हो रही इतनी चर्चा</a></h3><div>पिछले 7 वर्षों में यानी 2019 से लेकर 2026 मई तक, भारत में विभिन्न स्तरीय प्रतियोगी लगभग 70 परीक्षाओं के पेपर लीक हुए। आज तक किसी मामले की जांच न पूरी हुई और ना किसी मामले में न्याय हुआ। प्रत्येक मामलों में छोटे स्तर के कर्मचारी ही पकडे़ गए जिन्हें कुछ महीनों बाद या एकाध वर्षों में जमानत मिल गई। सबसे पहले दाखिला परीक्षा कराने वाली एनटीए को उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त कर देना चाहिए। एनटीए का कार्य इसलिए भी अब संतोषजनक नहीं, क्योंकि वह पुराने तौर-तरीकों को अभी भी अपनाती है।अपने सिस्टम को रिफॉर्म भी नहीं करती। विश्व की प्रतिष्ठित भरोसेमंद परीक्षाओं से भी कुछ नहीं सीखती। इंटरनेट-कंप्यूटर के जमाने में भी प्रश्न पत्र मुद्रित करके परीक्षा केंद्रों पर पहुंचाने में विश्वास करती है।अगर ऐसा ही करना है तो प्रश्पपत्रों के सेट बदले हुए और अलग-अलग होने चाहिए ताकि किसी तरह की गड़बड़ी की संभावनाएं न हो। अगर खुदा ना खास्ता कुछ हो भी, तो पूरी परीक्षा रद ना की जाए, सिर्फ उसी सेंटर पर दोबारा परीक्षा करवाई जाए, जहां कुछ गड़बड़ी हुई हो? अगर ऐसे आधुनिक तरीके अपनाए जाते तो परीक्षार्थियों के साथ खिलवाड़ न होता।</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>केंद्र से लेकर राज्य सरकारें भी अच्छे से जानती हैं कि भारत में आयोजित होने वाली हर चौथी प्रतियोगी परीक्षा का पेपर का लीक होता है जिसमें पुलिस भर्ती और शिक्षा परीक्षाएं कुख्यात हैं। जबकि, नीट परीक्षा नौकरी या भर्ती की परीक्षा नहीं होती, मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए आयोजित होती है उसमें भी सेंधमारी, हद है? गौरतलब है अगर पूर्ववर्ती पेपर लीक मामलों में सख्ती और स्वतंत्र-निष्पक्ष जांच हुई होती और आरोपियों के नाम सार्वजनिक किए गए होते और सजा के तौर पर उम्रकैद या मोटा हर्जाना वसूला गया होता, तो ऐसे कांड करने वाले भय खाते, डरते। भविष्य में गड़बड़ी करने से तौबा भी करते? लेकिन लचीला कानून-प्रशासन का उदार रवैया और कमजोर सजा-जुर्माने से आरोपी तनिक भी नहीं डरते। एक कांड करते हैं दूसरे की तैयारी में लगे होते हैं। फिलहाल मौजूदा नीट पेपर कांड पहला दोष तो परीक्षा कराने वाली संस्था ‘नेशनल टेस्टिंग एजेंसी’ यानी एनटीए का ही है। मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश की पात्रता परीक्षा नीट के सवाल लीक होने से पूरी परीक्षा रद्द करने की मजबूरी जितनी शर्मनाक है, उतनी ही चिंताजनक।</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>एनटीए का गठन 2017 में हुआ, तब से लेकर आज तक इस संस्था की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में रही। 5 मई 2024 को भी जब इसी नीट परीक्षा में गडबड़झाला हुआ और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। तब संस्था ने भविष्य में इस तरह की गलती दोबारा न करने का आश्वासन न सिर्फ अदालत को दिया था बल्कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को भी भरोषा दिया था? पर, बेशर्मी देखिए मात्र 24 महीनों बाद भी उससे पहले से भी बड़ा कांड़ कर दिया। पिछली दफा इन्होंने कई छात्रों को पूरे-पूरे 720 नंबर दे डाले थे,जबकि वो सभी छात्र पढ़ने में सामान्य थे उनके मुकाबले टॉपरों को उनसे कहीं कम नंबर दिए गए थे। इस बार तो उससे भी बड़ा ब्लंडर हुआ। पेपर लीक की सूचना सबसे पहले राजस्थान से बाहर निकली। जहां, कई छात्रों के पास 140 से अधिक परीक्षा के मूल प्रश्नों से हूबहू प्रश्न गेस पेपरों में मिले।</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>लीक प्रश्नों पर सबसे पहले एनटीए की ओर से सफाई दी गई कि प्रश्न प्रिटिंग प्रेस से लीक हुए। जबकि, सभी जानते हैं कि जहां पेपरों की छपाई होती है जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता। बेहद गुप्त स्थान होता है और वहां के कर्मचारियों को फोन तक रखने की इजाजत नहीं होती। ऐसे में प्रिंटिंग प्रेस से प्रश्नों के लीक होने का सवाल ही नहीं उठता। इस कांड में पूरा का पूरा सिंडिकेट शामिल होता है। समय का तकाजा है ऐसी विधि केंद्रीय लेबल पर बननी चाहिए, ताकि छात्रों के जीवन से कोई खिलवाड़ न कर पाए। केंद्र सरकार को आगे आकर हस्तक्षेप करना चाहिए। क्योंकि मौजूदा कांड में हुकूमत की चुप्पी सभी को अखर रही है। ऐसी घटनाओं के घट जाने के बाद छात्र सिर्फ सरकार से ही न्याय की उम्मीद करते हैं। उनकी उम्मीदें नहीं टूटनी चाहिए।</div><div><br></div><div>- डॉ. रमेश ठाकुर</div><div>सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 16 May 2026 15:27:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/how-long-will-the-future-of-examinees-continue-to-be-trifled-with</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अमेरिका और चीन की बढ़ती संवाद-प्रक्रिया के रणनीतिक साइड इफेक्ट्स को यूँ समझिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/how-to-understand-the-strategic-side-effects-of-the-intensifying-dialogue-between-us-and-china]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हाल में ही बढ़ती संवाद-प्रक्रिया और संभावित रणनीतिक समझौते को दुनिया बेहद गंभीरता से देख रही है, क्योंकि बदलती वैश्विक दुनियादारी और नवमहत्वाकांक्षी देशों-गुटों की मतलबी कूटनीति-अर्थनीति से अमेरिका-चीन दोनों की अंतरराष्ट्रीय बादशाहत खतरे में है। आखिर जब एक तरफ रूस और भारत अपनी दशकों पुरानी मित्रता पर अडिग हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप भी अपने पुराने सम्बन्धों को तरोताजा कर रहे हैं, जो कि अमेरिकी डीप स्टेट की बिल्कुल नई विसात है।</div><div><br></div><div>देखा जा रहा है कि भारत की चतुराई और रूस की दृढ़ता से अमेरिका अपने ही बुने हुए जाल में फंसकर तड़फड़ा रहा है। वहीं, रूस-चीन की समझदारी से पश्चिमी एशिया में जो अमेरिका की फजीहत हुई है, उसके बाद अब चीन के समक्ष हथियार डालने के अलावा उसके पास कोई चारा भी नहीं&nbsp; बचा है। चूंकि ट्रंप मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के फार्मूले पर काम कर रहा हैं और रूस, भारत, फ्रांस, ब्राजील, जापान ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिए हैं, ऐसे में पाकिस्तान को साधकर अरब में अपनी इज्जत बचाना और चीन के दरबार में हाजिरी लगाने के अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं बचा हुआ था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/why-did-xi-jinping-take-china-secrets-to-the-white-house" target="_blank">China के सीक्रेट 'White House' में ट्रंप को लेकर क्यों गए जिनपिंग? जहां पहुंच US प्रेसिडेंट ने कह दी अपने दिल की बात</a></h3><div>ऐसे में यदि अमेरिका और चीन के बीच टकराव कुछ कम होता है और “नई दोस्ती” या व्यावहारिक सहयोग बढ़ता है, तो इसके वैश्विक राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं। चूंकि दोनों देश पहले भी एक दूसरे के करीब रहे हैं, इसलिए उनके बीच कूटनीतिक प्रेम की पहल अमेरिकी की भूल सुधार रणनीति समझी जानी चाहिए और अपने उद्देश्य में ट्रंफ सफल प्रतीत हो चुके हैं। हालांकि यह भविष्य के गर्त में है कि चीनी चाकरी अमेरिका कहाँ तक कर पाएगा?</div><div><br></div><h2># समझिए,अमेरिका-चीन रिश्तों में नरमी क्यों महत्वपूर्ण है?</h2><div><br></div><div>अमेरिका और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक और सामरिक शक्तियाँ हैं। इनके संबंधों का असर लगभग हर देश पर पड़ता है। ऐसे में यदि दोनों के बीच व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और कूटनीति पर समझ बढ़ती है, तो वैश्विक तनाव कुछ हद तक कम हो सकता है। साथ ही&nbsp;&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर लाजिमी है।</span></div><div><br></div><div>पहला, वैश्विक बाजारों में स्थिरता: अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध कम होने पर शेयर बाजारों और निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है। सप्लाई चेन संकट कम हो सकता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्र को राहत मिल सकती है।</div><div><br></div><div>दूसरा, तेल और ऊर्जा बाजार: यदि दोनों देश सहयोग करते हैं, तो वैश्विक ऊर्जा कीमतों में अनिश्चितता कम हो सकती है। मध्य पूर्व में तनाव कम कराने के लिए संयुक्त दबाव बन सकता है।</div><div><br></div><div>तीसरा, डॉलर बनाम युआन: चीन लंबे समय से डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व को चुनौती देना चाहता है। ऐसे में अगर रिश्ते सुधरते हैं, तो अमेरिका कुछ आर्थिक संतुलन के साथ चीन को सीमित छूट दे सकता है, लेकिन डॉलर की केंद्रीय भूमिका तुरंत कमजोर नहीं होगी।</div><div><br></div><div>चतुर्थ, रूस, यूरोप और भारत पर प्रभाव: जहां तक रूस की बात है कि रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के लिए यह स्थिति मिश्रित हो सकती है। यदि अमेरिका और चीन करीब आते हैं, तो रूस की सामरिक उपयोगिता कुछ घट सकती है। लेकिन चीन रूस को पूरी तरह छोड़ने की स्थिति में नहीं होगा, क्योंकि उसे ऊर्जा और सैन्य संतुलन की जरूरत है।</div><div><br></div><div>वहीं, जहां तक यूरोप की बात है तो यूरोपीय देश राहत महसूस करेंगे क्योंकि अमेरिका-चीन तनाव से वैश्विक व्यापार प्रभावित हो रहा था। लेकिन यूरोप को डर रहेगा कि कहीं अमेरिका चीन के साथ सौदेबाजी में यूरोपीय हितों को पीछे न छोड़ दे।&nbsp;</div><div><br></div><div>जहां तक भारत की बात है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत के लिए यह स्थिति अवसर और चुनौती दोनों ला सकती है। जहां संभावित अवसर के रूप में वैश्विक व्यापार स्थिर होने से भारतीय निर्यात को लाभ मिलेगा। अमेरिका और चीन दोनों भारत को संतुलनकारी शक्ति के रूप में महत्व देते रहेंगे। भारत वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र बन सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>जहां तक संभावित चुनौतियाँ की बात है तो यदि अमेरिका चीन के प्रति नरम होता है, तो भारत पर चीन-विरोधी रणनीतिक दबाव कम हो सकता है। सीमा विवादों पर चीन अधिक आत्मविश्वासी रुख भी अपना सकता है। वहीं, क्वाड (QUAD) जैसे समूहों की रणनीतिक धार कुछ कम हो सकती है।</div><div><br></div><div>जहां तक सैन्य और सामरिक प्रभाव की बात है तो ताइवान मुद्दे पर तनाव कुछ समय के लिए कम हो सकता है। दक्षिण चीन सागर में सैन्य टकराव की आशंका घट सकती है। लेकिन दोनों महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा पूरी तरह खत्म नहीं होगी। सवाल है कि क्या यह स्थायी दोस्ती होगी? संभवतः नहीं। अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा संरचनात्मक है: तकनीकी वर्चस्व, सैन्य प्रभुत्व, वैश्विक व्यापार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, और इंडो-पैसिफिक रणनीति। इन मुद्दों पर दोनों देशों के हित टकराते रहेंगे। इसलिए यह “पूर्ण मित्रता” से अधिक “व्यावहारिक समझौता” हो सकता है।</div><div><br></div><div>इस पुनर्मिलन का सबसे बड़ा वैश्विक संदेश यह है कि दुनिया अब बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहाँ अमेरिका अकेला निर्णायक शक्ति नहीं रहेगा, बल्कि चीन भी खुलकर वैश्विक नेतृत्व चाहता है। वहीं, भारत, रूस, यूरोप, ब्राजील और खाड़ी देश भी अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र मजबूत कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में ट्रंप-जिनपिंग संवाद वैश्विक शक्ति-संतुलन को नया आकार दे सकता है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 16 May 2026 15:11:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/how-to-understand-the-strategic-side-effects-of-the-intensifying-dialogue-between-us-and-china</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सत्ता संभालते ही हिंदुत्व मॉडल के जरिये बंगाल में बड़े बदलाव ले आये सुवेंदु अधिकारी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/suvendu-adhikari-brought-about-significant-changes-in-bengal-through-the-hindutva-model]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने सत्ता की कमान संभालते ही चुनावी वादों पर अमल की दिशा में कदम बढ़ाने तो शुरू कर ही दिये हैं साथ ही राज्य की राजनीति और प्रशासन में तेज बदलावों का दौर भी शुरू कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी के नेता सुवेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद संभालते ही कई ऐसे फैसले लिए हैं, जिन्हें राज्य की दिशा बदलने वाला माना जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को उनके गढ़ में पराजित कर सत्ता तक पहुंचे सुवेंदु अधिकारी ने शपथ लेने के केवल 48 घंटे के भीतर लगभग डेढ़ दर्जन बड़े निर्णयों की घोषणा कर यह संकेत दे दिया कि नई सरकार प्रशासनिक, राजनीतिक और कानून व्यवस्था के मोर्चे पर व्यापक बदलाव चाहती है।</div><div><br></div><div>नई सरकार के शुरुआती फैसलों में सार्वजनिक स्थानों पर नमाज और ध्वनि विस्तारक यंत्रों के उपयोग को लेकर सख्ती प्रमुख रही। सरकार ने स्पष्ट किया कि सड़कों और सार्वजनिक मार्गों पर नमाज की अनुमति नहीं होगी तथा धार्मिक गतिविधियां निर्धारित परिसरों तक सीमित रहेंगी। कोलकाता के रेड रोड क्षेत्र में सार्वजनिक नमाज पर भी रोक लगाने का निर्णय लिया गया है। इसके साथ ही ध्वनि प्रदूषण नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए लाउडस्पीकर के उपयोग पर भी नियंत्रण लगाया गया है। सरकार ने पत्थरबाजी की घटनाओं पर भी कठोर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/suvendu-adhikari-takes-major-action-in-the-rg-kar-case-suspending-three-senior-ips-officers" target="_blank">RG Kar Case में Suvendu Adhikari का बड़ा एक्शन, लापरवाही पर 3 सीनियर IPS अफसर सस्पेंड</a></h3><div>साथ ही सुवेंदु अधिकारी सरकार ने वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव और वर्ष 2023 के पंचायत चुनावों के बाद हुई हिंसा से जुड़े मामलों को फिर से खोलने का आदेश दिया है। इन मामलों को पिछली सरकार के दौरान बंद कर दिया गया था। मुख्यमंत्री ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक कर लंबित और बंद मामलों की दोबारा जांच कराने का निर्देश दिया। सरकार का कहना है कि चुनाव बाद हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलाना उसकी प्राथमिकता है।</div><div><br></div><div>इसी क्रम में भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या के मामलों को भी दोबारा जांच के दायरे में लाया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछले पंद्रह वर्षों में मारे गए तीन सौ इक्कीस भाजपा कार्यकर्ताओं के परिवार यदि चाहें तो सरकार निष्पक्ष जांच कराएगी। यह फैसला राजनीतिक हिंसा के मुद्दे पर भाजपा के लंबे अभियान का हिस्सा माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, नई सरकार ने सांप्रदायिक हिंसा फैलाने वालों के खिलाफ गैर जमानती धाराओं में कार्रवाई करने और पुलिस को बिना राजनीतिक दबाव के काम करने की खुली छूट देने की घोषणा की है। प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि अवैध गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए और किसी की राजनीतिक पहचान को महत्व न दिया जाए। सरकार ने दावा किया है कि कानून व्यवस्था को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त किया जाएगा।</div><div><br></div><div>साथ ही सीमा पार से होने वाली अवैध घुसपैठ और पशु तस्करी के मुद्दे पर भी सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। राज्य में अवैध पशु बाजारों को बंद करने और अवैध परिवहन पर रोक लगाने के निर्देश जारी किए गए हैं। दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर चौबीस परगना जिलों में चल रहे अवैध पशु बाजारों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है। इसके साथ ही भारत बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने के लिए सीमा सुरक्षा बल को पैंतालीस दिनों के भीतर भूमि हस्तांतरित करने का निर्णय लिया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे अवैध घुसपैठ और जनसंख्या संतुलन में हो रहे बदलावों पर रोक लगेगी।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, पश्चिम बंगाल की नई सरकार ने राज्य में पशु वध को लेकर भी सख्त नियम लागू करने का निर्णय लिया है। राज्य सरकार ने पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम 1950 के प्रावधानों को कड़ाई से लागू करने के निर्देश जारी किए हैं। नए आदेश के अनुसार अब किसी भी पशु के वध से पहले उसकी उपयुक्तता का प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य होगा। यह प्रमाण पत्र नगर निकाय प्रमुख और सरकारी पशु चिकित्सक की संयुक्त सहमति से जारी किया जाएगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक स्थानों पर पशु वध पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा और केवल निर्धारित बूचड़खानों में ही इसकी अनुमति होगी। नियमों के उल्लंघन पर छह महीने तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान भी किया गया है। नई सरकार के इस कदम को कानून व्यवस्था, सार्वजनिक स्वच्छता और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>साथ ही राज्य में लंबे समय से चर्चा में रहे सिंडिकेट राज और अवैध खनन पर भी सरकार ने कार्रवाई का संकेत दिया है। जिला और प्रखंड स्तर पर सक्रिय कथित सिंडिकेट नेटवर्क को समाप्त करने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार का मानना है कि पिछली व्यवस्था में निर्माण सामग्री और कई क्षेत्रों में प्रभावशाली समूहों का नियंत्रण था, जिसे खत्म करना आवश्यक है।</div><div><br></div><div>सुरक्षा व्यवस्था में भी बदलाव करते हुए आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की सुरक्षा हटाने का निर्णय लिया गया है। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस शासनकाल में विभिन्न बोर्डों, सार्वजनिक उपक्रमों और गैर वैधानिक संस्थाओं में नियुक्त अध्यक्षों और सदस्यों की सेवाएं समाप्त करने के आदेश दिए गए हैं। साठ वर्ष से अधिक आयु वाले अधिकारियों को सेवा विस्तार देने पर भी रोक लगाने का निर्णय लिया गया है।</div><div><br></div><div>नई सरकार ने केंद्र की कई योजनाओं को पश्चिम बंगाल में लागू करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। आयुष्मान भारत, बेटी बचाओ बेटी पढाओ, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, प्रधानमंत्री कृषक बीमा योजना, प्रधानमंत्री श्री योजना, विश्वकर्मा योजना और उज्ज्वला योजना को शीघ्र लागू करने के निर्देश दिए गए हैं। मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग को केंद्र सरकार के साथ आवश्यक समझौते तेजी से पूरा करने को कहा है।</div><div><br></div><div>साथ ही राज्य की नई भाजपा सरकार ने शिक्षा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जुड़े मोर्चे पर भी बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में प्रार्थना सभा के दौरान वंदे मातरम् गाना अनिवार्य कर दिया है। आदेश के अनुसार कक्षाएं शुरू होने से पहले विद्यार्थियों को वंदे मातरम् के छहों पद गाने होंगे। सरकार का कहना है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक रहा है। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा वंदे मातरम् को जन गण मन के समान दर्जा दिए जाने के बाद इस निर्णय को और अधिक महत्व दिया जा रहा है। राज्य सरकार ने इसे राष्ट्रीय भावना और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, कानूनी ढांचे में बदलाव करते हुए भारतीय न्याय संहिता को राज्य में लागू करने की घोषणा भी की गई है। यह नया आपराधिक कानून पुराने भारतीय दंड संहिता का स्थान ले चुका है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इसका कार्यान्वयन लंबित था। नई सरकार ने इसे तुरंत प्रभाव से लागू करने का निर्णय लिया है।</div><div><br></div><div>सरकारी नौकरियों के इच्छुक युवाओं को राहत देते हुए आयु सीमा चालीस से बढ़ाकर पैंतालीस वर्ष कर दी गई है। सरकार का कहना है कि इससे लंबे समय से अवसरों से वंचित युवाओं को लाभ मिलेगा और भर्ती प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जाएगा।</div><div><br></div><div>जनगणना प्रक्रिया को भी नई सरकार ने फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है। केंद्र सरकार के निर्देशों के बावजूद यह प्रक्रिया लंबे समय से लंबित थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार अब बिना किसी राजनीतिक अहंकार के केंद्र के निर्देशों के अनुरूप कार्य करेगी।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, प्रशासनिक ढांचे में सुधार की दिशा में भी बड़े कदम उठाए गए हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और राज्य पुलिस अधिकारियों को केंद्र सरकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भेजने का फैसला किया गया है। इसका उद्देश्य राज्य की प्रशासनिक कार्यप्रणाली को राष्ट्रीय स्तर के मानकों से जोड़ना है। इसी क्रम में स्वास्थ्य विभाग के आठ अधिकारियों ने नई दिल्ली में आयुष्मान भारत योजना से संबंधित तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया। शहरी विकास विभाग सहित अन्य विभागों के अधिकारियों के लिए भी प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जा रहे हैं। इसे पश्चिम बंगाल की नौकरशाही में बड़े प्रशासनिक पुनर्गठन की शुरुआत माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुवेंदु अधिकारी ने सत्ता संभालते ही हिंदुत्व आधारित राजनीति को जमीन पर उतारने की दिशा में तेज कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पर सख्ती, वंदे मातरम् को अनिवार्य करना, सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और पशु तस्करी के खिलाफ कार्रवाई जैसे फैसलों को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा लंबे समय से बंगाल में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और कानून व्यवस्था को बड़ा मुद्दा बनाती रही है और अब सरकार बनने के बाद उसे अमली जामा पहनाने की कोशिश साफ दिखाई दे रही है। माना जा रहा है कि राज्य की एक बड़ी आबादी भी लंबे समय से ऐसे बदलावों की प्रतीक्षा कर रही थी, जिसका असर चुनाव परिणामों में भी देखने को मिला। नई सरकार के शुरुआती फैसलों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में बंगाल की राजनीति और प्रशासनिक दिशा दोनों में बड़े परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 18:40:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/suvendu-adhikari-brought-about-significant-changes-in-bengal-through-the-hindutva-model</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों के 'दिल्ली-विमर्श' के निहितार्थ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-implications-of-the-brics-foreign-ministers-delhi-dialogue]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ब्रिक्स (BRICS) के विदेश मंत्रियों की दो दिवसीय दिल्ली बैठक ने दुनिया को कई महत्वपूर्ण राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक संदेश दिए हैं, जिनके कूटनीतिक निहितार्थ को समझने की जरूरत है। अन्यथा शेष दुनिया को अमेरिकी-यूरोपीय दादागिरी (नाटो सैन्य गठबंधन) के दुनियावी दांवपेंचों से निजात मिलनी मुश्किल है।&nbsp; लिहाजा, इस बैठक में मुख्य रूप से वैश्विक शक्ति-संतुलन, अमेरिकी प्रतिबंध नीति, पश्चिम एशिया संकट, वैश्विक व्यापार व्यवस्था और “ग्लोबल साउथ” की भूमिका पर जोर दिखाई दिया।&nbsp;</div><div><br></div><div>देखा जाए तो नई दिल्ली में ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों का जमावड़ा लगा हुआ है। दो दिनों का यह 18वां शिखर सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है, जब दुनिया कई मोर्चे पर अस्थिरता से गुजर रही है। ब्रिक्स के सदस्य देश - ईरान और यूएई सीधे तौर पर इस हलचल में शामिल है। ऐसे में यह जुटान पूरी दुनिया के लिए अहम हो जाती है। इस अहम बैठक में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर, रूस के विदेश मंत्री सर्जेइ लावरोव और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची जैसे नेताओं के दूरदर्शिता भरे बयान विशेष चर्चा में रहे। जिसके दुनियावी मायने बेहद अहम हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/indias-clear-statement-at-the-brics-meeting-dialogue-and-cooperation-will-solve-the-global-crisis" target="_blank">India, Russia और Iran ने मिलाया हाथ, जानिये BRICS Foreign Ministers Meeting में क्या कुछ हुआ खास</a></h3><div>जिस तरह से कूटनीतिक सम्मेलन के पहले ही दिन जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के खिलाफ लगाए जाने वाले एकतरफा प्रतिबंधों का जिक्र किया, जो सबसे ज्यादा विकासशील देशों को नुकसान पहुंचाते हैं। स्वाभाविक तौर पर उनका इशारा अमेरिका है, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों की वजह से दुनिया को बहुत ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। वहीं, ईरान मामले में भी गतिरोध की वजह बहुत हद तक वॉशिंगटन की अव्यवहारिक मांगें है। ब्रिक्स के बड़े मंच से उठी आवाज का असर ज्यादा होगा।</div><div><br></div><div>विदेश मंत्री एस जयशंकर का उद्घाटन भाषण मौजूदा चुनौतियों का सही खाका खींचता है। पश्चिम एशिया पर मंडराता युद्ध का खतरा, ऊर्जा संकट, सप्लाई चेन में रुकावट और जलवायु परिवर्तन ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। तमाम देशों की अर्थव्यवस्था को मंदी में फंसने का डर सता रहा है। ऐसे में जैसा कि विदेश मंत्री ने कहा, विकासशील देशों ने ब्रिक्स से यह उम्मीद लगाई है कि यह मंच स्थिरता कायम करने में सकारात्मक भूमिका अदा करेगा। इसके कतिपय निहितार्थ इस प्रकार हैं-&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था को चुनौती: बैठक का सबसे बड़ा संदेश यह था कि दुनिया अब केवल अमेरिका-केन्द्रित व्यवस्था पर निर्भर नहीं रहना चाहती। ब्रिक्स देशों ने “मल्टीपोलर वर्ल्ड” के दृष्टिगत बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया। इसका अर्थ है कि वैश्विक निर्णयों में पश्चिमी देशों के साथ एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की शक्तियों की भी बराबर भूमिका हो।</div><div><br></div><div>दूसरा, अमेरिकी प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव का विरोध: भारत, रूस, चीन और ईरान सहित कई देशों ने एकतरफा प्रतिबंधों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार और संप्रभुता के खिलाफ बताया। विशेष रूप से एस जयशंकर ने कहा कि प्रतिबंध और दबाव कूटनीति का विकल्प नहीं हो सकते। यह संदेश सीधे तौर पर अमेरिका की प्रतिबंध नीति की आलोचना माना गया।</div><div><br></div><div>तीसरा, डॉलर प्रभुत्व कम करने का संकेत: बैठक में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों पर भी चर्चा हुई। यह संदेश था कि ब्रिक्स देश डॉलर पर निर्भरता कम करना चाहते हैं ताकि अमेरिकी आर्थिक दबाव का असर घटाया जा सके।</div><div><br></div><div>चतुर्थ, पश्चिम एशिया संकट पर चिंता: ईरान-इज़राइल तनाव और समुद्री मार्गों की सुरक्षा बड़ा मुद्दा रहा। ब्रिक्स देशों ने रेड सी और होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे मार्गों की सुरक्षा पर जोर दिया। दुनिया को यह संदेश दिया गया कि क्षेत्रीय युद्ध अब वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि इस मंच के सामने भी चुनौती है। ईरान और यूएई के आपसी रिश्ते ठीक नहीं चल रहे। जबकि चीन ने अपने विदेश मंत्री को नहीं भेजा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>एक बात और, जब सम्मेलन की शुरुआत हुई, चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग तब ट्रंप की मेजबानी में व्यस्त थे। ब्रिक्स के सबसे बड़े विरोधी ट्रंप है। उन्हें लगता है कि यह मंच अमेरिकी हितों के खिलाफ खड़ा किया गया है। मेजबान होने के नाते यह भारत की जिम्मेदारी है कि यहां से निकला संदेश किसी के विरोध में नहीं, साझा हित में हो। भारत के पास सभी सदस्यों को करीब लाने और मौजूदा संकट का समाधान पेश करने का मौका है।</div><div><br></div><div>पांचवां, ग्लोबल साउथ की राजनीतिक आवाज: बैठक में यह स्पष्ट हुआ किब्रिक्स स्वयं को केवल आर्थिक समूह नहीं, बल्कि विकासशील देशों की सामूहिक राजनीतिक आवाज के रूप में स्थापित करना चाहता है। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों की समस्याओं—जैसे खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा संकट और कर्ज—को वैश्विक एजेंडा में प्रमुखता देने की बात कही गई।</div><div><br></div><div>छठा, संयुक्त राष्ट्र सुधार की मांग: भारत और ब्राजील ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और विकासशील देशों के अधिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता दोहराई। यह संदेश था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी संस्थाओं में अब नई वैश्विक वास्तविकताओं के अनुसार बदलाव होना चाहिए।</div><div><br></div><div>सातवां, ब्रिक्स के भीतर मतभेद भी सामने आए: हालांकि बैठक में एकजुटता दिखाई गई, लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ कि सभी सदस्य अमेरिका-विरोधी नीति पर पूरी तरह एकमत नहीं हैं। भारत और ब्राजील जैसे देश पश्चिम के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना चाहते हैं, जबकि रूस और ईरान अधिक आक्रामक रुख चाहते हैं। इससे यह संकेत मिला कि ब्रिक्स अभी पूर्ण राजनीतिक गठबंधन नहीं, बल्कि साझा हितों वाला मंच है।&nbsp;</div><div><br></div><div>समग्र रूप से कहा जाए तो, इस बैठक का वैश्विक संदेश यह था कि उभरती शक्तियाँ अब विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था में अधिक स्वतंत्र, संतुलित और पश्चिम से अलग भूमिका चाहती हैं। ब्रिक्स ने यह दिखाने की कोशिश की कि “ग्लोबल साउथ” अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन का सक्रिय खिलाड़ी बनना चाहता है। चूंकि ब्रिक्स अब केवल उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रहा, इसकी भूमिका आज कहीं ज्यादा व्यापक हो चुकी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>वास्तव में यह वैश्विक संतुलन स्थापित करने में महत्वपूर्ण हो सकता है। भारत का रोल इसमें सबसे अहम हो जाता है। उसने पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते बनाए हुए हैं, जबकि रूस, ईरान और चीन के साथ भी बैलेंस रखा है। उसने हमेशा संवाद से समाधान की बात की है। यह रवैया उसे भरोसेमंद साथी बनाता है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 13:05:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-implications-of-the-brics-foreign-ministers-delhi-dialogue</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ट्रंप और जिनपिंग की दोस्ती ने बदल डाले वैश्विक राजनीतिक समीकरण, Quad का भविष्य अधर में]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/friendship-between-trump-and-xi-jinping-has-changed-the-global-political-equation]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा बदलती विश्व व्यवस्था का ऐसा प्रतीक बनकर सामने आई जिसने वैश्विक राजनीति की दिशा पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। बीजिंग में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ ट्रंप की लंबी बैठकों, व्यापारिक समझौतों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी सहयोग पर चर्चा तथा अमेरिकी उद्योगपतियों की भारी मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि तमाम टकरावों और आरोपों के बावजूद अमेरिका और चीन एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते। इसी के साथ यह सवाल भी तेज हो गया है कि क्या इस यात्रा ने क्वॉड जैसे रणनीतिक समूहों के भविष्य पर भी अनिश्चितता पैदा कर दी है?</div><div><br></div><div>दिलचस्प बात यह है कि पिछले वर्ष जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन के दौरान शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की थी, तब ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि “अमेरिका भारत को चीन और रूस के हाथों खो रहा है।” यही नहीं, मोदी की चीन और रूस के नेताओं के साथ तस्वीरों को वाशिंगटन में रणनीतिक असहजता के रूप में देखा गया था। लेकिन अब वही ट्रंप खुद चीन की धरती पर शी जिनपिंग के साथ बैठकों में व्यस्त रहे। उनके साथ अमेरिका के सबसे बड़े उद्योगपति और तकनीकी कंपनियों के प्रमुख भी मौजूद रहे। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि भारत का चीन से संवाद अमेरिका के लिए “भारत को खो देना” था, तो फिर ट्रंप की अपनी चीन यात्रा को क्या कहा जाए? क्या यह अमेरिकी यथार्थवाद है, आर्थिक मजबूरी है या फिर वैश्विक शक्ति संतुलन की नई स्वीकारोक्ति है?</div><div><br></div><div>ट्रंप की इस यात्रा ने यह भी साफ कर दिया कि चीन को अलग थलग करने की अमेरिकी रणनीति अब पहले जैसी प्रभावी नहीं रह गई है। वहीं बीजिंग ने ट्रंप की इस यात्रा को केवल कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं रहने दिया, बल्कि इसे अपनी तकनीकी, आर्थिक और सामरिक शक्ति के प्रदर्शन में बदल दिया। शहर की सड़कों पर चालक रहित विद्युत वाहन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियां, मानवरूपी रोबोट और डिजिटल विज्ञापन चीन की नई ताकत का प्रदर्शन कर रहे थे। चीन दुनिया को यह संदेश देना चाहता था कि अब वह केवल सस्ती वस्तुएं बनाने वाला देश नहीं बल्कि भविष्य की तकनीकों का नेतृत्व करने वाली शक्ति बन चुका है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-who-has-been-betting-on-india-for-years-is-now-suddenly-forced-to-dance-to-chinas-tun" target="_blank">वर्षों तक भारत पर लगाया दांव, अब चीन के धुन पर नाचने पर अचानक क्यों मजबूर हुआ अमेरिका, ट्रंप के डबलगेम ने कैसे बढ़ाई दिल्ली की टेंशन?</a></h3><div>देखा जाये तो ट्रंप की यात्रा ऐसे समय हुई जब अमेरिका ईरान युद्ध के कारण कई मोर्चों पर दबाव में है। अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के अनुसार चीन ने ईरान संकट का उपयोग अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के बीच चीन ने ऊर्जा आपूर्ति और हथियारों के जरिये अपनी भूमिका बढ़ाई, जबकि अमेरिका युद्ध और आर्थिक दबावों में उलझा रहा। यही कारण है कि ट्रंप को अंततः बीजिंग पहुंचकर शी जिनपिंग से संवाद करना पड़ा।</div><div><br></div><div>बीजिंग में हुई बातचीत के दौरान ताइवान सबसे बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया। शी जिनपिंग ने साफ कहा कि यदि ताइवान के मुद्दे को ठीक ढंग से नहीं संभाला गया तो दोनों देशों के बीच टकराव और संघर्ष हो सकता है। यह बयान केवल चेतावनी नहीं था बल्कि बदलते शक्ति संतुलन का संकेत भी था। चीन अब अमेरिका से बराबरी की भाषा में बात कर रहा है।</div><div><br></div><div>ट्रंप की प्राथमिकता हालांकि व्यापार और निवेश रही। उनके साथ एलन मस्क, जेन्सन हुआंग और अन्य अमेरिकी उद्योगपति भी पहुंचे। यह इस बात का संकेत था कि अमेरिकी उद्योग जगत चीन से दूरी नहीं चाहता। दुनिया की सबसे बड़ी उपभोक्ता अर्थव्यवस्था और विशाल तकनीकी बाजार से अलग होना अमेरिका के लिए आसान नहीं है।</div><div><br></div><div>व्हाइट हाउस की ओर से जारी आधिकारिक बयान ने भी यह स्पष्ट कर दिया कि ट्रंप की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों ने कई संवेदनशील मुद्दों पर व्यावहारिक सहयोग की दिशा में आगे बढ़ने के संकेत दिए। बयान के अनुसार ट्रंप और शी जिनपिंग ने अमेरिकी कंपनियों के लिए चीन में बाजार पहुंच बढ़ाने, चीन के निवेश को अमेरिका में प्रोत्साहित करने और कृषि उत्पादों की खरीद बढ़ाने पर चर्चा की। दोनों देशों ने होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने और ऊर्जा आपूर्ति बाधित न होने देने पर भी सहमति जताई। चीन ने जलडमरूमध्य के सैन्यीकरण का विरोध दोहराया, जबकि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देने पर भी साझा रुख सामने आया। यह बयान इस बात का संकेत है कि तीखी प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक अविश्वास के बावजूद अमेरिका और चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर टकराव के बजाय नियंत्रित सहयोग की राह भी तलाश रहे हैं।</div><div><br></div><div>यही वह बिंदु है जहां क्वॉड का भविष्य भी सवालों में घिरता दिखाई देता है। क्वॉड को लंबे समय से हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करने वाले समूह के रूप में देखा जाता रहा है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की यह साझेदारी चीन को लेकर साझा रणनीतिक चिंता पर आधारित मानी जाती है। लेकिन यदि अमेरिका का राष्ट्रपति खुद चीन के साथ संबंधों को स्थिर करने, व्यापार बढ़ाने और तकनीकी सहयोग तलाशने बीजिंग पहुंचता है, तो फिर क्वॉड की वास्तविक दिशा क्या रह जाएगी?</div><div><br></div><div>भारत के लिए यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। पिछले कुछ वर्षों में नई दिल्ली ने क्वॉड को अपनी हिंद प्रशांत रणनीति का अहम हिस्सा बनाया है। लेकिन ट्रंप की चीन यात्रा यह संकेत देती है कि अंततः अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही निर्णय लेगा। यदि आर्थिक या सामरिक कारणों से उसे चीन के साथ समझौता करना पड़े, तो वह पीछे नहीं हटेगा। ऐसे में भारत को यह समझना होगा कि वैश्विक राजनीति स्थायी मित्रताओं से अधिक स्थायी हितों पर चलती है।</div><div><br></div><div>ट्रंप की यात्रा ने एक और महत्वपूर्ण तथ्य उजागर किया है। अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा अब केवल व्यापार युद्ध तक सीमित नहीं है। यह तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा, दुर्लभ खनिज, चिप निर्माण, समुद्री मार्गों और वैश्विक प्रभाव की व्यापक लड़ाई बन चुकी है। लेकिन इस प्रतिस्पर्धा के बीच दोनों देश एक दूसरे पर निर्भर भी हैं। अमेरिका चीन को रोकना चाहता है, लेकिन उसकी कंपनियां चीन के बाजार और विनिर्माण क्षमता से अलग नहीं हो पा रहीं। दूसरी ओर चीन अमेरिकी तकनीक और वैश्विक वित्तीय संरचना से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता।</div><div><br></div><div>इसीलिए बीजिंग में ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात केवल दो नेताओं की बैठक नहीं थी। यह उस नई विश्व व्यवस्था की झलक थी जिसमें प्रतिद्वंद्विता और सहयोग साथ-साथ चलेंगे। दोनों देश सार्वजनिक रूप से एक दूसरे को चुनौती देंगे, लेकिन आर्थिक और तकनीकी स्तर पर पूरी तरह अलग भी नहीं होंगे।</div><div><br></div><div>इस पूरी प्रक्रिया में भारत की स्थिति बेहद जटिल हो जाती है। एक ओर वह अमेरिका के साथ सामरिक साझेदारी मजबूत कर रहा है, दूसरी ओर रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखता है और चीन के साथ संवाद भी बनाए हुए है। ट्रंप की चीन यात्रा भारत को यह संदेश भी देती है कि वैश्विक राजनीति में किसी एक धुरी पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, ट्रंप की बीजिंग यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 21वीं सदी की विश्व राजनीति का केंद्र अब अमेरिका चीन संबंध ही होंगे। यही संबंध तय करेंगे कि वैश्विक अर्थव्यवस्था किस दिशा में जाएगी, तकनीकी नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा और भविष्य की विश्व व्यवस्था कैसी होगी। लेकिन इसके साथ ही यह यात्रा एक बड़ा सवाल भी छोड़ गई है कि यदि अमेरिका खुद चीन के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से गढ़ रहा है, तो फिर दुनिया के बाकी देशों से वह किस प्रकार की रणनीतिक निष्ठा की अपेक्षा कर सकता है?</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 14 May 2026 18:05:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/friendship-between-trump-and-xi-jinping-has-changed-the-global-political-equation</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनफिंग की मुलाकात के कूटनीतिक मायने शेष दुनिया के लिए अहम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/diplomatic-significance-of-the-meeting-between-trump-and-jinping-is-crucial-for-rest-of-the-world]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सफल कारोबारी से राजनेता बने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने हर रिश्ते को फायदे और नुकसान के नजरिये से देखते है, लेकिन कूटनीतिक इंजीनियर समझे जाने वाले चीन के अपने दौरे को लेकर उन्होंने केवल इतना भर कहा कि यह सिर्फ व्यापार नहीं, वैश्विक रणनीतिक संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण है। चूंकि अमेरिका और चीन एक दूसरे के सहयोगी और प्रतिस्पर्धी दोनों समझे जाते हैं, इसलिए लगभग एक दशक के अन्तराल पर हुई उनकी यह यात्रा के कूटनीतिक मायने अहम समझे जाते हैं, क्योंकि उनकी इस मुलाकात की सफलता और विफलता का असर पूरी दुनिया पर निःसंदेह पड़ेगा।</div><div><br></div><div>गौरतलब है कि पिछले साल यानी अक्टूबर 2025 में जब आखिरी बार ट्रंप की चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकात हुई थी, तब उनके बीच मुख्य मुद्दा टैरिफ था, लेकिन अब बदलते वैश्विक हालात में जाहिर तौर पर ईरान भी होगा। क्योंकि पश्चिम एशिया संकट ने दोनों देशों के लिए मुश्किलें बढ़ाई है। इसलिए स्वाभाविक बात है कि आपसी तनाव के बावजूद वे सहयोग का रास्ता तलाशने की कोशिश करेंगे। चूंकि लगभग एक दशक बाद यानी 2017 के बाद कोई अमेरिकी राष्ट्रपति 2026 में चीन पहुंचा है। हालांकि, टैरिफ वॉर की वजह से माना जाता है कि ट्रंप का रुख पेइचिंग को लेकर कठोर है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/pakistan-paid-off-its-1971-debt-by-hiding-iranian-planes" target="_blank">ईरानी विमानों को अपने यहाँ छिपा कर पाकिस्तान ने उतार दिया 1971 का कर्ज</a></h3><div>समझा जाता है कि अपने पहले कार्यकाल में ही उन्होंने यानी ट्रंफ ने चीन से होने वाले आयात पर टैरिफ की घोषणा की थी। जबकि दूसरे टर्म में वह इस लड़ाई को और आगे ले गए और 125% तक भारी भरकम टैरिफ तक जड़ दिया। हालांकि दुनियावी रेयर अर्थ मिनरल्स पर चीनी नियंत्रण की वजह से आखिरकार ट्रंप को झुककर समझौता करना पड़ा था, अन्यथा उनका कारोबारी हित प्रभावित होता। ऐसे में टैरिफ वॉर भले थम गई हो, पर अमेरिका और चीन के बीच की पारस्परिक होड़ कायम है और वह नित्य नए स्वरूप में उभरकर सामने आ ही जाती है। चूंकि दोनों देश एक-दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश करते रहते हैं, पर इतना नहीं जिससे बात ज्यादा बिगड़े।&nbsp;</div><div><br></div><div>हाल के अमेरिका/इजरायल और ईरान युद्ध के दौरान भी कुछ यही देखने को मिला है। भले ही ईरान की आर्थिक व सामरिक मदद के आरोप में अमेरिका ने कुछ चीनी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की, और चीन ने भी पलटवार करते हुए वॉशिंगटन की नीतियों का विरोध किया, लेकिन सब कुछ नियंत्रण में रहकर हुआ। इसकी ठोस वजह उनकी आपसी निर्भरता और पारस्परिक जरूरत भी है, जिसे समझने की जरूरत है। आपको यह मालूम होना चाहिए कि चीन के लिए अमेरिका आज भी सबसे बड़ा बाजार है। हालांकि इस साल चीनी निर्यात में करीब 10% की कमी आई है। चीन की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था के लिए यह झटका है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दिलचस्प बात तो यह है कि खाड़ी देशों में भी चीन का निर्यात घटा है। मसलन, तेहरान (ईरान) का सबसे बड़ा तेल खरीदार होने के नाते भी उसकी परेशानी बढ़ रही है। लिहाजा चीन चाहता है कि युद्ध जल्दी थमे। भारत की भी यही सोच है। वहीं दूसरी ओर, ट्रंप को ईरान पर समर्थन और निवेश के लिए चीन चाहिए। इसीलिए वह अपने साथ कई बड़े उद्यमियों को लेकर बीजिंग पहुंचे हैं। चूंकि अमेरिका इस दौरे से बड़ी डील की उम्मीद कर रहा है, खासकर बोइंग विमानों की। इसलिए आलोचकों को डर है कि कहीं ताइवान पर ट्रंप नरम न पड़ जाएं। अमेरिकी हित में वह ऐसा कर सकते है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि इस समय दोनों रसूखदार नेता घरेलू मोर्चे पर विविध असहज स्थितियों में फंसे हुए हैं। लिहाजा उनकी कोशिश यही होगी कि इस मुलाकात से कुछ बड़ा हासिल किया जाए। यदि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं पारस्परिक सहयोग के रास्ते पर बढ़ती है और ईरान में शांति कायम होती है, तो यूक्रेन सहित सभी का फायदा होगा।</div><div><br></div><h2># आखिर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के चीन दौरे पर भारत की नज़र क्यों है?</h2><div><br></div><div>अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे पर दुनियाभर की निगाहें लगी हुई हैं। ऐसे में स्वाभाविक बात है कि भारत भी अपने दोनों प्रतिस्पर्धियों पर नजर रखेगा। उल्लेखनीय है कि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी इससे जुड़े एक सवाल पर कहा भी है कि भारत के कई देशों के साथ रिश्ते है। कई देशों के साथ साझेदारी आगे बढ़ रही है। चूंकि विभिन्न देशों के बीच इस तरह का दौरा होता रहता है और जब भी इस तरह के दौरे होते हैं तो भारत देखता है कि उसमें क्या बदलाव आया है- या फिर क्या गतिविधियां हुई। ऐसा इसलिए किया जाता है कि राष्ट्रहित के अनुरूप नीतियां संशोधित होती रहें।</div><div><br></div><div>चूंकि भारत हाल के वर्षों में अमेरिका भारत का अहम रणनीतिक साझेदार बनकर उभरा है। दूसरी ओर चीन भी भारत का अहम पड़ोसी देश है, जिसके साथ सीमा विवाद के बाद भी रिश्ते व्यवहारिक समझ पर वापस लौट रहे है। ऐसे में दोनों देशों के आपसी संबंध और इस दौरे के निष्कर्ष भी भारत पर असर डालेगा। अमेरिका और चीन के रिश्ते एक लंबे वक्त तक असहजता के दायरे में रहे, जिसके जियोपॉलिटिकल प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रहा है। ट्रंप का यह दौरा 2017 के बाद हो रहा है। चीन पहुंचने पर बुधवार को ट्रंप का स्वागत उपराष्ट्रपति ने किया, जो 2017 से अच्छा स्वागत होने को दर्शाता है।</div><div><br></div><div>चीन मामलो के जानकार बताते हैं कि भारत जानना चाहेगा कि ट्रंप और चिनफिंग के बीच बातचीत का क्या निष्कर्ष निकला। हाल के वर्षों में प्रशांत महासागर में जिस&nbsp; तरह चीन का प्रभाव बढ़ा है, इसी बैलेस ऑफ पावर के मद्देनजर अमेरिका और भारत रणनीतिक और सामरिक मुद्दों पर लगातार नजदीकी स्तर पर काम करते रहे। ऐसे में अमेरिका और चीन अपने सबंधों को अगर फिर से नया आयाम देने का फैसला करते है तो अमेरिका व चीन दोनों के रिश्तों के मुताबिक भारत को भी अपनी विदेश नीति में बदलाव करना होगा।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 14 May 2026 13:19:50 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/diplomatic-significance-of-the-meeting-between-trump-and-jinping-is-crucial-for-rest-of-the-world</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[ईरानी विमानों को अपने यहाँ छिपा कर पाकिस्तान ने उतार दिया 1971 का कर्ज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/pakistan-paid-off-its-1971-debt-by-hiding-iranian-planes]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान जब भारतीय हमलों से बचाने के लिए ईरान ने पाकिस्तानी सैन्य विमानों और संसाधनों को सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराया था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि पांच दशक बाद पाकिस्तान उसी एहसान का बदला चुकाता दिखाई देगा। अब आरोप लग रहे हैं कि अमेरिका की संभावित सैन्य कार्रवाई और क्षेत्रीय तनाव के बीच पाकिस्तान ने ईरानी विमानों को अपने सैन्य ठिकानों पर सुरक्षित शरण दी। इस तरह इस्लामाबाद ने तेहरान का पुराना कर्ज तो उतार दिया है लेकिन अब वह खुद संकट में फंसता दिखाई दे रहा है। हालांकि पाकिस्तान ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की जटिल कूटनीतिक राजनीति को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।</div><div><br></div><div>पाकिस्तानी अधिकारियों ने बताया है कि इस तरह के दावे वास्तविकता से परे हैं, क्योंकि नूर खान वायुसेना अड्डा राजधानी के अत्यंत व्यस्त और आबादी वाले हिस्से में स्थित है। पाकिस्तान का कहना है कि वहां किसी भी बड़े सैन्य बेडे या विमानों को छिपाकर रखना संभव ही नहीं है। दूसरी ओर अमेरिकी प्रशासन ने भी अब तक सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान पर कोई सीधा आरोप नहीं लगाया है, जिससे स्थिति और अधिक जटिल दिखाई दे रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/trump-kept-issuing-threats-iran-infiltrates-kuwait-shots-fired" target="_blank">धमकी देते रह गए ट्रंप, कुवैत में घुस गया ईरान, चल गई गोलियां</a></h3><div>सूत्रों के अनुसार ईरान ने संभावित खतरे को देखते हुए अपने कुछ नागरिक विमानों को पड़ोसी अफगानिस्तान की ओर भेजा। अफगान नागरिक उड्डयन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि महान एयर का एक विमान संघर्ष तेज होने से पहले काबुल पहुंचा था और बाद में सुरक्षा कारणों से उसे हेरात स्थानांतरित कर दिया गया। बताया गया कि अफगान क्षेत्र में पाकिस्तानी हवाई हमलों की खबरों के बाद यह आशंका पैदा हो गई थी कि काबुल हवाई अड्डा भी संभावित निशाना बन सकता है।</div><div><br></div><div>इन घटनाओं ने दक्षिण एशिया के जानकारों को 1971 के दौर की याद दिला दी है। उस समय शाह मोहम्मद रजा पहलवी के नेतृत्व वाला ईरान पाकिस्तान का प्रमुख समर्थक बनकर सामने आया था। तेहरान ने इस्लामाबाद को हेलिकाप्टर, ईंधन, गोला बारूद और सैन्य उपकरणों के कलपुर्जे उपलब्ध कराए थे। कई रिपोर्टों में यह भी उल्लेख मिलता है कि पाकिस्तान के कुछ सैन्य विमानों ने ईरानी वायुसेना अड्डों पर शरण ली थी।</div><div><br></div><div>बाद में सार्वजनिक हुए अमेरिकी दस्तावेजों से पता चला था कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन प्रशासन ने पर्दे के पीछे ईरान को पाकिस्तान की सहायता के लिए प्रोत्साहित किया था। उस दौर में अमेरिका और चीन दोनों ही पाकिस्तान को कमजोर होने से बचाना चाहते थे। शीत युद्ध के समय ईरान और पाकिस्तान दोनों सोवियत विरोधी सैन्य गठबंधन सेन्टो के सदस्य थे और निक्सन प्रशासन इन्हें क्षेत्र में सोवियत प्रभाव को रोकने वाले महत्वपूर्ण साझेदार मानता था।</div><div><br></div><div>पांच दशक बाद वैश्विक राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। आज ईरान अमेरिका का प्रमुख पश्चिम एशियाई प्रतिद्वंद्वी माना जाता है, जबकि पाकिस्तान दक्षिण एशिया में चीन का सबसे करीबी सुरक्षा सहयोगी बन चुका है। चीन ने हाल के समय में अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष संपर्क स्थापित कराने में पाकिस्तान की भूमिका की सार्वजनिक सराहना भी की है। इस बदलती परिस्थिति में पाकिस्तान का संतुलन साधना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है।</div><div><br></div><div>पाकिस्तान एक ओर चीनी सैन्य उपकरणों पर अत्यधिक निर्भर है। रिपोर्टों के अनुसार 2020 से 2024 के बीच पाकिस्तान के प्रमुख हथियार आयात का लगभग अस्सी प्रतिशत हिस्सा चीन से आया। वहीं दूसरी ओर इस्लामाबाद अमेरिका के साथ अपने सैन्य और खुफिया संबंधों को फिर से मजबूत करने की कोशिश भी कर रहा है, जो बराक ओबामा प्रशासन के दौरान काफी कमजोर पड़ गए थे।</div><div><br></div><div>पाकिस्तानी अधिकारी लगातार यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि तेहरान के साथ उनके संबंध किसी गुप्त सैन्य सहयोग की बजाय क्षेत्रीय स्थिरता के लिए रचनात्मक कूटनीति का हिस्सा हैं। पाकिस्तान समय समय पर अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश भी करता रहा है। उसका दावा है कि दोनों देशों के साथ कार्यकारी संबंध बनाए रखने की उसकी क्षमता क्षेत्रीय तनाव कम करने में सहायक हो सकती है।</div><div><br></div><div>इसके बावजूद अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठान के एक प्रभावशाली हिस्से में पाकिस्तान को लेकर संदेह अब भी गहराई से मौजूद है। अल कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन की पाकिस्तान में मौजूदगी की स्मृति आज भी अमेरिका पाकिस्तान संबंधों पर भारी पड़ती है। अमेरिकी अधिकारी और सांसद लंबे समय से पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था के कुछ तत्वों पर इस्लामी उग्रवादी संगठनों के साथ चयनात्मक संबंध रखने के आरोप लगाते रहे हैं, हालांकि पाकिस्तान इन आरोपों को लगातार नकारता आया है।</div><div><br></div><div>ताजा आरोपों ने अमेरिकी संसद में भी नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने चेतावनी दी है कि यदि पाकिस्तान द्वारा ईरान को सैन्य सहायता या शरण देने की खबरें सही साबित होती हैं, तो अमेरिका को ईरान और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थ के रूप में इस्लामाबाद की भूमिका का पूरी तरह पुनर्मूल्यांकन करना पड़ सकता है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति में पुराने रिश्ते, सामरिक हित और बदलते वैश्विक गठबंधन आज भी गहराई से प्रभाव डाल रहे हैं।</div><div><br></div><div>बहरहाल, विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान पर आंख मूंदकर भरोसा करना अमेरिका सहित कई देशों के लिए पहले भी भारी पड़ चुका है। हाल के वर्षों में अमेरिकी रणनीतिक और सुरक्षा रिपोर्टों में भी यह संकेत दिया गया था कि पाकिस्तान की नीतियां भविष्य में अमेरिका के लिए प्रत्यक्ष चुनौती बन सकती हैं। कुछ विश्लेषणों में पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर को भी ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा गया है जिनके फैसले क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ा सकते हैं और अमेरिकी हितों के लिए संकट खड़ा कर सकते हैं। यही कारण है कि वाशिंगटन में यह राय मजबूत होती जा रही है कि पाकिस्तान के साथ किसी भी सामरिक या कूटनीतिक साझेदारी में अमेरिका को अत्यंत सावधानी और सतर्कता बरतनी होगी।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 13:28:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/pakistan-paid-off-its-1971-debt-by-hiding-iranian-planes</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[प्रधानमंत्री मोदी की अपील पर राजनीति कितनी जायज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/how-justified-is-the-politics-surrounding-prime-minister-modi-appeal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय परंपरा में आभूषणों को सिर्फ पहनने या सौंदर्य बढ़ाने के लिए ही इस्तेमाल नहीं किया जाता रहा है। भारतीय परिवारों के लिए सोना-चांदी आदि के गहने बुरे वक्त के लिए एक तरह से संचित निधि की भूमिका निभाते रहे हैं। यही वजह है कि भारतीय परिवार शादी-विवाह के मौके पर सोने-चांदी के गहने खरीदने में दिलचस्पी दिखाते रहे हैं। भारतीय गृहिणियों की कमजोरी और सौंदर्य का जरिया रहा यह सोना भी विवादों में आ गया है। इसकी वजह है, प्रधानमंत्री मोदी की अपील, जिसमें उन्होंने लोगों से एक साल तक के लिए सोने की गैरजरूरी खरीद को टालने की अपील की है। प्रधानमंत्री की इस अपील के अपने मायने हैं और जरूरत भी। अव्वल तो इस पर विपक्षी दलों का सहयोग मिलना चाहिए था, लेकिन नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस मसले पर सरकार को घेरने की कोशिश की है। उन्होंने कहा है कि सरकार चलाने में नाकामी के चलते प्रधानमंत्री लोगों से यह खरीदो और यह ना खरीदो की अपील कर रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री के बयान के पीछे 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद उपजे हालात हैं। दरअसल पश्चिम एशिया में जारी तनाव के चलते वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर संकट उठ खड़ा हुआ है। चूंकि होमुर्ज जलडमरू मध्य पर ईरान का कब्जा है और अमेरिकी हमले के विरोध में उसने इसके जरिए सहज तरीके से आवाजाही पर रोक लगा रखी है, इसकी वजह से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आपूर्ति का संकट खड़ा हो गया है। इसकी वजह से जहां पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति महंगी हुई है, वहीं सोने की वैश्विक स्तर पर कीमतें लगातार बढ़ने से उसका भी आयात महंगा हुआ है। देश ही नहीं, आज पूरी दुनिया के लिए ऊर्जा का सबसे बड़ा जरिया पेट्रोलियम पदार्थ ही हैं। इसके अलावा रासायनिक खादों बनाने के लिए भी पेट्रोलियम पदर्थों को ही कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। वैश्विक सप्लाई कमजोर होने के चलते इन सबके आयात पर होने वाले भारी खर्च के चलते भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इन दिनों लगातार कम होता जा रहा है। प्रधानमंत्री की अपील इसी भंडार को बचाने के लिए भारत में सबसे ज्यादा आयात खर्च पेट्रोलियम पदार्थ, खाद्य तेल, सोना और रासायनिक उर्वरकों का है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश ने वित्त वर्ष 2025-26 में इन्हीं चार वस्तुओं के आयात पर करीब 240 अरब डॉलर यानी भारतीय मुद्रा में करीब 20 लाख करोड़ से अधिक का खर्च किया है। जो देश के कुल आयात बिल का करीब एक तिहाई है। इसका असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहा है। जो लगातार कम होता जा रहा है। एक मई को खत्म हुए सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 7.7 अरब डॉलर से घटकर महज 690 अरब अमरीकी डॉलर रह गया। भारतीय रिज़र्व बैंक के मुताबिक, देश के स्वर्ण भंडार में भी कमी आई, जो पांच अरब डॉलर घटकर 115 अरब डॉलर हो गया। भारत की निधियों के सबसे बड़े घटक विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां भी इस सप्ताह में 2.7 अरब डॉलर घटकर 551 अरब डॉलर ही रह गई। इसी तरह देश का विशेष यानी ट्राजेक्शन अधिकार भी करीब 1.5 अरब डॉलर बढ़कर 18.78 अरब अमेरिकी डॉलर रह गया। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास भारत जो आरक्षित आर्थिक भंडार है, उसमें भी गिरावट देखी गई, जो अस्सी लाख डॉलर बढ़कर 4.86 अरब डॉलर हो गई। वैसे तो वैश्विक संकट के चलते दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं हिचकोले खा रही हैं। भारत भी उसी में समाहित है। इसी से बचने के लिए प्रधानमंत्री ने एक तरह से मितव्ययिता और खर्च घटाने की अपील की है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/visit-of-prime-minister-modi-to-uae-netherlands-sweden-norway-and-italy" target="_blank">वैश्विक संकट के बीच सबसे बड़े कूटनीतिक मिशन पर निकल रहे हैं मोदी, विश्व राजनीति में होगा बड़ा उलटफेर</a></h3><div>रिजर्व बैंक और कारोबारी आंकड़ों के अनुसार मौजूदा वित्त वर्ष में भारत ने कुल 775 अरब डॉलर का आयात किया। इस आयात में सिर्फ चार प्रमुख वस्तुओं की हिस्सेदारी 240.7 अरब डॉलर रही। इसमें सबसे ज्यादा खर्च कच्चे तेल पर रहा। आंकड़ों के अनुसार, देश ने अकेले क्रूड ऑयल आयात पर ही करीब 134.7 अरब डॉलर खर्च किए हैं। चूंकि पश्चिम एशिया में तनाव की वजह से तेल की कीमतों में भारी उछाल दिख रहा है,। इसलिए भारत पर यह खर्च बढ़ गया है। अप्रैल में भारत ने औसतन 114.48 डॉलर प्रति बैरल की दर से कच्चे तेल का आयात किया। इन कीमतों की तुलना पिछले साल की कीमतों से करें तो इसमें भारी उछाल दिखता है। पिछले वित्त वर्ष में देश ने औसतन 70.99 डॉलर प्रति बैरल की दर से आयात किया। भारत अपने खर्च के पेट्रोलियम पदार्थों का 88 फीसद हिस्सा आयात करता है। जाहिर है कि इस मद में भारत को हर साल अतिरिक्त आर्थिक दबाव झेलना पड़ता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और कार पूलिंग जैसी योजनाओं को अपनाने की लोगों से अपील की है।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारतीय घरों, विशेषकर गृहिणियों के लिए सोना सबसे बड़ा आकर्षण रहा है। हाल के वर्षों में चूंकि बैंकों में जमा धन पर खास कमाई नहीं हो रही है, उसकी तुलना में सोने में रिटर्न बढ़ रहा है। इस वजह से सोने की मांग में बढ़ोतरी हुई है। मौजूदा वित्त वर्ष में भारत ने दूसरे नंबर पर विदेशी मुद्रा सोने के आयात में ही खर्च की है। मौजूदा वर्ष में सोने का आयात रिकॉर्ड 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह बढ़ोतरी पिछले साल की तुलना में करीब 24 प्रतिशत ज्यादा है। जाहिर है कि इस पर भी भारत को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करना पड़ रहा है। चूंकि भारत स्विटजरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, पेरू, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त अरब अमीरात से सोना आयात करता है। इसलिए यहां विदेशी मुद्रा भारी मात्रा में खर्च करनी पड़ती है। वैसे पिछले साल की तुलना में इस साल करीब 4.7 प्रतिशत कम सोना आयात हुआ है। इसकी वजह वैश्विक स्तर पर बढ़ती इसकी कीमतें हैं। फिर भी सोने के प्रति भारतीयों का मोह कम नहीं हुआ है। इसीलिए प्रधानमंत्री को सोने के गैर जरूरी खरीद को टालने के लिए अपील करनी पड़ी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारत में जितना खाद्य तेल का इस्तेमाल होता है, उसका करीब 57 से 60 प्रतिशत तक का हिस्सा आयात करना पड़ता है। इस मद में भी भारत को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करना पड़ रहा है। मौजूदा वित्त वर्ष में ही अब तक विदेशों से वनस्पति तेलों के आयात पर करीब 19.5 अरब डॉलर खर्च करना पड़ा है। चूंकि लोगों के खानपान पर रोक नहीं लगाई जा सकती, फिर खान-पान में कटौती का कसर राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्षमता में गिरावट के रूप में नजर आ सकता है। जिसका असर उत्पादन पर भी पड़ेगा। इसलिए इस मद में हो रहे खर्च को रोकना आसान नहीं है। इसलिए प्रधानमंत्री ने खाद्य तेलों के खर्च में कटौती की बात सीधे तौर पर तो नहीं की है, लेकिन यह जरूर कहा है कि लोग खाद्य तेलों का सीमित उपयोग करें। इसी तरह रासायनिक उर्वरकों के आयात 77 प्रतिशत बढ़कर 14.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इसलिए मोदी ने लोगों किसानों से रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल 50 प्रतिशत तक कम करने की अपील की है। उन्होंने किसानों को डीजल पंप की जगह सोलर पंप अपनाने की सलाह भी दी, ताकि पेट्रोलियम ईंधन पर निर्भरता घटाई जा सके।</div><div><br></div><div>कारोबारी आंकड़ों के अनुसार सिर्फ इन्हीं चार चीजों का कुल आयात बिल पिछले वित्त वर्ष की तुलना में इस बार बढ़कर 112 अरब डॉलर से 240.7 अरब डॉलर हो गया है। इससे देश के सामने संकट होना स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री की अपील इसी संकट से बचाव का रास्ता है। याद कीजिए, पिछली सदी के साठ के दशक को, जब भारत में अपनी पूरी जनसंख्या को खिलाने भर के लिए अनाज का उत्पादन तक नहीं हो पाता था। तब अमेरिका से गेहूं का आयात करना पड़ता था। अमेरिका इसके एवज में भारत को आंख दिखाता था। इससे बचाव के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश से एक शाम उपवास की अपील की थी। वे खुद भी सोमवार की शाम को उपवास रखते थे। इसके बाद ही उन्होंने कृषि क्रांति का सपना देखा। तब प्रधानमंत्री का लोगों ने साथ दिया था, विपक्षी दल चाहे तब जिस भी स्थिति में रहे हों, उन्होंने भी प्रधानमंत्री पर सवाल नहीं उठाए थे।</div><div><br></div><div>-उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 12:51:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/how-justified-is-the-politics-surrounding-prime-minister-modi-appeal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[वैश्विक संकट के बीच सबसे बड़े कूटनीतिक मिशन पर निकल रहे हैं मोदी, विश्व राजनीति में होगा बड़ा उलटफेर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/visit-of-prime-minister-modi-to-uae-netherlands-sweden-norway-and-italy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैश्विक चुनौतियों, बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों, ऊर्जा संकट, आपूर्ति शृंखला की अनिश्चितताओं और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बीच भारत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर बड़े कूटनीतिक मिशन पर निकल रहे हैं। 15 मई से 20 मई तक प्रस्तावित उनकी बहुराष्ट्रीय विदेश यात्रा के दौरान वह संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का दौरा करेंगे। यह यात्रा भारत की वैश्विक रणनीति, आर्थिक हितों और सामरिक साझेदारियों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है। इस दौरान ऊर्जा सहयोग, व्यापार, हरित प्रौद्योगिकी, रक्षा, निवेश, नवाचार और वैश्विक सुरक्षा जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होगी, जिससे भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका और अधिक मजबूत होने की संभावना है।</div><div><br></div><div>इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि भारत अपने पारंपरिक मित्र देशों के साथ केवल व्यापारिक संबंधों तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह प्रौद्योगिकी, हरित ऊर्जा, रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति शृंखला जैसे क्षेत्रों में दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग को भी विस्तार देना चाहता है। हाल के वर्षों में भारत ने विश्व मंच पर एक भरोसेमंद और संतुलित शक्ति के रूप में अपनी पहचान बनाई है। यही कारण है कि यूरोप और पश्चिम एशिया के देश भारत को भविष्य के आर्थिक और सामरिक साझेदार के रूप में देख रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-prime-minister-appeal-is-the-result-of-farsighted-thinking-in-a-time-of-global-crisis" target="_blank">वैश्विक संकट के दौर में दूरगामी सोच का परिणाम है प्रधानमंत्री की अपील</a></h3><div>हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी यात्रा की शुरुआत संयुक्त अरब अमीरात से करेंगे, जहां वह राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान से मुलाकात करेंगे। दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग, निवेश, डिजिटल भुगतान, रक्षा और भारतीय समुदाय के कल्याण जैसे विषयों पर चर्चा होने की संभावना है। भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हुई है। संयुक्त अरब अमीरात भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है तथा बीते पच्चीस वर्षों में भारत में निवेश करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। दोनों देशों के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते ने व्यापार को नई गति दी है। ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भी संयुक्त अरब अमीरात भारत का महत्वपूर्ण सहयोगी है। इसके अलावा भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा दोनों देशों की सामरिक निकटता को और अधिक मजबूत बना रहा है। वहां रह रहे लाखों भारतीय दोनों देशों के सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों की मजबूत कड़ी हैं।</div><div><br></div><div>संयुक्त अरब अमीरात के बाद प्रधानमंत्री नीदरलैंड जाएंगे। यह यात्रा भारत और नीदरलैंड के बीच बढ़ते आर्थिक तथा प्रौद्योगिकी सहयोग को नई दिशा देगी। प्रधानमंत्री वहां के राजा विलेम अलेक्जेंडर, महारानी माक्सिमा और प्रधानमंत्री रोब येटन से मुलाकात करेंगे। दोनों देशों के बीच रक्षा, सुरक्षा, हरित हाइड्रोजन, जल प्रबंधन, सेमीकंडक्टर और नवाचार जैसे क्षेत्रों में तेजी से सहयोग बढ़ रहा है। नीदरलैंड यूरोप में भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है और भारत में बड़े निवेशकों में शामिल है। जल प्रबंधन और कृषि प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नीदरलैंड की विशेषज्ञता भारत के लिए अत्यंत उपयोगी मानी जाती है। दोनों देश मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के समर्थन में भी एक समान दृष्टिकोण रखते हैं।</div><div><br></div><div>मोदी की स्वीडन की यात्रा भारत और नॉर्डिक देशों के साथ बढ़ते सहयोग को और मजबूत बनाएगी। प्रधानमंत्री गोथेनबर्ग में स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन से वार्ता करेंगे। दोनों देशों के बीच व्यापार, हरित परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उभरती प्रौद्योगिकी, रक्षा, अंतरिक्ष और जलवायु कार्रवाई जैसे क्षेत्रों में व्यापक सहयोग की संभावनाएं हैं। हम आपको बता दें कि स्वीडन की अनेक प्रमुख कंपनियां भारत में सक्रिय हैं और दोनों देशों के बीच नवाचार आधारित साझेदारी तेजी से विकसित हो रही है। भारत और स्वीडन लोकतांत्रिक मूल्यों, सतत विकास और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में समान सोच रखते हैं। हरित औद्योगिक परिवर्तन और जलवायु संरक्षण के लिए दोनों देशों का सहयोग वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी इसके बाद नॉर्वे जाएंगे, जहां वह तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे। यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की नॉर्वे की पहली यात्रा होगी और पिछले तैंतालीस वर्षों में भारत से वहां होने वाली पहली प्रधानमंत्री स्तरीय यात्रा भी मानी जा रही है। नॉर्वे के प्रधानमंत्री योनास गार स्तोरे के साथ होने वाली वार्ता में व्यापार, निवेश, हरित प्रौद्योगिकी और समुद्री अर्थव्यवस्था पर विशेष जोर रहेगा। भारत और नार्वे के संबंध समुद्री सहयोग, हरित ऊर्जा और सतत विकास पर आधारित हैं। भारत-यूरोपीय मुक्त व्यापार समझौते के बाद दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई गति मिलने की संभावना है। नॉर्वे का विशाल पेंशन कोष भारतीय पूंजी बाजार में महत्वपूर्ण निवेश कर चुका है। आर्कटिक क्षेत्र, हरित जहाजरानी और समुद्री संसाधनों के प्रबंधन में दोनों देशों का सहयोग भविष्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन इस यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पक्ष होगा। इसमें नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, फिनलैंड और आइसलैंड के शीर्ष नेता शामिल होंगे। यह मंच भारत और नॉर्डिक देशों के बीच प्रौद्योगिकी, नवाचार, नवीकरणीय ऊर्जा, रक्षा, अंतरिक्ष, सतत विकास और समुद्री अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई रणनीतिक दिशा देगा। वैश्विक आपूर्ति शृंखला को मजबूत बनाने और हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में यह सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।</div><div><br></div><div>यात्रा के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री इटली जाएंगे। प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और राष्ट्रपति सर्जियो मातारेला के साथ उनकी बैठकें भारत-इटली रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करेंगी। दोनों देश 2025 से 2029 तक की संयुक्त रणनीतिक कार्ययोजना पर तेजी से काम कर रहे हैं। व्यापार, रक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और औद्योगिक सहयोग इसके प्रमुख क्षेत्र हैं। इटली ने चीन की बेल्ट एंड रोड पहल से अलग होकर भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे को समर्थन दिया है, जिससे दोनों देशों की सामरिक निकटता बढ़ी है। रक्षा क्षेत्र में सह-विकास और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर जोर दिया जा रहा है। इटली भारत के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के प्रयासों का भी समर्थन करता रहा है। वहां रह रहा भारतीय समुदाय दोनों देशों के संबंधों को सामाजिक और सांस्कृतिक मजबूती प्रदान करता है।</div><div><br></div><div>इस प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह विदेश यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती वैश्विक भूमिका का प्रतीक भी है। यह यात्रा भारत को ऊर्जा सुरक्षा, प्रौद्योगिकी सहयोग, हरित विकास, रक्षा साझेदारी और वैश्विक व्यापार के नए अवसर प्रदान करेगी। साथ ही यह संदेश भी देगी कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख और विश्वसनीय केंद्र बनकर उभर रहा है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 12 May 2026 13:00:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/visit-of-prime-minister-modi-to-uae-netherlands-sweden-norway-and-italy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[वैश्विक संकट के दौर में दूरगामी सोच का परिणाम है प्रधानमंत्री की अपील]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-prime-minister-appeal-is-the-result-of-farsighted-thinking-in-a-time-of-global-crisis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ऐसा नहीं है कि भारत विदेशी मुद्रा के मामलें में संकट में हो बल्कि वास्तविकता तो यह है कि 10 अप्रेल, 2026 के आंकड़ों की ही बात करें तो भारत का विदेशी मुद्रा भण्डार आज उच्चतम स्तर पर है। 700 बिलियन अमेरिकी डालर से अधिक का विदेशी मुद्रा भण्डार भारत के पास है। एक मोटे अनमुन के अनुसार आगामी 11 माह से अधिक समय तक आयात मांग की पूर्ति इस राशि से आसानी से हो सकती है। विदेशी मुद्रा भण्डार से एफसीए यानी कि विदेशी मुद्रा संपत्ति, स्वर्ण भण्डार और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में आरक्षित राशि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। पर इसके सबके बावजूद भविष्य के संभावित संकट के हालातों से निपटने की आवश्यक तैयारियां समय रहते पूरी की जाती है तो यही दूरदृष्टि कहलाती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भविष्य के वैश्विक हालात साफ दिखाई दे रहे हैं। हालातों में सुधार की संभावना निकट भविष्य में दिखाई भी नहीं दे रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केवल एक वर्ष के लिए अनावश्यक खर्चों में कटौती का आग्रह देशवासियों से किया है। इसमें ईंधन बचाना, सोना नहीं खरीदने, विदेशी यात्राओं व विदेशों में शादी नहीं करने, खाने के तेल के उपयोग में 10 प्रतिशत तक की कटौती व खेती में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 50 प्रतिशत तक की कटौती करने का सुझाव प्रमुख है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के देशवासियों से आग्रह को लेकर आलोचक भले ही मृद्दा बनाने का प्रयास करें पर वैश्विक हालात आज सबके सामने हैं। देशवासियों को मालूम है कि पेट्रोलियम उत्पादों इनमें कच्चे तेल से लेकर गैस आदि आदि शामिल है आदि के लिए आयात पर निर्भरता अधिक है। देश में 979 अरब अमेरिकी डॉलर का सालाना आयात होता है जिसमें से करीब 38 प्रतिशत आयात केवल और केवल पेट्रोलियम पदार्थों पर ही हो रहा है। सोना-चांदी और इलेक्ट्रोनिक्स के साथ ही फर्टिलाइजरों के मामलें में भी विदेशों पर निर्भरता अधिक है। करीब 10 प्रतिशत राशि सोने के आयात पर खर्च होती है। यदि समग्र रुप से देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तेलंगाना के सिकन्दराबाद से देशवासियों से जो आग्रह किया है वह ऐसा नहीं है जो किसी भी तरह से देशवासियों के लिए दुबिधाजनक हो।</div><div><br></div><div>वैश्विक संकट के चलते देश-दुनिया की इकोनोमी पर पड़ने वाले संभावित असर को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की देशवासियों से दूरदृष्टियुक्त अपील से कोरोना काल की याद ताजा हो रही है तो पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री की तत्कालीन अन्न संकट के दौरान सप्ताह में एक दिन के उपवास के आग्रह की और चला जाता है। अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध सीज़फायर के आसार अभी दिखाई नहीं दे रहे हैं तो दूसरी और दोनों ही देशों की हठधर्मिता के कारण हार्मुज जलडमरुमध्य से परिवहन बाधित होने का परिणाम दुनिया के देशों के सामने हैं। दुनिया के देशों को यह समझ लेना होगा कि अमेरिका-ईरान युद्ध केवल दो या तीन देशों के बीच युद्ध तक सीमित ना होकर इसके असर से आज कोई देश दूर दूर तक अछूता नहीं दिखाई दे रहा है। यह दो देशों की अहम् की लड़ाई ना होकर समूची मानवता को प्रभावित करने वाले हालात है। आज दुनिया के देशों की एक दूसरे पर निर्भरता बढ़ी है। बिना किसी अन्य देश के सहयोग के कोई भी देश अपने स्तर पर अपने देशवासियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की स्थिति में नहीं है। आर्थिक उदारीकरण के बाद से आज विश्व विश्व ग्राम में परिवर्तित हो गया है। एक बात यह भी साफ हो जानी चाहिए कि आज अमेरिका-इजरायल और ईरान संकट का हल निकल भी आता है तब भी वैश्विक हालात सामान्य होने में लंबा समय लग जाएगा। युद्धरत देश यह समझने की कोशिश नहीं कर रहे कि उनके अहम् के चलते दुनिया आज सालों पीछे जा रही है। विकास बाधित हो रहा है, आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो रही है और हालात दिन प्रतिदिन बिगड़ते ही जा रहे हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/political-economic-implications-of-pm-modi-call-to-save-foreign-exchange" target="_blank">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा “विदेशी मुद्रा बचाने” के आह्वान के राजनीतिक-आर्थिक निहितार्थ</a></h3><div>आज सबको मालूम है कि अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते रास्ता अवरुद्ध होने के कारण कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का आयात प्रभावित हो रहा है। हार्मुज का रास्ता अवरुद्ध है। हालात की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि ईरान को प्रतिदिन 2800 करोड़ रुपए के कच्चे तेल को समुद्र में बहाना पड़ रहा है। तेल उत्पादक अन्य देश भी संकट के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कमी लाने, सार्वजनिक परिवहन वाहनों के उपयोग और वाहन पूलिंग का एक साल का सुझाव या आग्रह दूरदृष्टिपूर्ण व देशहित में ही माना जाना चाहिए। इसके साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग का बढ़ावा देना भविष्य के पर्यावरण संकट से बचाव और हरित उर्जा को बढ़ावा देने में ही सहायक हो सकेगा। इसी तरह से हमारे देश मेंं सोने के खरीद के प्रति खास मोह रहता आया है पर हालातों को देखते हुए व्यापक राष्ट्रहित में एक साल के लिए सोना नहीं खरीदे तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। इसी तरह से केवल शानों शोकत के लिए विदेशी यात्राएं करने से बचने की सलाह और विदेशों में शादी करने के स्थान पर स्थानीय पर्यटन और देश में ही एक से एक बेहतरीन वेडिंग डेस्टिनेशंस पर शादी करने से जहां खर्च कम होगा, देश के डेस्टिनेशनों की वैश्विक पहचान के साथ ही विदेशी पूंजी भी बचेगी। इसी तरह से रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से खेती और खेतों की उर्वरा शक्ति प्रभावित होने से आज देश दो चार हो रहा है। जैविक खाद और जैविक खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को सीमित करने का आग्रह निश्चित रुप से सकारात्मक ही है। जहां तक मीटिंग्स का प्रश्न है कोविड़ के बाद से सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर अधिकांष मीटिंग्स अब हाईब्रीड मोड पर ही होने लगी है। वर्कफ्राम होम को अवश्य प्रोत्साहित किया जा सकता है।</div><div><br></div><div>लब्बो-लबाब यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो देशवासियों से आग्रह किया है उनमें से एक भी ऐसा आग्रह नहीं है जिससे हमारे दैनिक जीवन चर्या प्रभावित हो रही हो। एक भी ऐसा बिन्दु नहीं है जिससे आमजन प्रभावित हो रहा हो। सीधे सीधे एक साल के लिए अपनी आदत व आवश्यकताओं में जरुरी बदलाव के लिए कहा जा रहा है ताकि वैश्विक संकट का असर देश की अर्थव्यवस्था व देश के आमलोगों को प्रभावित ही ना कर सकें। एक साल सोना नहीं खरीदने या ईवी वाहन या सार्वजनिक वाहन का उपयोग या विदेशों में शादी आदि कार्यक्रम आयोजित ना करने या विदेश घूमने नहीं जाने से कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला हैं। इसलिए इन सबसे बचने से देश वैश्विक हालातों का अधिक कुशलता से मुकाबला कर सकेगा और सबसे बड़ी बात की स्वदेशी को बढ़ावा मिलेगा। इसलिए आलोचना प्रत्यालोचना से ऊपर उठना होगा। यह देश नेता की एक आवाज पर आगे आना वाला देश है कोविड का समय और स्व. लालबहादुर शास्त्री के एक दिन के उपवास का आग्रह इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है।</div><div>&nbsp;</div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 12 May 2026 12:35:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-prime-minister-appeal-is-the-result-of-farsighted-thinking-in-a-time-of-global-crisis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[राजनीतिक विमर्श का जरिया बनी झालमुढ़ी वालों के फिरेंगे दिन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/fortunes-of-jhalmuri-vendor-who-have-become-medium-for-political-discourse-are-set-to-turn-around]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजे आ चुके हैं। शुभेंदु अधिकारी की अगुआई में राज्य में नई सरकार बन चुकी है। ममता बनर्जी की सरकार इतिहास के पन्नों में सिमट गई है। यूं तो हर चुनाव अभियान के साथ तमाम घटनाएं इतिहास में समाती रहती हैं। उनमें से कुछ का प्रभाव बरसों तक रहता है। पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव अभियान में एक घटना ऐसी घटी, जिसने ना सिर्फ पश्चिम बंगाल के वोटरों पर अमिट छाप छोड़ी, बल्कि बांग्ला खान-पान और संस्कृति से उन लोगों को भी परिचित करा दिया, जो उससे अब तक सर्वथा अपरिचित थे।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>पश्चिम बंगाल ही नहीं, पूर्वी उत्तर प्रदेश, समूचे बिहार, झारखंड और उड़ीसा में झालमुढ़ी खानपान का अभिन्न अंग है। झालमुढ़ी में दो शब्द हैं। पहला शब्द है झाल, जिसका मतलब होता है तीखा..ऐसा तीखापन, जिसका असर सिर्फ जुबान पर ही नहीं महसूस हो, बल्कि जुबान की सिसियाहट के साथ नाक के रास्ते भी हल्की झलन का अहसास है। इस शब्द के मूल में है मुढ़ी, जिसे कहीं मुड़ी तो कहीं मुरमुरा तो कहीं मुर्ही कहा जाता है। इसमें प्याज, टमाटर, नमकीन, हरी मिर्च, सरसों तेल, नमक और भुना जीरा आदि डालकर जो मिश्रण तैयार किया जाता है, उसे झालमुढ़ी या झालमुड़ी कहा जाता है। इसी झालमुढ़ी को झारखंड से सटे पश्चिम बंगाल के झारग्राम जिले में 19 अप्रैल के दिन चुनाव प्रचार के बीच सड़क पर उतर कर मात्र दस रूपए में खरीदकर जब प्रधानमंत्री ने वहां मौजूद महिलाओं-बच्चों के साथ मिलकर खाया था। इसके साथ ही झालमुढ़ी इंटरनेट सर्च की दुनिया में पहले नंबर पर पहुंच गई।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/is-the-india-alliance-adrift-in-the-mirage-of-secularism-gasping-for-political-breath" target="_blank">धर्मनिरपेक्षता की मृगतृष्णा में भटक रहा 'इंडिया गठबंधन' तोड़ रहा है सियासी दम? जानिए कैसे</a></h3><div>झालमुढ़ी में कई बार भुने हुए चने भी मिलाए जाते हैं तो कई बार भीगे हुए कच्चे चने तो कई बार उस चने से बनी घुघनी। जिन्हें घुघुनी के बारे में पता नहीं है, उनकी जानकारी के लिए बता दें कि भीगे हुए चने को जीरा, हरी मिर्च के सरसों तेल में छौंक लगाने के बाद सूखा और कई बार प्याज-टमाटर आदि मिलाकर मसालों को साथ भी पकाया जाता है। पश्चिम बंगाल ही क्यों, पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में मुढ़ी को विशेषकर शाम की चाय के वक्त खाया जाता है। इन इलाकों के स्कूलों, कॉलेजों के बाहर, कचहरियों में स्टेशन के सामने झालमुढ़ी के ठेले और खोमचे खूब दिख जाएंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>विशेषकर बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में मुढ़ी या मुड़ी तैयार की जाती है। इसके लिए पहले धान को उबाला जाता है, फिर उसे सुखाकर जो चावल निकाला जाता है, उसे भूनने के बाद मुढ़ी या मुड़ी का रूप मिलता है। इस तरह से कह सकते हैं कि मुढ़ी या मुड़ी सेला चावल का भुना हुआ रूप है। पश्चिम बंगाल और मिथिलांचल में तो मुढ़ी को पकौड़े के साथ भी खाया जाता है। पश्चिम बंगाल में तो इसे आलूचप के साथ विशेष रूप में पसंद किया जाता है। अब सवाल उठ सकता है कि आलूचप क्या होता है। दरअसल उबले आलू को मसलकर उसमें नमक, मसाले आदि मिलाकर उसकी टिक्की को बनाया जाता है। फिर उसे बेसन में डुबोकर छाना जाता है। इसे ही आलूचप कहा जाता है। वैसे आलूचप पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उड़ीसा में खूब प्रचलित है। विशेषकर शाम की चाय के वक्त।&nbsp;</div><div><br></div><div>झालमुढ़ी का पश्चिम बंगाल की राजनीति से खास रिश्ता है। राजनीतिक, चुनावी आदि चर्चाओं में चाय के साथ सहज उपलब्ध झालमुढ़ी ही होती है। कई बार सिर्फ मुढ़ी भी खाया जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में शादी-विवाह मुंडन-जनेऊ के हल्दी और मंडप बनाने के दिन विशेषरूप से लोगों को सिर्फ मुढ़ी मिठाई या गुड़ के साथ नाश्ते में दी जाती है। बहुत कम लोग जानते हैं कि पश्चिम बंगाल के पिछले विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद कोलकाता के एक मैदान पर ममता बनर्जी ने बाबुल सुप्रियो के संग झालमुढ़ी खाया था। इसके जरिए उन्होंने अपनी विजय, भाजपा से बेफिक्री और अपने लोगों को संदेश दिया था। उन्नीस अप्रैल को झारग्राम में झालमुढ़ी खरीदते वक्त पता नहीं प्रधानमंत्री मोदी को यह पता था कि नहीं, लेकिन उन्होंने इसके जरिए इतिहास रच दिया।&nbsp;</div><div><br></div><div>गांधी जी के बारे में कहा जाता है कि वे बड़े संचारक यानी कम्युनिकेटर थे। प्रधानमंत्री मोदी भी बड़े संचारक यानी कम्युनिकेटर हैं। मात्र दस रूपए की झालमुढ़ी के जरिए उन्होंने पश्चिम बंगाल के आम लोगों के दिलों तक जगह बना ली। उन्होंने अपनी पार्टी का संदेश सीधे हर घर तक पहुंचा दिया। जिन इलाकों में झालमुढ़ी खाई जाती है, उन इलाकों में देखेंगे तो हर राजनीतिक सम्मेलन, रैली आदि के दौरान बाहर इसके ठेले और खोमचे लगे होते हैं। कई बार नेताओं के इंतजार में वक्त काटने तो कई बार तात्कालिक भूख मिटाने का जरिया यह झालमुढ़ी ही होती है। स्कूलों, कॉलेजों और कचहरियों के आसपास झालमुढ़ी और चने-चबेने के खोमचे और ठेले आपको पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बहुतायत से मिल जाएंगे। हाट-बाजार में भी शाम की चाय के वक्त का इन इलाकों का सबसे आसानी से सस्ते में उपलब्ध और पसंदीदा स्नैक यह झालमुढ़ी ही है। झालमुढ़ी आम लोगों और आम दुकानदारों से जुड़ने का भी सबसे बड़ा जरिया है। शायद यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने झारग्राम में सड़क किनारे की झालमुढ़ी की दुकान को चुना और महज दस रूपए की झालमुढ़ी के ठोंगे यानी लिफाफे के जरिए पश्चिम बंगाल के करोड़ों दिलों तक जगह बना ली। प्रधानमंत्री मोदी ने आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल का नारा दिया है। झालमुढ़ी उनके इन दोनों नारों का भी प्रतिनिधित्व करता है। झालमुढ़ी और उसमें शामिल किए जाने तत्वों को स्थानीय स्तर पर ही तैयार किया जाता है, स्थानीय लोगों में यह सर्वाधिक लोकप्रिय है और इसके जरिए स्थानीय स्तर पर एक पूरी शृंखला की रोजी-रोटी चलती है। इसलिए यह आत्मनिर्भर भारत का भी प्रतीक है। चूंकि इसे खरीदने और खाने से स्थानीय रोजगार और पैदावार को सहयोग मिलता है, इसलिए यह वोकल फॉर लोकल के भी नजदीक है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल में अब सरकार बन चुकी है। सरकार बनने और जीत हासिल करने के बाद बीजेपी और उसके नेताओं ने झालमुढ़ी की पार्टियां की हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की सरकार राजनीतिक विमर्श का जरिया बनी झालमुढ़ी और उस पर निर्भर लोगों की भलाई की दिशा में जरूर कदम उठाएगी।</div><div><br></div><div>-उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 11 May 2026 13:32:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/fortunes-of-jhalmuri-vendor-who-have-become-medium-for-political-discourse-are-set-to-turn-around</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भारत और मोदी के बारे में Washington Post की धारणा बदली, PM को मानव इतिहास में सबसे अधिक जनसमर्थन वाला नेता बताया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-washington-post-perception-of-india-and-modi-changed]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका का प्रमुख समाचार-पत्र वाशिंगटन पोस्ट वैसे तो अक्सर भारत विरोधी लेख ही प्रकाशित करता है लेकिन अब उसने एक दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भारत के बारे में सकारात्मक लेख प्रकाशित किया है। इस महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण ने भारत की राजनीति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की लगातार बढ़ती ताकत को लेकर दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा है। लंबे समय से पश्चिमी उदारवादी विचारधारा से जुड़े विश्लेषकों और भारत के विपक्षी दलों का मानना रहा कि भारत जैसी अत्यंत विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी मजबूत नेतृत्व वाली राजनीति की सीमाएं होंगी और अंततः ऐसी राजनीति का प्रभाव कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों ने इस धारणा को गहरी चुनौती दी है।</div><div><br></div><div>विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सफलता को इस विश्लेषण में ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा गया है। पश्चिम बंगाल लंबे समय से क्षेत्रीय पहचान, सांस्कृतिक विशिष्टता और मजबूत स्थानीय राजनीतिक परंपराओं वाला राज्य माना जाता रहा है। यहां की राजनीति पर लंबे समय तक क्षेत्रीय दलों का प्रभाव रहा और माना जाता था कि उत्तर भारत केंद्रित तथा हिंदी भाषी छवि वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए यहां गहरी पैठ बनाना आसान नहीं होगा। लेकिन हालिया चुनावी परिणामों ने इस सोच को बदल दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bjp-government-in-west-bengal-pm-modi-said-happy-coincidence-on-gurudev-tagores-birth-anniversary" target="_blank">West Bengal में BJP सरकार, PM Modi बोले- गुरुदेव टैगोर जयंती पर यह 'सुखद संयोग'</a></h3><div>विश्लेषण में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल की नेता ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को लंबे समय तक भारतीय जनता पार्टी के विस्तार के सामने मजबूत दीवार माना जाता था। यह धारणा भी मजबूत थी कि भारत की भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता किसी एक राजनीतिक दल को राष्ट्रीय स्तर पर सर्वस्वीकार्य बनने से रोकेगी। किंतु पश्चिम बंगाल में मिली सफलता ने यह संकेत दिया कि भारतीय जनता पार्टी अब उन क्षेत्रीय और सांस्कृतिक बाधाओं को भी पार कर रही है जिन्हें कभी उसके विस्तार की सीमा माना जाता था।</div><div><br></div><div>लेख में भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक विस्तार को भी असाधारण बताया गया है। पार्टी की सदस्य संख्या को दुनिया में किसी भी राजनीतिक दल से अधिक बताया गया है। विश्लेषण के अनुसार पार्टी के लगभग चौदह करोड़ सदस्य हैं, जो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से भी अधिक हैं। इसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मानव इतिहास में सबसे अधिक जनसमर्थन पाने वाले नेताओं में गिना गया है। विभिन्न वैश्विक सर्वेक्षणों में भी उनकी लोकप्रियता लंबे समय से शीर्ष पर बनी हुई है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहचान अब केवल भारत के लोकप्रिय नेता तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह वैश्विक राजनीति में भी एक प्रभावशाली और निर्णायक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरे हैं। दुनिया के अनेक देशों में भारत की बढ़ती साख के पीछे मोदी की सक्रिय कूटनीति, मजबूत निर्णय क्षमता और वैश्विक मंचों पर भारत की स्पष्ट उपस्थिति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खास बात यह है कि ऐसे समय में जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश माने जाने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत कई बड़े वैश्विक नेताओं की लोकप्रियता में गिरावट दर्ज की जा रही है, वहीं प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता लगातार मजबूत होती दिखाई दे रही है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों और जनमत अध्ययनों में मोदी लंबे समय से दुनिया के सबसे लोकप्रिय लोकतांत्रिक नेताओं में शीर्ष स्थान पर बने हुए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत का नेतृत्व अब केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन और अंतरराष्ट्रीय विमर्श में भी उसकी निर्णायक भूमिका लगातार मजबूत हो रही है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित लेख में आलोचनाओं का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है। इसके बावजूद विश्लेषण का निष्कर्ष यह है कि केवल चुनावी प्रबंधन या संस्थागत प्रभाव के आधार पर भारतीय जनता पार्टी की सफलता को नहीं समझा जा सकता। पार्टी ने कुछ दशकों के भीतर सीमित प्रभाव वाले संगठन से देश के 21 राज्यों में सत्ता तक का सफर तय किया है। इसके विपरीत स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस पार्टी अब कुछ गिने चुने राज्यों तक सीमित होती दिखाई दे रही है।</div><div><br></div><div>लेख में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच संगठनात्मक अंतर को भी प्रमुखता से रेखांकित किया गया है। कांग्रेस को जहां स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और अभिजात वर्ग का समर्थन मिला, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने जमीनी स्तर पर लंबे संगठनात्मक संघर्ष के माध्यम से अपनी स्थिति मजबूत की। पार्टी ने जाति, भाषा, क्षेत्र और धार्मिक परंपराओं से परे व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार किया।</div><div><br></div><div>इस पूरे विस्तार के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। सौ वर्ष पुराने इस संगठन ने लाखों कार्यकर्ताओं और अनेक सामाजिक संगठनों के माध्यम से व्यापक वैचारिक ढांचा तैयार किया। विश्लेषण में कहा गया है कि श्रमिक संगठन, निजी विद्यालय नेटवर्क, छात्र संगठन और धार्मिक नेतृत्व से जुड़े अनेक मंचों के जरिये यह विचारधारा समाज के विभिन्न हिस्सों तक पहुंची। इसी मजबूत सामाजिक नेटवर्क, रणनीतिक गठबंधनों और संगठनात्मक अनुशासन ने भारतीय जनता पार्टी के उभार की मजबूत नींव तैयार की।</div><div><br></div><div>अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी भारत की बढ़ती शक्ति को इस राजनीतिक विस्तार से जोड़ा गया है। लेख में भारत को दुनिया की सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति और तेजी से उभरती आर्थिक ताकत बताया गया है। साथ ही यह भी कहा गया कि एशिया में चीन के प्रभाव का संतुलन बनाने की क्षमता यदि किसी देश में है तो वह भारत है। ऐसे समय में भारतीय जनता पार्टी का लगातार विस्तार यह संकेत देता है कि आने वाले दशकों में भारत की दिशा और एशिया की शक्ति संरचना पर इस राजनीतिक विचारधारा का गहरा प्रभाव रह सकता है।</div><div><br></div><div>विश्लेषण का अंतिम निष्कर्ष यही है कि भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आलोचक जिस राजनीतिक गिरावट की लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे हैं, वह फिलहाल दिखाई नहीं देती। इसके उलट वर्तमान राजनीतिक संकेत यह बताते हैं कि आने वाले वर्षों में भारत की राजनीति, उसकी वैश्विक भूमिका और एशिया का सामरिक संतुलन काफी हद तक इसी नेतृत्व और इसी राजनीतिक धारा के प्रभाव में आकार ले सकता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

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      <pubDate>Sat, 09 May 2026 15:34:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-washington-post-perception-of-india-and-modi-changed</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[भाजपा को परखने के औजार बदलने होंगे]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-tools-used-to-evaluate-the-bjp-will-have-to-change]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय जनता पार्टी की बंगाल जीत ने केवल राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषकों का भी ध्यान आकर्षित किया है। सभी अपने-अपने मापदण्डों पर इस चुनाव परिणाम को परख रहे हैं परन्तु पुराने ढर्रों पर चलते हुए फिर से गलती पर गलती दोहराते लगते हैं। यहां के विपक्ष की मानें तो यह एसआईआर के प्रयोग से निकला विजयमार्ग है तो विदेशी विश्लेषक फिर से जिंगल बैल जिंदल बैल की तरज पर साम्प्रदायिकता का गीत गाने लगे हैं। इन पांच राज्यों के चुनाव परिणाम बताते हैं कि भाजपा ने कहीं पहली बार पांव जमाए हैं, कहीं वह फिर से सत्ता में आई है तो कहीं उसने अपना जनाधार बढ़ाया है। अगर केरल जैसे राज्य में वामपंथी दलों को भाजपा के प्रभाव के डर से अयप्पा के दर्शन करने पड़ें, भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से बंजर कहे जाने वाले बंगाल में कमल की फसल लहलाने लगे, द्रविड़ राजनीति के केंद्र तमिलनाडू में उसकी आहट सुनने लगे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि विरोधी इस दल को गलत औजारों से परख रहे हैं। विरोधी भूलते हैं कि देश का मतदाता मदिहीन नहीं है, वह सुशासन व विकास को अपनी पसंद बनाता जा रहा है। अगर कोई दल संविधान के अनुरूप काम करते हुए जनता की पसंद बन रहा है तो विरोधियों को भी अपनी सोच बदलनी होगी।</div><div><br></div><div>भाजपा केंद्र और बहुत से राज्यों में वर्षों से शासन में है। अंधविरोध के चरम पर जा कर भी शासन व संवैधानिक व्यवस्था के किसी मान्य मापदण्ड पर विपक्ष अभी तक ऐसा कोई मुद्दा तराश नहीं पाया है जो जनता को भी मान्य हो। यहां तक कि प्रधानमंत्री कई बार चुटकी ले चुके हंै कि सार्वजनिक जीवन में विपक्ष उनकी कोई तथ्यात्मक आलोचना करने में असफल रहा है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में भाजपा के सत्ता तक पहुंचते ही वैश्विक वैचारिक गलियारों में भी बेचैनी पैदा हो गई है। विदेशी मीडिया के बड़े हिस्से ने भारत में लोकतंत्र, अल्पसंख्यक अधिकार और चुनावी निष्पक्षता पर अचानक सवाल उठाने शुरू कर दिए। बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स, द गार्जियन और अल जजीरा जैसे मंचों पर फिर से यह विमर्श तेजी से गढ़ा जाने लगा कि भारत हिन्दू राष्ट्रवाद की ऐसी दिशा में बढ़ रहा है, जहां लोकतंत्र व बहुलता खतरे में है। विदेशी मीडिया में ज्यादा चर्चा बंगाल की है। सवाल यही है कि क्या चिंता वास्तव में लोकतंत्र की है या उस सियासी बदलाव की, जिसने दशकों पुराने वामपंथ और छद्मधर्मनिरपेक्षता के वैचारिक गढ़ को ध्वस्त कर दिया? जब भाजपा हारती है, तो विदेशी मीडिया भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता की तारीफ करता है, पर जैसे ही वह निर्णायक जनादेश लेकर आती है, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया संदेह और संस्थागत संकट की भाषा में बदल जाती है। श्रेष्ठभावना से ग्रसित पश्चिमी जगत कहीं यह तो नहीं मानता कि भारतीय मतदाताओं में राजनीतिक समझ का अभाव है ?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/sridevi-and-hema-malinidesigner-only-woman-minister-in-bengal-cabinet-know-who-is-agnimitra-paul" target="_blank">Sridevi और Hema malini की Designer, Bengal Cabinet की अकेली महिला मंत्री, जानें कौन हैं Agnimitra Paul?</a></h3><div>राष्ट्रवाद को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर अनेक विचारक स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत का राष्ट्रवाद संकीर्ण पश्चिमी राष्ट्रवाद से सर्वदा विपरीत है। पश्चिमी मीडिया भारत को अक्सर यूरोपीय राजनीतिक अनुभवों के चश्मे से देखने की कोशिश करता है। वहां राष्ट्रवाद का अर्थ सत्ता विस्तार व नस्लीय वर्चस्व रहा है। जबकि भारत में राष्ट्रवाद सांस्कृतिक, सभ्यतागत पहचान और ऐतिहासिक आत्मबोध से जुड़ा है। इसे विदेशी मीडिया समझ नहीं पाता। इसीलिए वो हमारे सांस्कृतिक पुनर्जागरण को सीधे अल्पसंख्यक-बहुसंख्यकवाद से जोड़ देता है। यही कारण है कि बंगाल में भाजपा की जीत को पश्चिम के विश्लेषकों ने लोकतांत्रिक परिवर्तन के बजाय हिंदू राष्ट्रवादी कब्जे की तरह प्रस्तुत किया गया। एसआईआर पर अर्धसत्य दिखाते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने परिणामों के बाद वोट चोरी का आरोप लगाया। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को भाजपा का आयोग बताया। विदेशी मीडिया ने इन आरोपों को लगभग बिना तथ्य जांचे ही अपने विमर्श का आधार बना लिया। विशेष रूप से एसआईआर को मुस्लिम मतदाताओं को हटाने की साजिश के रूप में पेश किया गया, जबकि हटाए गए 91 लाख नामों में 63 प्रतिशत हिंदू मतदाता थे। बड़ी संख्या में नाम मृत, डुप्लिकेट, स्थायी रूप से स्थानांतरित या फर्जी पाए गए थे। इसके बावजूद विदेशी मीडिया के बड़े हिस्से ने केवल मुस्लिम वोट हटाए गए वाली जिद को प्रमुखता दी। देसी-विदेशी विश्लेषक यह भूल गए कि जिन 20 सीटों पर जाँच के बाद सबसे ज्यादा वोट काटे गए थे, उनमें से ज्यादातर पर टीएमसी ने ही कब्जा जमाया है। इन सीटों में समशेरगंज, लालगोला, भगवानगोला, रघुनाथगंज, मटियाबुर्ज, सूती, मोथाबाड़ी, गोलपोखर, मालतीपुर, चोपड़ा, सुजापुर, राजारहाट न्यू टाउन और बशीरहाट उत्तर शामिल हैं। इन सभी 13 सीटों पर ममता बनर्जी की पार्टी को जीत मिली है। अन्य सीटों की बात करें तो फरक्का सीट पर सबसे ज्यादा 38,222 वोट काटे गए थे, लेकिन वहाँ से कॉन्ग्रेस ने जीत दर्ज की। वहीं भाजपा को जंगीपुर, रतुआ, करनदिघी, केतुग्राम, मानिकचक और मोंतेश्वर जैसी 6 सीटों पर जीत मिली। यह अकेला आँकड़ा ही उस प्रोपेगेंडा की हवा निकाल देता है जिसमें यह दावा किया जा रहा था कि वोटर लिस्ट में सुधार से सिर्फ टीएमसी को नुकसान हुआ और भाजपा को फायदा पहुँचा।</div><div><br></div><div>अगर बड़े पैमाने पर देखें, तो जिन 187 सीटों पर 5,000 से ज्यादा वोटर्स के नाम काटे गए थे, वहां भाजपा ने 119 और टीएमसी ने 65 सीटों पर जीत दर्ज की। इन 187 सीटों में से 47 सीटें ऐसी थीं, जहाँ कटे हुए वोटों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी। भाजपा ने जो 119 सीटें जीतीं, उनमें से 28 सीटों पर जीत का अंतर कटे हुए वोटों से कम था। इन आँकड़ों से साफ है कि कई सीटों पर कांटे की टक्कर थी और वहाँ कटे हुए वोटों की संख्या जीत के मार्जिन से ज्यादा रही। लेकिन हार का पूरा ठीकरा सिर्फ वोटर लिस्ट सुधार की प्रक्रिया पर फोड़ देना और इसे ही हार की एकमात्र वजह बताना पूरी तरह से भ्रामक और गलत है।</div><div><br></div><div>सच्चाई यह है कि देसी-विदेशी विश्लेषकों को नरेंद्र मोदी और भाजपा का बढ़ता राजनीतिक विस्तार विदेशी वैचारिक प्रतिष्ठानों की सबसे बड़ी बेचैनी बन चुका है। खास कर उन क्षेत्रों में यह जलन ज्यादा है जो 2024 के आम चुनावों में कांग्रेस को मिली थोड़ी राजनीतिक राहत को लेकर उत्साहित चला आरहा था। आज भाजपा अधिकांश राज्यों में प्रत्यक्ष या गठबंधन के जरिए सत्ता में है। ऐसे में भारत को हिन्दू राष्ट्रवादी&nbsp; लोकतंत्र और एकदलीय प्रभुत्व के खांचे में फिट करने की कोशिशें और तेज होती दिख रही हैं। परंतु बंगाल का फैसला यह भी साबित करता है कि भारत का मतदाता अपनी प्राथमिकताएं जमीन, अनुभव और आकांक्षाओं के आधार पर तय कर रहा है, न कि न्यूयॉर्क, लंदन या दोहा में बैठे नैरेटिव निर्माताओं की वैचारिक दृष्टि के अनुसार।</div><div><br></div><div>विदेशी विश्लेषणों में बंगाल के चुनावी परिणाम को हिन्दुत्व के उभार के रंग में रंग दिया। लेकिन वहां की जनता की नाराजगी, आर्थिक बदहाली, भ्रष्टाचार, महिला उत्पीडऩ, सत्ताधारियों की हिंसा, उद्योगों का पलायन जैसे कारणों की अनदेखी कर गया। आज बंगाल पर कर्ज 7.7 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका है। हजारों कंपनियां राज्य छोड़ चुकी हैं। युवाओं का बड़ा वर्ग रोजगार के लिए पलायन कर रहा है। महानगरों में घरों में काम करने वाली अधिकतर महिलाएं बंगाली ही निकलती हैं। कट मनी, भर्ती घोटाले और सिंडिकेट संस्कृति जैसे मुद्दे वर्षों से जनता में असंतोष पैदा कर रहे थे। लेकिन देसी-विदेशी विश्लेषक उलझे हैं एसआईआर और&nbsp; बहुसंख्यकवाद के उभार में। इसी दकियानूसी सोच के आधार पर यह तत्व जनता में अप्रासंगिक हो रहे हंै और भाजपा का ग्राफ निरंतर बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>- राकेश सैन</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 09 May 2026 12:51:44 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-tools-used-to-evaluate-the-bjp-will-have-to-change</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन है वैचारिक बदलाव का संकेत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-change-of-power-in-west-bengal-signals-an-ideological-shift]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों को केवल एक राजनीतिक दल की जीत या हार के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह परिणाम उस वैचारिक संघर्ष का प्रतीक बनकर उभरे हैं, जो लंबे समय से बंगाल की राजनीति के भीतर सुलग रहा था। वर्षों तक बंगाल को एक ऐसे राज्य के रूप में प्रस्तुत किया गया, जहां कथित रूप से जाति, धर्म और पहचान की राजनीति नहीं चलती, बल्कि विचारधारा, वर्ग-संघर्ष और बंगालियत की राजनीति प्रभावी रहती है। किंतु 2026 के चुनाव परिणामों ने इस स्थापित धारणा को गहराई से चुनौती दी है। यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान में आए परिवर्तन का भी संकेत है। मतदाता अब केवल भावनात्मक नारों या वैचारिक रोमांटिसिज्म के आधार पर मतदान नहीं कर रहा, बल्कि वह अपनी सांस्कृतिक पहचान, सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और भविष्य को भी ध्यान में रख रहा है। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व सफलता को अनेक विश्लेषक एक प्रकार के “सांस्कृतिक पुनर्जागरण” के रूप में देख रहे हैं।</div><div><br></div><div>पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल की राजनीति में “बंगाली अस्मिता” और “हिंदू पहचान” के बीच एक वैचारिक द्वंद्व स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा था। तृणमूल कांग्रेस ने स्वयं को बंगाल की संस्कृति और क्षेत्रीय गौरव का संरक्षक बताया, जबकि भाजपा ने राष्ट्रीयता, हिंदुत्व और सांस्कृतिक चेतना को अपने राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनाया। वास्तव में बंगाल की ऐतिहासिक चेतना कभी संकुचित नहीं रही। यह वही भूमि है जहाँ से स्वामी विवेकानंद, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, रवींद्रनाथ ठाकुर और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे महापुरुषों ने भारतीय राष्ट्रवाद को नई दिशा दी। “वंदे मातरम्” का उद्घोष भी इसी भूमि से निकला। इसलिए जब बंगाल में राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक अस्मिता की चर्चा होती है, तो वह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि भावनात्मक और ऐतिहासिक संदर्भ भी ग्रहण कर लेता है। भाजपा ने इसी ऐतिहासिक चेतना को पुनः जागृत करने का प्रयास किया। दुर्गापूजा, रामनवमी, हनुमान जयंती और हिंदू धार्मिक प्रतीकों को लेकर जिस प्रकार की राजनीतिक बहसें पिछले वर्षों में सामने आईं, उन्होंने हिंदू समाज के एक बड़े वर्ग को यह महसूस कराया कि उसकी सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां राजनीतिक विवाद का विषय बन रही हैं। परिणामस्वरूप एक बड़ा वर्ग अपनी पहचान के प्रश्न पर अधिक मुखर हुआ।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/as-long-as-i-am-alive-bengal-need-not-fear-suvendu-adhikaris-big-statement-before-becoming-cm" target="_blank">जब तक मैं जीवित हूं, बंगाल को डरने की जरूरत नहीं..., CM बनने से पहले Suvendu Adhikari का बड़ा बयान</a></h3><div>पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से अल्पसंख्यक वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमती रही है। विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा कि ममता बनर्जी सरकार ने संतुलित शासन के बजाय तुष्टिकरण की राजनीति को बढ़ावा दिया। चाहे इमाम भत्ता का मुद्दा हो, धार्मिक आयोजनों को लेकर प्रशासनिक निर्णय हों या सीमावर्ती जिलों में बदलता जनसांख्यिकीय संतुलन-इन सभी विषयों ने धीरे-धीरे हिंदू समाज के भीतर असंतोष को जन्म दिया। यह असंतोष केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भी था। अनेक लोगों को यह लगने लगा कि राज्य में कानून व्यवस्था और प्रशासनिक निर्णयों में निष्पक्षता का अभाव है। भाजपा ने इसी भावना को राजनीतिक रूप दिया। उसने यह संदेश देने का प्रयास किया कि उसकी राजनीति केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि “सांस्कृतिक सुरक्षा” स्थापित करने की राजनीति है। यही कारण है कि चुनाव प्रचार के दौरान “जय श्रीराम” जैसे नारे केवल धार्मिक उद्घोष नहीं रहे, बल्कि वे एक प्रकार के राजनीतिक प्रतिरोध और सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक बन गए।</div><div><br></div><div>इस चुनाव में हिंदी भाषी मतदाताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। पिछले कुछ वर्षों में बंगाल के औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों में हिंदी भाषी समाज का प्रभाव बढ़ा है। यह वर्ग लंबे समय से स्वयं को राजनीतिक रूप से उपेक्षित महसूस करता रहा था। भाजपा ने इस वर्ग को संगठित करने में सफलता प्राप्त की। हालांकि इस चुनाव को केवल “हिंदी बनाम बंगाली” के दृष्टिकोण से देखना भी उचित नहीं होगा। वस्तुतः भाजपा ने हिंदी भाषी और स्थानीय हिंदू समाज के बीच एक वैचारिक सेतु बनाने का प्रयास किया। उसने यह संदेश दिया कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर है। यही कारण है कि बंगाल के अनेक क्षेत्रों में भाजपा को व्यापक समर्थन मिला। पश्चिम बंगाल कभी वामपंथ का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था। वर्ग-संघर्ष, श्रमिक राजनीति और धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा यहाँ की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा रही। लेकिन समय के साथ यह विचारधारा जमीन से कटती चली गई। वामपंथी दल जनता की नई आकांक्षाओं, युवाओं की उम्मीदों और बदलते सामाजिक यथार्थ को समझने में असफल रहे। आज का युवा केवल वैचारिक भाषण नहीं चाहता- वह रोजगार, सुरक्षा, सांस्कृतिक सम्मान और विकास चाहता है। यही कारण है कि वामपंथ धीरे-धीरे राजनीतिक हाशिये पर पहुँच गया। भाजपा ने इस खाली स्थान को भरते हुए स्वयं को एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल में भाजपा की सफलता को अनेक लोग डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों से भी जोड़कर देख रहे हैं। डॉ. मुखर्जी केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि भारतीय एकता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने विभाजनकारी राजनीति का विरोध किया और राष्ट्रीय एकात्मता को सर्वोपरि माना। बंगाल की राजनीति में भाजपा का उभार कहीं न कहीं उसी विचारधारा की पुनस्र्थापना के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है कि बंगाल अब केवल क्षेत्रीय राजनीति का केंद्र नहीं रहेगा, बल्कि वह पुनः राष्ट्रीय चेतना का नेतृत्व करेगा। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या इन चुनाव परिणामों को “हिंदू पुनर्जागरण” कहा जा सकता है? इसका उत्तर पूरी तरह सरल नहीं है, किंतु इतना स्पष्ट है कि हिंदू समाज के भीतर अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर एक नई जागरूकता अवश्य उत्पन्न हुई है। यह जागरूकता केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि राजनीतिक अभिव्यक्ति का भी रूप ले रही है। हालांकि किसी भी लोकतंत्र में यह आवश्यक है कि सांस्कृतिक चेतना सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों के साथ संतुलित रहे। यदि पहचान की राजनीति संवाद और समावेशिता के बजाय टकराव का रूप लेती है, तो वह लोकतंत्र के लिए चुनौती बन सकती है। इसलिए बंगाल के इस परिवर्तन को केवल विजय उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक चेतावनी और आत्ममंथन के अवसर के रूप में भी देखा जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल की राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी है। भाजपा की जीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल अब राजनीतिक रूप से “अपवाद” नहीं रहा। यहाँ भी वही प्रश्न महत्वपूर्ण हो गए हैं जो देश के अन्य हिस्सों में प्रभावी हैं-सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रवाद, सुरक्षा, विकास और सामाजिक संतुलन। लेकिन सत्ता परिवर्तन के साथ जिम्मेदारियाँ भी आती हैं। यदि भाजपा वास्तव में बंगाल में एक नए युग की शुरुआत करना चाहती है, तो उसे केवल वैचारिक नारों तक सीमित नहीं रहना होगा। उसे रोजगार, उद्योग, शिक्षा, कानून व्यवस्था और सामाजिक समरसता जैसे मुद्दों पर ठोस कार्य करना होगा। बंगाल की धरती ने हमेशा भारत को विचार, साहित्य, संस्कृति और राष्ट्रवाद की नई दिशा दी है। आज फिर इतिहास एक नए मोड़ पर खड़ा है। आने वाला समय तय करेगा कि यह परिवर्तन केवल राजनीतिक लहर साबित होगा या वास्तव में बंगाल के सांस्कृतिक और वैचारिक पुनर्जागरण का आधार बनेगा।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 08 May 2026 19:13:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-change-of-power-in-west-bengal-signals-an-ideological-shift</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[संजय राउत ने डोनाल्ड ट्रंप को पत्र में जो कुछ लिखा है उससे विपक्षी नेताओं की देशभक्ति पर सवाल उठ गया है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/sanjay-raut-letter-to-donald-trump-raises-questions-about-the-patriotism-of-opposition-leaders]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद विपक्षी गठबंधन के कई नेताओं की प्रतिक्रियाएं अब केवल राजनीतिक असहमति तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि वह भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्था पर सीधे सवाल खड़े करती दिखाई दे रही हैं। शिवसेना यूबीटी के नेता संजय राउत द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पत्र लिखना और ममता बनर्जी द्वारा अंतरराष्ट्रीय अदालत जाने की चेतावनी देना इसी प्रवृत्ति का ताजा उदाहरण है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या देश के आंतरिक मामलों को विदेशी शक्तियों और वैश्विक मंचों तक ले जाना लोकतंत्र की रक्षा है या फिर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास?</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि शिवसेना यूबीटी सांसद संजय राउत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लिखे अपने पत्र में पश्चिम बंगाल चुनावों को भय, दबाव और कथित धांधली से प्रभावित बताया। उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए और केंद्रीय बलों की तैनाती को लेकर भी आरोप लगाए। हैरानी की बात यह है कि यह सब उस समय कहा जा रहा है जब भारत का चुनाव आयोग विश्व की सबसे विश्वसनीय और विशाल चुनावी संस्थाओं में गिना जाता है। यदि किसी दल को चुनाव परिणाम स्वीकार नहीं हैं, तो उसके लिए न्यायपालिका, जन आंदोलन और संवैधानिक प्रक्रियाएं मौजूद हैं। फिर विदेशी राष्ट्रपति को पत्र लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी?</div><div><br></div><div>क्या भारत इतना कमजोर लोकतंत्र है कि यहां के चुनावों का फैसला विदेशी नेताओं की राय से तय होगा? क्या विपक्ष यह संदेश देना चाहता है कि भारत की संवैधानिक संस्थाओं पर उसे भरोसा नहीं है? यदि हर हार के बाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाकर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया जाएगा, तो इससे दुनिया में भारत की छवि पर क्या असर पड़ेगा?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-threat-of-fragmentation-within-india-a-time-for-introspection-for-the-opposition" target="_blank">इंडी में बिखराव का खतराः विपक्ष के लिए आत्ममंथन का समय</a></h3><div>इस पूरे विवाद में ममता बनर्जी का बयान भी कम गंभीर नहीं है। चुनाव हारने के बाद उनका यह कहना कि वह अंतरराष्ट्रीय अदालत तक जाएंगी, कई सवाल खड़े करता है। क्या किसी राज्य के चुनावी परिणाम को लेकर संयुक्त राष्ट्र की न्यायिक संस्था में जाने की बात करना भारत की संप्रभुता पर प्रश्नचिह्न लगाने जैसा नहीं है? जब देश का संविधान, सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग मौजूद हैं, तब विदेशी अदालतों की चर्चा क्यों?</div><div><br></div><div>दरअसल यह वही राजनीति है जिसमें जब तक सत्ता हाथ में रहे तब तक संस्थाएं निष्पक्ष लगती हैं, लेकिन हार मिलते ही चुनाव आयोग, सुरक्षा बल, न्यायपालिका और लोकतंत्र सब कटघरे में खड़े कर दिए जाते हैं। यह प्रवृत्ति केवल राजनीतिक असंतोष नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के विश्वास को कमजोर करने का प्रयास भी मानी जा सकती है।</div><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या विपक्षी दल अपनी राजनीतिक हार को स्वीकार करने का साहस खो चुके हैं? क्या लोकतंत्र केवल तब तक सही है जब तक परिणाम उनके पक्ष में आएं? यदि हर चुनाव के बाद विदेशी शक्तियों से हस्तक्षेप की मांग की जाएगी, तो क्या यह देश की आंतरिक संप्रभुता के खिलाफ कदम नहीं माना जाएगा?</div><div><br></div><div>भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां सत्ता परिवर्तन चुनावों के माध्यम से होता है, अदालतें स्वतंत्र हैं और मीडिया पूरी तरह सक्रिय है। ऐसे में विदेशी नेताओं और अंतरराष्ट्रीय मंचों को भारत के घरेलू राजनीतिक विवादों में घसीटना न केवल राजनीतिक अपरिपक्वता दर्शाता है, बल्कि यह देश की गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है।</div><div><br></div><div>राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन देश की छवि और संस्थाओं की विश्वसनीयता से खिलवाड़ किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। देखा जाये तो लोकतंत्र में हार और जीत दोनों को स्वीकार करना ही सबसे बड़ी लोकतांत्रिक मर्यादा होती है। लेकिन संजय राउत जैसे लोग जोकि खुद करोड़ों के घोटाले के आरोप से जुड़े हैं और जेल काट चुके हैं, वह भारत के लोकतंत्र की शुचिता और जनमत की ईमानदारी पर सवाल उठा रहे हैं। यहां एक सवाल यह भी उठता है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दी गयी बधाई विपक्ष को इतनी चुभ क्यों रही है?</div><div><br></div><div>साथ ही संजय राउत भारतीय लोकतंत्र को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से शिकायत कर रहे हैं, लेकिन उन्हें यह भी देखना चाहिए कि स्वयं अमेरिका में लोकतंत्र की स्थिति को लेकर कितने गंभीर सवाल उठ चुके हैं। दुनिया ने देखा कि वर्ष 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हार के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव परिणाम स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। चुनावी धांधली के आरोपों को लेकर उनके समर्थकों ने अमेरिकी संसद भवन कैपिटल हिल पर हमला तक कर दिया था, जिसे अमेरिकी लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना गया। उस घटना में हिंसा हुई, कई लोग घायल हुए और पूरे विश्व ने अमेरिका की लोकतांत्रिक व्यवस्था को संकट में देखा। इतना ही नहीं, ट्रंप लगातार अमेरिकी चुनाव प्रणाली, न्याय व्यवस्था और मीडिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में भारतीय नेताओं द्वारा अमेरिका को सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र का प्रमाण पत्र बांटने वाला देश मान लेना अपने आप में कई प्रश्न खड़े करता है। भारत में चुनाव करोड़ों मतदाताओं की भागीदारी से शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होते हैं और सत्ता परिवर्तन भी संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होता है। इसलिए विदेशी नेताओं से शिकायत करने से पहले विपक्ष को यह भी देखना चाहिए कि जिन देशों की ओर वह उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है, वहां स्वयं लोकतंत्र कितनी चुनौतियों से गुजर रहा है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 08 May 2026 12:05:25 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/sanjay-raut-letter-to-donald-trump-raises-questions-about-the-patriotism-of-opposition-leaders</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[इंडी में बिखराव का खतराः विपक्ष के लिए आत्ममंथन का समय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-threat-of-fragmentation-within-india-a-time-for-introspection-for-the-opposition]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की अपनी-अपनी अनिवार्य भूमिकाएं हैं। जहां सत्ता नीतियों का निर्माण और क्रियान्वयन करती है, वहीं विपक्ष उन नीतियों की समीक्षा, संतुलन और वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करता है। लेकिन जब विपक्ष स्वयं ही असंगठित, दिशाहीन और अंतर्विरोधों से ग्रस्त हो जाए, तब लोकतांत्रिक संतुलन भी प्रभावित होता है। हाल के पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सहित अन्य राज्यों के चुनाव परिणामों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि विपक्षी एकता का दावा करने वाला गठबंधन अपने भीतर ही गंभीर संकट से गुजर रहा है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की पराजय और तमिलनाडु में द्रमुक की स्थिति ने विपक्षी खेमे को झकझोरने का काम किया है। यह केवल चुनावी हार नहीं है, बल्कि रणनीतिक विफलता का भी संकेत है और यह प्रश्न भी खड़ा करता है कि क्या विपक्ष केवल भाजपा-विरोध के आधार पर टिक सकता है या उसे एक ठोस वैचारिक और नीतिगत आधार की भी आवश्यकता है। भारतीय लोकतंत्र की सुदृढ़ता केवल सत्तापक्ष की नीतियों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि एक सजग, विवेकशील और रचनात्मक विपक्ष पर भी उतनी ही आधारित होती है। विपक्ष का मूल दायित्व केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करना, नीतियों की खामियों को तथ्यों के आधार पर उजागर करना और जनहित के मुद्दों को प्रभावी ढंग से संसद एवं समाज के समक्ष रखना है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष सरकार का विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन का संरक्षक होता है। उसे विकास कार्यों में सहयोग करते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शासन पारदर्शी, जवाबदेह और जनोन्मुखी बना रहे। दुर्भाग्यवश, पिछले दो दशकों में विपक्ष का एक बड़ा वर्ग इस रचनात्मक भूमिका से भटकता दिखाई दिया है, जहां नीतिगत बहसों की जगह व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक शोर-शराबा अधिक प्रमुख हो गया है।</div><div><br></div><div>इंडिया गठबंधन का गठन एक बड़े राजनीतिक उद्देश्य के साथ हुआ था-भाजपा के वर्चस्व को चुनौती देना। प्रारंभिक स्तर पर यह प्रयास कुछ हद तक सफल भी दिखाई दिया, जब इस गठबंधन ने भाजपा को पूर्ण बहुमत से दूर रखने में भूमिका निभाई, लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट होता गया कि यह गठबंधन वैचारिक एकता से अधिक राजनीतिक अवसरवाद पर आधारित है। गठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी उसका आंतरिक समन्वय है, जहां विभिन्न दलों के अपने-अपने क्षेत्रीय हित, नेतृत्व की महत्वाकांक्षाएं और अलग-अलग राजनीतिक एजेंडे अक्सर एक-दूसरे से टकराते हैं। सीट बंटवारे से लेकर नेतृत्व के प्रश्न तक, हर स्तर पर मतभेद सामने आते रहे हैं, जिससे यह स्थिति बनती है कि केवल एक साझा विरोध के आधार पर गठबंधन को स्थायी नहीं बनाया जा सकता। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी जैसे प्रमुख चेहरों के बीच जिस तरह की बयानबाजी सामने आई है, वह गठबंधन की आंतरिक स्थिति को और अधिक उजागर करती है। सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे की आलोचना करना न केवल राजनीतिक परिपक्वता की कमी को दर्शाता है, बल्कि कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच भी भ्रम की स्थिति पैदा करता है। राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उन्हें व्यक्त करने का तरीका और मंच भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि जब गठबंधन के नेता ही एक-दूसरे के खिलाफ बयान देने लगें, तो यह संदेश जाता है कि गठबंधन केवल नाम का है और वास्तविकता में वह बिखराव की ओर बढ़ रहा है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/talks-about-hindu-identity-dressing-like-vivekananda-will-bjp-make-bengal-yogi-the-cm" target="_blank">हिंदू अस्मिता की बातें, विवेकानंद सा पहनावा, बंगाल के 'योगी' को CM बनाएगी BJP?</a></h3><div>महिला आरक्षण विधेयक पर विपक्ष का रुख भी उसकी रणनीतिक कमजोरी को उजागर करता है। यह विधेयक भारतीय समाज की आधी आबादी से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय था, लेकिन इसका विरोध जिस रूप में सामने आया, उसने विपक्ष की स्थिति को कमजोर किया। विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उसका स्वरूप रचनात्मक होना चाहिए था। यदि विपक्ष इस विधेयक में सुधार के सुझाव देता, उसके क्रियान्वयन की समय-सीमा और प्रक्रिया पर सवाल उठाता, तो वह अधिक प्रभावी और विश्वसनीय बन सकता था, लेकिन सीधे विरोध में खड़ा होना, वह भी बिना स्पष्ट जनसंदेश के यह दर्शाता है कि विपक्ष मुद्दों को समझने और उन्हें सही तरीके से प्रस्तुत करने में चूक कर रहा है। इसका प्रभाव विशेष रूप से महिला मतदाताओं पर पड़ा, जिन्होंने इसे अपने अधिकारों के विस्तार के रूप में देखा और इसी का राजनीतिक लाभ भाजपा ने अपनी रणनीति के माध्यम से उठाया। भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी ताकत उसकी आत्मसमीक्षा और सुधार की क्षमता रही है। हार के बाद भी वह अपने संगठन, नेतृत्व और रणनीति में बदलाव करती है, जिससे वह और अधिक मजबूत होकर सामने आती है। इसके विपरीत, विपक्ष अक्सर अपनी हार के कारणों को बाहरी परिस्थितियों में खोजता है, जिससे वह अपनी कमजोरियों को पहचानने और उन्हें दूर करने में असफल रहता है। राजनीति में परिपक्वता का अर्थ है हार को स्वीकार करना, उससे सीखना और भविष्य के लिए बेहतर रणनीति बनाना, लेकिन इस दिशा में विपक्ष को अभी लंबा रास्ता तय करना है।&nbsp;</div><div><br></div><div>विपक्षी गठबंधन के भीतर सबसे बड़ा संकट हितों का टकराव है, जहां हर दल अपने क्षेत्रीय आधार को मजबूत करने की कोशिश करता है और इसी प्रक्रिया में वह अपने सहयोगी दलों से भी प्रतिस्पर्धा करने लगता है। पश्चिम बंगाल, दिल्ली, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह द्वंद्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जहां सहयोग और प्रतिस्पर्धा एक साथ चलते हैं और अंततः यही स्थिति बिखराव को जन्म देती है। जब तक गठबंधन के भीतर स्पष्ट भूमिका निर्धारण, न्यूनतम साझा कार्यक्रम और नेतृत्व की स्वीकृति नहीं होगी, तब तक यह टकराव समाप्त नहीं होगा। विपक्षी दलों की यह नाकामी केवल रणनीतिक कमजोरी नहीं, बल्कि उनके नेतृत्व की मंशा और प्राथमिकताओं पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। जब विपक्ष जनहित के मुद्दों को छोड़कर सत्ता प्राप्ति के लिए अवसरवादी गठजोड़, भ्रामक प्रचार और व्यक्तिगत हमलों का सहारा लेता है, तब वह अपनी नैतिक विश्वसनीयता खो देता है। लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व जनभावनाओं का सच्चा प्रतिनिधित्व करना और सरकार को सही दिशा में प्रेरित करना है, न कि केवल विरोध के लिए विरोध करना। आज आवश्यकता इस बात की है कि विपक्ष अपने आचरण और दृष्टिकोण में सुधार लाए, सिद्धांतों और मूल्यों पर आधारित राजनीति को पुनर्जीवित करे तथा जनता के विश्वास को पुनः अर्जित करे। तभी भारतीय लोकतंत्र वास्तविक अर्थों में मजबूत और संतुलित बन सकेगा।</div><div><br></div><div>आज आवश्यकता इस बात की है कि विपक्ष स्वयं को पुनर्गठित करे, अपनी वैचारिक स्पष्टता स्थापित करे और जनता के सामने एक सकारात्मक एवं ठोस विकल्प प्रस्तुत करे। केवल विरोध की राजनीति अब पर्याप्त नहीं है, बल्कि जनहित के मुद्दों पर स्पष्ट दृष्टिकोण और व्यवहारिक समाधान भी आवश्यक हैं। आंतरिक मतभेदों को सार्वजनिक करने के बजाय संवाद के माध्यम से सुलझाना होगा और जनता के बदलते मिजाज को समझते हुए अपनी रणनीति को नया स्वरूप देना होगा। भारतीय राजनीति एक ऐसे दौर में पहुंच चुकी है, जहां मतदाता अधिक सजग और निर्णायक हो चुका है। ऐसे में गठबंधन की राजनीति को केवल संख्या के खेल से आगे बढ़कर विश्वास, समन्वय और स्पष्टता की नींव पर खड़ा होना होगा। बिखराव केवल राजनीतिक शक्ति को ही कमजोर नहीं करता, बल्कि लोकतंत्र के संतुलन को भी प्रभावित करता है। अंततः राजनीति में वही सफल होता है जो समय के साथ सीखता है, बदलता है और स्वयं को बेहतर बनाता है। “हार को पचाना और उससे सीख लेना” केवल एक कहावत नहीं, बल्कि सफल राजनीति का मूलमंत्र है, जिसे भाजपा ने बार-बार सिद्ध किया है और अब विपक्ष के सामने भी यही चुनौती है कि वह इस मूलमंत्र को अपनाकर अपने बिखराव को शक्ति में बदल पाए या फिर आंतरिक संघर्षों में उलझकर अपनी प्रासंगिकता खोता जाए।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 07 May 2026 19:24:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-threat-of-fragmentation-within-india-a-time-for-introspection-for-the-opposition</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पुराने दोस्त द्रमुक का हाथ दिया झटक, सत्ता के लिए पाला बदलने में कांग्रेस को कभी नहीं होती हिचक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/shaking-off-the-hand-of-old-friend-dmk-congress-has-never-hesitated-to-switch-sides-for-power]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>तमिलनाडु की राजनीति में आज एक बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ देखने को मिला, जब कांग्रेस ने विजय की तमिलगा वेत्री कड़गम यानि टीवीके को सरकार गठन के लिए समर्थन देने की घोषणा कर दी। इस फैसले के साथ ही द्रविड़ मुनेत्र कषगम यानि द्रमुक और कांग्रेस के बीच दो दशक से अधिक पुराने राजनीतिक रिश्ते पर लगभग विराम लग गया है। कांग्रेस ने साफ किया है कि उसका यह गठबंधन केवल सरकार गठन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय निकाय, लोकसभा और राज्यसभा चुनावों तक जारी रहेगा।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में विजय की पार्टी टीवीके 234 सदस्यीय सदन में 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। बहुमत के लिए 118 सीटों की जरूरत है। कांग्रेस के पांच विधायकों के समर्थन के बाद यह संख्या 113 तक पहुंच गई है और अब सरकार गठन के लिए केवल पांच और विधायकों की आवश्यकता रह गई है। विजय ने राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा भी पेश कर दिया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/congress-kingmaker-in-tamil-nadu-vijay-will-take-oath-as-cm-tomorrow-rahul-gandhi-also-attend" target="_blank">Tamil Nadu में Congress बनी Kingmaker, एक्टर विजय कल लेंगे CM पद की शपथ, Rahul Gandhi भी होंगे शामिल</a></h3><div>कांग्रेस ने अपने समर्थन के साथ एक महत्वपूर्ण शर्त भी रखी है। पार्टी ने कहा है कि टीवीके किसी भी परिस्थिति में भाजपा या उसके सहयोगी दलों को सरकार या गठबंधन का हिस्सा नहीं बनाएगी। तमिलनाडु प्रभारी गिरीश चोडानकर ने कहा कि कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और संवैधानिक मूल्यों वाली राजनीति के साथ खड़ी है और जनता के जनादेश का सम्मान करना उसका कर्तव्य है।</div><div><br></div><div>उधर, कांग्रेस के इस फैसले ने द्रमुक को गहरा राजनीतिक झटका दिया है। द्रमुक नेताओं ने इसे ‘‘पीठ में छूरा घोंपना’’ बताया है। यह नाराजगी इसलिए भी अधिक है क्योंकि द्रमुक और कांग्रेस का रिश्ता केवल चुनावी समझौता नहीं बल्कि लंबे समय की राजनीतिक साझेदारी माना जाता रहा है। दोनों दल पहली बार 1971 में साथ आए थे और बाद में 2004 से 2013 तक द्रमुक केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का अहम हिस्सा रही थी। 2016 के बाद दोनों ने फिर मिलकर चुनाव लड़े और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी राजनीति की मजबूत धुरी बने।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का यह कदम केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर राष्ट्रीय राजनीति और विपक्षी गठबंधन इंडिया पर भी पड़ेगा। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कांग्रेस और द्रमुक तमिलनाडु में आमने सामने होंगे, तब क्या वह राष्ट्रीय स्तर पर एक मंच पर बने रह पाएंगे। कांग्रेस यह तर्क दे रही है कि वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस की तरह अलग अलग राज्यों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद इंडिया गठबंधन जारी रह सकता है। लेकिन द्रमुक की नाराजगी और कांग्रेस के नए रुख ने विपक्षी एकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।</div><div><br></div><div>इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ विजय और उनकी पार्टी टीवीके को मिलता दिखाई दे रहा है। पहली बार चुनाव लड़कर सबसे बड़ी पार्टी बनना और उसके तुरंत बाद कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल का समर्थन हासिल करना विजय को राज्य की राजनीति में एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करता है। यही कारण है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने चेन्नई स्थित सत्यमूर्ति भवन में जश्न मनाया और इसे नई राजनीतिक शुरुआत बताया।</div><div><br></div><div>विजय ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी से बात कर उन्हें शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित भी किया है। इससे यह संकेत मिलता है कि दोनों दल भविष्य में स्थायी राजनीतिक साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। कांग्रेस नेता प्रवीण चक्रवर्ती ने बताया कि विजय ने राहुल गांधी और खरगे को फोन कर समर्थन के लिए धन्यवाद दिया। हालांकि सरकार गठन का रास्ता अभी पूरी तरह साफ नहीं है। कांग्रेस के समर्थन के बाद भी टीवीके बहुमत से पांच सीट दूर है। ऐसे में नजर अब अन्नाद्रमुक पर टिकी है, जिसके पास 47 विधायक हैं। यदि अन्नाद्रमुक किसी रूप में समर्थन देती है, तो विजय आसानी से बहुमत हासिल कर सकते हैं। लेकिन यही वह स्थिति है जिसने कांग्रेस को असहज कर रखा है, क्योंकि उसने स्पष्ट कहा है कि भाजपा या उसके सहयोगियों की भागीदारी स्वीकार नहीं होगी। ऐसे में देखना होगा कि क्या अन्नाद्रमुक में विभाजन होता है या फिर अन्नाद्रमुक भाजपा का साथ छोड़कर विजय के साथ आ जाती है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो तमिलनाडु की राजनीति का इतिहास भी बताता है कि यहां गठबंधन स्थायी नहीं रहे हैं। कभी कांग्रेस और द्रमुक साथ रहे, फिर कांग्रेस अन्नाद्रमुक के साथ चली गई। 1999 में द्रमुक ने भाजपा के साथ हाथ मिलाया, जबकि 2004 में वह फिर कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन में लौट आई। इस बार भी सत्ता समीकरण ने पुराने रिश्तों को बदल दिया है। राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो कांग्रेस का यह फैसला व्यावहारिक राजनीति का उदाहरण माना जा रहा है। पार्टी को यह एहसास हो गया था कि द्रमुक के साथ रहते हुए उसकी भूमिका सीमित होती जा रही थी। वहीं टीवीके के साथ आने से उसे भविष्य में अधिक सीटें और सत्ता में भागीदारी मिलने की संभावना दिखाई दे रही है। दूसरी ओर द्रमुक के लिए यह संकट का समय है, क्योंकि उसका सबसे पुराना सहयोगी अब उसके विरोधी खेमे में खड़ा दिखाई दे रहा है।</div><div><br></div><div>आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इंडिया गठबंधन इस राजनीतिक झटके को संभाल पाता है या फिर राज्यों में बदलते समीकरण राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता को कमजोर कर देंगे। फिलहाल इतना तय है कि तमिलनाडु की राजनीति में विजय का उदय और कांग्रेस का नया दांव देश की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत का संकेत दे रहा है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 06 May 2026 19:53:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/shaking-off-the-hand-of-old-friend-dmk-congress-has-never-hesitated-to-switch-sides-for-power</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बंगाल में निर्ममता की हार, तुष्टिकरण पर प्रहार और विकास की बयार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-defeat-of-ruthlessness-the-attack-on-appeasement-and-the-wind-of-development-in-bengal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल के जनादेश ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि जनता प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के निर्णायक, प्रभावी और परिणाम देने वाले नेतृत्व पर अडिग विश्वास रखती है। यह भरोसा किसी भावनात्मक लहर का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों से दिख रहे सुशासन, पारदर्शिता और निरंतर विकास की ठोस बुनियाद पर खड़ा है। यह केवल एक चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि बंगाल की जनता के भीतर वर्षों से पनप रहे आक्रोश, पीड़ा और बदलाव की आकांक्षा का सशक्त विस्फोट है। इस जनादेश में साफ दिखता है कि जनता ने भय की राजनीति को नकारते हुए भरोसे को अपनाया, तुष्टिकरण को ठुकराकर विकास को चुना और भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होकर सुशासन को प्राथमिकता दी। बंगाल में यह जीत वास्तव में जनता की जीत है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में चल रहे टोलाबाजी, सिंडिकेट राज, भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा और खुले तुष्टिकरण के खिलाफ जनता लंबे समय से सड़कों पर थी। हर वर्ग, चाहे वह किसान हो, युवा हो, महिला हो या व्यापारी, सबने इस व्यवस्था के खिलाफ मन बना लिया था।&nbsp;</div><div><br></div><div>पिछले वर्षों में पश्चिम बंगाल में जिस तरह से हिन्दू समाज के साथ भेदभाव हुआ, वह किसी से छिपा नहीं है। तुष्टिकरण की राजनीति ने सामाजिक संतुलन को बिगाड़ा और अवैध घुसपैठ को प्रोत्साहन देकर राज्य की पहचान और सुरक्षा दोनों पर सवाल खड़े कर दिए गए। हालात ऐसे बन गए थे कि कई इलाकों में हिन्दू समाज को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया। चुनाव के समय उन्हें वोट डालने तक से रोका गया, डराया-धमकाया गया। यह लोकतंत्र का अपमान था, लेकिन इस बार जनता ने इन सबका जवाब दिया है। ममता बनर्जी की हताशा चुनाव से पहले ही दिखने लगी थी। एक भ्रष्ट निजी कंपनी को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाना, मतगणना में केंद्रीय कर्मचारियों की उपस्थिति का विरोध करना, ये सभी कदम इस बात के संकेत थे कि उन्हें अपनी हार का अंदाजा हो चुका था। लेकिन लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है और जनता ने अपना फैसला स्पष्ट रूप से सुना दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/in-west-bengal-it-is-now-the-politics-of-change-not-revenge" target="_blank">पश्चिम बंगाल में अब 'बदला' नहीं 'बदलाव' की राजनीति</a></h3><div>यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाती है कि देश की जनता आज भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व पर अटूट विश्वास रखती है। पिछले 12 वर्षों में केंद्र में भाजपा की सरकार ने जिस तरह से विकास और सुशासन का मॉडल प्रस्तुत किया है, उसका असर हर राज्य में दिख रहा है। जहां-जहां भाजपा की सरकारें हैं, वहां न केवल विकास हुआ है बल्कि जनता ने बार-बार उस पर मुहर लगाई है। असम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लगातार तीसरी बार भाजपा की सरकार बनना और वह भी पहले से अधिक, लगभग तीन-चौथाई बहुमत के साथ, यह बताता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में राज्य सरकारों ने विकास के नए मानक स्थापित किए हैं। असम में बुनियादी ढांचे से लेकर कानून-व्यवस्था तक हर क्षेत्र में सुधार हुआ है, जिसका परिणाम जनता के विश्वास के रूप में सामने आया है।</div><div><br></div><div>इन विधानसभा चुनावों में विपक्ष पूरी तरह से बिखरा हुआ नजर आया। राहुल गांधी एक बार फिर इस चुनाव में असफल नेता के रूप में सामने आए हैं। वह न तो इंडी गठबंधन को एकजुट रख पाए और न ही जनता के बीच कोई विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत कर पाए। चुनाव परिणामों के समय उनका विदेश में होना यह दर्शाता है कि वह इस जिम्मेदारी को गंभीरता से लेने के लिए तैयार ही नहीं हैं। इंडी गठबंधन अब केवल नाम का गठबंधन रह गया है, जिसका भविष्य अंधकारमय दिखता है। तमिलनाडु में वर्षों से जो लोग सनातन संस्कृति का अपमान करते आए, जिन्होंने हिन्दू आस्थाओं को निशाना बनाया, दीपम जैसे धार्मिक आयोजनों में बाधाएं डालीं और धर्म-भाषा के नाम पर समाज को बांटने की कोशिश की। जनता ने उन्हें भी करारा जवाब दिया है। सनातन संस्कृति की तुलना डेंगू-मलेरिया जैसी बीमारियों से करने वाली मानसिकता को जनता ने नकार दिया है। यह बदलाव धीरे-धीरे ही सही, लेकिन स्थायी रूप से उभर रहा है। पुडुचेरी में भी भाजपा के प्रति जनता का विश्वास बढ़ा है। भले ही यह प्रतिशत में कम दिखे, लेकिन यह संकेत स्पष्ट है कि दक्षिण भारत में भी भाजपा अपनी पकड़ मजबूत कर रही है। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी वैचारिक बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। केरल में भी भाजपा का आधार लगातार मजबूत हो रहा है। भले ही अभी वहां सत्ता तक पहुंचने में समय लगे, लेकिन जनता के बीच वैचारिक परिवर्तन साफ दिखाई दे रहा है। यह दर्शाता है कि देश का हर कोना अब विकास और राष्ट्रवाद की राजनीति की ओर बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>बंगाल की इस ऐतिहासिक जीत के पीछे भाजपा के लाखों कार्यकर्ताओं का संघर्ष और बलिदान छिपा हुआ है। पिछले कई वर्षों में, खासकर पिछले विधानसभा चुनाव के बाद, भाजपा कार्यकर्ताओं ने जिस तरह की हिंसा और उत्पीड़न का सामना किया, वह अभूतपूर्व था। हजारों कार्यकर्ताओं को बेघर होना पड़ा, कईयों के घरों में आग लगा दी गई, दुकानों को लूट लिया गया, महिलाओं के साथ अत्याचार हुए और कई कार्यकर्ताओं ने अपनी जान तक गंवाई। तृणमूल कांग्रेस के गुंडों द्वारा किए गए इन अत्याचारों के बावजूद भाजपा कार्यकर्ता डटे रहे। उन्होंने हार नहीं मानी, बल्कि और मजबूती से संघर्ष किया। यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि विचारधारा और लोकतंत्र की रक्षा का संघर्ष था। आज जब बंगाल में कमल खिला है, तो यह केवल एक पार्टी की जीत नहीं, बल्कि उन सभी कार्यकर्ताओं के बलिदान का परिणाम है, जिन्होंने अपने खून-पसीने से इस जमीन को सींचा। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की धरती पर यह जीत विशेष महत्व रखती है। यही वह भूमि है जहां से वैकल्पिक राजनीति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नींव रखी गई थी। आज उसी धरती पर भाजपा का परचम लहराना, उस विचारधारा की जीत है जो राष्ट्र की एकता और अखंडता को सर्वोपरि मानती है।</div><div><br></div><div>यह जनादेश लोकतंत्र की जीत है, संविधान की जीत है और सबसे बढ़कर बंगाल की जनता की जीत है। यह संदेश साफ है, जो सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती, जो भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण में डूबी होती है, उसे सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है। और जो सरकार विकास, सुशासन और विश्वास के साथ आगे बढ़ती है, जनता उसे बार-बार अपना समर्थन देती है। यह केवल शुरुआत है। आने वाले समय में देश की राजनीति और अधिक स्पष्ट होगी, एक तरफ विकास और राष्ट्रवाद की राजनीति होगी और दूसरी तरफ अवसरवाद और तुष्टिकरण की। जनता ने अपना रास्ता चुन लिया है, और यह रास्ता परिवर्तन का है, प्रगति का है और एक मजबूत भारत के निर्माण का है।</div><div><br></div><div>- प्रेम शुक्ल</div><div>भारतीय जनता पार्टी</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 06 May 2026 12:42:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-defeat-of-ruthlessness-the-attack-on-appeasement-and-the-wind-of-development-in-bengal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[बंगाल विजयः संघ की जमीनी साधना शांति से शक्ति तक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/bengal-vijay-sangh-grassroots-efforts-from-peace-to-power]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ऐतिहासिक, अद्भुत, अविस्मरणीय एवं करिश्माई जीत के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (संघ) की बहुत बड़ी भूमिका रही है। निश्चिततौर पर इस शानदार जीत के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह मुख्य भूमिका में हैं। लेकिन बंगाल में ममता बनर्जी की मजबूत चुनौती के सामने भाजपा की जीत के लिए संघ लंबे समय से मेहनत कर रही थी और उसकी वह मेहनत ही जीत का सशक्त माध्यम बनी है। पश्चिम बंगाल में लगातार चल रही हिन्दू विरोधी गतिविधियों एवं मुसलमानों के बढ़ते वर्चस्व को देखते हुए संघ ने इस चुनाव के मद्देनजर बहुत पहले से ही कमर कस ली थी,&nbsp; संघ ने पश्चिम बंगाल में 1.75 लाख से अधिक छोटी-बड़ी बैठकें आयोजित कीं। पिछले 15 सालों में संघ ने पश्चिम बंगाल में तेजी से विस्तार किया है और एक मजबूत ‘हिंदू वोट बैंक’ तैयार किया है। पश्चिम बंगाल में पिछले 15 वर्षों में संघ की शाखाओं की संख्या 900 से बढ़कर 5,000 तक पहुंच गई है। संघ के स्वयंसेवकों ने पश्चिम बंगाल में घर-घर जाकर ‘बंग बचाओ’ इस थीम पर ‘मतदाता जागरूकता अभियान’ चलाया। संघ की माइक्रो प्लानिंग ने बंगाल में भाजपा को ऐतिहासिक बढ़त दिलाई और सत्ता परिवर्तन का माध्यम बनी। पश्चिम बंगाल चुनाव भाजपा के लिए एक ऐतिहासिक ‘मील का पत्थर’ और ऐतिहासिक सफलता साबित हुआ।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि राजनीति केवल बड़े मंचों, विशाल रैलियों और जोरदार नारों से तय नहीं होती। कई बार असली लड़ाई उन स्तरों पर लड़ी जाती है, जहां न कैमरे पहुंचते हैं और न ही जमीनी प्रयास सुर्खियां बनती हैं। इस बार के चुनाव में एक ऐसी ही खामोश रणनीति कारगर साबित हुई है। जहां एक ओर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का आक्रामक चुनाव प्रचार केंद्र में रहा, वहीं दूसरी ओर संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं ने अपेक्षाकृत शांत रहकर ‘निःशब्द विप्लव’ या ‘मूक क्रांति’ को अंजाम देते हुए जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने पर ध्यान दिया। बंगाल की अस्मिता, विकास और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों को आधार बनाकर जनजागरण अभियान चलाया गया। इस दौरान महिला, युवा, प्रबुद्ध वर्ग, किसान, श्रमिक और अनुसूचित जाति-जनजाति समुदायों तक अलग-अलग तरीकों से पहुंचने की कोशिश की गई।</div><div><br></div><div>निश्चिततौर पर पश्चिम बंगाल की राजनीति ने वर्ष 2026 में जो ऐतिहासिक करवट ली, वह केवल सत्ता परिवर्तन की घटना नहीं है, बल्कि एक गहरे सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक परिवर्तन का संकेत भी है। लंबे समय तक वामपंथी प्रभाव और उसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व रहा, लेकिन इस बार जनमत ने जिस प्रकार से भाजपा के पक्ष में निर्णायक रूप से झुकाव दिखाया, उसने स्थापित राजनीतिक धारणाओं को चुनौती दी है। इस परिवर्तन के मूल में जो शक्ति को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी रही है तो वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसने एक अदृश्य लेकिन अत्यंत प्रभावशाली भूमिका निभाई है। यह विजय केवल चुनावी रणनीतियों का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों से चल रहे संगठनात्मक परिश्रम, वैचारिक विस्तार और समाज के भीतर गहराई तक किए गए संवाद का परिणाम है। पश्चिम बंगाल में संघ का विस्तार किसी तात्कालिक राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित नहीं था, बल्कि यह एक दीर्घकालिक सामाजिक दृष्टि का हिस्सा था। पिछले डेढ़ दशक में संघ ने प्रांत में जिस प्रकार अपनी शाखाओं का विस्तार किया और समाज के विभिन्न वर्गों तक अपनी पहुंच बनाई, उसने एक मजबूत वैचारिक आधार तैयार किया। यह कार्य किसी प्रचार की तरह नहीं, बल्कि एक शांत सामाजिक प्रक्रिया एवं क्रांति की तरह हुआ, जिसने धीरे-धीरे जनमानस को प्रभावित किया। यही कारण है कि जब चुनाव का समय आया, तो एक पहले से तैयार मानसिकता भाजपा के पक्ष में खड़ी दिखाई दी।</div><div><br></div><div>इस पूरे परिदृश्य में सरसंघचालक मोहन भागवत की रणनीतिक दृष्टि को भी विशेष रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए। उन्होंने बंगाल को केवल एक राजनीतिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक भूमि के रूप में देखा, भारत की अस्मिता के रूप में देखा। जिसकी अपनी विशिष्ट पहचान और परंपराएं हैं। संघ के प्रयासों में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि उसने बंगाल की सांस्कृतिक चेतना को समझने और उससे जुड़ने का प्रयास किया। दुर्गा पूजा, काली पूजा और रामनवमी जैसे पर्वों को सामाजिक एकता और सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे एक व्यापक सामाजिक जुड़ाव स्थापित हुआ। इस प्रक्रिया में हिंदुत्व को किसी बाहरी विचारधारा के रूप में नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक आत्मा के एक स्वाभाविक विस्तार के रूप में प्रस्तुत किया गया। लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि बंगाली अस्मिता और हिंदुत्व परस्पर विरोधी हैं, लेकिन इस चुनाव में यह धारणा काफी हद तक टूटती हुई दिखाई दी। “जय श्री राम” के साथ “जय मां काली” और “जय मां दुर्गा” जैसे नारों का समन्वय केवल राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक संदेश था, जिसने यह स्थापित किया कि क्षेत्रीय पहचान और व्यापक सांस्कृतिक विचारधारा के बीच कोई टकराव नहीं है। इस समन्वय ने मतदाताओं के भीतर एक नई प्रकार की आत्मजागरूकता उत्पन्न की, जहां वे केवल विकास या योजनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी पहचान, सुरक्षा और सांस्कृतिक गौरव के आधार पर भी निर्णय लेने लगे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-new-dawn-of-nationalism-in-bengal" target="_blank">श्यामा बाबू के संकल्प की जीत, विवेकानंद के विचारों की प्रीति: बंगाल में राष्ट्रवाद का नया सूर्योदय</a></h3><div>चुनाव के दौरान जिस प्रकार से ‘अस्तित्व’ एवं ‘अस्मिता’ का विमर्श उभरा, उसने इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य को एक नई दिशा दी। संघ और भाजपा ने इसे केवल एक चुनावी मुकाबले के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि एक वैचारिक संघर्ष के रूप में स्थापित किया, जिसमें पहचान और सम्मान के प्रश्न प्रमुख हो गए। ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस पर लगाए गए तुष्टिकरण के आरोपों ने इस विमर्श को और तीव्र किया, जिससे मतदाताओं के बीच एक स्पष्ट ध्रुवीकरण देखने को मिला। इस पूरे प्रक्रिया में संघ ने जमीनी स्तर पर संवाद स्थापित कर इस विचार को सामाजिक स्वीकृति दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संगठनात्मक दृष्टि से भी यह चुनाव एक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि किस प्रकार मजबूत जमीनी ढांचा चुनावी सफलता का आधार बन सकता है। बूथ स्तर तक सक्रियता, कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय, गुटबाजी पर नियंत्रण और नए-पुराने कार्यकर्ताओं का एकीकरण-इन सभी पहलुओं में संघ की भूमिका महत्वपूर्ण रही। यह केवल एक राजनीतिक दल का प्रयास नहीं था, बल्कि एक व्यापक संगठनात्मक सहयोग का परिणाम था, जिसने भाजपा को एक सशक्त चुनावी शक्ति के रूप में स्थापित किया।</div><div><br></div><div>इस जीत में नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह की रणनीतिक क्षमता ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन इन प्रयासों को प्रभावी बनाने के लिए जिस सामाजिक आधार की आवश्यकता थी, वह संघ ने तैयार किया। यही कारण है कि यह जीत केवल शीर्ष नेतृत्व की सफलता नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर किए गए सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। इस चुनाव में बंगाल के मध्यम वर्ग का झुकाव भी एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में सामने आया। यह वर्ग परंपरागत रूप से विचारशील और राजनीतिक रूप से सजग माना जाता है और इसका समर्थन किसी भी राजनीतिक दल के लिए निर्णायक होता है। संघ ने इस वर्ग के बीच संवाद और जागरूकता के माध्यम से एक वैचारिक आधार तैयार किया, जिससे यह वर्ग भाजपा के समर्थन में एक मजबूत स्तंभ के रूप में उभरा। इस पूरे परिवर्तन को जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दृष्टिकोण और उनके सपनों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। उन्होंने जिस राष्ट्रवादी विचारधारा की नींव रखी थी, उसे आज बंगाल की धरती पर एक नए रूप में साकार होते हुए देखा जा रहा है। यह केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक वैचारिक निरंतरता का प्रतीक भी है।</div><div><br></div><div>अंततः यह स्पष्ट होता है कि पश्चिम बंगाल 2026 का चुनाव केवल एक चुनावी घटना नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक और वैचारिक परिवर्तन का प्रतीक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जिस प्रकार से वर्षों तक धैर्य और अनुशासन के साथ समाज के भीतर कार्य किया, वह आज परिणाम के रूप में सामने आया है। यह परिवर्तन यह संकेत देता है कि जब संगठनात्मक शक्ति, वैचारिक स्पष्टता और नेतृत्व की दिशा एक साथ मिलती है, तो वे न केवल राजनीतिक परिणामों को प्रभावित करती हैं, बल्कि समाज की दिशा को भी बदलने की क्षमता रखती हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह परिवर्तन किस प्रकार आगे विकसित होता है और क्या यह केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित रहता है या एक स्थायी सामाजिक पुनर्जागरण का आधार बनता है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 06 May 2026 10:15:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/bengal-vijay-sangh-grassroots-efforts-from-peace-to-power</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[केरल से सत्ता तो केरलम् से ही हाशिये में जाती कम्युनिस्ट पार्टियां]]></title>
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      <description><![CDATA[<div>पांच राज्यों के 4 मई के चुनाव परिणाम देश में बड़े बदलाव का संकेत लेकर आये हैं। एक और जहां पश्चिम बंगाल में पिछले 15 साल का ममता बनर्जी सरकार की करारी हार हुई है तो केरलम् में एलडीएफ की करारी हार के साथ ही देश में एक मात्र वामपंथी सरकार का भी अंत हो गया है। असम में हिमंता सरकार की हेटट्रिक, पुडुचेरी में एनडीए की वापसी और तमिलनाडू में डीएमके-एआईडीएमके की 57 साल की राजनीति का अंत और अभिनेता से नेता बने विजयन का उदय बहुत कुछ कहता है। जनता ने अपना मेंडेट दे दिया है तो चुनाव आयोग ने भी अपना कार्य बखूबी निभा दिया है भले ही अब हारने वाले लाख आरोप-प्रत्यारोप लगायें पर इन चुनावों की एक खास विशेषता यह रही कि मतदान प्रतिशत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी और हिंसा भी लगभग नहीं के बराबर रही है। प.बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की जीत के साथ भाजपा का वर्षों पुराना सपना पूरा हो गया है वहीं सबसे अधिक चिंतनीय व गंभीर परिणाम यह रहा है कि केरलम् में वामपंथी सरकार की हार के साथ ही देश में वामपंथ हाशिये में चला गया है। मजे की बात यह है कि 1956 में त्रावणकोर, कोचिन और मालाबार को मिलाकर बने केरलम् की 1957 की पहली चुनी हुई सरकार कम्युनिस्ट पार्टी ईएमएस नंबूदरीपाद की बनी। ठीक 70 साल बाद केरलम् में वामपंथियों की हार के साथ ही देश में वामपंथियों की एकमात्र राज्य की अंतिम सरकार का भी अंत हो गया है। सवाल यह उठने लगा है कि प. बंगाल और त्रिपुरा की तरह केरलम् में भी क्या अब वामपंथी सरकार आने वाले सालों में वापसी नहीं कर पायेगी ? इतिहास तो यही बता रहा है कि 34 साल के लगातार शासन के बावजूद 2011 के बाद से प. बंगाल में कम्यूनिस्ट सरकार की वापसी नहीं हो पायी है तो 25 साल से सरकार के बावजूद त्रिपुरा में भी 2018 के बाद से कम्युनिस्ट सरकार की वापसी नहीं हो पायी है। इससे लगता है कि वामपंथ या कम्युनिस्ट सरकारें अब इतिहास का हिस्सा बनती जा रही है। मजे की बात यह है कि लोकसभा में भी आज कम्युनिस्टों का प्रतिनिधित्व सिमट कर 4 की संख्या तक रह गया हैं हांलाकि यह गत लोकसभा से एक ज्यादा है। यह नहीं भूलना चाहिए कि 1977 के बाद जिस तरह से भारतीय राजनीति में कम्युनिस्ट पार्टियों का दबदबा बढ़ा वह 1990 के दशक में किंग मेकर की स्थिति में आ गया था यहां तक कि 2004 में लोकसभा में 59 सदस्यों के साथ कम्यूनिस्ट पार्टियों की सर्वाधिक भागीदारी रही और ज्योतिबसु को एक बार नहीं अपितु तीन बार देश का प्रधानमंत्री का पद ऑफर किया गया पर वामपंथियों में अहम् की लड़ाई के चलते यह अवसर खो दिया और इसके बाद तो कम्यूनिस्ट पार्टियां धीरे धीरे हाशिये में जाती रही जबकि सोमनाथ चटर्जी लोेकसभा अध्यक्ष रहे तो उस दौर में कम्यूनिस्ट पार्टियां किंग मेकर की भूमिका निभा रही थी। एक दौर था जब कम्युनिस्ट पार्टियों के बड़े बड़े नाम होते थे। समय ने पलटा खाया और धीरे धीरे पार्टिंयां पहचान खोने लगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>हमारे देश में कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास आजादी से पहले का है। 26 दिसंबर, 1925 को मानवेन्द्र नाथ रॉय जिन्हें एमएन रॉय के नाम से भी अधिक जाना जाता रहा है ने कानपुर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। उस समय अवनी मुखर्जी, एसबी घाटे, मोहम्मद अली और मोहम्मद शफीक सिद्धिकी उनके संस्थापक साथी रहे। कम्युनिस्टों की भारतीय राजनीति में उभार को इसी से समझा जा सकता है कि आजादी के बाद 1957 में केरल की पहली चुनी हुई सरकार वामपंथियों की बनी। यह दूसरी बात है कि बाद में कांग्रेस द्वारा इस सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। पर आजादी के बाद से अब तक केरल में अधिकांश शासन कम्युनिस्ट पार्टियों का ही रहा है। प. बंगाल में भी 1977 से 2011 तक लगातार कम्यूनिस्ट सरकार रही। त्रिपुरा में भी कम्युनिस्टों का बीच बीच में अंतराल के बावजूद काफी समय तक रहा है। माणिक सरकार के बाद से बीजेपी एनडीए गठबंधन ने त्रिपुरा में सत्ता संभाल ली है। 1964 में चीन को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन हुआ और भाकपा और माकपा दो पार्टियां बन गई। धीरे धीरे बर्चस्व और अहम् की लड़ाई ने कम्युनिस्ट आंदोलन को धक्का पहुंचाने के बाद ही भारतीय राजनीति में भी कम्यूनिस्ट पार्टियों का प्रभाव कम होता गया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/reviews-on-tea/analysis-of-election-results-in-bengal-tamil-nadu-assam-kerala-and-puducherry" target="_blank">Chai Par Sameeksha: Bengal, Tamil Nadu, Assam, Keralam, Puducherry के चुनाव परिणामों का विश्लेषण</a></h3><div>वैसे उदारीकरण के दौर में कम्युनिस्ट पार्टियों के सामने नए तरह की चुनौतियां सामने आई और 1922 में रुस में बना यूएसएसआर तक 70 साल बाद ही 1991 आते आते बिखराव के दौर में आ गया। यूक्रेन सहित कई राज्य अलग हो गए और आज रुस और यूक्रेन का संघर्ष जगजाहिर है। चीन ने समयानुकूल सोच विकसित किया और आज औद्योगिक दुनिया में चीन का वर्चस्व है। अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश चीन के वर्चस्व से चिंतित है और चीन की काट देखने लगा है। खैर यह विषयांतर होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>सौ टके का सवाल यह है कि केरलम् की विजयन सरकार की हार को देश में वामपंथी सरकारों का अंत माना जाना चाहिए या फिर वापसी की संभावना हो सकती है। सबसे बड़ी बात यह है कि जब केन्द्र में वामपंथियों का दखल बढ़ा तो वहीं वामपंथी पार्टिंयों के बिखराव का कारण बन गया। इगो के चलते ज्योतिबसु का विरोध हुआ तो सोमनाथ चटर्जी तक का विरोध किया गया। दरअसल समय के साथ बदलाव औैर समय की नब्ज को नहीं पहचानने से ही समस्याएं होती है। आज लगभग यही स्थिति स्थानीय दलों की होती जा रही है। समाजवादी पार्टी, बहुजनसमाज पार्टी, शिव सेना, एनसीपी, जेडीयू, जेडीएस, आप, शिरोमणी अकाली दल आदि धीरे धीरे जनाधार खोते जा रहे हैं और राज्यों तक ही सीमित होते जा रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों को सोच, नीति और रणनीति में बदलाव लाना होगा नहीं तो भविष्य में रही सही पहचान भी खोने में देरी नहीं लगेगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 06 May 2026 10:11:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/communist-parties-losing-power-in-kerala-being-marginalized-in-keralam</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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